खेल खिलाड़ी का compleet

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raj..
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Re: खेल खिलाड़ी का

Unread post by raj.. » 04 Nov 2014 10:35

गतान्क से आगे..............

अजीत निराश हो चला गया.दिव्या को थोड़ा अफ़सोस तो हुआ मगर इतना भी नही की वो परेशान हो जाए.दरअसल उसे अजीत से इतना प्यार नही था कि उसके बिना ज़िंदगी उसे अधूरी लगे.उन्ही दीनो दिव्या की पोस्टिंग डेवाले के साउत डिस्ट्रिक्ट मे हुई जहा डीसीपी वेर्मा उसके सीनियर अफ़सर थे.डीसीपी साहब ने किसी मंत्री की कोई नाजायज़ बात नही मानी & उसने 1 ऐसी गंदी चाल चली कि सभी लोग वेर्मा साहब पे उंगली उठाने लगे.डिपार्टमेंट ने उन्हे सस्पेंड कर दिया.बात इतनी खराब हुई कि वेर्मा साहब की बीवी भी उन झूठी बातो को मानने लगी.1 दिव्या ही थी जिसे वेर्मा साहब की ईमानदारी पे पूरा भरोसा था.उसने वेर्मा साहब के साथ मिलके 1 प्लान बनाया & उस मंत्री की चाल उसी पे उलट दी.

उन्ही दीनो जब वेर्मा साहब को सभी ने तन्हा छ्चोड़ दिया था & केवल दिव्या ही उनपे भरोसा करती थी,1 दिन वो उस से बात करते हुए जज़्बाती हो गये & दिव्या उनका हौसला बढ़ाने लगी & ना जाने कब दोनो 1 दूसरे की बाहो मे समा गये.मर्द के लिए चुदाई कयि बार तनाव भगाने का ज़रिया भी होती है & वेर्मा साहब के लिए भी वो चुदाई कुच्छ ऐसी ही थी.जब खुमारी टूटी तो उन्हे थोड़ा पचहतावा हुआ मगर दिव्या को बहुत मज़ा आया था.

होटेल के कमरे मे बिस्तर पे नंगी पड़ी वो यही सोच रही थी कि अगर परेशान वेर्मा साहब उसे इतनी खुशी पहुँचा सकते हैं तो खुश वेर्मा साहब तो उसे जन्नत दिखा देंगे!वेर्मा साहब को ये डर सता रहा था कि कही दिव्या इस बात का कोई ग़लत फयडा नही उठाए लेकिन उनका ये डर दिव्या ने ग़लत साबित किया & दोनो का रिश्ता & मज़बूत हो गया.दोनो को 1 दूसरे से कुच्छ नही चाहिए था सिवाय मस्ती के.

दिव्या ने गोद मे बैठे हुए ही वेर्मा साहब की कमीज़ निकाल दी & उनके सीने के बालो मे हाथ फिराते हुए हँसी.वेर्मा साहब भी उसकी शर्ट निकाल चुके थे & उसके नीचे पर्पल कलर के ट्रॅन्स्परेंट बार को देख वो चौंक पड़े थे.उनकी हैरत पे ही दिव्या को हँसी आ गयी थी.दिव्या कितने जोश मे थी उसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता था कि ब्रा मे से सॉफ दिख रहे उसके गुलाबी निपल्स बिल्कुल कड़े थे & ऐसा लग रहा था की ब्रा के पतले कपड़े को फाड़ डालना चाहते हों.

वेर्मा साहब ने अपने दाए हाथ की उंगलियो से उसके बाए निपल को मसला तो दिव्या ने आह भरी.नीचे गंद पे वो वेर्मा साहब के कुलबुलाते लंड को महसूस कर रही थी & उसकी मस्ती और बढ़ रही थी.वेर्मा साहब ने उसकी बाई चूची को अपने दाए हाथ मे भर लिया & झुक के उसकी दाई चूची को ब्रा के उपर से ही चूसने लगे.दिव्या अब खुल के आहे भरने लगी.कॅबिन साउंड प्रूफ था & इस वक़्त उन्हे डिस्टर्ब करने वाला भी कोई नही था.

दिव्या झुकी & वेर्मा साहब के सर को चूमते हुए उनकी पीठ पे अपने नखुनो से खओर्च्ने लगी.वेर्मा साहब को उसकी यही अदा बहुत पसंद थी,वो बिस्तर मे बिल्कुल शेरनी की तरह पेश आती थी.वेर्मा सहबा की बाहे उसकी कमर के गिर्द थी & उसकी मखमली पीठ पे उनके हाथ फिसल रहे थे.जब उनके हाथो ने उसके ब्रा के हुक्स को खोला तो दिव्या ने खुद अपने कंधो से ब्रा को सरका दिया.उसकी मस्त चूचियाँ नंगी होते ही वेर्मा साहब 1 बार फिर उन्हे पीने मे जुट गये.इस बार दिव्या ने उसके जिस्म को सहलाते हुए अपना बाया हाथ उनकी गोद मे घुसाया & उनकी पॅंट खोलने लगी.

दोनो के पास वक़्त तो था मगर इतना भी नही कि आराम से 1 दूसरे के जिस्मो का लुत्फ़ उठाएँ.वेर्मा साहब ने दिव्या को गोद से उतारा तो झट से घुटनो पे बैठ गयी & उनकी पॅंट खोलने लगी.वेर्मा साहब ने कुर्सी से बिना उठे बस अपनी गंद उचकाई & दिव्या ने उनकी पतलून निकाल उन्हे पूरा नंगा कर दिया.48 बरस के वेर्मा साहब का 7.5 इंच लंबा लंड पूरा तना अब उसकी आँखो के सामने था.बिना 1 पल भी गवाएँ दिव्या ने उसे अपने मुँह के हवाले किया & दाए हाथ से लंड को पकड़ उसे चूसने लगी.

"आहह....!",वेर्मा साहब कुर्सी से उचकते हुए कराहे.जिस बेबाकी से दिव्या उनके लंड के साथ खेलती थी,वो उनका जोश और बढ़ा देती थी.लंड के सूपदे को अपनी जीभ से चाटते हुए दिव्या ने उनके अंडे दबाए तो वेर्मा साहब का जिस्म मस्ती से भर उठा.उन्होने हाथ नीचे कर दिव्या की चूचियो को दबोच लिया & उन्हे दबाने लगे....कितनी नर्म थी उसकी चूचियाँ!छुते ही सनसनी सीधा हाथो से दिल & उस से भी पहले लंड तक पहुँचती थी....कैसे रखती है ये इतनी बड़ी चूचियो को इतना चुस्त?..1 बार फिर वेर्मा साहब हैरान हुए बिना नही रह सके.दिव्या की भारी-भरकम छातियाँ ज़रा भी झूली नही थी.जब वो जोश मे नही होती तब भी चूचियाँ सीधी तनी होती थी & उनके निपल सामने देख रहे होते.

दिव्या की लपलपाति जीभ वेर्मा साहब के लंड की लंबाई पे चल रही थी & वो उनके अंडे लगातार दबाए जा रही थी.वेर्मा साहब के आहे भरते-2 बुरा हाल था.जब दिव्या ने उनके लंड को अपनी 1 उंगली & अंगूठे के घेरे मे पकड़ हिलाते हुए उसके सूपदे को मुँह मे भर के कोई 2 मिनिट तक चूसा तो उनका खुद पे काबू रखना बिल्कुल नामुमकिन सा हो गया.कुर्सी पे छट-पटाते हुए उन्होने उसके बॉल पकड़ के उसकी ज़ुबान को अपने लंड से अलग किया.

ऐसा करते ही दिव्या उठी & खड़ी हो आगे झुक के उन्हे चूमने लगी.वेर्मा साहब के हाथ 1 बार फिर उसकी चूचियो से जा लगे.काफ़ी देर तक वो वैसे ही उसकी चूचियाँ भींचते हुए उसे चूमते रहे फिर उन्होने उसे सीधा खड़ा किया & उसकी नाज़ुक कमर को अपनी बाहो मे भींच उसके सपाट,चिकने पेट से अपना मुँह सटा दिया.

"आहह....!",दिव्या ने मस्ती मे सर पीछे कर आँखे बंद कर आह भरी.उसके बॉस की ज़ुबान उसके पेट पे फिसल रही थी & धीरे-2 उसकी नाभि की ओर बढ़ रही थी.दिव्या को भी उसी का इंतेज़ार था.वेर्मा साहब की लपलपाति जीभ जैसे ही उसकी नाभि मे दाखिल हुई उसकी चूत और ज़्यादा गीली हो गयी.वेर्मा साहब उसकी नाभि चाट रहे थे & उनके हाथ उसकी पतलून उतार रहे थे.

दिव्या ने उनके कंधे थाम अपने 1 पैर से दूसरे पैर का जूता उतारा & फिर दूसरे से पहले का.जूते उतारते ही पॅंट भी उसके जिस्म से अलग हो गयी & डीसीपी साहब की आँखो के सामने पर्पल कलर की पतली,ट्रॅन्स्परेंट पॅंटी से नज़र आती दिव्या की गीली चूत थी.हौले से उन्होने पॅंटी को नीचे किया.दिव्या की चूत पे 1 भी बाल नही था,गोरी,मस्त,भारी जाँघो के बीच गुलाबी चूत की दरार इतनी कसी थी मानो दिव्या अभी भी कुँवारी हो.

डीसीपी वेर्मा ने चूत के उपर पेट के नीचे के हिस्से पे 1 किस ठोकी & 1 बार फिर अपनी बाहो मे उसकी कमर को जाकड़ लिया & उसकी नाभि चाटने लगे.उनके हाथ उसकी चौड़ी गंद की पुष्ट फांको को तौल रहे थे.दिव्या मस्ती मे बहाल हो उनके सर को झुक के चूमते हुए नीचे धकेल रही थी.वेर्मा साहब उसकी हसरत समझ गये & उन्होने उसकी नाभि से ज़ुबान निकली & 1 ही झटके मे उसे लट्तू की तरह घुमा उसकी गंद अपने चेहरे की ओर कर ली.

दिव्या थोड़ा लड़खड़ाई & संभलने के लिए उसने अपने हाथ सामने डेस्क पे टीका दिए.वेर्मा साहब ने उसकी फांको को फैलाया & अपना मुँह उसकी गंद की दरार मे दफ़ना दिया,"हाईईइ....!",उनकी जीभ के उसकी चूत को छुते ही दिव्या करही.वेर्मा साहब उसकी गंद की फांको रगड़ते हुए उसकी चूत चाट रहे थे & वो बेचैनी से अपनी कमर हिला रही थी.कमर पीछे की ओर धकेल वो अपनी चूत को अपने बॉस के मुँह पे और दबा रही थी.डिसेपी वेर्मा के हाथ उसकी केले के तने जैसी जाँघो को कमर से लेके घुटनो तक सहलाते हुए उसकी चूत चाट रहे थे.दिव्या के मुँह से बस आहे निकल रही थी-कभी तेज़,कभी धीमी मगर सभी बेताबी से भरी हुई.

"ओह....आहह.....!",डेस्क पे हाथ टिकाए अपना सर पीछे फेंकते हुए दिव्या चीखी & अपनी गंद से अपने बॉस का चेहरा मसल सा दिया-वो पहली बार झाड़ रही थी.वेर्मा साहब ने उसकी चूत से बहती पानी की धार को अपनी ज़ुबान से सॉफ किया & उसकी कमर पकड़ उसे बिठाया तो दिव्या ने भी कुर्सी के हत्थे थाम लिए & धीरे-2 उनके लंड पे अपनी चूत को झुकाने लगी.

"ऊओववववव.....!",जैसे-2 चूत लंड को अंदर ले रही थी दिव्या की आह तेज़ हो रही थी.थोड़ी ही देर मे उसकी चूत उसके बॉस के लंड से भरी थी.वेर्मा साहब के लंड की मोटाई कुच्छ ज़्यादा थी & जब भी दिव्या उन्हे अपने अंदर लेती उसकी चूत कुच्छ ज़्यादा फैलने लगती .उसे हल्की तकलीफ़ होती मगर जो मज़ा मिलता था,वो उस तकलीफ़ के मुक़ाबले कही ज़्यादा था.

वेर्मा साहब कुर्सी पे पीछे आड़ के बैठ गये & दिव्या 1 बार फिर आगे झुक गयी & डेस्क को थाम लिया & कमर उचकाने लगी.दोनो की चुदाई शुरू हो गयी.वेर्मा साहब उसकी कमर थामे उसकी हर्कतो का लुत्फ़ उठा रहे थे.दिव्या ने धीरे-2 अपनी कमर की रफतार बधाई & साथ ही साथ अपने बॉस की मदहोशी भी.वो भी धीरे-2 कमर उचका उसे चोद रहे थे.उनके हाथ अपनी मातहत अफ़सर की नंगी पीठ पे चल रहे थे & जैसे ही वो उसकी कमर के पास पहुँचते उसकी मक्खनी गंद को भी दबा देते.

दिव्या के बदन मे बिजलियो की मानो मे अनगिनत धाराए फुट पड़ी थी.आहे भरते हुए वो पीछे झुकी & अपने बॉस के सीने से लग गयी.ज़मीन पे अपने पैर लगा उन्हे चला उसने कुर्सी को पीच्चे किया & पीच्चे की दीवार से लगा दिया फिर अपने बॉस के दाए कंधे पे सर रख गर्दन को बाए घुमाया & उन्हे गर्मजोशी से चूमने लगी.डीसीपी वेर्मा ने उसकी कसी जाँघो के नीचे हाथ लगा उन्हे उठाया & नीचे से कमर उचका के धक्के लगाने लगे.

"उन्न...उन्न्न..!",उनके होंठो से सिले उसके होंठो से अभी भी हल्की से आवाज़ बाहर आ रही थी.उसके बॉस के धक्के उसे फिर से मदहोशी की उसी बुलंदी पे ले जा रहे थे जहा उसे वो लाजवाब सुकून हासिल होता था.वेर्मा साहब अपनी इस अफ़सर की कसी चूत के कायल थे & इस पोज़िशन मे वो वैसे शदीद धक्के लगा लगा पा रहे थे जैसे उनका दिल चाहा रहा था.


raj..
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Re: खेल खिलाड़ी का

Unread post by raj.. » 04 Nov 2014 10:36

"ज़रा खड़ी हो जाओ,दिव्या.",दोनो उसी तरह 1 दूसरे से जुड़े खड़े हो गये.वेर्मा साहब दिव्या से कद मे बस 2 इंच ही बड़े थे & इस तरह से दोनो 1 ही कद के लगते थे.चुदाई मे उन्हे इस बात से बड़ी सहूलियत मिलती थी.खड़े हो उन्होने बाई बाँह दिव्या के सीने पे बाँधी & दाई को उसकी कमर पे & फिर थोड़े धक्के लगाए.दिव्या की चूत भी अब उनके लंड की रगड़ से छल्नी होना चाहती थी.

"उन्न्न....सर..",वेर्मा साहब उसकी गर्दन की दाई तरफ चूम रहे थे.दिव्या ने उनके बाए कंधे पे सर पीछे झुका उनके बालो को अपने दाए हाथ से पकड़ लिया,"....ऐसे नही ज़ोर से करिए ना!",उसकी बेबाकी ने 1 बार फिर वेर्मा साहब की गर्मी मे इज़ाफ़ा किया & उन्होने फ़ौरन उसे डेस्क पे झुकाया & उसकी दाई जाँघ को उठा डेस्क पे चढ़ा दिया.उसके बाद जो धक्के उन्होने लगाए तो दिव्या की आहो का कोई हिसाब ही ना रहा.वेर्मा साहब का लंड इस पोज़िशन मे उसकी चूत मे गहरे उतरा था & उसकी दीवारो से रगड़ खा वो भी झड़ने को मचल उठा था.

वो आगे झुके & दिव्या की पीठ पे लेट गये.बाए हाथ को उन्होने उसकी चूचियो से सटाया & दाए को उसकी चूत के दाने पे.इस सब के दौरान उनकी चुदाई उसी रफ़्तार से जारी थी.दिव्या भी मदहोशी की उस मंज़िल पे पहुँच रही थी जहा ये सफ़र अपने अंजाम पे पहुँचता था.उसकी चूत और सिकुड गयी & वेर्मा साहब के लंड को और कस लिया.1 बार 1 मुजरिम से हाथापाई के दौरान उस मुजरिम ने उनका गला अपने हाथो से घोटना शुरू कर दिया था.दिव्या की चूत की पकड़ उन्हे उस मुजरिम के हाथो की मज़बूत गिरफ़्त जैसी ही लगती थी.फ़र्क ये था कि मुजरिम की गिरफ़्त उनकी ज़िंदगी ख़त्म करने को थी & ये गिरफ़्त मानो उन्हे हर बार 1 नया जीवन देती थी.

"ऊवंन्न...आआहह....आअहह....आआआआआहह......!",दिव्या की चूत की दीवारें मानो 1 दूसरे से बिल्कुल चिपक जाना चाहती थी & उनकी इस हरकत से उनके बीच फँसे डीसीपी वेर्मा का लंड बिल्कुल पिसा महसूस कर रहा था.वेर्मा साहब के मज़े की तो कोई इंतेहा नही थी.चीखती दिव्या झाड़ रही थी & उसके जिस्म से चिपके वो भी झटके खा रहे थे,उनका लंड उनके गाढ़े,गर्म वीर्य से दिव्या की चूत को भर रहा था.थोड़ी देर बाद उन्होने लंड को बाहर खींचा & डेस्क पे औंधी पड़ी हाँफती दिव्या को उठा के बाहो मे भरा & चूम लिया.

"ये कल के कामयाब एनकाउंटर का इनाम है.",दिव्या मुस्कुराइ & उनकी बाहो से निकल दोनो के कपड़े समेटने लगी.

"आज मुझे तुम्हे 1 खबर देनी है & 1 इंसान से मिलवाना है.",वेर्मा साहब ने दिव्या के हाथ से अपना अंडरवेर लिया & अपने पैर उसने उसमे डाले.

"कैसी खबर?",दिव्या पॅंटी पहन चुकी थी & ब्रा डाल कर उसके हुक्स लगाने की कोशिश कर रही थी.

"1 नया अफ़सर तबादला होके यहा हमारे डिपार्टमेंट मे आया है.",वेर्मा साहब ने आगे बढ़ उसके हुक्स लगाए & फिर अपनी पॅंट पहनने लगे.

"अजीत चौहान.",उन्होने अपनी शर्ट की बाँह मे हाथ डाला.दिव्या की पीठ उनकी ओर थी इसलिए वो उसके चेहरे के भाव नही देख पाए.दिव्या को अजीब लगा....क्यू आ रहा था वो यहा?..ऐसा नही था कि अजीत का सामना करने से उसे डर लग रहा था मगर उन दोनो के बीच जो हुआ था उसके बाद साथ काम करने मे कही कोई परेशानी ना हो,उसे इसी बात का डर था....लेकिन अब किया क्या जा सकता था!..चलो,देखा जाएगा.उसने वर्दी पहन कर जूते पैरो मे डाले.

"और मिलवा किस से रहे हैं?",अपनी बेल्ट बाँध डेस्क के दूसरी तरफ रखी कुर्सियो मे से 1 पे बैठ गयी.

"बस थोड़ा इंतेज़ार करो.थोड़ी ही देर मे वो शख्स यहा होगा.",डीसीपी वेर्मा मुस्कुराए & अपनी कुर्सी पे बैठ गये.

डीसीपी साहब तो किसी से फोन पे बातो मे लग गये & दिव्या बैठी अपनी उलझन के बारे मे सोचने लगी,उसे अपने काम मे किसी तरह की रुकावट पसंद नही थी.अपने छ्होटे से करियर मे ये उसकी ख़ुशनसीबी थी कि अभी तक उसके किसी भी सीनियर अफ़सर ने उसके काम करने के तरीके पे कोई ऐतराज़ नही जताया था लेकिन वो अच्छे से जानती थी कि जिस दिन भी उस से कोई ग़लती हुई तो उसे अपने तरीके बदलने पड़ेंगे....अब अजीत आ रहा था & शायद रोज़ ही दोनो का सामना होगा..कही उसने फिर से रिश्ता जोड़ने की कोशिश की तो?..उसे अजीत की भलमांसाहत पे कोई शुबहा नही था मगर उसके इश्क़ पे भरोसा नही था उसे.बहुत मुमकिन था कि पुरानी प्रेमिका को सामने देख वो फिर से उसे अपनी ओर खींचना चाहे लेकिन अब वो उस रिश्ते को दोबारा जोड़ने को तैय्यार नही थी.

"हां,उन्हे अंदर भेजो.",डीसीपी प्रदीप वेर्मा ने इंटरकम नीचे रखा,"..वो आ गया है.",तभी दरवाज़ा खुला & लंबा,चौड़ा,सांवला शख्स अंदर दाखिल हुआ,"हेलो,डीसीपी!",उसकी भारी आवाज़ कमरे मे गूँजी.

"हेलो,प्रोफेसर.",दिव्या ने देखा वेर्मा साहब उस इंसान को देख अपनी कुर्सी से उठ आगे बढ़ आए,"कैसे हो दोस्त?",दोनो दोस्त गले लग गये.दिव्या की पुलिसिया निगाहो ने उस शख्स का मुआयना करना शुरू कर दिया.उम्र मे वो डीसीपी साहब के बराबर ही लग रहा था मगर कद उनसे ऊँचा था....लगभग 6'3" तो होगा ही....& कंधे कितने चौड़े थे!....उसने पूरे बाज़ू की सफेद कमीज़ पहनी थी जिसकी आस्तीने मूड के कोहनी तक की हुई थी.सीने की चौड़ाई से शर्ट खींच सी रही थी & आस्तीनो से निकले बाज़ू पेड़ की मोटी शाख जैसे मज़बूत थे.रंग सांवला था & सूरत भी कोई खास नही थी मगर उसका डील-डौल & बातो का अंदाज़ उसे खास बना रहा था.

"हेलो,ऑफीसर!",वेर्मा साहब से गले मिलने के बाद उसकी नज़र दिव्या पे पड़ी,"प्रदीप,आजकल तुमलोग समझदार हो गये हो."

"क्यू भाई?",कॅबिन मे कोने मे लगे सोफा सेट की ओर बढ़ उन्होने अपने दोस्त & दिव्या को भी वाहा बैठने का इशारा किया.

"भाई,मैने अब तक जितनी पोलिसेवालिया देखी हैं उनसे खूबसूरत तो मुझे पोलिसेवाले लगते हैं पर इनकी बात कुच्छ और है.",वो दिव्या के बिल्कुल सामने आया & अपना दाया हाथ आगे कर दिया,अपनी निगाहे उसकी निगाहो से मिला दी,"हेलो.",दिव्या ने हाथ मिलाके जवाब दिया.वो 1 तक उसकी आँखो मे देखे जा रहा था मगर दिव्या ने अपनी पलके नही झपकाई.उसके लिए नज़रे मिलाना भी 1 मुक़ाबला था & किसी मुक़ाबले मे वो दूसरे नंबर पे आए ये उसे मंज़ूर नही था.

क्रमशः...........


raj..
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Re: खेल खिलाड़ी का

Unread post by raj.. » 04 Nov 2014 10:37

KHEL KHILADI KA paart--2

gataank se aage..............

ajit nirash ho chala gaya.divya ko thoda afsos to hua magar itna bhi nahi ki vo pareshan ho jaye.darasal use ajit se itna pyar nahi tha ki uske bina zindagi use adhuri lage.unhi dino divya ki posting devalay ke south district me hui jaha DCP Verma uske senior afsar the.DCP sahab ne kisi mantri ki koi najayaz baat nahi mani & usne 1 aisi gandi chal chali ki sabhi log verma sahab pe ungli uthane lage.department ne unhe suspend kar diya.baat itni kharab hui ki verma sahab ki biwi bhi un jhuthi ahwaho ko maanane lagi.1 divya hi thi jise verma sahab ki imandari pe pura bharosa tha.usne verma sahab ke sath milke 1 plan banaya & us mantri ki chal usi pe ulat di.

unhi dino jab verma sahab ko sabhi ne tanha chhod diya tha & keval divya hi unpe bharosa karti thi,1 din vo us se baat karte hue jazbati ho gaye & divya unka hausla badhane lagi & na jane kab dono 1 dusre ki baaho me sama gaye.mard ke liye chudai kayi baar tanav bhagane ka zariya bhi hoti hai & verma sahab ke liye bhi vo chudai kuchh aisi hi thi.jab khumari tuti to unhe thoda pachhtawa hua magar divya ko bahut maza aaya tha.

hotel ke kamre me bistar pe nangi padi vo yehi soch rahi thi ki agar pareshan verma sahab use itni khushi pahuncha sakte hain to khush verma sahab to use jannat dikha denge!verma sahab ko ye darr sata raha tha ki kahi divya is baat ka koi galat fayda nahi uthaye lekin unka ye darr divya ne galat sabit kiya & dono ka rishta & mazbut ho gaya.dono ko 1 dusre se kuchh nahi chahiye tha siway masti ke.

divya ne god me baithe hue hi verma sahab ki kamiz nikal di & unke seene ke balo me hath firate hue hansi.verma sahab bhi uski shirt nikal chuke the & uske neeche purple color ke transparent bar ko dekh vo chaunk pade the.unki hairat pe hi divya ko hansi aa gayi thi.divya kitne josh me thi uska andaza isi baat se lagaya ja sakta tha ki bra me se saaf dikh rahe uske gulabi nipples bilkul kade the & aisa lag raha tha ki bra ke patle kapde ko phad dalna chahte hon.

verma sahab ne apne daye hath ki ungliyo se uske baye nipple ko masla to divya ne aah bhari.neeche gand pe vo verma sahab ke kulbulate lund ko mehsus kar rahi thi & uski masti aur badh rahi thi.verma sahab ne uski bayi chhati ko apne daye hath me bhar liya & jhuk ke uski dayi chhati ko bra ke upar se hi chusne lage.divya ab khul ke aahe bharne lagi.cabin sound proof tha & is waqt unhe disturb karne vala bhi koi nahi tha.

divya jhuki & verma sahab ke sar ko chumte hue unki pith pe apne nakhuno se khaorchne lagi.verma sahab ko uski yehi ada bahut pasand thi,vo bistar me bilkul sherni ki tarah pesh aati thi.verma sahaba ki baahe uski kamar ke gird thi & uski makhmali pith pe unke hath fisal rahe the.jab unke hatho ne uske bar ke hooks ko khola to divya ne khud apne kandho se bra ko sarka diya.uski mast chhatiya nangi hote hi verma sahab 1 baar fir unhe pine me jut gaye.is baar divya ne uske jism ko sehlate hue apna baya hath unki god me ghusaya & unki pant khone lagi.

dono ke paas waqt to tha magar itna bhi nahi ki aaram se 1 dusre ke jismo ka lutf uthayen.verma sahab ne divya ko god se utara to jhat se ghutno pe baith gayi & unki pant kholne lagi.verma sahab ne kursi se bina uthe bas apni gand uchkayi & divya ne unki patlun nikal unhe pura nanga kar diya.48 baras ke verma sahab ka 7.5 inch lumba lund pura tana ab uski aankho ke samne tha.bina 1 pal bhi gavayen divya ne use apne munh ke hawale kiya & daye hath se lund ko pakad use chusne lagi.

"aahhhh....!",verma sahab kursi se uchakte hue karahe.jis bebaki se divya unke lund ke sath khelti thi,vo unka josh aur badha deti thi.lund ke supade ko apni jibh se chatate hue divya ne unke ande dabaye to verma sahab ka jism masti se bhar utha.unhone hath neeche kar divya ki chhatiyo ko daboch liya & unhe dabane lage....kitni narm thi uski choochiyaan!chhute hi sansani seedha hatho se dil & us se bhi pehle lund tak pahunchti thi....kaise rakhti hai ye itni badi chhatiyo ko itna chust?..1 baar fir verma sahab hairan hue bina nahi reh sake.divya ki bhari-bharkam chhatiya zara bhi jhuli nahi thi.jab vo josh me nahi hoti tab bhi chhatiya seedhi tani hoti thi & unke nipple samne dekh rahe hote.

Divya ki laplapati jibh Verma Sahab ke lund ki lambai pe chal rahi thi & vo unke ande lagatar dabaye ja rahi thi.verma sahab ke aahe bharte-2 bura haal tha.jab divya ne unke lund ko apni 1 ungli & anguthe ke ghere me pakad hilate hue uske supade ko munh me bhar ke koi 2 minute tak chusa to unka khud pe kabu rakhna bilkul namumkin sa ho gaya.kursi pe chhatpatate hue unhone uske baal pakad ke uski zuban ko apne lund se alag kiya.

aisa karte hi divya uthi & khadi ho aage jhuk ke unhe chumne lagi.verma sahab ke hath 1 baar fir uski chhatiyo se ja lage.kafi der tak vo vaise hi uski chhatiya bhinchte hue use chumte rahe fir unhone use seedha khada kiya & uski nazuk kamar ko apni baaho me bhinch uske sapat,chikne pet se apna munh sata diya.

"aahhh....!",divya ne masti me sar peechhe kar aankhe band kar aah bhari.uske boss ki zuban uske pet pe fisal rahi thi & dhire-2 uski nabhi ki or badh rahi thi.divya ko bhi usi ka intezar tha.verma sahab ki laplapati jibh jaise hi uski nabhi me dakhil hui uski chut aur zyada gili ho gayi.verma sahab uski nabhi chat rahe the & unke hath uski patloon utar rahe the.

divya ne unke kandhe tham apne 1 pair se dusre pair ka juta utara & fir dusre se pehle ka.jute utarte hi pant bhi uske jism se alag ho gayi & DCP sahab ki aankho ke samne purple color ki patli,transparent panty se nazar aati divya ki gili chut thi.haule se unhone panty ko neeche kiya.divya ki chut pe 1 bhi baal nahi tha,gori,mast,bhari jangho ke beech gulabi chut ki darar itni kasi thi mano divya abhi bhi kunwari ho.

DCP verma ne chut ke upar pet ke neeche ke hisse pe 1 kiss thonki & 1 baar fir apni baaho me uski kamar ko jakad liya & uski nabhi chatne lage.unke hath uski chaudi gand ki pusht fanko ko taul rahe the.divya masti me behal ho unke sar ko jhuk ke chumte hue neeche dhakel rahi thi.verma sahab uski hasrat samajh gaye & unhone uski nabhi se zuban nikali & 1 hi jhatke me use lattu ki tarah ghuma uski gand apne chehre ki or kar li.

divya thoda ladkhadayi & sambhalne ke liye usne apne hath samne desk pe tika diye.verma sahab ne uski fanko ko failaya & apna munh uski gand ki darar me dafna diya,"haiiii....!",unki jibh ke uski chut ko chhute hi divya karahi.verma sahab uski gand ki fanko ragadte hue uski chut chat rahe the & vo bechaini se apni kamar hila rahi thi.kamar peechhe ki or dhakel vo apni chut ko apne boss ke munh pe aur daba rahi thi.DCP verma ke hath uski kele ke tane jaisi jangho ko kamar se leke ghutno tak sehlate hue uski chut chaat rahe the.divya ke munh se bas aahe nikal rahi thi-kabhi tez,kabhi dhimi magar sabhi betabi se bhari hui.

"OHHHHHHH....AAHHHHHH.....!",desk pe hath tikaye apna sar peechhe fenkte hue divya chikhi & apni gand se apne boss ka chehra masal sa diya-vo pehli baar jhad rahi thi.verma sahab ne uski chut se behti pani ki dhar ko apni zuban se saaf kiya & uski kamar pakad use bithaya to divya ne bhi kursi ke hatthe tham liye & dhire-2 unke lund pe apni chut ko jhukane lagi.

"oooww....!",jaise-2 chut lund ko andar le rahi thi divya ki aah tez ho rahi thi.thodi hi der me uski chut uske boss ke lund se bhari thi.verma sahab ke lund ki motai kuchh zyada thi & jab bhi divya unhe apne andar leti uski chut kuchh zyada failne lagti .use halki taklif hoti magar jo maza milta tha,vo us taklif ke mukable kahi zyada tha.

verma sahab kursi pe peechhe ad ke baith gaye & divya 1 baar fir aage jhuk gayi & desk ko tham liya & kamar uchkane lagi.dono ki chudai shuru ho gayi.verma sahab uski kamar thame uski harkato ka lutf utha rahe the.divya ne dhire-2 apni kamar ki rafatar badhayi & sath hi sath apne boss ki madhoshi bhi.vo bhi dhire-2 kamar uchka use chod rahe the.unke hath apni maathat afsar ki nangi pith pe chal rahe the & jaise hi vo uski kamar ke paas pahunchte uski makkhani gand ko bhi daba dete.

divya ke badan me bijliyo ki mano me anginat dharaye fut padi thi.aahe bharte hue vo peechhe jhuki & apne boss ke seene se lag gayi.zamin pe apne pair laga unhe chala usne kursi ko peechhe kiya & peechhe ki deewar se laga diya fir apne boss ke daye kandhe pe sar rakh gardan ko baye ghumaya & unhe garmjoshi se chumne lagi.DCP verma ne uski kasi jangho ke neeche hath laga unhe uthaya & neeche se kamar uchka ke dhakke lagane lage.

"unn...unnn..!",unke hotho se sile uske hotho se abhi bhi halki se aavaz bahar aa rahi thi.uske boss ke dhakke use fir se madhoshi ki usi bulandi pe le ja rahe the jaha use vo lajawab sukun hasil hota tha.verma sahab apni is afsar ki kasi chut ke kayal the & is position me vo vaise shadid dhakke lanhi laga pa rahe the jaise unka dil chaha raha tha.

"zara khadi ho jao,divya.",dono usi tarah 1 dusre se jude khade ho gaye.verma sahab divya se kad me bas 2 inch hi bade the & is tarah se dono 1 hi kad ke lagte the.chudai me unhe is baat se badi sahuliyat milti thi.khade ho unhone bayi banh divya ke seene pe bandhi & dayi ko uski kamar pe & fir thode dhakke lagaye.divya ki chut bhi ab unke lund ki ragad se chhalni hona chahti thi.

"unnn....sir..",verma sahab uski gardan ki dayi taraf chum rahe the.divya ne unke baye kandhe pe sar peechhe jhuka unke balo ko apne daye hath se pakad liya,"....aise nahi zor se kariye na!",uski bebaki ne 1 baar fir verma sahab ki garmi me izafa kiya & unhone fauran use desk pe jhukaya & uski dayi jangh ko utha desk pe chadha diya.uske baad jo dhakke unhone lagaye to divya ki aaho ka koi hisab hi na raha.verma sahab ka lund is position me uski chut me gehre utra tha & uski deewaro se ragad kha vo bhi jhadne ko machal utha tha.

vo aage jhuke & divya ki pith pe let gaye.baye hath ko unhone uski choochiyo se sataya & daye ko uski chut ke dane pe.is sab ke dauran unki chudai usi raftar se jari thi.divya bhi madhoshi ki us manzil pe pahunch rahi thi jaha ye safar apne anjam pe pahunchta tha.uski chut aur sikud gayi & verma sahab ke lund ko aur kas liya.1 baar 1 mujrim se hathapai ke dauran us mujrim ne unka gala apne hatho se ghotna shuru kar diya tha.divya ki chut ki pakad unhe us mujrim ke hatho ki mazbut giraft jaisi hi lagti thi.fark ye tha ki mujrim ki giraft unki zindagi khatm karne ko thi & ye giraft mano unhe har baar 1 naya jiwan deti thi.

"ooonnn...aaaahhhh....AAAHHHHHH....AAAAAAAAAAHHHHHHHHH......!",divya ki chut ki deewaren mano 1 dusre se bilkul chipak jana chahti thi & unki is harkat se unke beech fanse DCP verma ka lund bilkul pisa mehsus kar raha tha.verma sahab ke maze ki to koi inteha nahi thi.chikhti divya jhad rahi thi & uske jism se chipke vo bhi jhatke kha rahe the,unka lund unke gadhe,garm virya se divya ki chut ko bhar raha tha.thodi der baad unhone lund ko bahar khincha & desk pe aundhi padi haanfti diovya ko utha ke baaho me bhara & chum liya.

"ye kal ke kamyab encounter ka inam hai.",divya muskurayi & unki baaho se nikal dono ke kapde sametne lagi.

"aaj mujhe tumhe 1 khabar deni hai & 1 insan se milwana hai.",verma sahab ne divya ke hath se apna underwear liya & apne pair usne usme dale.

"kaisi khabar?",divya panty pahan chuki thi & bra daal kar uske hooks lagane ki koshish kar rahi thi.

"1 naya afsar tabadla hoke yaha humare department me aya hai.",verma sahab ne aage badh uske hooks lagaye & fir apni pant pehanane lage.

"Ajit Chauhan.",unhone apni shirt ki banh me hath dala.divya ki pith unki or thi isliye vo uske chehre ke bhav nahi dekh paye.divya ko ajib laga....kyu aa raha tha vo yaha?..aisa nahi tah ki ajit ka samna karne se use darr lag raha tha magar un dono ke beech jo hua tha uske baad sath kaam karne me kahi koi pareshani na ho,use isi baat ka darr tha....lekin ab kiya kya ja sakta tha!..chalo,dekha jayega.usne vardi pehan pane jute pairo me dale.

"aur milwa kis se rahe hain?",apni belt bandh desk ke dusri taraf rakhi kursiyo me se 1 pe baith gayi.

"bas thoda intezar karo.thodi hi der me vo shakhs yaha hoga.",DCP verma muskuraye & apni kursi pe baith gaye.

DCP Sahab to kisi se fone pe baato me lag gaye & Divya baithi apni uljhan ke bare me sochne lagi,use apne kaam me kisi tarah ki rukavat pasand nahi thi.apne chhote se career me ye uski khushnasibi thi ki abhi tak uske kisi bhi senior afsar ne uske kaam karne ke tarike pe koi aitraz nahi jataya tha lekin vo achhe se janti thi ki jis din bhi us se koi galti hui to use apne tarike badalne padenge....ab Ajit aa raha tha & shayad roz hi dono ka samna hoga..kahi usne fir se rishta jodne ki koshish ki to?..use ajit ki bhalmansahat pe koi shubaha nahi tha magar uske ishq pe bharosa nahi tha use.bahut mumkin tha ki purani premika ko samne dekh vo fir se use apni or khinchna chahe lekin ab vo us rishte ko dobara jodne ko taiyyar nahi thi.

"haan,unhe andar bhejo.",DCP Pradip Verma ne intercom neeche rakha,"..vo aa gaya hai.",tabhi darwaza khula & lamba,chauda,sanvla shakhs andar dakhil hua,"hello,DCP!",uski bhari aavaz kamre me gunji.

"hello,Professor.",divya ne dekha verma sahab us insan ko dekh apni kursi se uth aage badh aaye,"kaise ho dost?",dono dost gale lag gaye.divya ki pulisiya nigaho ne us shakhs ka muayana karna shuru kar diya.umra me vo DCP sahab ke barabar hi lag raha tha magar kad unse ooncha tha....lagbhag 6'3" to hoga hi....& kandhe kitne chaude the!....usne pure bazu ki safed kamiz pehni thi jiski aasteene mud ke kohni tak ki hui thi.seene ki chaudai se shirt khinch si rahi thi & aasteeno se nikle bazu ped ki moti shakh jaise mazbut the.rang sanvla tha & surat bhi koi khas nahi thi magar uska deel-daul & baato ka andaz use khas bana raha tha.

"hello,officer!",verma sahab se gale milne ke baad uski nazar divya pe padi,"Pradip,aajkal tumlog samajhdar ho gaye ho."

"kyu bhai?",cabin me kone me lage sofa set ki or badh unhone apne dost & divya ko bhi vaha baithne ka ishara kiya.

"bhai,maine ab tak jitni policevaliya dekhi hain unse khubsurat to mujhe policevale lagte hain par inki baat kuchh aur hai.",vo divya ke bilkul samne aaya & apna daya hath aage kar diya,apni nigahe uski nigaho se mila di,"hello.",divya ne hath milake jawab diya.vo 1 tak uski aankho em dekhe ja raha tha magar divya ne apni palke nahi jhapkayi.uske liye nazre milana bhi 1 muqabla tha & kisi muqable me vo dusre number pe aaye ye use manzur nahi tha.

kramashah...........