गर्ल'स स्कूल compleet

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rajaarkey
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Re: गर्ल'स स्कूल

Unread post by rajaarkey » 12 Dec 2014 03:23

गर्ल्स स्कूल पार्ट --33

दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा गर्ल्स स्कूल पार्ट 33 लेकर आपकी अदालत मैं हाजिर हूँ ।दोस्तो जिन दोस्तो ने इस कहानी के इस पार्ट को पहली बार पढ़ा है उनकी समझ मैं ये कहानी नही आएगी इसलिए आप इस कहानी को पहले पार्ट से पढ़े

तब आप इस कहानी का पूरा मज़ा उठा पाएँगे आप पूरी कहानी मेरे ब्लॉग -कामुक-कहानियाँब्लॉगस्पॉटडॉटकॉम पर पढ़ सकते है अगर आपको लिंक मिलने मैं कोई समस्या हो तो आप बेहिचक मुझे मेल कर सकते हैं अब आप कहानी पढ़ें प्रिय पाठाको पार्ट 33 मैं गौरी की चुदाई तो सपने मैं पूरी हो गयी ।उसने तो अमित का गन्ना चूस लिया था लॅकिन अपनी वाणी की कहानी अधूरी रह गयी थी ।अब आगे ...............

"कपड़े... नही.. मैं कपड़े नही निकालूंगी...." वाणी की साँसें हर गुजरें पल के साथ बहकति ही जा रही थी.. उसका पूरा बदन थरथराने वाला था..

"क्यूँ..? क्या प्यार करने का मंन नही करता.." मनु ने उसको और सख्ती के साथ जाकड़ लिया.. अपनी बाहों में..

"करता है.. बहुत करता है.. जाने कितने दीनो से मैं तुम्हारा इंतज़ार कर रही थी.. जाने कितने युगों से.." वाणी कसमसाते हुए अपनी जाँघ मनु के शरीर से रगड़ने लगी..

"तो फिर शरम कैसी.. कपड़े निकल दो ना.." मनु झुक कर उसकी गर्दन पर अपने दाँत गाड़ने लगा..

"तुम्ही निकल दो ना.. कह तो रही हून.... सब कुच्छ तुम्हारा ही है.." वाणी ने अंगड़ाई लेते हुए अपनी बाहें उपर उठा दी.. वाणी के दिल के उपर उठने के साथ ही मनु का कलेजा बाहर निकालने को हो गया... वाणी का यौवन छलक्ने को बेताब था.. अपने यार के पहलू में...

"ओह.. हमें अंदर चलना पड़ेगा.. बारिश तेज़ हो गयी है.." मनु ने वाणी को कहा..

"नही.. मैं कहीं नही जाउन्गि.. लेकर चलना है तो उठा लो.. मुझे तो यहीं मज़ा आ रहा है.." वाणी पूरी मस्ती में थी.. आँखें चाह कर भी खुल नही पा रही थी..

"वाणी! उठो जल्दी.. बारिश तेज़ हो गयी है.. फुहारें तुम तक आ रही है.. उठो अंदर चलो.." दिशा ने ज़बरदस्ती उसको उठा कर बैठा दिया..

"दीदी.....???????.. व्व.. वो.. मैं तो सो रही थी.. गौरी.. दी...."

"तो कौन कह रहा है.. की तुम नाच रही थी.. जल्दी चलो.. देखो सारी भीग गयी हो.."

"ओह्ह्ह.. म्‍म्म.. मैं सपना......"

"हां.. हाँ.. सपने अंदर लेटकर देख लेना.. ओह्हो.. अब उठो भी.."

"कितना अच्च्छा सपना आ रहा था दीदी.. ख्हाम्खा जगा दिया.. पैर पटकते हुए वाणी नींद में ही जाकर अंदर सोफे पर पसर गयी... इश्स उम्मीद में की सपना जारी रहे....

उसके बाद सारी रात वाणी सो ना सकी.. सपने के मिलन की अधूरी प्यास वह पल पल अपनी छ्होटी सी अनखुली योनि की चिपचिपाहट में महसूस करती रही.. गीली हो होकर भी वह कितनी प्यासी थी... मनु-रस की..

मनु अपनी जान की हालत से बेख़बर किन्ही दूसरे ही सपनो में खोया हुआ था.. उसको तो ये अहसास भी नही था की किसी को आज उसकी बड़ी तलब लगी हुई थी..

अमित का भी यही हाल था.. कोई आधा घंटा इंतज़ार करने के बाद ही वह सोया था.. पर गौरी को उसके दिए इशारे का आभास नही हुआ था.. नही तो.. क्या पता?

अगली सुबह वाणी की आँखें लाल थी.. कम सोने के कारण.. सभी इकट्ठे बैठकर चाय की चुस्कियाँ ले रहे थे... अमित और गौरी में शुरू हुई नोक झोंक उठते ही फिर से जारी हो गयी,"ऐसे क्या देख रहे हो? कभी लड़की देखी नही क्या?" गौरी ने माथे पर लटक आई जुल्फ को हाथ का इशारा दिया..

"देखी क्यूँ नही.. पर तुम्हारे जैसी..." तभी कमरे में दिशा आ गयी और अमित के होंठ सील गये...

"क्या मेरे जैसी.. बोलो ना.. बात पूरी क्यूँ नही करते...?" गौरी को दिशा से क्या शरम.. उनमें तो बहुत से राज सांझे हुए थे...

"नही कुच्छ नही.... मैं कह रहा था.. तुम्हारे जैसी झगड़ालु लड़की आज तक नही देखी..." अमित ने बात का रुख़ पलट दिया..

"ओये.. मुझे झगड़ालु मत कहना.. खा जाउन्गि..!" गौरी कुच्छ और ही सुन'ना चाहती थी..

"ये लो! प्रत्यक्ष को प्रमाण कैसा.. देख लो दीदी.. कह रही है.. मुझे खा जाएगी.." अमित दिशा से मुखातिब हुआ..

दिशा हँसने लगी..," एक अच्च्ची खबर है.. गौरी पढ़ने के लिए भिवानी आ रही है.. और हमारे साथ ही रहेगी... क्यूँ गौरी?"

अमित की आँखें चमक उठी..

"अभी क्या पता.. मम्मी इश्स बार पापा से मिलकर आएँगी तभी फाइनल होगा..." कहते हुए गौरी ने एक नज़र अमित को देखा.. उसके हाव भाव जान'ने के लिए.. अमित ने

उसकी ओर आँख मार दी..

"तूमम्म!" गौरी एक पल के लिए लपक कर उसकी और बढ़ी.. पर तुरंत ही उसको अपने लड़की होने की मर्यादायें याद आ गयी... और वह शर्मकार वापस सोफे पर जा बैठी..

"अब हम चलेंगे दीदी.. जल्दी ही पहुँचना होगा...." मनु उठते हुए दिशा से बोला..

"ठीक है.. मिलते हैं फिर भिवानी में.. आज कल में हम भी आ ही रहे हैं..." दिशा भी उसके साथ ही खड़ी हो गयी...

"पर.... मम्मी पापा को तो आने दो!" कुच्छ देर ही सही.. पर वाणी का दिल मनु को अपने से जुदा होते नही देखना चाह रहा था...

"सॉरी.. वाणी.. मुझे थोड़ी जल्दी है.. " अमित ने जवाब दिया.. मनु तो वाणी की दबदबाई हुई आँखें भी देख नही पाया...

दोनो ने मोटरसाइकल स्टार्ट की और उन्न तीनो की आँखों से ओझल हो गये...

दोस्तो मैं यानी आपका राज शर्मा .दोस्तो मेरा मन भी इस कहानी इस कहानी मैं दुबारा एंट्री लेने को कर रहा है

आप तो जानते हैं जहाँ आपका राज शर्मा हो उस कहानी का मज़ा कुछ ओर बढ़ जाता है दोस्तो मैने सोचा मैं भी कुछ दीनो के लिए अपने दोस्त सुरेश के गाँव जाकर उससे मिल आउ .इस समय हम दोनो सुरेश के बाग मैं बैठे थे . अब आगे आप खुद ही देखिए यहाँ क्या हो रहा है .

"आ लौंडिया!" सड़क के साथ सटे बाग में शहर से आए अपने दोस्त के साथ बैठकर दारू गटक रहे सुरेश ने सड़क पर जा रही दो लड़कियों में से एक को टोका.. मौसम था भी पीने लायक..

सुर्सेश राकेश और सरिता का बड़ा भाई था.. ताउ का लड़का!!

"जी बाबू जी!" लड़कियों में से एक ने सड़क किनारे सिड्दत से खड़े होते हुए कहा.. कमसिन उमर की उस लड़की का रंग ज़रूर सांवला था.. पर नयन नक्स इतने काटिले की खड़ा करने के लिए 'और कुच्छ' देखने की ज़रूरत ही ना पड़े.. शीरत से भोली लगती थी.. और सूरत से 'ब्लॅकबेरी'; चूचियाँ अभी उठान पर ही थी... पर बिना 'सहारे' के नाच सी रही थी.. हिलते हुए! वस्त्रा फटे पुराने ही थे.. यूँ कह लीजिए.. जैसे तैसे शरीर को ढक रखा था बस!

"तू तेजू की छ्छोकरी है ना?" दोनो को टुकूर टुकूर देखते हुए सुरेश ने पूचछा...

"जी बाब..उ!" अपने शरीर में घुसी जा रही नज़रों से सिहर सी उठी लड़की ने मारे शरम के अपना सिर झुका लिया..

"तेरे बापू को कितनी बार बोला है हवेली में आने को.. आता क्यूँ नही है साला हरामी!" सुरेश की आँखों में उस भेड़िए

के समान वहशीपान छलक उठा जो मासूम मेम्ने के शिकार के लिए कोई भी रास्ता ढूँढ लेना चाहता है..

लड़की ने नज़रें झुका ली.. अब उसको बड़ों के लेनदेन का क्या पता..!

"तू तो पूरी जवान हो गयी है..कल तक तो नंगी घुमा करती थी.. क्या नाम है तेरा?" सुरेश ने अपने बोलने को पूरा 'गब्बरी' अंदाज दे दिया था..

"ज्जई.. क्कामिनी!" इश्स बात ने तो उसको पानी पानी ही कर दिया था..

उसके साथ खड़ी दूसरी लड़की को सब नागनवार लग रहा था.. उसने कामिनी का हाथ पकड़ कर खींचा," चल ना.. चलते हैं!"

"ये छिप्कलि कौन है?" सुरेशको इतनी बेबाकी से बोलते देख उसका दोस्त हैरान था..

"बाबू जी ये मेरी मासी की लड़की है, चंचल!.. हूमें देरी हो रही है.... हम जायें..?" कामिनी को ऐसी नज़रों की आदत पड़ी हुई थी.. वो कहते हैं ना.. ग़रीब की बहू.. सबकी भाभी!

"ज़रा एक मटका पानी तो लाकर रख दो.. उस ट्यूबिवेल से.. फिर चली जाना..!" सुरेश ने खड़ा होकर अपनी जांघों के बीच

खुजलाते हुए कहा..

"चल ला देते हैं.. नही तो बापू धमकाएँगे बाद में.." कामिनी ने हौले से चंचल को कहा और सड़क से नीचे उतर गयी.. चंचल ने उनको देखते हुए अपनी कड़वाहट प्रदर्शित की और कामिनी के पिछे चल पड़ी.. टुबेवेल्ल करीब आधा कीलोमेटेर दूर था...

"यार.. तुमने तो हद कर दी.. क्या गाँव में ऐसे बोलने को सहन कर लेती हैं लड़कियाँ.." अब तक चुप बैठे दोस्त ने सुरेश को ताज्जुब से देखा..

"ये ज़मीन देख रहे हो राज.. जहाँ तक भी तेरी नज़र जा रही है.. सब अपनी है.. आधे से ज़्यादा गाँव हमारे टुकड़ों पर पलता है.. यहाँ के हम राजा हैं राजा...! इसके बाप ने एक लाख रुपए लिए थे बड़ी लौंडिया की शादी में.. अब तक नही चुकाए हैं साले ने.. इसको तो मैं चाहू तो हमारे सामने सलवार खोलकर मुतवा सकता हूँ.. चल छ्चोड़.. एक पैग लेकर तो देख यार.." सुरेश ने अपना सीना चौड़ा करते हुए राज की तरफ गिलास बढ़ाया..

"तुझे पता है ना यार.. मैं नही लेता..!" राज ने रास्ते में ही सुरेश का हाथ थाम दिया..

"कोई बात नही प्यारे.. तेरे नाम का एक और सही.." कहकर अकेले सुरेश ने अद्ढा ख़तम कर दिया.. अकेले ही..

"एक बात तो है यार.. गाँवों में अब भी बहुत कुच्छ होना बाकी है..." राज को शायद सब कुच्छ पसंद नही आया था..

सुरेश को उसकी बात समझ नही आई..,"तेरे को एक तमाशा दिखाऊँ...?"

"कैसा तमाशा?" राज समझ नही पाया..

"आने दे.. इंतज़ार कर..."

"कमाल है कामिनी.. वो तुझसे इतनी बेशर्मी से बात कर रहा था और तू पानी भरने चली आई उनका.. तेरी जगह अगर मैं होती तो.." चंचल गुस्से से उबाल रही थी...

"तुझे नही पता.. एक बार मुम्मी ने इनका कोई काम करने से मना कर दिया था.. बापू ने इतनी पिटाई की थी की.. बस पूच्छ मत.. वैसे भी पानी पिलाना तो धरम का काम है.." कहते हुए कामिनी ने जैसे ही घड़े का मुँह ट्यूबिवेल के आगे किया.. पानी की एक तेज़ बौच्हर से दोनो नहा गयी...

"ऊयीई.. ये क्या किया..? सारी भिगो दी..मैं भी.." टपकती हुई चंचल ने कामिनी को देखा...

"क्या करूँ.. बातों में सही तरह से घड़े का मुँह नही लगा पाई.. कोई बात नही.. घर जाते जाते सब सूख जाएगा..

"हूंम्म कोई बात नही.. अपनी छाती तो देख ज़रा.. तूने क्या नीचे कुच्छ भी नही पहना..?" चंचल ने कामिनी को कमीज़ में से नज़र आ रहे चूचियों पर चवँनी जैसे धब्बे से दिखाते हुए कहा...

"ओई माआ.. अब क्या करूँ..? इसमें से तो सब दिख रहा है...

"तू क़ोठरे ( खेतों में बना हुआ कमरा) में चल.. और मेरा समीज़ पहन ले.. मेरी छाती सूखी हुई है..." चंचल ने रास्ता निकाला...

"हाँ ये ठीक रहेगा.. चल.. अंदर आजा..!" कहकर कामिनी चंचल को लेकर ट्यूबिवेल के साथ ही बने एक कोठरे में चली गयी...

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उधर पता नही कौनसा तमाशा दिखना चाह रहे सुरेश से इतना इंतज़ार सहन नही हुआ..," चल यार.. ट्यूबिवेल पर ही चलते हैं.."

"छ्चोड़ ना यार.. सही बैठहे हैं यहीं.." राज ने कहा..

"आबे तू उठ तो सही.. वहाँ और मज़ा आएगा.. चल" कहकर सुरेश ने राजका हाथ पकड़ कर खींच लिया...

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"पर.. मैं तेरे सामने कपड़े निकालू क्या?" कामिनी ने अपने साथ कोठरे में खड़ी चंचल से कहा..

"और क्या करें.. मजबूरी है.. तू मेरी तरफ कमर करके निकाल दे.. मैं तुझे अपना समीज़ निकाल कर देती हूँ.." चंचल थोड़ी सी खुले विचारों की थी..

"नही... मुझसे नही होगा.. मैने तो कभी मम्मी के सामने भी नही बदले.." कामिनी शर्मकार हँसने लगी....

"ओये होये.. बड़ी आई शरमाने वाली.. ठीक है.. तू बाहर जा.. मैं समीज़ निकाल कर यहाँ रख देती हूँ.. फिर पहन लेना.. अब तो ठीक है ना मेरी शर्मीली.."

"हां.. ये ठीक है.. कहते हुए कामिनी बाहर निकल कर खड़ी हो गयी..

"अरे.. इसमें तो कोई कुण्डी ही नही है.." चंचल ने दरवाजा अंदर से बंद करने की सोची थी..." खैर तू जा बाहर.. ध्यान रखना.."

"ठीक है.. जल्दी कर.." कहकर कामिनी बाहर निकली ही थी की मानो उसको साँप सूंघ गया.. उसकी ज़ुबान हिली तक नही.. दरवाजे के बाहर खड़े सुरेश और राज शायद सब सुन रहे थे..

"वववो... कपड़े..." बड़ी मुश्किल से कामिनी इतना ही बोल पाई थी की सुरेश ने दरवाजा खोल दिया.. चंचल अचानक हुए इश्स 'हादसे' के कारण सहम गयी.. वह अपना समीज़ निकाल चुकी थी और कमीज़ डालने की तैयारी में थी.. घुटनों के बल बैठ कर उसने अपनी सौगातों को छिपाने की कोशिश की.. इस'से उसके उभार तो छिप गये पर उनके बीच की खाई और गहरी होकर सुरेश को ललचाने लगी.. शराब के साथ ही शबाब का सुरूर भी उस पर छाने लगा..

झट से अपना मोबाइल निकाला और चंचल की 2-4 तस्वीरें उतार ली....

"याइयीई.. क्क्या कर रहे हो?.. कामिनियैयियी...." चंचल बुरी तरह सहम गयी थी.. रोने लगी....

राज जो अब तक मौन ही खड़ा था.. अपने आपको 'नारी-दर्शन' से रोक ना सका.. वा भी अंदर आ गया.. चंचल का शरीर देखने लायक था भी...,"ये क्या कर रही हो तुम?"

"लड़की लड़की खेल रहे थे.. और क्या?" कहकर सुरेश ने दाँत निकाल दिए..," अरे कामिनी.. तू तो सच्ची में ही जवान लौंडिया हो गयी रे..." कामिनी के उभारों के उपर नज़र आ रहे नन्हे उभारों पर नज़र गड़ाए सुरेश बोला..," कोई लड़का नही मिल रहा क्या तुम्हारे को.. हम हैं ना.." कहते हुए सुरेश ने चंचल से उसके दोनो कपड़े झपट लिए....

"नही नही.. प्लीज़.. हमारे कपड़े दे दो.. वो इसका कमीज़ भीग गया था.. इसलिए.." कक्कर चंचल बिलख पड़ी...

"देख लौंडिया.. कपड़े तो माखन चोर भी चुराते थे... देखने के लिए.. फिर ये कोठरा किसी के बाप की जागीर नही.. हमारा है... यहाँ मेरी मर्ज़ी चलेगी.. मैं अभी गाँव वालों को इकट्ठा करता हूँ.. यहीं पर.. और उनको बताता हूँ की तेजू की छ्छोकरी यहाँ 'लड़की-लड़की' खेल रही थी.." कहते हुए सुरेश का जबड़ा भिच गया..

"नही नही.. बाबूजी..ऐसा ना करो.. हम आपके पाँव पकड़ते हैं.." मासूम कामिनी घुटनो के बल आ गयी...

"क्यूँ ना करूँ छ्होरी.. तुझे याद है ना.. 2 साल पहले कीही बात हैं.. गाँव का एक लड़का रात में तुम्हारे घर घुस गया था.. याद है ना.. तब क्या हुआ था..!" सुरेश गुस्से का झूठहा दिखावा कर रहा था..

"याद है बाबू जी.. हमें माफ़ कर दो.. कपड़े दे दो हमारे.. हम चले जाएँगे.."

"उस बख़त (वक़्त) तू कौनसी क्लास में थी..?" सुरेश ने उसकी बात पर ध्यान नही दिया..

"जी सातवी (सेवेंत) में.." कामिनी सूबक रही थी..

"अब नवी 9थ में होगी...है ना?"

"जी..."

"क्या कुसूर था.. उस लड़के का.. तेरी मा बेहन ने बुलाया होगा.. तभी गया होगा ना.... और पंचायत ने उसको 5 जूते मारे.. क्यूँ? तेरी मा बेहन को क्यूँ नही मारे..? क्यूंकी लड़का तुम्हारे घर फँस गया था.. वैसे ही जैसे ये हमारे यहाँ फँस गयी है.. मैं अभी गाँव वालों को बुलाता हूँ.." कहते हुए सुरेश ने बिना कॉल किए ही फोन कान से लगा लिया..

ये सब देख कर चंचल अपना नन्गपन भूल कर खड़ी हुई और सुरेश से फोने छ्चीन'ने की नाकामयाब कोशिश करने लगी.. उसका बदन कमाल का था..एक दम छरहरा बदन पर चूचियाँ काफ़ी सुडौल और मस्ती भरी थी.. फोने छ्चीन'ने की कोशिश में जब वो रह रह कर सुरेश की छाती से टकराई तो वो निहाल हो गया.. खून उबाल खाने लगा..

अलग थलग खड़े राज को अब इसमें मज़ा आने लगा था...

"ठीक है.. नही बुलाउन्गा.. पर एक शर्त पर.." चंचल से अलग हट कर उसने 2-4 बार और कैमरे का बटन क्लिक कर दिया.. और चंचल फिर से घुटनो के बल आ गयी..

"क्कैसी शर्त.. बाबूजी.. बताइए..." किसी उम्मीद में कामिनी भी खड़ी हो गयी..

"मैं तुमसे कुच्छ पूच्हूंगा.. बताउन्गा?" सुरेश के मॅन में जाने क्या सूझा..

"पूच्हिए बाबूजी.. हम बताएँगे.. पर किसी को ना बुलाना.. हुमारी बड़ी बेइज़्ज़ती होगी.....

"वो लड़का तुम्हारे घर में किसके पास आता था.. तुम्हारी बेहन के.. या तुम्हारी मा के..?" सुरेश शायद अब भी सीधे मतलब की बात पर आने से हिचक रहा था..

"किसी के पास नही आता था.. वो तो चोरी करने आया था.. हमारे घर.." कामिनी ने नज़रें चुराते हुए कहा..

"तू मुझे चूतिया समझती है क्या?" सुरेश ने बालों के नीचे उसकी गर्दन में हाथ फेरा... कामुकता की अंजनी सी तरंग एक दम से कामिनी के पूरे बदन में दौड़ गयी.. संभवतया सर्वप्रथम!

चंचल ने अपने आपको एक कोने में दुब्का लिया था.. शर्म से और अनहोनी के डर से...

"बुलाऊं अभी फोने करके.. गाँव वालों को.. ?" सुरेश ने बंदर घुड़की दी...

"मेरी बेहन के पास..." चंचल के आगे इश्स स्वीकारोक्ति से लज्जित सी हो गयी कामिनी अपने दोनो हाथ आगे बँधे सिर झुकाए खड़ी थी..

"रहने दो ना यार.. बहुत हो गया.. अब जाने दो बेचारियों को.." राज से उनके आँसू देखे नही जा रहे थे...

"तुम बीच में मत बोलो राज.. तुम्हे नही पता.. वो लड़का मेरा गहरा दोस्त था.. आज मौका मिला है मुझे.. कुच्छ साबित करने का.. मैं तुम्हे बाद में समझा दूँगा..."

"पर यार.. कम से कम उस बेचारी के कपड़े तो दे दो.. उसका क्या कुसूर है..?" इन्ही अवसरों पर पहचान होती है.. इंसान की.. और हैवान की.. मर्द तो सभी होते हैं.. राज भी था

"चलो.. दे देता हूँ.. पर याद रखना.. मैने फोटो खींच ली हैं.. ज़्यादा नखरे किए तो.. समझ गयी ना.." कहते हुए सुरेश ने उसकी और कपड़े उच्छल दिए..

चंचल की नज़रों में राज के लिए अतः क्रितग्यता झलक रही थी.. जाने कैसे वह बदला चुका पाएगी....

सुरेश फिर से कामिनी की और घूम गया," वहाँ आ जाओ दोनो..." और कहकर दीवार के साथ लगे फोल्डिंग पर बैठ गया.. दोनो चुपचाप जाकर उसके सामने खड़ी हो गयी..

"मैं बाहर बैठता हूँ यार.. तू कर ले अपनी इन्वेस्टिगेशन.. जल्दी जाने देना यार.." कहकर राज बाहर निकल गया...

"हां तो किसके पास आता था सन्नी.." सुरेश फिर से टॉपिक पर आ गया..

".... बेहन!" कामिनी ने हौले से बुदबुडाया.. इश्स वक़्त चंचल को इश्स बात पर चौंकने से ज़्यादा अपनी जान के लाले पड़े हुए थे..

"क्यूँ आता था..?"

"पता नही बाबूजी.. हमें जाने दो ना प्लीज़.. मम्मी बहुत मारेंगी.." कामिनी ने गिडगीडा कर एक आख़िरी कोशिश की.. पिच्छा छुड़ाने की..

सुरेश ने पास पड़ी एक लुंबी सी च्छड़ी उठाई और उसकी नोक को कामिनी के गले पर रख दिया.. फिर धीरे धीरे उसको उसकी चुचियों के उपर से लहराता हुआ उसके पाते और फिर जांघों पर जाकर रोक दिया," नही पता..?"

"ज्जई.. गंदा काम करने....... आता था.." बिल्कुल सही जगह के करीब च्छड़ी रखने से उत्तेजना की जो लहर कामिनी के बदन में उपजी.. उसने सवाल का जवाब देना थोड़ा आसान कर दिया..

"क्या गंदा काम करने...? सीधे जवाब नही दोगि तो मैं सवाल पूच्छना बंद करके फोन घुमा दूँगा..." सुरेश इश्स हथियार को अचूक मान रहा था.. और बदक़िस्मती ये की.. लड़कियाँ भी!

"जी.. वो कपड़े निकाल कर...." आगे कामिनी बोलने की हिम्मत ना जुटा पाई....

"जैसे अभी तुम निकाल रही थी.. है ना..!" सुरेश ने फिर से उनको याद दिलाया की उनको उसने क्या करते पकड़ा था...

"नही बाबू जी.. हम तो बस... बदल रहे थे..." आगे कामिनी का बोल अटक गया.. सुरेश ने च्छड़ी का दबाव उसकी जांघों के बीच बढ़ा दिया था.. चुलबुलाहट सी हुई.. कामिनी के बदन में.. और वो पिछे हट गयी..

"वहीं खड़ी रहो.. हिलो मत.. आगे आओ.. क्या कह रही थी तुम..?"

"कामिनी ने अक्षरष: सुरेश की आग्या का पालन किया.. वो आगे आ गयी.. च्छड़ी उसकी सलवार और पॅंटी पर अपना दबाव बढाने लगी...," जी.. हम तो बस कपड़े बदल रहे थे...

"तो वो क्या करते थे.. कपड़े निकाल कर.. बोलो..?" सुरेश च्छड़ी को वहीं पर टिकाए घुमा रहा था.. कामिनी को अजीब सा अहसास हो रहा था.. उसकी पॅंटी के अंदर.. पहली बार.. चीटियाँ सी रैंग रही थी.. और लग रहा था..च्छड़ी में से वो चीटियाँ निकल निकल कर उसके 'वहाँ' से उसके सारे शरीर में फैल रही हैं...

"ज्जई.. वो.. प्यार करते थे.." जाने कहाँ से कामिनी ने सुना था.. ' इसे प्यार कहते हैं..

"अच्च्छा.. और कैसे करते हैं प्यार..?" सुरेश के 'औजार' को शायद अहसास हो गया था की उसका इस्तेमाल होने वाला है.. रह रह कर वो पयज़ामे में फुनफना रहा था.. और इश्स फंफनहट से हुई बेचैनी चंचल को अपने शरीर में भी महसूस होने लगी थी..

"ज्जई... वो कपड़े निकाल कर... " कामिनी फिर अटक गयी..

"हां हां.. बोलो.. कपड़े निकाल कर.. क्या करते थे बोलो!" सुरेश ने उकसाया..

"जी.... वो.. सू.. सू.. में.." लगता था जैसे किसी ने कामिनी की ज़ुबान को बाँध रखा हो.. हर शब्द अटक अटक कर बाहर आ रहा था....

"आख़िरी बार पूचहता हूँ.. सीधे सीधे बता रही हो या नही.." अब सुरेश से भी ये अनोखा साक्षात्कार सहन नही हो रहा था..

" ज्जजई.. वो च.. चुदाई.. करते थे.." बोलते हुए कामिनी का अंग अंग सिहर उठा...

"अच्च्छा चुदाई करते थे.. ऐसे बोलो ना.. इसमें मुझसे शरमाने की क्या बात है.. मैने भी बहुतों की चुदाई की है.. अपने लंड से.. जब चूत में लंड डालता है तो लड़कियाँ पागल हो जाती हैं.. तुमने डलवाया है कभी लंड.." जाने क्या क्या सुरेश एक ही साँस में बोल गया था..

दोनो लड़कियाँ सिर नीचे झुकायं ज़मीन में गाड़ि जा रही थी.. शर्म के मारे..

"बताओ ना.. तुम्हे चोदा है कभी.. किसी ने... तुम्हारी चूत को फाडा है कभी..?"

चंचल का सिर ना में हिल गया.. पर कामिनी तो जैसे सुन्न हो गयी थी...

"इसका मतलब कामिनी को चोदा है.. कामिनी.. तू तो छुपि रुस्तम निकली.. तू तो सच में ही जवान है रानी.. किसने चोदा है तुझे.." सुरेश को इश्स कामुक वार्तालाप में अत्यधिक आनंद आ रहा था..

अनायास ही कामिनी के मुँह से निकल पड़ा,"मैने तो आज तक देखा भी नही बाबूजी.. देवी मैया की कसम..!" फिर ये सोचकर की क्या बोल गयी.. शरम से हाथों में अपना मुँह छिपा लिया..

"चूचूचूचु.. आज तक देखा भी नही.. आजा.. इधर आ .. दिखाता हूँ...... आती है की नही..." सुरेश ने जब धमकी सी दी तो कामिनी की हिम्मत ना रही की उसके आदेश का पालन ना करे.. वह आगे आकर उसकी टाँगों के पास खड़ी हो गयी...

"बैठ जा..." सुरेश के कहते ही वह घुटनों के बल ज़मीन पर आ गयी..

"ले..! मेरा नाडा (स्ट्रिंग टू होल्ड पयज़ामा) खोल.." सुरेश ने अपनी टाँगें चौड़ी करके अपना कुर्ता उपर उठा दिया... पयज़ामा जांघों के बीच में एक पोल की तरह उठा हुआ था..,"जल्दी खोल.." सुरेश के इश्स आदेश में उत्तेजना और अधीरता दोनो थे..

मरती क्या ना करती.. अभागन मासूम कामिनी ने नाडे को पकड़ा और आँखें बंद करके खींच लिया.. अंदर बैठा अजगर शायद इसी इंतज़ार में था.. कामिनी की आँखें बंद थी.. लेकिन चंचल जो इश्स सारे घटनाक्रम को बड़ी उत्सुकता से देखने लगी थी.. उसका कलेजा लंड का आकर देखकर मुँह को आ गया.. हैरत से उसने अपने होंठों पर हाथ रख लिया.. नही तो शायद चीख निकल जाती..

सुरेश का ध्यान चंचल की और गया.. जिस तरह की प्रतिक्रिया चंचल ने दी थी.. उस'से सपस्ट था की उसको बहकाना कामिनी के मुक़ाबले ज़्यादा आसान है..

"तुम भी इधर आकर बैठ... इसको हाथ में लो.."

चाहते हुए या ना चाहते हुए.. पर चंचल को 'उस' के करीब आने में कामिनी से कम समय लगा... आहिस्ता से डरती सी हुई चंचल ने अपना एक हाथ आगे बढ़ाया और उसको एक उंगली से च्छुने लगी.. मानो चेक कर रही हो.. कहीं गरम तो नही..

"ऐसे क्या कर रही हो.. मुट्ठी में पाकड़ो ना.." सुरेश उत्तेजना के मारे अकड़ सा गया था...

और चंचल ने अपने हाथ को सीधा करके लंड पर रखा और मुट्ही बंद करने की कोशिश करने लगी.. बहुत गरम था.. बहुत ठोस था.. और बहुत मोटा भी.. मुट्ही बंद नही हुई..

चंचल बड़े गौर से 'उसको' देख रही थी.. जैसे कभी पहले ना देखा हो.. देखा भी होगा तो ऐसा नही देखा होगा.. जाने अंजाने जीभ बाहर निकाल कर उसके होंठों को तर करने लगी..

"तुम भी पाकड़ो ना.. देखो इसने पकड़ लिया है.. मज़ा आ रहा है ना" नशे और उत्तेजना में रह रह कर सुरेश की आँखें बंद हो रही थी..

कामिनी ने धीरे से पलकें खोली.. आधे से थोडे ज़्यादा लंड पर अपनी बेहन के कोमल हाथों का घेरा देखा.. और फिर तिर्छि नज़रों से सम्मोहित सी हो चुकी चंचल को देखा.. कामिनी को पता हो ना हो.. की लंड बहुत कमाल का है.. पर उसकी चूत एक नज़र देखते ही समझ गयी.. एक दम से पानी छ्चोड़ दिया.. आनंद के मारे.. एक बार फिर कामिनी ने आँखें बंद करके अपनी जांघें भीच ली..

सुरेश तो निहाल हो गया था," इसको अपने मुँह में लेकर देखो.. सच में बड़ा मज़ा आता है.. सारी लड़कियाँ लेती हैं.." सुरेश के आदेश अब प्रार्थना सी में तब्दील होते जा रहे थे..

पहल चंचल ने ही की.. अपने गुलाबी होंठ खोले और झुक कर उसके सूपदे पर रख दिए.. सुरेश आनंद के मारे सिसकार उठा..

समा ही कुच्छ ऐसा बन गया था.. डर की जगह अब उत्सुकता और आनंद ने ले ली थी.. कामिनी का हाथ अपने आप उठकर चंचल के हाथ के नीचे लंड पर जाकर जाम गया.. अब भी सूपड़ा बाहर झाँक रहा था.. दो कमसिन कलियों के पाश में बँधा हुआ..

चंचल तो अब इश्स काद्रा बदहवास हो गयी थी की अगर उसको रोका भी जाता तो शायद वह ना रुकती.. अपना हाथ नीचे सरककर उसने कामिनी के हाथ को हटाया और पूरा मुँह खोल कर सूपदे को निगल गयी.. आँखें बंद की और किसी लोलीपोप की तरह मुँह में ही चूसने लगी.. सुरेश पागल सा हो गया.. अपने हाथों को चंचल के सिर पर रखा और नीचे दबाने लगा.. पर जगह थी ह कहाँ.. और अंदर लेने के लिए..

"मुझे भी करने दो..!" और कामिनी का संयम और शर्म एक झटके में ही बिखर गये..

चंचल ने अपना मुँह हटा कर लंड को कामिनी की और घुमा दिया..

अजीब नज़ारा था.. ब्लॅकमेलिंग से शुरू हुआ खेल ग्रुप सेक्स में तब्दील हो जाएगा... खुद सुरेश को भी इतनी उम्मीद ना थी.. रह रह कर तीनों की दबी हुई सी आनंदमयी लपड चापड़ और सिसकियाँ कमरे के माहौल को गरम से गरम करती रही.. इसका पटाक्षेप तब हुआ जब सुरेश दो कलियों के बीच शुरू हुए इश्स आताम्चेट युध को सहन नही कर पाया और छ्चोड़ दिया... ढेर सारा.. दोनो के चेहरों पर गरम वीरा की बूंदे और लकीरें छप गयी.. दोनो तड़प रही थी.. लेने को.. डलवाने को!

दोनो जाने कितनी देर तक ढहीले पड़ गये लंड को उलट पलट कर सीधा करने की कॉसिश करती रही.. पर सुरेश शराब के कारण अपने होश कायम नही रख पाया था.. एक बार के ही इश्स चरमानंद ने उसको गहरी नींद में सुला दिया..

जब कामिनी ने सुरेश के खर्राटे भरने की आवाज़ को सुना तो वो मायूस होकर चंचल से बोली..," पता नही क्या हो रहा है.. मैं मर जवँगी.. कुच्छ करो.."

"जाओ.. बाहर उस दूसरे लड़के को देखकर आओ.. तब तक मैं इसका पयज़ामा उपर करती हूँ..." चंचल का भी यही हाल था..

"वो यहाँ नही है दीदी..! मैं बाहर सड़क तक देख आई.." वापस आकर कामिनी ने बदहवासी सी अपनी जांघों के बीच उंगलियों से खुरचते हुआ कहा..

"तुम एक काम करो.. कपड़े निकालो जल्दी.." चंचल के पास एक रास्ता और था..

जिन कपड़ों को वापस पाने की खातिर वो इतना रोई थी.. इतना गिड़गिडाई थी.. उनकी दुर्गति पूच्छने वाला अब कोई नही था.. दोनो के कपड़े यहाँ वहाँ कमरे में बिखरे पड़े थे..

चंचल ने कामिनी की छ्होटी छ्होटी चुचियों को मुँह में दबाया और उसकी गांद की दरार में अपनी उंगलियाँ घुमाने लगी.. कामिनी आनंद के मारे रह रह कर उच्छल रही थी.. आँखें बंद करके ज़्यादा से ज़्यादा चूची उसके मुँह में घुसेड़ने का प्रयास कर रही थी..

"मुझे कौन करेगा?" चंचल ने अचानक हट'ते हुए गुस्से से कहा..

"क्या?" कामिनी समझी नही...

"वही जो मैं कर रही हूँ बेवकूफ़.. मेरी गांद को सहला.. और ये ले.. अब मेरी चूची को तू चूस.."

बड़ा ही अनोहारी दृश्या था.. पास ही बेड पर सुरेश सोया पड़ा था.. और अब तक इज़्ज़त बचाने की जद्दोजहद से जूझ रही लड़कियाँ एक दूसरी को सांत्वना देने की होड़ में भिड़ी हुई थी.. एक दूसरी की 'इज़्ज़त' को दोनो हाथों से.. और होंठों से चूम रही थी.. चूस रही थी.. फाड़ रही थी.. नोच रही थी और लूट रही थी....

कुच्छ देर बाद चंचल ने कामिनी को ज़मीन पर लिटा और उल्टी तरफ होकर उसके उपर चढ़ गयी.. कामिनी की चूत पड़ी प्यारी थी.. हल्क हल्क बालों वाली.. छ्होटी सी.. चंचल ने अपनी जीभ निकाली और कामिनी की चूत की पतली सी दरार को अपनी उंगलियों से चौड़ा करके उसमें अपनी जीभ घुसेड दी.. कामिनी आनंद के मारे लाल हो उठी..," आआआआअहह मम्मी मैं मरी..."

"अकेली क्यूँ मर रही है रंडी? मेरी भी मार ना.. तेरे मुँह पर रखी है मेरी चूत.. चाट इसको.. उंगली घुसा के पेल.." चंचल की वासना ने रौद्रा रूप धारण कर लिया था.. उसकी साँसे उखड़ी हुई थी.. पर हौंसले बुलंद थे..

कामिनी को अब बारबार सीखने की ज़रूरत नही पड़ी.. बस जैसे जैसे चंचल उसको कर रही थी.. वैसे वैसे ही कामिनी भी करती जा रही थी.. दोनो अब तेज तेज आवाज़ें निकाल रही थी...

अपने भाई को घर बुलाने आया राकेश काफ़ी दीनो के बाद इतना प्यारा मादक संगीत सुनकर भाव विभोर हो गया..

दरवाजे की दरार से झाँक कर देखने की उसने कोशिश की पर सफल ना हुआ.. शब्र का बाँध टूट ही गया तो उसने एक झटके के साथ दरवाजा खोल दिया..

शुरू में लड़कियाँ चौंकी नही.. उनको राज के आने की उम्मीद थी.. पर राकेश को देखकर उनकी घिग्गी बाँध गयी..," वववो.. म्‍म्माइन.... हूंम्म्म.."

"ष्ह.. कुच्छ मत बोलो.. ऐसे ही लेटी रहो.. शोर मचाया तो दोनो को ऐसे ही घसीट'ता गाँव ले जाउन्गा.." और एक दूसरी ब्लॅकमेलिंग शुरू हो गयी.. पर इश्स वक़्त उन्न दोनो को इसकी ही सबसे अधिक ज़रूरत थी...

"इस्सको कहते हैं बिल्ली के भागों छ्चीका टूटना.." राकेश को पका पकाया माल खाने को मिल गया..

"ले मेरा लंड चूस कामिनी.. बहुत दीनो से सूखा ही घूम रहा हूँ.." राकेश ने भी बिना देर किए अपने कपड़े उतार फैंके...

राकेश का लंड मुँह में लेने में कामिनी को ज़्यादा मस्सकत नही करनी पड़ी.. थोड़ी ही कोशिश के बाद राकेश का आधा लंड कामिनी के गले में ठोकरे मार रहा था...

"ये चिकनी चूत कौन है.. पहचान में नही आई..." राकेश ने कामिनी के मुँह के उपर रखी चंचल की चूत में उंगली घुसेड दी.. उंगली घुसेड़ने का तरीका इतना जंगली था की चंचल बिलख पड़ी..," ओई माआ.."

"मा को क्यूँ पुकार रही है.. उसकी भी मर्वानी है क्या..!" मस्ती से भरे राकेश ने 'पुच्छ' की आवाज़ के साथ अपना लंड कामिनी के होंठों से जुदा किया और चंचल की थूक और रस से चिकनी हो चुकी चूत को दो उंगलियों से खोलकर वहाँ टीका दिया..

"कामिनी.. इसकी गांद को दोनो हाथों से कसकर पकड़ ले.. नही तो ये बिलबिलाएगी.. पहली बार लग रहा है.. आई है किसी लंड के सामने.."

कामिनी ने वैसा ही किया.. और वैसा ही हुआ जैसा राकेश ने कहा था.. चंचल चिंहूक उठी.. हालाँकि बिलबिलने वाली बात नही थी... पर अभी सूपड़ा ही अंदर गया था.....

जब एक के साथ एक फ्री मिल रही हो तो कोई दोनो के ही मज़े लेगा.. एक के क्यूँ.. सूपदे को चिकनी कुँवारी चूत का स्वाद चखाकर राकेश ने 'अपना' वापस खींच लिया और फिर से उसको कामिनी ने मुँह पर रख दिया.. कामिनी को इश्स मादक द्रिव्या को चटकार सॉफ करने में चाँद सेकेंड ही लगे.. राकेश ने ऐसा अनोखा मज़ा कभीलिया नही था सो उच्छल उच्छल कर दोनो के मज़े ले रहा था...

एक बार फिर सूपदे समेत लंड आधा चूत द्वार के पार हो गया.. आनंद की पराकास्था में अब चंचल खुद भी धक्के लगा रही थी.. हानफते हुए.. पीछे की ओर..

और चंचल ने वासना के सागर में अंतिम साँस ली.. इसी एक पल में उसने अपनी जीभ गोल करके कामिनी की चूत में घुसा दी और निढाल हो गयी..

राकेश ने जब अपना लंड बाहर निकाला तो वह पहले से ज़्यादा खड़ा, पहले से ज़्यादा चिकना और पहले से ज़्यादा ख़तरनाक लग रहा था...

पाला बदल कर वह चंचल के मुँह की और जा पहुँचा.. कामिनी की चूत की और.. जो उसका बेशबरी से इंतज़ार कर रही थी.. फूल कर मोटी हो चुकीचूत की दरार भी भी अब पहले से चौड़ी लग रही थी.. पर योनि द्वार उतना ही था.. पेन्सिल की नोक भी घुसना असमभव लगता था..

पर इरादे मजबूत थे..," कसकर टाँगें पकड़ना डार्लिंग.. यहाँ मामला मुश्किल लगता है....

"कर दो.. मैने पकड़ रखी हैं.." चंचल कामिनी को ऐसे कैसे जाने देती.. टाँगों को मजबूती से दबाते हुए उन्हे और चौड़ा किया और सुपाडे को अपने होंठों से चूमा.. मानो विजय सूचक तिलक कर रही हो लंड के माथे पर..

च्छेद पर हूल्का सा दबाव बनते ही कामिनी बिलबिला उठी.. लंड को इधर उधर का रास्ता दिखाने की कोशिश के साथ ही कामिनी ने इस जानलेवा प्रहार से बचना चाहा.. पर..

अचानक ऐसी आवाज़ हुई जैसे कोई वाल्व फट गयी हो.. और खून की एक पतली सी धारा राकेश के लंड को वापस खींचने के साथ ही बह निकली..," वाह.. इसको कहते हैं असली कुँवारा माल.. क्या सील टूटी है आज.." राकेश को कामिनी की छट पटाहट से कोई लेना देना नही था... तो बस रोंडता ही चला गया.. घुसता ही चला गया..

कामिनी के आँसू किसी ने पौन्छे नही.. अपने आप ही रुके जब उसको दर्द के असहनीया अहसास के साथ आनंद की मिठास की खुश्बू आने लगी.. फिर ये तो होता ही है.. हाए, आह में बदल जाती है.. वही अब तक कुँवारी कामिनी के साथ भी हो रहा था...

राकेश को अब खूब सहयोग सहयोग दोनो तरफ से मिल रहा था.. जब भी उसका लंड हाँफने के लिए बाहर निकालता.. चंचल के होंठ उसको अपनी गिरफ़्त में ले लेते.. और चूम चाट कर दोबारा तरोताजा करके.. उसके लिए मिन्नटें कर रही कामिनी की चूत में वापस धकेल देते.. कामिनी भी ज़्यादा देर ना ठहरी और एक बार फिर से छ्चोड़ देने के लिए गिड़गिदाने लगी..

अब राकेश का भी वक़्त आ गया था.. उसके बाहर निकलते ही ज्यूँ ही इश्स बार चंचल ने उसको लपका.. राकेश ने लंड उसके मुँह में ही कसकर दबा लिया.. चंचल च्चटपटाने लगी.. लंड उसके गले में फँसा हुआ था..

और वीरया की एक गढ़ी धार चंचल के गले में उतरती चली गयी.. बिना स्वाद का अहसास कराए...

कुच्छ देर बाद जब सब कपड़े पहन कर खड़े हुए तो राकेश ने हंसते हुए कहा," इश्स मूसलचंद को कहाँ फँस गयी थी तुम.. इश्स'से तो 2-2 बच्चों वाली भी डरती हैं.. अगर ये कर देता तो यहाँ से सीधे हॉस्पिटल ही जाती तुम....

खैर जो हुआ.. अच्च्छा ही हुआ!!!!!

rajaarkey
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Re: गर्ल'स स्कूल

Unread post by rajaarkey » 12 Dec 2014 03:23

गर्ल्स स्कूल पार्ट --34



मोटी सी एक करीब 40 साल की औरत गुस्से से तमतमाति हुई अपने घर से बाहर निकली

"तुम लफंगों को शरम नही आती... भला ये भी कोई तरीका है?"

"सीसी..क्या हुआ आंटी जी?" राज ने जब उस औरत के शब्डबानो को खुद की और आते देखा तो विचलित सा हो गया..

"हुउऊउ.. क्या हो गया आंटी जी?" आंटी जी ने मुँह फुलाते हुए राज की नकल उतारी," यहाँ हमारे घर के बाहर बैठहे तुम्हे आधा घंटा हो गया है.. घर में कोई काम नही है क्या? बेशार्मों की तरह दूसरों के घरों में झाँकते हो....."

"पर.... पर मैने तो कुच्छ नही किया आंटी जी.. आप खामखाँ नाराज़ हो रही हैं..." राज को कुच्छ समझ ना आया...

"तुम चुपचाप यहाँ से दफ़ा होते हो की नही.. अब अगर यहाँ खड़े रहे तो मुझसे बुरा कोई ना होगा... मेरे पति थानेदार हैं.. एक फोन करूँगी ना..!" औरत का गुस्सा शांत होने का नाम नही ले रहा था...

"आ..आप क्या बकवास कर रही हैं... क्या मैं अपने रूम के बाहर भी नही बैठ सकता...!" राज के सब्र का बाँध भी टूट'ता जा रहा था...

सुनकर औरत एक पल के लिए सकपका गयी," तुम्हारा कमरा?"

"हाँ.. कल ही किराए पर लिया है...!" राज ने मुँह फूला लिया...

"तो कमरा ही किराए पर लिया होगा ना.. पूरी कॉलोनी तो नही खरीद ली.. यहाँ बाहर आकर इश्स... नेकर में बैठ गये... कमरा लिया है तो कमरे में ही रहा करो.. यहाँ बेहन बेटियाँ भी रहती हैं.. समझे" हालाँकि औरत को अपनी ग़लती का अहसास हो गया था.. उसने तो सोचा था की कहीं से कोई लफंगा आकर उसकी बेटी पर लाइन मार रहा है.. पर थानेदारनी 'सॉरी' कैसे बोलती...

राज ने गुस्से से पैर पटका और अंदर चला गया..

"यार.. ये कहाँ पागल लोगों के बीच फँसा दिया यार.. ये कोई जगह है.. अब बाहर भी नही बैठ सकते.. हुउन्ह!" राज ने अंदर लेते हुए वीरेंदर को अपना बरमूडा दिखाते हुए कहा..

"क्या हुआ?" वीरेंद्र ने चौंकते हुए कहा...

"हुआ क्या यार.. ये सामने वाली आंटी......." राज ने सारा किस्सा वीरेंद्र को सुना दिया....

"हाहहः... हाहहाहा... हाहहाहा.... तू उसके सामने ऐसे चला गया... " कहकर वीरेंदर पेट पकड़ कर हँसने लगा...

"अब इसमें हँसने वाली क्या बात है..." राज का पहले से ही खराब मूड और खराब हो गया...

"बुरा मत मान'ना यार.. पर इश्स औरत से सम्भल कर रहना.... पर उसकी भी क्या ग़लती हो.. जिसकी पटाखे जैसी 2-2 जवान बेटियाँ हों.. उसका ऐसा व्यवहार लाजिमी ही है.. दोनो मस्त माल हैं यार.. जुड़वा हैं... देखते ही बेहोश ना हो जाओ तो कहना.. एक दम मक्खन के माफिक बदन है.. तू देखना उनको.. पर टोकने की गुस्ताख़ी मत करना.. और आइन्दा ऐसे बाहर मत बैठना कभी..." वीरेंद्र ने सीरीयस होते हुए कहा...

"पर यार.. बेटियाँ हैं तो हैं.. इसमें हमारी नाक में दम कर देना.. ये कहाँ जायज़ है..." राज को बात हजम नही हुई...

"कह तो तू ही ठीक रहा है.. पर एक तो थानेदारनी की चौधर.. दूसरा शक्की मिज़ाज.. बाप भी ऐसा ही है... हालत यहाँ तक है की लड़कियों को स्कूल लाने ले जाने तक के लिए एक बुड्ढे सिपाही की ड्यूटी लगा रखी है.. चल छ्चोड़.. आ खाना खाकर आते हैं....

"क्या हुआ मम्मी..?" बाहर शोर शराबा सुनकर मुम्मी के घर के अंदर आते ही प्रिया ने सवाल किया...

"क्या बताऊं..? आज कल के लड़के भी इतने लुच्छे लफंगे हैं... तेरे पापा देख लेते तो उसकी तो खाल ही खींच लेते.. और ज़ुबान इतनी चलाता है की बस.. हे राम!"

"पर हुआ क्या मम्मी.. कौन था?" प्रिया को जानने की जिगयसा हो उठी..

"अरी.. यहीं.. सामने वाले मकान में रूम लिया होगा.. बाहर बैठा था.. कच्च्छा पहने.. चल तू पढ़ाई कर ले.. छुट्टियों का काम रहता होगा.. देख रिया पढ़ रही है की नही...

"क्या..???? कच्च्छा पहनकर.." प्रिया ने अपने मुँह पर हाथ रखकर अपनी शरम छिपाइ.. बड़ा बदतमीज़ होगा कोई.."

"चल तू अपना काम कर ले.. तेरे पापा आते ही होंगे... उनको मत बताना.. याद है ना.. पिच्छले लड़के को कितना मारा था....

राज की आँखों में कल गाँव वाला मंज़र जीवंत हो उठा.. वो लड़की कैसे अपनी देह को छिपाने की कोशिश कर रही थी.. ना चाहकर भी रह रह कर राज का ध्यान यहाँ वहाँ से छलक रही छातियों पर जा रहा था.. नंगा बदन देख कर कैसे उसके दिलो दिमाग़ में उथल पुथल सी होने लगी थी.. और जब वो अचानक अपने आपको मोबाइल में क़ैद किए जाने पर खड़ी हुई थी... अफ.. कैसे मैस्तियों का जाम सा उसकी नशों को नशे में तर कर गेया था.. भगवान ने भी क्या चीज़ बनाई है.. 'नारी'.. अगर वा वहाँ से बाहर नही जाता तो शायद ज़ज्बात इंसानियत पर हावी हो जाते.. और वह भी अपनी पौरुष्टा को उस लड़की के 'खून' में रंग चुका होता.. उसका कुन्नवारापन भंग हो गया होता...

राज ने अभी तक की अपनी पढ़ाई हिंदू बाय्स स्कूल, सोनीपत में होस्टल में की थी.. इसीलिए लड़कियों के 'सुरूर' से अभी तक अंजान ही था.. पर अब 12थ में उसके दोस्त वीरेंदर ने उसको रोहतक बुला लिया था.. घर वाले भी मान गये.. क्यूंकी होस्टल से कोचैंग क्लासस के लिए बाहर जाने की अनुमति नही थी.. यहाँ का स्कूल को-एड था..

"कहाँ खो गये भाई?" वीरेंद्र ने राज के कंधे को दबाया...

"उउउन्ह.. कहीं नही.. बस ऐसे ही.. यार में कभी लड़कियों के साथ नही पढ़ा हूँ.. हम तो वहाँ खुल कर हंसते खेलते थे.. यहाँ पर तो बड़ी बंदिशें होंगी...." राज ने अपनी किताब निकालते हुए पूचछा....

"अरे यार.. तू भी ना.. खामखाँ की टेन्षन क्यूँ ले रहा है.. को-एड के अपने ही मज़े होते हैं... पढ़ने में भी मज़ा आता है... और.."

"यार.. वो देख.. सामने वाले घर से कोई झाँक रहा है.. खिड़की में से.." राज ने वीरेंद्र को बीच में ही रोक दिया....

"कौन?.. अरे उधर मत देख यार.. नज़रों में चढ़ गये तो बेवजह टेन्षन हो जाएगी.. इधर आ जा... लगता है ये रूम छोड़ना ही पड़ेगा.." वीरेंदर ने राज को खींचने की कोशिश की...

पर राज तो जैसे जड़ सा हो गया था.. सम्मोहित सा.. सामने वाली खिड़की से उन्ही की और देख रहा चेहरा इश्स कदर हसीन था की राज वहाँ से अपनी नज़रें ना हटा पाया.. एक दम ताजे गुलाब जैसी नज़ाकत उस चेहरे से टपक रही थी.. रसीलापन इतना की फलों का राजा 'आम' भी शर्मा जाए.. आँखों में तूफान को भी अपने अंदर समा लेने की तड़प थी.. होंठ ऐसे की जैसे गुलाबी रंग की लिपस्टिक लगा रखी हो...

"आई मम्मी!" कहकर वह नीचे भाग गयी..

आवाज़ भी इश्स कदर सुरीली थी जैसे सातों सुर स्वारबद्ध होकर अपना जादू बिखेरने लगे हों.. वह करीब 10 सेकेंड खिड़की पर रही.. इतने में ही जाने सुंदरता के जाने कितने अलंकरण राज ने अपने दिल से उसको दे दिए..

"यह लड़की तो बड़ी प्यारी है यार..!" राज ने खिड़की पर से नज़र हटा'ते हुए कहा. उसकी की आँखों से सौंड्राया दर्शन की तृप्ति झलक रही थी..

"तो मैं क्या दोपहर को बीन बजा रहा था.. बताया तो था.. दोनो बहनें लाखों में एक हैं..." वीरेंदर किताब उठा कर पढ़ने बैठ गया..

"ये कौनसी थी..? बड़े वाली की छ्होटी.."

"यार.. दोनो जुड़वा हैं.. मैं तो आज तक पहचान नही पाया हूँ.. तू पहचान सके तो पहचान लेना.. पर यहाँ नही.. कल स्कूल में.. अब पढ़ने दे..!" वीरेंदर बोला..

"सच... क्या ये हमारे ही स्कूल में प्पढ़ती हैं.. यकीन नही होता यार.. यकीन नही होता..."

"अरे ओ भाई.. माफ़ कर.. ये लड़किया दूर से ही प्यारी दिखाई देती हैं.. तू कभी साथ रहा नही ना.. धीरे धीरे सब समझ आ जाएगा.. कम से कम इनके चक्कर में मत पड़ना.. लेने के देने पड़ जाएँगे..."

"मैं तो बस ऐसे ही पूच्छ रहा था यार..." राज ने मायूस होते हुए जवाब दिया..

"चल ठीक है.. आजा.. अब खिड़की बंद कर... और पढ़ ले!"

और उस रात राज पढ़ ना पाया.. दिमाग़ में खिड़की में खड़ी होकर झाँक रही वही दो आँखें घूमती रही.... खुमारी भर देने वाली आँखें....

नये स्कूल का पहला दिन... राज बहुत रोमांचित था पर अंदर ही अंदर झिझक की एक हुल्की सी मेहराब उसको उसके फुदकते दिल को काबू में रखने की नसीहत दे रही थी... जैसे ही उसने स्कूल के गेट से प्रवेश किया.. हज़ारों की संख्या में यहाँ वहाँ मंडरा रही 'तितलियों' के हृदयस्पर्शी दृश्यों ने उसका स्वागत किया.. 'आ.. लड़कियाँ कितनी प्यारी होती हैं.. कितनी स्वप्निल, कितनी कातिल.. नज़र के ही एक वार से घायल कर दें.. '

पर राज की आँखें तो उसी चेहरे को ढ़हूंढ रही थी जो उसको कल खिड़की में से नज़र आया था.. और फिर सारी रात निकल ही नही पाया.. उसके ख़यालों से..

"चल यार.. क्या ढूँढ रहा है..? आरती मेडम की क्लास है प्रेयर से पहले.. अगर आ गयी होंगी तो दरवाजे पर ही क्लास ले लेंगी..." वीरेंद्र ने राज के बॅग को पकड़ कर खींचा...

"आन....हाँ.. चल!" राज की नज़रें फिर भी उसके कदमों का साथ नही दे रही थी...

"श.. लगता है मेडम आ गयी.. अब देखना..."

"मे आइ कम इन मेडम?" वीरेंद्र ने एक हाथ में राज का हाथ पकड़े दूसरा हाथ आगे बढ़ाया...

"ये लो भाई... हाइह्कोर्ट ने 'गे ऑर्डर' क्या पास कर दिया.. लोगों ने तो हम लॅडीस को नोटीस करना ही छ्चोड़ दिया.. अब तक कहाँ रंगरलियाँ माना रहे थे..?" और क्लास में ठहाका गूँज उठा... आरती मेडम की तीखी आवाज़ वीरेंद्र के कानों में मिर्ची की तरह पड़ी...

"नही.. मेडम.. वो.. इसने अभी अड्मिशन लिया है.. आज पहला दिन था.. सो...." वीरेंद्र ने बच्चों के ठहाकों पर ध्यान नही दिया..

"ओह्ह्हो.. नया लड़का...! गॅल्स.. देखो..! नया लड़का आया है.... तो क्या आरती उतारें इसकी.. स्कूल के टाइम का नही पता क्या तुम लोगों को.." आख़िरी लाइन बोलते बोलते आरती मेडम चीख सी पड़ी थी..

"सॉरी मेडम.. वो.. आगे से ऐसा नही होगा..! प्लीज़ लेट अस कम इन..!"

"नो! नो वे.. जस्ट स्टे आउटसाइड..!" कहकर आरती ने क्लास की और रुख़ कर लिया..

मायूस वीरेंदर और राज कॅंटीन में आकर बैठ गये...

"यार यहाँ तो बड़ा स्ट्रिक्ट माहौल है.. पहले ही दिन किरकिरी हो गयी.." राज ने भावपूर्ण तरीके से वीरेंदर की और देखा...

"नही यार.. सब ऐसे नही हैं.. बस यही एक खड़ूस मेडम है जो बच्चों की नाक में दम रखती है.. पता नही कब रिटाइर होगी... " वीरेंदर ने उसको दिलासा दी...

"यार.. वो लड़की भी इसी स्कूल में है.. तू कह रहा था..?" राज मतलब की बात पर आ गया...

"यार तू आदमी है की बंदर.. एक बात के पिछे ही चिपक गया.. इसी स्कूल में ही नही.. इसी क्लास में भी है.. पर यार.. तू उसका चक्कर छ्चोड़ दे.. मरवा देगी.. देखा नही.. कैसे दाँत निकल कर हंस रही थी अभी.. क'मिनी!"

"क्या? अपन ही क्लास में है.. " और राज की आँखें चमक उठी....

प्रेयर की बेल होते ही सभी ग्राउंड में जाकर कक्षानुसार पंक्तिबद्ध होना शुरू

हो गये.. लड़कियाँ एक तरफ खड़ी थी.. लड़के दूसरी तरफ.. राज और वीरेंद्र कक्षा के सबसे लंबे लड़के थे सो वो दोनो सबसे पिछे खड़े थे...

"ओये राज.. वो देख प्रिया!" वीरेंदर ने अपनी कोहनी से राज के पेट पर टच किया..

"कहाँ?" राज के दिल में घंटियाँ सी बज उठी..

"वहाँ... सामने मंच पर.. पाँचों लड़कियों के बीच में खड़ी है.. अब जी भर कर देख लेना... " वीरेंदर हल्क से फुसफुसाया...

"ओह... " सिर्फ़ यही वो शब्द थे जो राज के मुँह से प्रतिक्रिया के रूप में निकले.. उसका मुँह खुला का खुला रह गया.. धरीदार स्कर्ट और जगमगाती हुई सफेद शर्ट पहने प्रिया को सिर से पाँव तक देखकर राज की साँसे सीने में ही अटक गयी..

प्रिया हाथ जोड़े नज़रें झुकाए प्रेयर करने लगी.. नख से सिख तक उसके शरीर का कतरा कतरा शरबती मिठास संजोए हुए था.. कपड़ों में से झाँकते संतरी उभारों में मानो नयन चुंबक लगा हो.. नज़रें चिपक जायें.. जैसे राज की चिपकी हुई थी.. लंबा छरहरा वक्राकार बदन किस को पागल ना बना दे.. सो राज भी हो गया.. पहली नज़र में ही घायल... उसकी आँखें बंद ही ना हुई.. प्रेयर के लिए.. उसको लगा जैसे प्रिया उसी के लिए गा रही है.. 'प्रेम-गीत'

उसका ये सुखद अहसास प्रेयर के ख़तम होने के बाद भी जारी रहा और उसकी नज़रें प्रेयर के बाद अपनी लाइन में जाकर खड़ी हुई प्रिया का पिच्छा करते हुए लगभग 90 डिग्री पर घूम गयी.. उसके चेहरे के साथ...

"हे यू! लास्ट बॉय इन 12थ.. वॉट'स अप?" आगे खड़ा एक टीचर गुस्से में गुर्राया..

वीरेंद्र ने कोहनी मार कर राज का ध्यान भंग किया..," तू तो गया यार...!"

"सस्स्सोररी सर.." कहकर राज ने सीधा खड़ा होकर नज़रें झुका ली...

प्रेयर के बाद राज क्लास में घुसा ही था की एक लड़की ने उसका रास्ता रोक लिया," नये हो..?"

"हाँ.." जब आगे जाने का रास्ता नही मिला तो राज ने वही खड़े होकर एक शब्द में उत्तर दिया....

"सुनो! सुनो! सुनो! ये नया है.. अभी बनकर आया है.." लड़की के ऐसा कहते ही क्लास में हँसी का ठहाका गूँज उठा...

"आ स्वाती! माइंड उर लॅंग्वेज.. जस्ट श्युटप आंड पुट डाउन युवर..." वीरेंदर का रुतबा ही ऐसा था की लड़कियाँ तो उसके नाम से ही बिदक्ति थी.... शानदार गठीले बदन का जवान होने के कारण लड़कियाँ उस पर जान तो छिदक्ति थी पर जान जाने का डर भी उनके मॅन में रहता था.. सुनते हैं की एक लड़की के प्रपोज़ करने पर वीरेंदर ने उसको खींच कर एक तमाचा दे दिया था.. पाँचों उंगलियाँ उसके चेहरे पर छप गयी थी.. तब से ही लड़कियाँ.. बस दूर से ही आ भर कर काम चला रही थी..

"मैं तुमको क्या कह रही हूँ.. " और लड़की की आँखों में आँसू उतर आए.. वह वापस अपनी बेंच पर जा बैठी..

"यार... लड़की को ऐसे नही डांटना चाहिए.." राज ने वीरेंदर के साथ अपनी बेंच पर

बैठते हुए कहा..

"हाँ.. नही कहना चाहिए.. मैं भी मानता हूँ.. पर लड़की को भी तो अपनी मर्यादायें याद रखनी चाहियें...

"यार.. उसने मज़ाक ही तो किया था.. मैं सॉरी बोलकर आता हूँ.." इससे पहले की वीरेंद्र कुच्छ बोलता.. राज उसके बेंच तक पहुँच गया था..

उसने वहाँ जाकर 'सॉरी' बोला ही था की दरवाजे से वही सुरीली आवाज़ आई जो उसने रात को सुनी थी.."नया लड़का कौन है?"

और एक बार फिर पूरी क्लास में ठहाके गूँज उठे... 'नया लड़का!'

"इसमें हँसने वाली क्या बात है.. मैने कोई जोक सुनाया है.." प्रिया को एक मिनिट पहले हुए तमाशे की जानकारी नही थी...

राज पलट गया.. उसका दिल एक बार फिर धड़कना भूल गया..,"मैं हूँ.. राज!" राज का हाथ अपने आप ही उसकी तरफ बढ़ गया..

"तुम्हे गौड़ सर बुला रहे हैं.. स्टाफ रूम में..!" प्रिया ने बढ़े हुए हाथ को नही थामा..

"पर ... मुझे स्टाफ रूम का पता नही है..!" राज ने शर्मकार हाथ वापस खींच लिया...

"चलो.. मैं लेकर चलती हूँ.." कहकर प्रिया बाहर निकल गयी.. राज की आँखों में पनप रहे अपने पन को उसने कोई तवज्जो नही दी.. शायद सुन्दर लड़कियों को इसकी आदत होती है..

बिना एक भी शब्द बोले दोनो स्टॅफरुम पहुँच गये...

"कम इन सर?" प्रिया और राज पर्मिशन लेकर गौड़ सर की चेर के पास जा पहुँचे.. ये वही थे जिन्होने राज को प्रेयर में टोका था...

"क्या बात है सर..?" राज को लगा प्रिया के सामने ही उसकी किरकिरी होगी..

"हूंम्म...! मिस्टर. हॅंडसम, यहाँ पढ़ने आए हो की तान्क झाँक करने..?"

"सर.. मैं समझा नही.. " राज ने भोलेपन से कहा..

"समझ तो तुम सब गये हो बेटा.. तुम दिखने में सुंदर हो.. इसका मतलब ये नही की.. खैर छ्चोड़ो.. 10थ में कितने मार्क्स आए हैं..?"

"सर.. 95%!" बोलते हुए राज की आँखों में चमक थी.. गर्व था.."

"हाउ मच?!!!!" प्रिया ने ऐसा रिक्ट किया मानो उसको विस्वास ना हुआ हो..

"95%!"

"हूंम्म.. थ्ट्स लाइक ए गुड बॉय.. शायद मुझसे ही कोई चूक हो गयी होगी.. जाओ.. एंजाय युवर स्टडीस!" और गौड़ सर ने राज की कमर पर थ्हप्कि देकर उसको वापस भेज दिया..

क्लास की और जाते हुए राज मन ही मन उच्छल रहा था.. प्रिया ने उसकी स्कोरिंग पर आसचर्या व्यक्त किया था.. प्रभावित ज़रूर हुई होगी.. उसने साथ चुपचाप चल रही प्रिया के मॅन को सरसरी नज़र से पढ़ने की कोशिश की.. पर कुच्छ खास अब लगा नही..,"आ.. आपके कितने मार्क्स हैं.. 10थ मैं.."

"अच्च्चे हैं.. पर तुम्हारे आगे कुच्छ नही.. बस यूँ समझ लो की तुमसे पहले मैं ही स्कूल की टॉपर थी..

"श.." राज ने ऐसे रिक्ट किया मानो प्रिया का रेकॉर्ड खराब करने पर उसको बहुत अफ़सोस हुआ हो.. इश्स'से पहले वो कुच्छ और बोलता.. उसकी आँखें आसचर्या से फट गयी.. वह एक बार सामने से आ रही रिया को देखता तो एक बार साथ चल रही प्रिया को...

"ये मेरी बेहन है.. रिया! मुझसे 8 मिनिट छ्होटी.. रिया! ये हैं मिस्टर..??" प्रिया की प्रशंसूचक नज़रों ने राज के दिल पर कहर सा ढाया..

"मुझे राज कहते हैं.. !"

"तूमम.. तो हमारे घर के सामने ही रहते हो ना...?" रिया ने तपाक से पूचछा...

"क्या???" प्रिया ने आसचर्या व्यक्त किया..

"जी.. मुझे नही पता आप कहाँ रहती हैं.. मैं तो मॉडेल टाउन 82-र मैं रहता हूँ.." राज ने अंजान बन'ने की कोशिश की...

"अच्च्छा.. तो वो तुम्ही हो.. जो..." कुच्छ सोचकर प्रिया आगे की बात खा गयी..

"जी क्या?" राज असमन्झस में पड़ गया..

"कुच्छ नही.. क्लास का टाइम हो रहा है.. " कहकर प्रिया रिया का हाथ पकड़ कर क्लास की और आगे बढ़ गयी..

राज उनके पीछे पीछे चलता हुआ उनको घूरता रहा.. क्या समानता थी.. उनकी हाइट में भी.. उनकी हँसी में भी.. उनकी चाल में भी.. और चलते हुए लचक रहे उनके मादक कुल्हों में भी... 'आ! किस किस को.... '

राज मॅन ही मन मुस्कुराया और क्लास में घुस गया...

"क्या बात थी.. अंदर घुसते ही वीरेंदर ने चिंता से पूचछा " डाँट पड़ी क्या?"

"नही.. शाबाशी मिली.. " राज ने मुस्कुराते हुए कहा..

"सच! किसलिए?

"अब मैं स्कूल का टॉपर हूँ.. इसलिए..!" राज ने सीना तान कर कहा...

---------

"आ तुझे पता है.. राज के 10थ में 95% मार्क्स हैं.." प्रिया ने साथ बैठी रिया के कान में कहा..

"सच... दिखने में तो एकद्ूम भोला.. स्वीट सा लगता है.. इसने चीटिंग कर ली होगी क्या???" रिया शरारत से राज की और देखकर मुस्कुराइ...

"अच्च्छा.. तो तेरे कहने का मतलब ये है की मेरे 91 चीटिंग की वजह से आए हैं.. हे भगवान.. जब टीचर्स को पता चलेगा तो मेरी तो हवा ही खराब हो जाएगी..." प्रिया को अपनी कुर्सी हिलती नज़र आई....

..........

"हे वीरेंद्र! देख.. प्रिया मुझे देखकर मुस्कुरा रही है..." राज ने रिया को अपनी और मुस्कुराते देख वीरेंदर से कहा...

"वो रिया है.. चक्कर में मत आना.. शिकायत करने में भी सबसे आगे रहती है.. मुस्कुराती है बस! सबको पता है..." वीरेंदर ने अपने हाथ से राज की उनकी ओर निकली हुई बतीसि बंद करके उसको सीधा कर दिया..

"पर तुझे कैसे पता.. दोनो एक जैसी हैं.. बिल्कुल! और तूने कहा भी था.. की तू भी उनको नही पहचान पता!" राज ने उत्सुकता से पूचछा..

"ऐसे तो उनकी मा भी उनको नही पहचानेगी.. रिया कान में बाली डालती है.. पर प्लीज़ यार.. ये सब मुझे अच्च्छा नही लगता.. तू पढ़ाई में ध्यान लगा.. बस!" वीरेंद्र ने उसको नसीहत दी...

"बस एक आख़िरी बात.. इनमें से किसी का बाय्फ्रेंड है क्या?"

"क्यूँ? मैं इनका असिस्टेंट हूँ क्या? अब कुच्छ पूच्छना है तो सीधा जा और उनसे पूच्छ ले..."

"बुरा क्यूँ मानता है यार.. मैं तो.." तभी क्लास में सर आ गये और सारी क्लास खड़ी हो गयी....

"क्या हाल हैं.. थानेदार साहब!" विकी घर के अंदर घुसते ही ड्रॉयिंग रूम में पड़े सोफे पर फैल गया...

"कौन?" पर्दे के पिछे से कड़क आवाज़ आई...

"आप कहाँ याद रखेंगे हमें.. हमें ही आकर बार बार आपको शकल दिखानी पड़ती है..." कहकर विकी हँसने लगा....

"ओह विकी भाई.. कैसे हो?" खिसियाए हुए से विजेंदर ने अंदर आकर बैठते हुए कहा..," सुनती हो? कुच्छ ठंडे वनडे का इंतज़ाम करो.."

"इतनी मेहरबानी का शुक्रिया.. वो सेक 4 वाला मल्टिपलेक्स आप कब बिकवा रहे हैं.. हमें जल्द से जल्द कब्जा चाहिए.. झकास जगह है!" विकी ने खिड़की से बाहर झाँकते हुए कहा..

"इतना आसान नही है भाई... मुरारी की भी पहुँच उपर तक है.. अब अगर सरकार नही बदली तो मेरे गले में फाँसी लटक जाएगी.. पर में देख रहा हूँ..." विजेंदर ने लुंबी साँस छ्चोड़ी.....

"मुरारी की मा का... साला उसके बाप का माल है क्या..?तो पहले मुझे उसकी मा बेहन करनी पड़ेगी पहले.. ये बोल ना.... साले की...." तभी अचानक विकी चुप होकर ड्रॉयिंग रूम में अचानक घुस आए जलवे को निहारने लगा...

"पापा! मुझे स्वेता के घर नोट्स लेने जाना है.. ज़ाउ क्या..?" रिया ने विकी पर धान नही दिया...

"कितनी बार कहा है की ये लेन देन स्कूल में ही किया करो.. चलो! कहीं जाने की ज़रूरत नही है.." विजेंदर ने पसीने के रूप में माथे पर छलक आया अपना गुस्सा पोंच्छा... रिया सहम कर अंदर चली गयी....

"ये... तुम्हारी बेटी है खन्ना?" विकी ना चाहकर भी उस हसीन काली के बारे में पूच्छ ही बैठा..

"यार.. कितनी बार कहा है की इन्न कामों के लिए ऑफीस में ही आ जाया करो.. घर में ऐसे बात करना अच्च्छा नही लगता.."

"कौनसा ऑफीस.. थाना?"

"हां!"

"पर आप वहाँ मिलते ही नही तो क्या करें.. मुझे भी जवान बेटियों वाले घरों में जाना वैसे अच्च्छा नही लगता.." विकी ने अपने होंठों पर जीभ फेरी...

"खैर छ्चोड़ो.. लाला 10 करोड़ माँग रहा है.. कहता है.. इससे कम पर बात ही नही करेगा..." विजेंदर ने बात पलट'ते हुए कहा..

"और मैं उसको 8 करोड़ से ज़्यादा नही दूँगा.."

"पर मुरारी 10 देने को तैयार है..."

" पहले कहे देता हूँ.. खो दूँगा मुरारी को.. इश्स दुनिया से.. बाद में मत कहना बताया नही था.. और बॉडी भी यहीं डाल कर जाउन्गा.. तेरे घर के सामने! चलता हूँ.. जै हो!" कहकर विकी घर से बाहर खड़ी सफ़ारी में जा बैठा..

"यार.. तुम पॉलिटिशियन्स का मैं क्या करूँ.. वो कहता है तुम्हे टपका देगा और तुम कहते हो...." विजेंदर अपनी बात पूरी नही कर पाया.. गाड़ी का शीशा उपर चढ़ा और विजेंदर पिछे हट गया.. गाड़ी सड़क किनारे की धूल उड़ाती हुई वहाँ से गायब हो गयी.....

"यार.. थानेदार की बेटी ने खड़ा कर दिया.. कोई ताज़ा माल है क्या...?" विकी ने जाने किसको फोन मिलया....

"कल तक खड़ा रख सको तो हो जाएगा विकी.. आज कोई चान्स नही है.. नयी का.. कहो तो......." सामने वाले की बात को विकी ने बीच में ही काट दिया...

"मुरारी की भी एक बेटी है ना...."

"तू पागल तो नही हो गया है विकी... क्या बक रहा है? बिज़्नेस अलग चीज़ है.. मस्ती अलग!"

"अरे बिज़्नेस को मारो गोली.. साला मुझे टपकाने की कह रहा है.. तू जल्दी उसका डाटा बता..." विकी के चेहरे पर मुस्कान आ गयी...

"मान जा विकी.. उलझ जाएँगे.. मंत्री भी साथ नही देगा.."

"जो साथ नही देगा उसकी मा की चूत.. तू जल्दी बता.. नही तो.."

"ठीक है भाई.. पर मैं अब इश्स मामले में नही हूँ.. याद रखना.. और ये भी की सरकार आजकल उसी की है... लिख!"

"पेन नही है भोसड़ी के.. मेसेज कर दे.. और सुन.. तूने पक्का सोच लिया है ना तू मामले में नही है..."

"यार! तू समझता नही है.. पंगा हो जाएगा.. अगर उसको ज़रा भी भनक लग गयी तो वो इसका भी राजनीतिक फ़ायदा उठाने की सोचेगा.. फिर मीडीया हमें बकषेगी नही.. करियर चौपट हो जाएगा भाई... मान जा.."

"तू ऐसा कर.. उसकी लड़की की हिस्टरी मेसेज कर और मेरा रेसिग्नेशन लेटर.. टाइप करवा के रख..." कहकर विकी ने फोन काट दिया...

"हेलो!"

"जी मुरारी जी हैं?"

"तू कौन बे?"

"नमस्ते मुरारी जी.. मैं सिटी थाना इंचार्ज विजेंदर बोल रहा हूँ.." विजेंदर की आवाज़ घिघियाई हुई थी...

"हां... खन्ना! तेरी बक्शीश मिली नही क्या..." मुरारी ने लहज़ा नरम किया..

"वो बात नही है भाई साहब.... ववो.. विकी आया था.. काफ़ी बुकबुक करके गया है.. कह रहा था.." विजेंदर की बात अधूरी ही रह गयी...

"उस साले का नाम मेरे सामने मत ले.. अगर उस तरफ नज़र उठा कर भी देखा तो मार दूँगा साले को.. समझा चुका हूँ.. अगर वो ऐसे ही धमकी गिरी करता रहा तो जान से जाएगा.. मैं एलेक्षन्स की वजह से चुप हूँ.. वरना उसकी.. में ठुकवा देता.. समझा उसको.. कल का लौंडा है.. ज़्यादा गर्मी दिखाएगा तो महनगा पड़ेगा.."

"मैने उसको बोल दिया है.. बाकी आप देख लेना... कुच्छ ज़्यादा ही बोल रहा था.. मेरे तो दिल में आया था की उठाकर साले को अंदर कर दूँ.. पर आपकी वजह से ही चुप रहा.. कहीं आप पर बेवजह आरोप ना लगें..."

"तूने ठीक ही किया खन्ना.. एक बार एलेक्षन हो जाने दे.. फिर तू देखना.. मैं उसका क्या करता हूँ... अच्च्छा अब फोन रख.. कोई फोने आ रहा है वेटिंग में..." कहकर मुरारी ने दूसरी कॉल रिसीव की," हां मेरी गुड़िया रानी.. कैसी है मेरी बच्ची...."

"कितनी बार बताउ पापा.. मुझे गुड़िया नाम अच्च्छा नही लगता.. अब में बच्ची नही रही.. 19 की हो चुकी हूँ....!" उधर से कोमल सी आवाज़ आई..

"पर मेरे लिए तो तू गुड़िया ही रहेगी ना.. बोल कैसे याद किया.. पापा को अभी बहुत काम है....

"क्या पापा! मेरी सारी छुट्टियाँ ख़तम हो गयी... आप मुझे घर क्यूँ नही आने देते.. अब फिर स्कूल से बच्चे टूर पर चले गये हैं.. आपने मुझे वहाँ भी नही जाने दिया....मैं यहाँ अकेली बोर हो रही हूँ..."

"बेटा.. तू समझती नही है.. मुझे अक्सर बाहर ही रहना पड़ता है.. और फिर यहाँ भी तुम अकेली बोर ही होवॉगी... चल मैं तेरा पर्सनल तौर का इंतज़ाम करता हूँ.. अब तो खुश!"

"ओह थॅंक्स पापा.. यू आर सो ग्रेट.. उम्म्म्ममचा! कब भेज रहे हो गाड़ी..."

"कल ही भेज देता हूँ.. मेरी बच्ची.."

"ओकी पापा.. बाइ!"

"बाइ बेटा!"

मुरारी ने एक और फोने मिलाया..," हां मोहन!"

"येस सर!"

"कल ही मर्सिडीस लेकर होस्टल पहुँच जाओ.. 5-7 दिन...जहाँ भी वह कहे.. उसको घुमा लाना.. हर तरह का ख्याल रखना..

"ओके सर!"

मुरारी ने कॉल डिसकनेक्ट करते ही वहाँ निर्वस्त्रा लेती उसकी बेटी की ही उमर की लड़की की

चुचियों में सिर घुसा दिया....

rajaarkey
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Re: गर्ल'स स्कूल

Unread post by rajaarkey » 12 Dec 2014 03:25

विकी खिड़की में खड़ा होकर घूमड़ आए बादलों को देख रहा था.. किसी गहरी सोच में.. जो प्लॅनिंग वह कर रहा था.. वह घातक थी.. खुद के लिए भी और उसके करियर के लिए भी.. हालाँकि राजनीति में उसकी गहरी पैठ थी... पर इसकी गलियाँ कितनी बेवफा और हरजाई होती हैं.. विकी को अहसास था.. मुरारी की बेटी को अगवा करना खुद सीयेम को चोट पहुँचाने के बराबर था.. पर नफ़रत की आग होती ही ऐसी है.. इसमें खुद के नुकसान या फ़ायदे के बारे में नही सोचा जाता.. बल्कि दुश्मन की तबाही ही अहम होती है.. फिर चाहे जान ही क्यूँ ना चली जाए..

मुरारी का चेहरा जहाँ में आते ही जैसे उसका मुँह कड़वा हो गया.. अधजाली सिगेरेत्टे को बाहर फैंका और थूक दिया," साला भड़वा! कितनी कुत्ती चीज़ है.."

विकी ने बुदबुडाया...

"भाई.. अगर तू मज़ाक कर रहा है तो बता दे.. वरना मेने तो स्विट्ज़र्लॅंड का टूर प्लान कर लिया है.. मैं ख़ुदकुशी नही कर सकता.. सच्ची बोलता हूँ..." काफ़ी देर से सोफे पर खामोश बैठे माधव ने कहा...

"अबे जा साले! तू भाग जा.. ये गेम तुझ जैसे गांडुओं के लिए नही है.. अब मुरारी 10 करोड़ देगा और मल्टिपलेक्स का मालिक मैं बनूंगा... अब की बार पिच्छला सारा हिसाब चुकता हो जाएगा..." ,विकी ने हंसते हुए कहा...

"पर यार .. तू करेगा कैसे.. क्या तू उसको खुला चलेंज देगा.... किडनॅपिंग की खबर देगा..." माधव अभी तक डिसाइड नही कर पाया था की वो क्या करेगा....

"तुझे अब इस बात से कोई मतलब नही होना चाहिए.. चल फुट ले.."

"मतलब है भाई.. तुझे पता है.. मैं तुझे नही छ्चोड़ सकता.. बता ना.. कैसे करना है..?"

"बैठकर तमाशा देखना है.. और ताली बजानी है.. छक्का कहीं का.. अब तक क्यूँ गान्ड फटी हुई थी साले..." विकी ने उसके कंधे पर हाथ मारा....

"वो बात नही है भाई.. मुझे पता है.. तू दिमाग़ से कम और दिल में उफान रहे जज्बातों से ज़्यादा काम लेता है.. बस इसीलिए.. सिर्फ़ इसी वजह से अपना 'बल्लू' मुरारी से मात खा गया.. तुझे पता है...." माधव के इतना कहते ही विकी की मुत्ठियाँ और जबड़े भिच गये.. आँखों में खून उतर गया..," इश्स बार मुरारी की गाड़ उसके ही हथियार से मारूँगा.. तू देखता रह माधो.. मैं बल्लू भाई का बदला लूँगा.. देखता रह.. अबकी बार दिल नही दिमाग़ चलेगा.. तुझे एक खुशख़बरी मिलने वाली है.. बस थोड़ी देर रुक जा..." विकी ने अपनी बात पूरी भी नही की थी की दरवाजे के पास गेट्कीपर आया," साहब! कोई मोहन आया है..!"

"यस! जल्दी भेज उसको.. " विकी के चेहरे पर कामयाबी की ख़ुसी लहरा गयी.....

"ये मोहन कौन है भाई..?" माधव भी विकी के साथ ही खड़ा हो गया...

"अभी बताता हूँ.. 2 मिनिट सब्र कर..."

"नमस्ते सर..!"

"आओ आओ मोहन कैसे हो..?" विकी ने मोहन की कमर थपथपाई...

"ठीक हूँ साहब.. ये लो गाड़ी की चाबी...! हमें बहुत डर लग रहा है साहेब.." मोहन के बिना बताए ही ये बात झलक रही थी की वो कितना डरा हुआ है...

विकी ने ड्रॉयर से निकाल कर एक थैला उसको थमा दिया..," पैसे गिन ले.. और अपना फोने मुझे दे.. पैसे घर पहुँच जाएँगे तो माधव तुम्हारी बात करा देगा.. जब तक काम पूरा नही होता.. तू यहीं रहेगा... समझा.."

"ठीक है साहब.. पर मेरे घर वालों पर कोई आँच..."

"तू परवाह मत कर.. मैं देख लूँगा.. पीछे वाले कमरे में जा और दारू शारू गटक जी भर कर.. मलिक की तरह रह..! ऐश कर..."

"ठीक है साहब.." बॅग में 500 की गॅडडीया देखकर मोहन की आँखें चमक उठी," साहब.. वहाँ आज ही जाना है.. मॅ'म साहब को लेने..."

"यार.. मेरा एक काम कर देगा..प्लीज़!"... राज ने स्कूल आते हुए वीरेंदर से कहा...

"अगर उन्न छिपकलियो से रिलेटेड कोई काम है तो बिल्कुल नही...." वीरेंदर ने राज को शंका की द्रिस्ति से देखा...

स्कूल का तीसरा दिन था... प्रिया के करारे हुष्ण का सुरूर राज पर चढ़ता ही जा रहा था.. वीरू भी समझा समझा कर पक गया था.. पर ढाक के तो वही तीन पात...

"यार कोई ऐसा वैसा काम नही है... ज़रूरी है.. पढ़ाई से रिलेटेड..." राज के चेहरे पर गिड़गिडाहट सी उभर आई...

"बोल!" रूखा सा जवाब दिया...

"आ.. वो क्या है की.. छुट्टियों से पहले के प्रॅक्टिकल्स कॉपी करने हैं मुझे... अगर तू.... प्रिया से माँग दे तो... प्लीज़.."

"क्यूँ? प्रिया से क्यूँ.. मैं क्या मर गया हूँ साले..." वीरेंदर की आँखों से प्रतीत हो रहा था कि वो भी उस अचानक बने आशिक से हार मान चुका है... मन ही मन मुस्कुरा रहा था..

"समझा कर यार.. उसने अच्छे से लिखा होगा... माँग देगा ना यार.."

"अच्च्छा.. इश्क़ तुम फरमाओ.. और बलि पर मैं चढ़ु.. ना भाई ना.. अगर बोलने तक की हिम्मत नही है तो छ्चोड़ दे मैदान.." वीरेंदर ने राज का मज़ाक ही तो बना लिया...

"अच्च्छा .. तो तू समझता है की मैं खुद नही कर सकता..." राज ने बंदर घुड़की दी...

"तो कर ले ना यार.. मुझ पर क्यूँ चढ़ रहा है.. जा कर ले..!" वो क्लास में घुसे ही थे की वीरेंदर की करतूत ने राज का चेहरा पीला कर दिया," प्रिया! इसको तुमसे कुच्छ चाहिए...."

राज को काटो तो खून नही.. वो इसके लिए कतयि तैयार नही था.. और कोई लड़की होती तो वो बेबाक ही कह देता.. पर यहाँ तो दाढ़ी में तिनका था.. वह कभी अपनी सीट पर जा बैठे वीरेंदर को तो कभी दरवाजे की और देखने लगा....

आकर्षण की आग दूसरी तरफ थी या नही ये तो पता नही.. पर तिनका तो वहाँ भी मिल ही गया.. उठते बैठते रिया प्रिया को याद दिलाती रहती थी की राज उनकी ही और घूर रहा है.... मतलब तो वो भी समझती ही होगी.. पागलों की तरह एकटक देखते रहने का...

प्रिया ने एक बार राज की और देखा.. नज़रें झुकाई.... फिर उठाई और झुका ली... झुकाए ही रही...

"हां.. क्या चाहिए?" रिया बोल पड़ी.. हालाँकि आवाज़ बहुत मीठी थी पर राज के सीने में तीर की तरह चुभि...

"ववो.. केमिस्ट्री क्की.. प्रॅक्टिकल फाइल... एक बार चाहिए थी... एक बार.. बस!" राज को एक लाइन बोलने में इतनी मेहनत करनी पड़ी की पसीने से तर हो गया...

रिया ने प्रिया का बॅग खोला और उसमें से फाइल निकल कर देदी...

राज ने काँपते हाथो से फाइल पकड़ी और अपनी सीट की और रुख़ कर लिया...

"तूने.. मेरी फाइल क्यूँ दी.. अपनी दे देती.." प्रिया रिया के कान में फुसफुसाई...

"मुझसे थोड़े ही माँगी थी.. प्रिया से चाहिए थी ना!" कहकर रिया खिलखिला पड़ी...

राज का चेहरा देखने लायक था.. हालाँकि उसकी मंशा कामयाब हुई.. पर बे-आबरू सा होकर...

फाइल के एक एक पन्ने को राज इश्स तरह पलट रहा था.. जैसे वह गीता हो... बड़े प्यार से.. बड़ी श्रद्धा से..

ना तो प्रिया अपनी फाइल को वापस माँग पाई और ना ही उस दिन राज उसको वापस कर पाया...

चमचमाती हुई मर्सिडीस होस्टल के गेट के बाहर रुकी.. जानबूझ कर विकी ने ड्राइवर वाली ड्रेस नही डाली थी.. ब्लॅक जीन और कॉलर वाली वाइट टी-शर्ट में सरकार बदले बदले नज़र आ रहे थे.. वरना तो सफेद कुर्ता पाजामा उसकी शख्शियत की पहचान बन चुके थे.. बॅक व्यू मिरर को अड्जस्ट करके उसने एक सरसरी सी नज़र अपने ही चेहरे पर डाली.. 'वह क्या लग रहा है तू' ...विकी मॅन ही मॅन बुदबुडाया और कमर के साथ टँगी माउज़र निकाल कर सीट के नीचे सरका दी...

रेबन के पोलेराइज़्ड गॉगल्स पहने जब नीचे उतरा तो गेट्कीपर बिना सल्यूट किए ना रह सका.. वरना तो वहाँ अगर गार्जियन आते भी थे तो बॅक सीट पर बैठकर....

"सलाम साहब! गाड़ी अंदर ले जानी है तो गेट खोल दूं?"

"नही.. मिस स्नेहा को बोलो ड्राइवर आ गया है.. उसको लेने..!" विकी ने बाहें फैलाकर आसमान को निहारते हुए अंगड़ाई ली...

"ड्राइवर?????.... आप?" गेट्कीपर आसचर्या से जूतों से लेकर गॉगल्स तक पॉलिटीशियन विकी से जेंटलमेन विकी में तब्दील हुए शक्ष को घहूरता चला गया...

" 6 फीट 1 इंच!" विकी ने उसकी आँखों में आँखें डालकर कहा...

"क्या?"

"मुझे लगा मेरी हाइट माप रहे हो.." विकी मुस्कुराया...

"रूम नंबर. क्या है..?

"247! जल्दी करो..." विकी को जल्दी थी.. चिड़िया को लेकर उड़ जाने की...

गेट्कीपर ने एक नंबर. डाइयल किया..," हेलो मॅ'म! रूम न. 247 से स्नेहा जी को नीचे भेज दो... ड्राइवर जी... सॉरी.. आ.. उनका ड्राइवर लेने आया है.." वह अब भी फटी नज़रों से विकी को निहार रहा था....

"ओ तेरी.. क्या पीस है???" दूर से एक लड़की को आते देख विकी की हड्डियाँ तक जम गयी.. 'नही नही.. ये तो स्नेहा हो ही नही सकती.. कहाँ वो बदसूरत मुरारी.. और कहाँ ये हुश्न की परी... वो तो शायद अपने दोनो हाथ उठाकर भी इसकी उँचाई को नही छ्छू सकता... पर विकी खुदा की उस हसीन कृति से नज़रें ना हटा सका...

ज्यों ज्यों लड़की करीब आती गयी.. उसके छ्होटे कपड़ों में छिपे अनमोल खजाने को विकी अपनी पारखी नज़रों से परखने लगा..

करीब 5'8" की हाइट होगी.. कमर तो मानो थी ही नही.. 26" की कमर भी कोई कमर होती है.. उसकी जैसे दूधिया रंग में पूती जांघों पर फँसी हुई गुलाबी रंग की मिनी स्कर्ट पीछे से उसको मुश्किल से ही ढक पा रही होगी... उपर सफेद रंग की चादर सी सिलवटों से भरी पड़ी थी.. उसको क्या कहते हैं.. विकी को अंदाज़ा नही था.. पर वो सिलवटें भी शानदार उभारों का साइज़ च्छुपाने में सक्षम नही थी.. वहाँ से कपड़ा टाइट था.. एकद्ूम.. चलने के साथ ही उसके लूंबे बॉल इधर उधर लहरा रहे थे.....

अचानक विकी का कलेजा मुँह को आ गया जब उस लड़की की मीठी सी आवाज़ उसके कानो में पड़ी...,"कहाँ है.. ड्राइवर?"

गेट्कीपर बिना कुच्छ बोले विकी की और देखने लगा..

"ड्राइवर??? आप.." लगभग वही प्रतिक्रिया स्नेहा की थी.. जो कुच्छ देर पहले गेट्कीपर प्रदर्शित कर चुका था... फिर संभालते हुए उसने अपनी गाड़ी को पहचाना और बोली," गाड़ी अंदर ले आओ..!"

विकी ने गाड़ी स्नेहा के बताए अनुसार ले जाकर रोक दी और बाहर निकल कर खड़ा हो गया...

"समान कौन रखेगा..??"

"क्या ? ओह सॉरी.." विकी को बात सुनकर एकबार गुस्सा आया पर अगले ही पल वो संभाल गया..," कहाँ है..?"

"लगता है.. एक्सपीरियन्स नही है.. आओ.." और कहकर स्नेहा अंदर से लाकर समान रखवाने में उसकी मदद करने लगी....

"आ.. तुमने कब से नौकरी जाय्न की है..?" स्नेहा ने चहकते हुए पूचछा...

"पैदाइशी नौकर हूँ...!" विकी ने तल्ख़ लहजे में जवाब दिया.... दोनो हॉस्टिल से करीब 5 कि.मी आ चुके थे.. जब स्नेहा से चुप ना रहा गया...

"शकल से लगते नही हो.. अब तक तो पापा खूसट ड्राइवर रखा करते थे...!"

"हूंम्म!" विकी ने उसी रफ़्तार से गाड़ी चलाना जारी रखा...

"वैसे हम जा कहाँ रहे हैं.." स्नेहा ने आगे वाली सीट की और झुकते हुए कहा...

"जहाँ कहो...!" विकी अपने प्लान पर काम कर रहा था.. मंन ही मंन.. उसको यकीन नही हो रहा था की वो इतनी आसानी से पहली सीढ़ी पार कर लेगा...

"माउंट आबू चलो.. हमारे स्कूल की ट्रिप वहीं गयी है.."

"नही.. मुझे वो जगह पसंद नही है... कहीं और बोलो..." विकी भला उसके स्कूल की ट्रिप में उसको शामिल कैसे करता...

"व्हाट डू यू मीन बाइ तुम्हे पसंद नही है.. डोंट फर्गेट यू आर ए ड्राइवर... चलो! हम वहीं चलेंगे..."

"नही.. जहाँ मेरा मॅन नही मानता; वहाँ में नही जाता.. कहो तो वापस हॉस्टिल छ्चोड़ दूं...." विकी ने अपने कंधे उचका कर अपना इरादा बता दिया...

"बड़े ईडियट किस्म के ड्राइवर हो.. अगर पापा कहते तो भी नही जाते क्या..?" स्नेहा के माथे की थयोरियाँ पर बल पड़ गये...

"उस.. उनकी बात और है... मैं उनका ड्राइवर हूँ.." कहते हुए विकी का जबड़ा भिच गया था..

"तो मेरे क्या हो?"

"मोहन... मेरा नाम है.... बाकी जो तुम कहो..!" विकी ने रेस पर से दबाव हटाते हुए बोला....

"हे! तुम्हे नही लगता तुम कुच्छ ज़्यादा ही बोलते हो..... एर्र्ररर.. ये गाड़ी क्यूँ रोक दी..?" स्नेहा को अब हर बात अजीब लग रही थी....

"पेशाब करना है.. तुम भी कर सकती हो.. सुनसान जगह है...!" विकी ने खिड़की खोली और बाहर निकल गया....

स्नेहा निरुत्तर हो गयी.. उस'से इतनी बदतमीज़ी से बात करने की हिम्मत आज तक किसी में नही थी..

विकी सड़क किनारे चलता हुआ करीब 10 ही कदम आगे गया होगा... उसने अपनी ज़िप सर्काई और अपना 'लंबू' बाहर निकाल लिया.. वो तो तब से ही बाहर आने को तड़प रहा था.. जब उसने गेट की तरफ मादक अंदाज में मटकती आ रही स्नेहा को देखा था.. बाहर आते ही 2-3 बार उपर नीचे हुआ..

विकी ने जानबूझ कर अपने आपको इश्स पोज़िशन में खड़ा किया था की अगर चाहे तो आसानी से स्नेहा उस भारी भरकम 'जुगाड़' को देख सके...

विकी वापस आया तो स्नेहा का चेहरा तपते अंगारे की तरह लाल हो चुका था.. मानो उसने कोई अनोखी चीज़ देख ली हो.. नज़रें लजाई हुई थी.. जांघे एक दूसरी के उपर चढ़ि थी.. और होंठ तर हो चुके थे.. शायद जीभ घूमकर गयी

होगी...

विकी ने वापस आने पर हर एक चीज़ नोट की थी.. पर रेप उसके प्लान में नही

था.. स्नेहा को इश्स कदर पागल कर देना था की वो कुँवारी हो या रंडी बन चुकी हो.. पके हुए फल की तरह उसकी गोदी में आ गिरे....

"तो बताया नही.. कहाँ चलें...?" विकी ने सीट पर बैठकर गाड़ी स्टार्ट करते हुए कहा...

"जहन्नुम में..." कहकर स्नेहा ने अपना मुँह बाहर की और कर लिया....

"वो भी मुझे पसंद नही... मैं तो जन्नत में रहता हूँ.. ऐश करता हूँ!"

विकी की इश्स हाज़िरजवाबी पर स्नेहा मुस्कुराए बिना ना रह सकी... ," ठीक है फिर.. वहीं चलो!"

"कहाँ?"

"जन्नत में.. और कहाँ..."

"नही.. तुम अभी उस लायक नही हो...!"

"आ तुम पागल हो क्या? एक भी बात का सीधा जवाब नही देते.. मैं तो खुश हो गयी थी.. तुम्हे देखकर.. की पहली बार कोई ढंग का ड्राइवर भेजा है.... तुम हो की.......," ओईईईई मुंम्मी.... ये यहाँ कैसे...?"

विकी ने गाड़ी रोक दी.... पलटा तो चौंक गया..," ययए मुझे दो..!"

"पर ये गाड़ी में कैसे रह गयी... इसको तो पापा के पास होना चाहिए..." स्नेहा हैरत से माउज़र को देख रही थी...," मैं पापा के पास फोन करती हूँ.."

"न्नाही.. कोई ज़रूरत नही है.. ये मेरी है.. पर तुम्हे कैसे मिली.." विकी ने उसके हाथ से माउज़र ले ली...

"ववो.. मैने अपनी टाँग सीधी की तो मेरी सेंडल सीट में फँस कर निकल गयी.. उसको निकाल रही थी तो... पर तुम्हारे पास माउज़र.. तुम सच में अजीब आदमी हो.. इतने महँगे शौक!" स्नेहा उसको अजीब तरीके से देख रही थी....

"वो दरअसल मैं ड्राइवर नही हूँ.. एस.ओ. हूँ तुम्हारे पापा का...!" विकी तब तक सँभाल गया था...

"श.. ई सी!" स्नेहा के भाव विकी के लिए अचानक बदल गये...," सॉरी.. मैने आपसे ग़लत सुलूक किया हो तो..."

"कहाँ चलें...?" विकी ने सवाल किया...

"कहीं भी.. जहाँ तुम चाहो.. बस मुझे खुली हवा में साँस लेनी है.. आप सच में ही कमाल के हो... उ हूऊऊऊऊओ.." स्नेहा ने शीशा नीचे करके बाहर मुँह निकाला और ज़ोर की चीख मारी.. आनंद और लापरवाही भरी चीख....

विकी कुच्छ ना बोला... उसके प्लान का दूसरा हिस्सा कुच्छ ज़्यादा ही जल्दी कामयाब हो गया... स्नेहा का विस्वास जीतने वाला हिस्सा...

गाड़ी सड़क पर एक बार फिर तेज़ गति से दौड़ पड़ी....

"एक मिनिट रोकोगे प्लीज़.. "

"क्या हुआ..?"

"ओहो.. रोको भी..."

"बताओ तो सही.. हुआ क्या है आख़िर..."

"लड़कियाँ लड़कों की तरह बेशर्म नही होती... जल्दी रोको प्लीज़.." स्नेहा के चेहरे पर बेचैनी सॉफ झलक रही थी...

"श.." कहते हुए विकी ने ब्रेक लगा दिए....

स्नेहा गाड़ी से नीचे उतरते ही तेज कदमों से पास की झाड़ियों की तरफ चल दी.. उसकी गान्ड की लचकान देखकर विकी आह भर उठा.. पर कंट्रोल ज़रूरी था... दिमाग़ से काम लेना था इश्स बार!

नज़रों से औझल होते ही विकी ने उसके पर्स में हाथ मारा.. मोबाइल उपर ही मिल

गया.. विकी ने उसको साइलेंट करके अपनी पॅंट की जेब में डाल लिया...

स्नेहा की पेशाब करने की प्यारी आवाज़ ने विकी की धड़कने और बढ़ा दी.. स्नेहा कुँवारी थी.. बिल्कुल कुँवारी.. विकी पेशाब करने की आवाज़ से ही इश्स बारे में कन्फर्म्ड हो गया.. हाथ के इशारे से उसने पॅंट में कुलबुला रहे यार को शांत रहने की नसीहत दी....

स्नेहा वापस आई तो उसकी आँखों में लज्जा सी थी.. एक अपनापन सा था.. एक चान्स था!

"मैं आगे बैठ जाउ?" पेशाब करके वापस आई स्नेहा के मंन में अब आदेश नही.. आग्रह था...

"क्यूँ नही..!" कहकर विकी ने अगली खिड़की खोल दी..

"श थॅंक्स... एक बात बोलूं?" स्नेहा ने अपने आपको अगली सीट पर अड्जस्ट किया...

"हूंम्म... बोलो!" विकी ने हुल्की सी मुस्कान उसकी और फैंकी.. दरअसल वो उस अधनंगे कमसिन बदन को देखकर बड़ी मुश्किल से अपनी बेकरारी छिपा पा रहा था.. चिकनी जांघें बेपर्दा सी उसकी नज़रों के सामने थी.... एक दूसरी से चिपकी हुई!

"मुझे शुरू में ही शक़ था की तुम ड्राइवर तो कम से कम नही ही हो.. तुम तो एकदम हीरो लगते हो...!" स्नेहा अपनी शर्ट को नीचे खींचती हुई बोली.. जो सिमट कर उसकी नाभि तक पहुँच गयी थी...

"हूंम्म.. बिना हेरोयिन के भी कोई हीरो होता है भला..." जाने विकी बात को कहाँ घुमा रहा था...

"मतलब!" क्या सच में वो मतलब नही समझ पाई होगी...?

"कुच्छ नही.. बस ऐसे ही...!"

"मतलब तुम्हारी कोई गर्लफ्रेंड नही है.. है ना?" स्नेहा ने हुल्की सी मुस्कान उसकी तरफ फैंक दी...

गर्ल फ.... सुनते ही अनगिनत सुंदर चेहरों की कतार सी विकी की आँखों में घूम गयी.. पर प्रत्यक्ष में वो कुच्छ और ही बोला..," कुच्छ ऐसा ही समझ लो..! कोई मिलती ही नही...!"

"उदास क्यूँ होते हो.. जब तक हम हैं.. हूमें ही समझ लो.." स्नेहा ने कातिल मुस्कान उसकी और फैंकते हुए कहा...

"सच!" मानो विकी को बिन माँगे ही मोती मिल गया हो.. इतनी देर से उस पर टूट पड़ने को बेताब विकी का हाथ एक दम से उसकी जांघों पर जाकर चिपक गया...

"आएययी.. ऊउउउउ..." स्नेहा ने एक दम से उसका हाथ दूर पटक दिया," स्टॉप दा कार... आइ सेड स्टॉप दा कार...!" अचानक से स्नेहा का चेहरा तमतमा उठा...

विकी के दिल में आया की गाड़ी रोक कर अभी उसको अपनी गोद में बैठकर झूला दे.... उसको लगा मामला तो बिगड़ ही गया है.. पर फिर भी उसने संयम रखा और गाड़ी रोक दी....

"तूमम.. तुम बहुत बदतमीज़ हो.. तुमने किस बात का क्या मतलब निकाल लिया.." कहते हुए स्नेहा ने गुस्से से खिड़की पटकी और पीछे जाकर बैठ गयी... उसकी आँखों में आँसू थे....

उसके बाद करीब 2 मिनिट तक गाड़ी में कोई हुलचल नही हुई... आख़िरकार विकी को ही चुप्पी तोड़नी पड़ी..," चलें?"

स्नेहा कुच्छ ना बोली... अपनी आँखें मसल मसल कर वो लाल कर चुकी थी...

विकी किसी भी तरह बात को संभाल लेना चाहता था..," सॉरी... वो... मैं समझा की........"

"क्या समझे तुम... हां.. क्या समझे..? यही की मैं कोई आवारा लड़की हूँ... यही की लड़की के लिए उसकी इज़्ज़त.. उसकी आबरू कोई मायने नही रखती.. बोलो!" स्नेहा का ये रूप विकी के लिए किसी आठवे अजूबे से कम नही था.. उसकी आँखों से विकी के प्रति क्षणिक घृणा और ग्लानि भभक रही थी," सारे मर्द भेड़िए होते हैं.. मैने हंसकर दो बात क्या कर ली... तुम जैसे लोगों के लिए गर्लफ्रेंड का एक ही मतलब होता है....!" स्नेहा का हर अंग एक ही भाषा बोल रहा था.. तिरस्कार तिरस्कार और तिरस्कार....

विकी की तो बोलती ही बंद हो गयी.. हालाँकि उसकी शरारती आँखें पूच्छ रही थी..," देवी जी! ऐसे कपड़ों में कोई नारी को पूज तो नही सकता!" पर मामला और बिगड़ सकता था.. इसीलिए आँखों की बात ज़ुबान तक वो लेकर नही आया..," मैने बोला ना सॉरी! आक्च्युयली तुम ऐसी... हो की मैं रह ना सका.. मेरे ज़ज्बात काबू में ना रहे.. अब तो माफ़ कर दो...!"

नारी की सबसे बड़ी कमज़ोरी.. खुद को शीशे में देखकर इतराना और खुद की प्रसंशा सुनकर सब कुच्छ भुला देना.. स्नेहा भी अपवाद नही थी.. विकी की इश्स बात से उसके कलेजे को अजीब सी ठंडक पहुँची जिसकी खनक उसके अगले ही बोल में सुनाई दी," अब चलो भी... अंधेरा हो रहा है.. रात भर यहीं पड़े रहोगे क्या...?" स्नेहा ने अपने आँसू पोंच्छ दिए या हुश्न की तारीफ़ की लेहायर उन्हे उड़ा ले गयी.. पता ही नही चला.. आँखों में आँसुओं का स्थान अब चिरपरिचित चमक ने ले लिया था... गाड़ी फिर दौड़ने लगी....

"अब मौन व्रत रख लिया है क्या? कुच्छ बोलते क्यूँ नही..." लड़की थी.. भला चुप कैसे रहती... 10 मिनिट की चुप्पी ने ही स्नेहा को बोर कर दिया...

विकी कुच्छ नही बोला.. नारी की हर दुखती राग को वह पहचानता था...

"श गॉड! लगता है फोन हॉस्टिल में ही रह गया...! मुझे पापा को फोन करना था...!" स्नेहा अपने पर्स को खंगालने लगी... पर फोन मिलना ही नही था.. वो तो विकी की जेब में पड़ा था.. साइलेंट!

"एक बार अपना फोन देना...!" स्नेहा ने अपना हाथ आगे बढ़ा दिया...

विकी ने मोहन वाला फोन निकल कर स्नेहा को पकड़ा दिया.....

करीब 3 बार फोन करने के बाद मुरारी ने फोने उठाया," साले.. पिल्ले के बच्चे.. कितनी बार बोला है..... रंग में भंग मत डाला कर...!"

स्नेहा को उसके पापा के पास दो लड़कियों के हँसने खिलखिलाने की आवाज़ सुनाई दी..," ओह डार्लिंग! यू आर सो हॅंडसम.. मुऊऊउऊन्हा!"

स्वेता का दिल बैठ गया," पापा! ... मैं हूँ...!" अपने पापा का रंगीलापन देख उसका नरित्व शर्मसार हो गया....

"ओह्ह्ह.. मेरी बच्ची! कैसी हो.. मोहन पहुँच गया ना...!"

"हां पापा.. मैं फोने रखती हूँ..." कहकर उसने फोन काटा और गुस्से से पटक दिया....

"क्या हुआ?" विकी ने अचरज भरी नज़रों से मिरर में देखा...

"कुच्छ नही.. बस बात मत करो.. मेरा मूड खराब है!"

"हुआ क्या है?... अगर मुझे बताने लायक हो...." विकी ने गाड़ी की रफ़्तार धीमी कर दी...

"बोला ना, कुच्छ नही.. पर्सनल बात थी.... तुम बताओ.. तुम कहाँ के हो.. इश्स'से पहले कहाँ थे.. वग़ैरह वग़ैरह...." स्नेहा ने बात को टालते हुए कहा...

"हमारा क्या है मेडम..! रोटी के लिए आज यहाँ कल वहाँ... जिंदगी तो तुम जैसे बड़े लोगों की होती है.. ऐश ही ऐश.. ना कोई चिंता.. ना फिकर.. !" विकी ने अपने पत्ते फैक्ने शुरू कर दिए थे.....

"ऐसा क्यूँ कहते हो...? क्या मेरी एक भी बात से तुम्हे लगा की मुझ में बड़े होने का कोई गुमान है.. मैने तो जब से होश संभाला है.. बस इश्स अनाथाश्रम जैसे हॉस्टिल में ही रह रही हूँ... पापा कभी मुझे घर लेकर ही नही जाते.. ले भी गये तो दिन के दिन वापस..." स्नेहा की आँखें सूनी हो गयी.. मानो अपनेपन की तलास में भटक भटक कर थक गयी हों...

"पर... ये तो बहुत जाना माना हॉस्टिल है.. अनाथाश्रम कैसे?.. और आप भी तो.. एक्दुम परियों के जैसे रहती हो.. बेइंतहा कर..." विकी ने बात को आगे बढ़ाया!

"अनाथ उसी को कहते हैं ना... जो बिना मा-बाप के रहता हो! मम्मी को तो कभी देखा ही नही.. बस पापा हैं... वो भी.." कहते हुए स्नेहा का गला रुंध गया... जिसके अपने 'अपने' नही होते... वह सबको अपना मान'ने लगता है.. किसी को भी!

"आप ऐसा क्यूँ कह रही हैं मॅम साहब!.. आप तो...."

"ये मेमसाहब मेमसाहब क्या लगा रखा है.. मैं स्नेहा हूँ.. मुझे मेरे नाम से बुलाओ!"

विकी जानता था.. लड़कियाँ ऐसा ही बोलती हैं.. जब कोई उनको अच्च्छा लगने लग जाए..," पर मॅम.. सॉरी.. पर मैं तो आपका नौकर हूँ ना!"

"नौकरी गयी तेल लेने... मुझे अब और घुटन नही चाहिए.. मैं जीना चाहती हूँ.. कम से कम.. जब तक तुम्हारे साथ हूँ.. ओके? कॉल मी स्नेहा ओन्ली.. वी आर फ्रेंड्स!" कहकर स्नेहा ने अपना हाथ आगे बढ़ा दिया.. फ्रेंडशिप का प्रपोज़ल देकर...

विकी ने स्नेहा का कोमल हाथ अपने बायें हाथ में लपक सा लिया,"मैं.. अब क्या कहूँ.. आप को समझ ही नही पा रहा.. इतनी जल्दी गुस्सा हो जाती हैं.. तो उतनी ही जल्दी फिर से...!"

"सच बताओ.. मैं तुम्हे गुस्सैल दिखती हूँ... वो.. उस समय तो... खैर.. हम चल कहाँ रहें हैं.. ये तो बताओ..." स्नेहा धीरे धीरे लाइन पर आ रही थी...

"एक मिनिट..." कहते हुए विकी ने गाड़ी रोकी और बाहर निकल गया.. घना अंधेरा असर दिखाने लगा था... रात हो गयी थी...

"हेलो.. माधव!"

"हां भाई..? सब ठीक तो है ना.. कहाँ हो.. तुम्हारा फोन भी ऑफ आ रहा है..." माधव चिंतित लग रहा था...

"अरे मैं बिल्कुल ठीक हूँ.. और वो मेरे साथ ही है.. सब तरीके से हो रहा है.. किसी बूथ से फोन करवा मुरारी को.. बोल दे की उसकी बेटी किडनॅप हो गयी है.. जल्दी करना.. अब रखता हूँ.. हां.. मोहन को संभाल कर रखना.. उसको टी.वी से दूर रखना...." कहकर विकी ने फोन काट दिया.... और ऑफ कर दिया...!

वापस आया तो स्नेहा बेचैनी से उसकी राह देख रही थी...," कहाँ चले गये थे.. मुझे डर लग रहा था.."

विकी अपनी अनामिका (छ्होटी उंगली) खड़ी करके मुस्कुराया और गाड़ी में बैठ गया...

"तुम भी ना.. इतनी जल्दी!" कहकर स्नेहा खिलखिलाने लगी.. विकी ने भी हँसने में उसका साथ दिया.. सुर मिलने लगे थे.. दूरियाँ कम होने लगी.. एक अपनापन सा अंगड़ाई लेने लगा.....

गाड़ी फिर चल दी.... पता नही कौन्से रोड पर गाड़ी चल रही थी.. स्नेहा को जान'ने की कोई जल्दी नही थी.. पर विकी को फिकर थी.. अब गाड़ी जल्द से जल्द बदलना ज़रूरी हो गया था.....

साधू सा आलाप कर लेता हूँ ,

मंदिर जाकर जाप भी कर लेता हूँ ..

मानव से देव ना बन जाऊं कहीं,,,,

बस यही सोचकर थोडा सा पाप भी कर लेता हूँ

आपका दोस्त

राज शर्मा

(¨`·.·´¨) Always

`·.¸(¨`·.·´¨) Keep Loving &

(¨`·.·´¨)¸.·´ Keep Smiling !

`·.¸.·´ -- raj

Hello dosto main yaani aapka dost raj sharma paart -35 lekar aapke liye lekar haajir hun

Vicky khidki mein khada hokar ghumad aaye badlon ko dekh raha tha.. Kisi gahri soch mein.. Jo planning wah kar raha tha.. Wah Ghatak thi.. Khud ke liye bhi aur uske career ke liye bhi.. Halanki Rajniti mein uski gahri paith thhi... Par iski galiyan kitni bewafa aur harjayi hoti hain.. Vicky ko ahsaas tha.. Murari ki beti ko agwa karna khud CM ko chot pahunchane ke barabar tha.. Par nafrat ki aag hoti hi aisi hai.. Ismein khud ke nuksaan ya fayde ke barey mein nahi socha jata.. Bulki dushman ki tabahi hi aham hoti hai.. Fir chahe jaan hi kyun na chali jaye..

Murari ka chehra jehan mein aate hi jaise uska munh kadwa ho gaya.. Adhjali cigerette ko bahar fainka aur thhook diya," Sala bhadwa! Kitni kutti cheej hai.."

Vicky ne budbudaya...

"bhai.. Agar tu majak kar raha hai toh bata de.. Warna meine toh switzerland ka tour plan kar liya hai.. Main khudkushi nahi kar sakta.. Sachchi bolta hoon..." Kafi der se sofey par khamosh baithhe Madhav ne kaha...

"Abey ja saley! Tu bhag ja.. Ye game tujh jaise gaanduon ke liye nahi hai.. Ab Murari 10 karod dega aur multiplex ka malik main banunga... Ab ki baar pichhla sara hisab chukta ho jayega..." ,Vicky ne hanste huye kaha...

"par yaar .. Tu karega kaise.. Kya tu usko khula chalenge dega.... Kidnapping ki khabar dega..." Madhav abhi tak decide nahi kar paya tha ki wo kya karega....

"Tujhe ab iss baat se koyi matlab nahi hona chahiye.. Chal fut le.."

"matlab hai bhai.. Tujhe pata hai.. Main tujhe nahi chhod sakta.. Bata na.. Kaise karna hai..?"

"Baithkar tamasha dekhna hai.. Aur taali bajani hai.. Chhakka kahin ka.. Ab tak kyun gaand fati huyi thi saaley..." Vicky ne uske kandhe par hath maara....

"Wo baat nahi hai bhai.. Mujhe pata hai.. Tu dimag se kum aur dil mein ufan rahe jajbaton se jyada kaam leta hai.. Bus isiliye.. Sirf isi wajah se Apna 'Ballu' Murari se maat kha gaya.. Tujhe pata hai...." Madhav ke itna kahte hi Vicky k muthhian aur jabde bhich gaye.. Aankhon mein khoon utar gaya..," Iss baar Murari ki Gaand uske hi hathiyaar se maarunga.. Tu dekhta rah madho.. Main ballu bhai ka badla loonga.. Dekhta rah.. Abki baar dil nahi dimag chalega.. Tujhe ek khushkhabri milne wali hai.. Bus thhodi der ruk ja..." Vicky ne apni baat poori bhi nahi ki thi ki darwaje ke paas gatekeeper aaya," Sahab! Koyi Mohan aaya hai..!"

"Yes! Jaldi bhej usko.. " Vicky ke chehre par kamyabi ki khusi lehra gayi.....

"Ye mohan koun hai bhai..?" Madhav bhi vicky ke sath hi khada ho gaya...

"abhi batata hoon.. 2 minute sabra kar..."

"Namastey sir..!"

"aao aao Mohan kaise ho..?" vicky ne mohan ki kamar thhapthapayi...

"Thheek hoon sahab.. Ye lo gadi ki chabi...! Hamein bahut darr lag raha hai saheb.." Mohan ke bina bataye hi Ye baat jhalak rahi thi ki wo kitna dara huaa hai...

Vicky ne drawer se nikal kar ek thhaila usko thhama diya..," Paise gin le.. Aur apna fone mujhe de.. Paise ghar pahunch jayenge toh madhav tumhari baat kara dega.. Jab tak kaam poora nahi hota.. Tu yahin rahega... Samjha.."

"thheek hai sahab.. Par mere ghar walon par koyi aanch..."

"tu parwah mat kar.. Main dekh loonga.. Pichhe waley kamre mein ja aur daru sharu gatak ji bhar kar.. Malik ki tarah rah..! Aish kar..."

"Thheek hai sahab.." bag mein 500 ki gaddiyan dekhkar Mohan ki aankhein chamak uthhi," Sahab.. Wahan aaj hi jana hai.. Ma'm sahab ko lene..."

"Yaar.. Mera ek kaam kar dega..pls!"... Raj ne school aate huye Virender se kaha...

"Agar unn chhipakaliyon se related koyi kaam hai toh bilkul nahi...." Virender ne Raj ko shanka ki dristi se dekha...

School ka teesra din tha... Priya ke karare hushn ka suroor Raj par chadhta hi ja raha tha.. Viru bhi samjha samjha kar pak gaya tha.. Par Dhaak ke toh wahi teen paat...

"Yaar koyi aisa waisa kaam nahi hai... Jaruri hai.. Padhayi se related..." Raj ke chehre par gidgidahat si ubhar aayi...

"Bol!" Rukha sa jawaab diya...

"aa.. Wo kya hai ki.. Chhuttiyon se pahle ke practicals copy karne hain mujhe... Agar tu.... Priya se maang de toh... Pls.."

"kyun? Priya se kyun.. Main kya mar gaya hoon saale..." Virender ki aankhon se prateet ho raha tha k wo bhi uss acyanak baney aashik se haar maan chuka hai... Man hi man muskura raha tha..

"samjha kar yaar.. Usne achchhe se likha hoga... Maang dega na yaar.."

"achchha.. Ishq tum farmaao.. Aur bali par main chadhun.. Na bhai na.. Agar bolne tak ki himmat nahi hai toh chhod de maidan.." Virender ne Raj ka majak hi toh bana liya...

"Achchha .. Toh tu samajhta hai ki main khud nahi kar sakta..." Raj ne bandar ghudki di...

"toh kar le na yaar.. Mujh par kyun chadh raha hai.. Ja kar le..!" wo class mein ghuse hi thhe ki virender ki kartoot ne Raj ka chehra pila kar diya," Priya! Isko tumse kuchh chahiye...."

Raj ko kato toh khhoon nahi.. Wo iske liye katayi taiyaar nahi tha.. Aur koyi ladki hoti toh wo bebaak hi kah deta.. Par yahan toh dadhi mein tinka tha.. Wah kabhi Apni seat par ja baithhe virender ko toh kabhi darwaje ki aur dekhne laga....

Aakarshan ki Aag dusri taraf thi ya nahi ye toh pata nahi.. Par tinka toh wahan bhi mil hi gaya.. Uthhte baithhte Riya priya ko yaad dilati rahti thi ki raj unki hi aur ghoor raha hai.... Matlab toh wo bhi samajhti hi hogi.. Paglon ki tarah ektak dekhte rahne ka...

Priya ne ek baar Raj ki aur dekha.. Najrein jhukayi.... Fir uthhayi aur jhuka li... Jhukaye hi rahi...

"Haan.. Kya chahiye?" Riya bol padi.. Halanki aawaj bahut meethi thi par Raj ke seene mein teer ki tarah chubhi...

"wwo.. Chemistry kki.. Practical file... Ek baar chahiye thhi... Ek baar.. Bus!" Raj ko ek line bolne mein itni mehnat karni padi ki pasine se tar ho gaya...

Riya ne Priya ka Bag khola aur usmein se file nikal kar dedi...

Raj ne kaanpte haathhon se file pakdi aur apni seat ki aur rukh kar liya...

"tuney.. Meri file kyun di.. Apni de deti.." Priya riya ke kaan mein fusfusayi...

"mujhse thhode hi maangi thhi.. Priya se chahiye thhi na!" kahkar Riya khilkhila padi...

Raj ka chehra dekhne layak tha.. Halanki uski mansha kaamyaab huyi.. Par be-aabroo sa hokar...

File ke ek ek panne ko Raj iss tarah palat raha tha.. Jaise wah Geeta ho... Badey pyar se.. Badi shraddha se..

Na toh Priya apni file ko wapas maang payi aur na hi uss din Raj usko wapas kar paya...

Chamchamati huyi Mercedes hostal ke gate ke bahar ruki.. Jaanboojh kar Vicky ne driver wali dress nahi dali thhi.. Black jean aur collar wali white T-shirt mein sarkaar badle badle najar aa rahe thhe.. Warna toh safed kurta pajama uski shakhshiyat ki pahchan ban chuke thhe.. Back view mirror ko adjust karke usne ek sarsari si najar apne hi chehre par dali.. 'Wah kya lag raha hai tu' ...vicky mann hi mann budbudaya aur kamar ke sath tangi mouser nikal kar seat ke neeche sarka di...

Rayban ke polarised goggles pahne jab neeche utara toh Gatekeeper bina salute kiye na rah saka.. Warna toh wahan agar guardian aate bhi thhe toh back seat par baithkar....

"salam sahab! Gadi andar le jani hai toh gate khol doon?"

"Nahi.. Miss Sneha ko bolo Driver aa gaya hai.. usko lene..!" Vicky ne baahein failakar aasman ko niharte huye angdayi li...

"Driver?????.... Aap?" Gatekeeper aascharya se jooton se lekar goggles tak politician vicky se gentleman vicky mein tabdeel huye shaksh ko ghhoorta chala gaya...

" 6 feet 1 inch!" vicky ne uski aankhon mein aankhein daalkar kaha...

"kya?"

"mujhe laga meri height maap rahe ho.." vicky muskuraya...

"room No. kya hai..?

"247! Jaldi karo..." Vicky ko jaldi thhi.. Chidiya ko lekar ud jaane ki...

Gatekeeper ne ek no. dial kiya..," Hello Ma'm! Room No. 247 se sneha ji ko neeche bhej do... Driver Ji... Sorry.. Aa.. Unka Driver lene aaya hai.." wah ab bhi fati najron se vicky ko nihar raha thha....

"O teri.. Kya piece hai???" Door se ek ladki ko aate dekh Vicky ki haddiyan tak jam gayi.. 'nahi nahi.. Ye toh sneha ho hi nahi sakti.. Kahan wo badsoorat murari.. Aur kahan ye hushn ki pari... Wo toh shayad apne dono hath uthakar bhi iski unchayi ko nahi chhoo sakta... Par vicky khuda ki uss haseen kriti se najrein na hata saka...

Jyon jyon ladki kareeb aati gayi.. Uske chhote kapdon mein chhipe anmol khajane ko vicky apni paarkhi najron se parakhne laga..

Kareeb 5'8" ki height hogi.. Kamar toh mano thi hi nahi.. 26" ki kamar bhi koyi kamar hoti hai.. Uski jaise doodhiya rang mein puti jaanghon par fansi huyi gulabi rang ki mini skirt peechhe se usko mushkil se hi dhak pa rahi hogi... Upar safed rang ki chadar si silwaton se bhari padi thi.. Usko kya kahte hain.. Vicky ko andaja nahi tha.. Par wo silwatein bhi Shandaar ubharon ka size chhupane mein saksham nahi thhi.. Wahan se kapda tight tha.. Ekdum.. Chalne ke sath hi uske lumbe baal idhar udhar lehra rahe thhe.....

Achanak vicky ka kaleja munh ko aa gaya jab uss ladki ki meethi si aawaj uske kaano mein padi...,"kahan hai.. Driver?"

Gatekeeper bina kuchh bole vicky ki aur dekhne laga..

"Driver??? Aap.." lagbhag wahi pratikriya Sneha ki thhi.. Jo kuchh der pahle Gatekeeper pradarshit kar chuka tha... Fir sambhalte huye usne apni Gadi ko pahchana aur boli," Gadi andar le aao..!"

Vicky ne Gadi Sneha ke bataye anusar le jakar rok di aur bahar nikal kar khada ho gaya...

"saman koun rakhega..??"

"Kya ? oh Sorry.." vicky ko baat sunkar ekbaar gussa aaya par agle hi pal wo sambual gaya..," Kahan hai..?"

"lagta hai.. Experiance nahi hai.. Aao.." aur kahkar Sneha andar se lakar saman rakhwane mein uski madad karne lagi....

"aa.. Tumne kab se noukri join ki hai..?" Sneha ne chahakte huye poochha...

"Paidayishi noukar hoon...!" Vicky ne talkh lahje mein jawaab diya.... Dono hostel se kareeb 5 km aa chuke thhe.. Jab Sneha se chup na raha gaya...

"Shakal se lagte nahi ho.. Ab tak toh papa khoosat driver rakha karte thhe...!"

"hummm!" vicky ne usi raftaar se gadi chalana jari rakha...

"waise hum jakahan rahe hain.." Sneha ne aagey wali seat ki aur jhukte huye kaha...

"jahan kaho...!" Vicky apne plan par kaam kar raha tha.. Mann hi mann.. Usko yakeen nahi ho raha tha ki wo itniaasani se pahli seedhi paar kar lega...

"Mount abu chalo.. Hamare school ki trip wahin gayi hai.."

"Nahi.. Mujhe wo jagah pasand nahi hai... Kahin aur bolo..." Vicky bhala uske school ki trip mein usko shamil kaise karta...

"what do u mean by tumhe pasand nahi hai.. Dont forget u r a driver... Chalo! Hum wahin chalenge..."

"nahi.. Jahan mera mann nahi maanta; wahan mein nahi jata.. Kaho toh wapas hostel chhod dun...." Vicky ne apne kandhe uchka kar apna irada bata diya...

"Badey idiot kism ke driver ho.. Agar papa kahte toh bhi nahi jatey kya..?" Sneha ke mathhe par tyoriyan par bal pad gaye...

"uss.. Unki baat aur hai... Main unka driver hoon.." Kahte huye Vicky ka jabda bhich gaya tha..

"to mere kya ho?"

"Mohan... Mera naam hai.... Baki jo tum kaho..!" Vicky ne race par se dabav hatate huye bola....

"Hey! Tumhe nahi lagta tum kuchh jyada hi bolte ho..... Errrrr.. Ye Gadi kyun rok di..?" Sneha ko ab har baat ajeeb lag rahi thi....

"Peshab karna hai.. Tum bhi kar sakti ho.. Sunsaan jagah hai...!" Vicky ne Khidki kholi aur bahar nikal gaya....

Sneha niruttar ho gayi.. Uss'se Itni badtameeji se baat karne ki himmat aaj tak kisi mein nahi thi..

Vicky sadak kinare chalta hua kareeb 10 hi kadam aage gaya hoga... Usne apni zip sarkayi aur apna 'lambu' bahar nikal liya.. Wo toh tab se hi bahar aane ko tadap raha tha.. jab usne gate ki taraf madak andaj mein matakti aa rahi Sneha ko dekha thha.. Bahar aate hi 2-3 baar upar neeche huaa..

Vicky ne jaanboojh kar apne aapko iss position mein khada kiya thha ki agar chahe toh aasani se sneha uss bhari bharkam 'jugad' ko dekh sake...

Vicky wapas aaya toh Sneha ka chehra tapte angaare ki tarah laal ho chuka thha.. Mano usne koyi anokhi cheej dekh li ho.. Najrein lajayi huyi thhi.. Jaangheinek dusri ke upar chadhi thhi.. Aur hont tar ho chuke thhe.. Shayad jeebh ghoomkar gayi

hogi...

Vicky ne wapas aane par har ek cheese note ki thi.. Par Rape uske plan mein nahi

tha.. Sneha ko iss kadar pagal kar dena tha ki wo kunwari ho ya randi ban chuki ho.. Pake huye fal ki tarah uski godi mein aa girey....

"toh bataya nahi.. Kahan chalein...?" Vicky ne seat par baithkar gadi start karte huye kaha...

"jahannum mein..." kahkar Sneha ne apna munh bahar ki aur kar liya....

"wo bhi mujhe pasand nahi... Main toh jannat mein rata hoon.. Aish karta hoon!"

Vicky ki iss hazirjawabi par Sneha muskuraye bina na rah saki... ," thheek hai fir.. Wahin chalo!"

"kahan?"

"jannat mein.. Aur kahan..."

"nahi.. Tum abhi uss layak nahi ho...!"

"A tum pagal ho kya? Ek bhi baat ka seedha jawaab nahi dete.. Main toh khush ho gayi thi.. Tumhe dekhkar.. Ki pahli baar koyi dhang ka driver bheja hai.... Tum ho ki.......," Oyiiiiii mummmy.... Ye yahan kaise...?"

Vicky ne gadi rok di.... Palata toh chounk gaya..," yye mujhe do..!"

"par ye gadi mein kaise rah gayi... Isko toh papa ke paas hona chahiye..." Sneha hairat se mouser ko dekh rahi thi...," Main papa ke paas fone karti hoon.."

"nnahi.. Koyi jarurat nahi hai.. Ye meri hai.. Par tumhe kaise mili.." vicky ne uske hath se mouser le li...

"wwo.. Maine apni taang seedhi ki toh meri sendal seat mein fans kar nikal gayi.. Usko nikal rahi thi toh... Par tumhare paas mouser.. Tum sach mein ajeeb aadmi ho.. Itne mahange shouk!" Sneha usko ajeeb tareeke se dekh rahi thhi....

"wo darasal main driver nahi hoon.. S.O. hoon tumhare papa ka...!" vicky tab tak sambhal gaya tha...

"Ohh.. I see!" Sneha ke bhav Vicky ke liye achanak badal gaye...," Sorry.. Maine aapse galat sulook kiya ho toh..."

"kahan chalein...?" vicky ne sawaal kiya...

"kaheen bhi.. Jahan tum chaho.. Bus mujhe khuli hawa mein saans leni hai.. Aap sach mein hi kamaal ke ho... Vu hooooooooooo.." Sneha ne sheesha neeche karke bahar munh nikala aur jor ki cheekh mari.. Anand aur laparwahi bhari cheekh....

Vicky kuchh na bola... Uske plan ka dusra hissa kuchh jyada hi jaldi kaamyab ho gaya... Sneha ka visvas jeetne wala hissa...

Gadi sadak par ek baar fir tez gati se doud padi....

"ek minute rokogey pls.. "

"kya hua..?"

"oho.. Roko bhi..."

"batao toh sahi.. Hua kya hai aakhir..."

"ladkiyan ladkon ki tarah besharm nahi hoti... Jaldi roko pls.." Sneha ke chehre par bechaini saaf jhalak rahi thi...

"ohh.." kahte huye Vicky ne break laga diye....

Sneha Gadi se neeche utarte hi tej kadmon se paas ki jhadiyon ki taraf chal di.. Uski gaand ki lachakan dekhkar Vicky aah bhar uthha.. Par control jaruri tha... Dimag se kaam lena tha iss baar!

Najron se aujhal hote hi Vicky ne uske purse mein hath mara.. mobile upar hi mil

gaya.. Vicky ne usko silent karke apni pant ki jeb mein daal liya...

Sneha ki peshab karne ki pyari aawaj ne Vicky ki dhadkane aur badha di.. Sneha kunwari thi.. Bilkul kunwari.. Vicky peshab karne ki aawaj se hi iss bare mein confirmed ho gaya.. Hath ke ishare se usne pant mein kulbula rahe yaar ko shant rahne ki naseehat di....

Sneha wapas aayi toh uski aankhon mein lajja si thhi.. Ek apnapan sa tha.. Ek chance tha!

"Main aage baith jaaun?" Peshab karke wapas aayi Sneha ke mann mein ab aadesh nahi.. Aagrah tha...

"Kyun nahi..!" kahkar vicky ne agli khidki khol di..

"ohh thanx... Ek baat bolun?" Sneha ne apne aapko agli seat par adjust kiya...

"hummm... Bolo!" Vicky ne hulki si muskaan uski aur fainki.. Darasal wo uss adhnange kamsin badan ko dekhkar badi mushkil se apni bekaraari chhipa pa raha tha.. Chikni jaanghein beparda si uski najron ke saamne thhi.... Ek dusri se chipki huyi!

"mujhe shuru mein hi shaq tha ki tum driver toh kum se kum nahi hi ho.. Tum toh ekdum hero lagte ho...!" Sneha apni shirt ko neeche kheenchti huyi boli.. Jo simat kar uski nabhi tak pahunch gayi thi...

"hummm.. Bina heroine ke bhi koyi hero hota hai bhala..." jane vicky baat ko kahan ghuma raha tha...

"matlab!" kya sach mein wo matlab nahi samajh payi hogi...?

"kuchh nahi.. Bus aise hi...!"

"matlab tumhari koyi girlfriend nahi hai.. Hai na?" Sneha ne hulki si muskan uski taraf faink di...

Girl F.... Sunte hi anginat sundar chehron ki kataar si vicky ki aankhon mein ghoom gayi.. Par pratyax mein wo kuchh aur hi bola..," kuchh aisa hi samajh lo..! Koi milti hi nahi...!"

"udaas kyun hote ho.. Jab tak hum hain.. Humein hi samajh lo.." Sneha ne katil muskaan uski aur fainkte huye kaha...

"Sach!" mano Vicky ko bin maange hi moti mil gaya ho.. Itni der se uss par toot padne ko betaab vicky ka hath ek dum se uski jaanghon par jakar chipak gaya...

"Aeyyyy.. Uuuuu..." Sneha ne ek dum se uska hath door patak diya," Stop the car... I said stop the car...!" achanak se Sneha ka chehra tamtama uthha...

Vicky ke dil mein aaya ki gadi rok kar abhi usko apni god mein baithakar jhula de.... Usko laga maamla toh bigad hi gaya hai.. Par fir bhi usne sanyam rakha aur gadi rok di....

"Tumm.. Tum bahut badtameej ho.. Tumne kis baat ka kya matlab nikal liya.." Kahte huye Sneha ne gusse se Khidki patki aur peechhe jakar baith gayi... Uski aankhon mein aansoo thhe....

Uske baad kareeb 2 minute tak Gadi mein koyi hulchal nahi huyi... Aakhirkaar Vicky ko hi chuppi todni padi..," Chalein?"

Sneha kuchh na boli... Apni aankhein masal masal kar wo laal kar chuki thi...

Vicky kisi bhi tarah baat ko sambhal lena chahta tha..," Sorry... Wo... Main samjha ki........"

"Kya samjhe tum... Haan.. Kya samjhe..? Yahi ki main koyi aawara ladki hoon... Yahi ki ladki ke liye uski ijjat.. Uski aabroo koyi mayne nahi rakhti.. Bolo!" Sneha ka ye roop Vicky ke liye kisi aathhwein ajoobe se kum nahi tha.. Uski aankhon se vicky ke prati kshanik ghrina aur glani bhabhak rahi thhi," sare mard bhediye hote hain.. Maine hanskar do baat kya kar li... Tum jaise logon ke liye Girlfriend ka ek hi matlab hota hai....!" Sneha ka har ang ek hi bhasha bol raha tha.. Tiraskar tiraskar aur tiraskar....

Vicky ki toh bolti hi band ho gayi.. Halanki uski shararati aankhein poochh rahi thhi..," Devi ji! Aise kapdon mein koyi nari ko pooj toh nahi sakta!" par maamla aur bigad sakta tha.. Isiliye aankhon ki baat juban tak wo lekar nahi aaya..," Maine bola na Sorry! Actually tum aisi... Ho ki main rah na saka.. Mere jajbaat kaabu mein na rahe.. Ab toh maaf kar do...!"

Nari ki sabse badi kamjori.. Khud ko sheeshe mein dekhkar itrana aur khud ki prasansha sunkar sab kuchh bhula dena.. Sneha bhi apwaad nahi thi.. Vicky ki iss baa se uske kaleje ko ajeeb si thhandak pahunchi jiski khanak uske agle hi bol mein sunayi di," Ab chalo bhi... Andhera ho raha hai.. Raat bhar yahin pade rahoge kya...?" Sneha ne apne aansoo ponchh diye ya hushn ki taareef ki lehar unhe uda le gayi.. Pata hi nahi chala.. Aankhon mein aansuon ka sthan ab chirprichit chamak ne le liya tha... Gadi fir doudne lagi....

"ab moun vrat rakh liya hai kya? Kuchh bolte kyun nahi..." Ladki thhi.. Bhala chup kaise rahti... 10 minute ki chuppi ne hi Sneha ko bore kar diya...

Vicky kuchh nahi bola.. Nari ki har dukhti rag ko wah pahchaanta tha...

"Ohh God! Lagta hai fone Hostel mein hi rah gaya...! Mujhe papa ko fone karna tha...!" Sneha apne purse ko khangaalne lagi... Par fone milna hi nahi tha.. Wo toh Vicky ki jeb mein pada tha.. Silent!

"Ek baar apna fone dena...!" Sneha ne apna hath aage badha diya...

Vicky ne Mohan wala fone nikal kar Sneha ko pakda diya.....

Kareeb 3 baar fone karne ke baad Murari ne fone uthhaya," Saley.. Pille ke bachche.. Kitni baar bola hai..... Rang mein bhang mat dala kar...!"

Sneha ko uske papa ke paas do ladkiyon ke hansne khilkhilane ki aawaj sunayi di..," Oh Darling! U r so handsome.. Muuuuunha!"

Sweta ka dil baith gaya," Papa! ... Main hoon...!" apne papa ka rangeelapan dekh uska naritva sharmsaar ho gaya....

"ohhh.. Meri bachchi! Kaisi ho.. Mohan pahunch gaya na...!"

"haan papa.. Main Fone rakhti hoon..." kahkar usne fone kaata aur gusse se patak diya....

"kya hua?" vicky ne acharaj bhari najron se Mirror mein dekha...

"kuchh nahi.. Bus baat mat karo.. Mera mood kharaab hai!"

"hua kya hai?... Agar mujhe batane layak ho...." Vicky ne gadi ki raftaar dheemi kar di...

"bola na, kuchh nahi.. Personal baat thhi.... Tum batao.. Tum kahan ke ho.. Iss'se pahle kahan thhe.. Wagairah wagairah...." Sneha ne baat ko taalte huy kaha...

"hamara kya hai madam..! Roti ke liye aaj yahan kal wahan... Jindagi to tum jaise badey logon ki hoti hai.. Aish hi aish.. Na koyi chinta.. Na fikar.. !" vicky ne apne patte faikne shuru kar diye thhe.....

"aisa kyun kahte ho...? Kya meri ek bhi baat se tumhe laga ki mujh mein badey hone ka koyi gumaan hai.. Maine toh jab se hosh sambhala hai.. Bus iss anathasharam jaise hostel mein hi rah rahi hoon... Papa kabhi mujhe ghar lekar hi nahi jatey.. Le bhi gaye toh din ke din wapas..." Sneha ki aankhein sooni ho gayi.. Mano Apnepan ki talaas mein bhatak bhatak kar thak gayi hon...

"par... Ye toh bahut jana mana hostel hai.. Anathasharam kaise?.. Aur aap bhi toh.. Ekdum pariyon ke jaise rahti ho.. Banthhan kar..." vicky ne baat ko aagey badhaya!

"anath usi ko kahte hain na... Jo bina maa-baap ke rahta ho! Mummy ko toh kabhi dekha hi nahi.. Bus papa hain... Wo bhi.." kahte huye Sneha ka gala rundh gaya... jiske apne 'apne' nahi hote... Wah sabko apna maan'ne lagta hai.. Kisi ko bhi!

"aap aisa kyun kah rahi hain mam sahab!.. Aap toh...."

"ye memsahab memsahab kya laga rakha hai.. Main Sneha hoon.. Mujhe mere naam se bulao!"

Vicky jaanta tha.. Ladkiyan aisa hi bolti hain.. Jab koyi unko achchha lagne lag jaye..," Par Mam.. Sorry.. Par main toh aapka noukar hoon na!"

"Noukari gayi tel lene... Mujhe ab aur ghutan nahi chahiye.. Main jeena chahti hoon.. Kum se kum.. Jab tak tumhare sath hoon.. OK? Call me Sneha only.. We r friends!" kahkar Sneha ne apna hath aage badha diya.. Friendship ka proposal dekar...

Vicky ne Sneha ka komal hath apne bayein hath mein lapak sa liya,"Main.. Ab kya kahoon.. Aap ko samajh hi nahi pa raha.. Itni jaldi gussa ho jati hain.. Toh utni hi jaldi fir se...!"

"sach batao.. Main tumhe gussail dikhti hoon... Wo.. Uss samay toh... Khair.. Hum chal kahan rahein hain.. Ye toh batao..." Sneha dheere dheere line par aa rahi thi...

"Ek minute..." Kahte huye Vicky ne Gadi roki aur bahar nikal gaya.. Ghana andhera asar dikhane laga tha... Raat ho gayi thi...

"Hello.. Madhav!"

"haan bhai..? Sab thheek toh hai na.. Kahan ho.. Tumhara fone bhi off aa raha hai..." Madhav chintit lag raha tha...

"arey main bilkul thheek hoon.. Aur Wo mere sath hi hai.. Sab tareeke se ho raha hai.. Kisi booth se fone karwa Murari ko.. Bol de ki uski beti kidnap ho gayi hai.. Jaldi karna.. Ab rakhta hoon.. Haan.. Mohan ko sambhal kar rakhna.. Usko T.V se door rakhna...." kahkar vicky ne fone kaat diya.... Aur off kar diya...!

Wapas aaya toh sneha bechaini se uski raah dekh rahi thi...," kahan chale gaye thhe.. Mujhe Darr lag raha tha.."

Vicky apni anamika (chhoti ungali) khadi karke muskuraya aur Gadi mein baith gaya...

"tum bhi na.. Itni jaldi!" kahkar Sneha khilkhilane lagi.. Vicky ne bhi hansne mein uska sath diya.. Sur milne lage thhe.. Dooriyan kum hone lagi.. Ek apnapan sa angadayi lene laga.....

Gadi fir chal di.... Pata nahi kounse Road par gadi chal rahi thi.. Sneha ko jaan'ne ki koyi jaldi nahi thi.. Par vicky ko fikar thi.. ab Gadi jald se jald badalna jaruri ho gaya tha.....