गर्ल'स स्कूल compleet

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rajaarkey
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Re: गर्ल'स स्कूल

Unread post by rajaarkey » 12 Dec 2014 03:44

गर्ल्स स्कूल पार्ट --44



"शुक्र है फ्रॅक्चर नही है! माँस फटने से सूजन आ गयी है.. ठीक होने में 10-15 दिन लग जाएँगे.. मैं कुच्छ दवाइयाँ लिख देती हून.. टाइम से लेते रहना और नेक्स्ट मंडे एक बार आकर चेक करा जाना... ओके?" हॉस्पिटल में लेडी डॉक्टर वीरेंदर और राज के पास खड़ी थी..," करते क्या हो तुम?"

"जी, पढ़ते हैं..10+2 में" दोनो एक साथ बोल पड़े...

"तुम्हारा दोस्त शरमाता बहुत है.." डॉक्टर ने राज को प्रिस्क्रिप्षन पेपर दिया और मुस्कुराते हुए वहाँ से दूसरे पेशेंट के पास चली गयी...

"क्या बात थी.. तू शर्मा क्यूँ रहा था ओये?" राज ने वीरू के कान के पास मुँह लेजाकार कहा...

"मेरी पॅंट निकलवा ली थी यार.. शरम नही आएगी क्या?" वीरू मुस्कुराया और अचानक बात पलट दी..," चलें.. सुबह होने को है.."

"एक मिनिट.. मैं भाई साहब को देखकर आता हूँ... तू यहीं लेटा रह तब तक.." राज ने वीरू से कहा..

"कहाँ गये वो..?"

"पता नही.. अभी 20 मिनिट पहले यहीं थे.. एक फोन करने की बात कहकर निकले थे.. बाहर ही होंगे.. मैं बुलाकर लाता हूँ.." कहकर राज बाहर निकल गया...

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करीब 10-15 मिनिट बाद राज वापस आया," यार वो तो कहीं दिखाई नही दिए... मैं हर जगह देख आया.."

"चले तो नही गये हैं.. स्नेहा रूम पर अकेली है ना.. वो उसको बोल भी रहे थे की देर लगी तो मैं आ जाउन्गा..!" वीरू ने राज से कहा..

"पर मैं पार्किंग में गाड़ी भी देख आया हूँ... वहीं खड़ी है.. गये होते तो गाड़ी लेकर नही जाते क्या?" राज ने सवाल किया...

"फिर तो यहीं होंगे.. इंतजार करते हैं.. और क्या?" वीरू ने राज की और देखते हुए कहा...

राज ने सहमति में सिर हिलाया और वीरेंदर के पास ही बैठ गया.....

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सवेरा हो गया था.. स्नेहा को सारी रात नींद नही आई.. यूँही करवटें बदलती हुई विकी के बारे में सोचती रही...कितना प्यारा है मोहन.. कितना अपना सा है.. 3 दिन में ही वो उस'से किस कदर जुड़ गयी थी.. उसके दूर जाते ही उसको लगता था की वो फिर से नितांत अकेली हो गयी है... मोहन ने एक साथ ही उसको कितनी सारी खुशियाँ दे दी... मोहन के लिए ही जियूंगी अब... उसके लिए मर भी जाउन्गि... स्नेहा ने मन ही मन सोचा और अंगड़ाई लेते हुए उल्टी लेट गयी.. उसका रूप निखर आया था.. अब हर अंग हर पल जैसे 'मोहन मोहन' ही पुकारता रहता था.. आज गाड़ी में ही उन्होने कितनी मस्ती की थी.. स्नेहा रह रह कर विकी से लिपट जा रही थी.. 'पल' भर की बेचैनी भी स्नेहा से सहन नही हो रही थी... मोहन ने वादा किया था.. रोहतक जाकर एक दोस्त के फ्लॅट पर रुकेंगे और वो उस'से वहाँ पहले दिन वाला ही प्यार फिर से करेगा... जी भर कर.. वो रोहतक आ भी गये थे.. पर स्नेहा से 2 पल का भी इंतज़ार नही हो रहा था.. वो रह रह कर मोहन से लिपटी जा रही थी.....

और शायद इसीलिए 'वो' हादसा हुआ.. अगर वो मोहन को इस तरह 'तंग' ना करती तो शायद मोहन हादसे को टाल भी लेता.. सोचते हुए स्नेहा ने एक लंबी आह भारी.. और करवट बदलकर फिर से सीधी हो गयी...

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करीब 10 मिनिट बाद दरवाजे पर दस्तक हुई.. स्नेहा एक दम से उठी और दरवाजे के पास जाकर पूचछा," कौन है?"

"हम हैं.. दरवाजा खोलो"

आवाज़ वीरू की थी.. स्नेहा ने झट से दरवाजा खोल दिया..," आ गये.. क्या रहा?"

"भैया यहाँ नही आए हैं क्या..?" राज ने उल्टा उसी से सवाल किया..

"क्या मतलब?" स्नेहा का दिल धक से रह गया..," कहाँ हैं वो? यहाँ तो नही आए..

"गाड़ी तो उनकी वहीं पर खड़ी है... फोन करने की कहकर निकले थे.. हमने करीब 1:30 घंटे उनका इंतज़ार किया.. फिर सोचा क्या पता यहीं आ गये हों.. इसीलिए हम आ गये..." राज ने चिंतित स्वर में उत्तर दिया...

स्नेहा बिना कुच्छ सोचे समझे ही रोने लगी...," उन्होने पहले ही कहा था की रोहतक में उनको ख़तरा है.." सुबक्ती हुई स्नेहा के गालों से मोटे मोटे आँसू बहने लगे..

राज ने वीरू को बेड पर लिटा दिया.. दोनो की समझ में नही आ रहा था की वो क्या करें; क्या कहें... कुच्छ देर बाद राज उठकर स्नेहा के पास आया," आ जाएँगे.. आप रो क्यूँ रही हैं.. हम छ्चोड़ आएँगे.. आपको जहाँ जाना है..."

स्नेहा को कहाँ जाना था.. वो अब जा भी कहाँ सकती थी... मोहन के संग सपनों का, अरमानो का जो गुलिस्ताँ स्नेहा ने अपने दिल में सहेज लिया था, उसके आलवा अब इस जहाँ में उसका बचा ही क्या था.. पापा? जिसने महज अपनी राजनीति के लिए शतरंज की बिसात पर मोहरे की तरह से उसका इस्तेमाल किया था.. उसके पास? नही.. कभी नही! अगर वो ऐसा सोचती भी तो किस मुँह से.. वा खुद उसके खिलाफ बग़ावत पर उतर आई थी.. और शालिनी वाला केस सुर्ख़ियों में आने पर तो उसको अपने 'बाप' से नफ़रत सी हो गयी थी....

"चिंता ना करें आप... लीजिए.. आप फोन कर लीजिए..." राज ने अपना फोन उठाकर स्नेहा को दे दिया...

"ओह हां.. पर उसका फोन तो ऑफ ही रहता है.. अक्सर.. चलो ट्राइ करती हूँ..!" उम्मीद की किरण नज़र आने से उसकी सुबाकियाँ कुच्छ कम हुई और उसने विकी का नंबर. डाइयल किया.. पर जैसा स्नेहा ने सोचा था वैसा ही हुआ.. फोन ऑफ था.. स्नेहा को मोहन की भी चिंता हो रही थी और अपनी भी.. वह बेड पर बैठकर अपना सिर पकड़कर रोने लगी....

"तुम रो क्यूँ रही हो.. वो थोड़ी बहुत देर में आ ही जाएँगे.... वैसे तुम्हारे पास घर का नंबर. भी तो होगा ना.. वहाँ पता कर लीजिए अगर उन्होने घर पर फोन किया हो तो.. वैसे वो भाई साहब आपके लगते क्या हैं?" वीरू बेबस था.. उसके पास आकर उसके आँसू नही पोंच्छ सकता था...

क्या बताती स्नेहा.. क्या नाम देती 2 दिन पहले बने इस दिल के रिश्ते को.. उसको डर था की अगर वो सच्चाई बताती है तो कहीं दोनो डर कर कुच्छ उल्टा सीधा ना कर दें.. मसलन पोलीस को फोन वग़ैरह.. प्रत्युत्तर में वो बिलख पड़ी..," मोहन.. कहाँ हो तूमम्म्मममम???"

स्नेहा का वो कारून प्रलाप सुनकर दोनो का दिल दहल गया.. राज उसके पास जाकर बैठ गया," आप ऐसे ना रोयें.. मैं छ्चोड़ आउन्गा आपको जहाँ जाना है... देखिए यहाँ पर हम एज ए स्टूडेंट रह रहे हैं... किसी ने आपका रोना सुन लिया तो लोग तरह तरह की बातें करेंगे.. प्लीज़.. आप सब्र से काम लें.. वो आते ही होंगे..." राज कह तो रहा था की वो आ जाएँगे.. पर चिंता उसको खुद को भी होने लगी थी.. अब तक तो उसको यहीं पर आ जाना चाहिए था.. 3 घंटे के करीब होने वेल थे उसको गायब हुए...

स्नेहा ने जैसे तैसे खुद को संभाला..," क्या मैं यहीं रह सकती हूँ.. जब तक वो नही आता?" उसने अपने आँसू पोंच्छ लिए.. सच में ही उसका रोना उन्न बेचारों को मुसीबत में डाल सकता था.. और खुद उसको भी...

" क्या?.. हां.. पर.. मेरा मतलब है कि..." राज को कोई शब्द ही ना मिला आगे कुच्छ कहने को.. कैसे रह सकती है वो यहाँ.. लड़कों के कमरे में.. राज ने प्रशन सूचक नज़रों से वीरू की और देखा...

"हां.. रह ले बहन.. जब तक तेरा दिल करे तब तक रह यहीं पर.. मैं कह दूँगा.. मेरी बेहन है.. लोगों की ऐसी की तैसी..! लोग तो बोलते ही रहते हैं.." वीरू ने फ़ैसला सुना दिया..

स्नेहा सुनकर चोंक पड़ी.. उसने अपनी जुल्फें पीछे करके नज़रें उठाकर वीरू की और देखा.. कुच्छ पल तो वो विस्मय से अपनी आँखें फाडे हुए उसको देखती रही.. बूझे हुए चेहरे पर एक मद्धय्म सी मुस्कान दौड़ गयी.. और आँसू फिर से बहने लगे.. उसको यकीन ही नही हो रहा था की उसको 'भाई' मिल गया है..

वीरू उसकी तरफ देखकर मुस्कुराने लगा तो स्नेहा से रहा ना गया.. लगभग दौड़ती हुई सी वो उसके बेड की और गयी और घुटने ज़मीन पर रखकर उसकी छाती पर सिर रख लिया.. और सुबक्ती रही...

"अब भी क्यूँ रो रही है तू.. मैं हूँ ना.. तेरा भाई.." वीरू ने उसका चेहरा अपने हाथों में लेकर उपर उठाया...

"रो नही रही भैया.. समेट नही पा रही हूँ.. रक्षा बंधन पर मिली इस अनोखी खुशी को.. मेरा कोई भाई नही था.. आज से पहले.." स्नेहा खिल उठी..

"अब तो है ना.. वीरू!" वीरू की आँखें चमक रही थी...

"मुझे क्यूँ भूल रहे हो.. मैं भी तो हूँ.." राज भी स्नेहा की बराबर में आ बैठा...

"बहती गंगा में हाथ धो रहा है.. क्यूँ? चल आजा तू भी" वीरू ने कहा और दोनो राज के चेहरे को देखकर खिलखिला उठे......

विकी के इंतज़ार में दिन के कब 7 बज गये तीनो को पता ही नही चला.. स्नेहा रह रह कर बेचैन हो जाती थी.. पर अब उसको अपनी नही सिर्फ़ मोहन की चिंता थी.. उसको तो भाई मिल गये थे.. पर मोहन का यूँ अचानक गायब हो जाना उसकी परेशानी का सबब बना हुआ था.. स्नेहा रह रह कर खामोश हो जाती और शून्या में झाँकने लगती...

"चिंता क्यूँ कर रही हो सानू.. वो कोई बच्चे थोड़े ही हैं.. आ जाएँगे.." वीरू ने स्नेहा का हाथ पकड़ कर उसका ध्यान वापस खींचा...

स्नेहा ने हां में सिर हिलाया और अपनी नम हो चली आँखों को पौंच्छ लिया...

"स्नेहा तो है ही अभी.. मैं स्कूल चला जाउ? कल भी नही जा पाए थे.." राज ने खड़े होते हुए पूचछा..

"ठीक है.. तुम नहा लो.. वैसे भी मुझे कोई खास दिक्कत तो होने नही वाली है.. नाश्ता करके नही जाओगे क्या?" वीरू बोला....

"अभी तो मैं लेट हो रहा हूँ.. आकर ही देखूँगा.. स्कूल में खा लूँगा कुच्छ.. तुम्हारे लिए लाकर दे जाता हूँ..." राज बाहर निकलने लगा...

"मेरे लिए तो मेरी बेहन बना देगी.. क्यूँ स्नेहा?" वीरू स्नेहा को देखकर मुस्कुराया....

"पर... मुझे खाना बनाना नही आता है... कभी बनाया ही नही.." स्नेहा ने नज़रें उठाकर वीरू को देखा...

"कोई बात नही.. मैं सीखा दूँगा ना.. बस तुम वैसा करती जाना जैसे में बताउन्गा.. जा राज ब्रेड और बटर ले आ..." वीरेंदर स्नेहा को व्यस्त रखना चाहता था.. जब तक विकी नही आता... उसको पता था की वो खाली रहेगी तो ज़्यादा परेशान रहेगी...

राज ने स्नेहा की और देखा.. स्नेहा मुस्कुरा पड़ी..,"ठीक है.. पर कुच्छ उल्टा सीधा बन गया तो मुझे मत बोलना बाद में.. पहले बोल रही हूँ" और हँसने लगी...

राज उसकी हँसी का जवाब हुल्की मुस्कुराहट से देकर बाहर निकल गया....

"क्या बात है भैया? राज कुच्छ परेशान सा लग रहा है..?" स्नेहा ने राज के जाते ही वीरू से पूचछा..

"हूंम्म.. वही तो मैं भी देख रहा हूँ.. कल से इसको पता नही क्या हो गया है..?" वीरू ने जवाब दिया..

"आपने इस-से पूचछा ये रात को कहाँ गया था...?"

"ना.. पर शायद मुझे पता है ये कहाँ गया होगा..?"

"कहाँ?" स्नेहा को भी उत्सुकता हुई जान'ने की...

"रहने दो.. तुम्हारे मतलब की बात नही है..." कहकर वीरू ने करवट बदल ली..

"बताओ ना भैया.. ऐसे क्यूँ कर रहे हो.. मैं फिर से रो पड़ूँगी..." स्नेहा ने उसकी बाजू पकड़ कर वापस अपनी तरफ खींच लिया....

" ठीक है.. उसको आने दो.. पहले पक्का तो कर लूँ.. मैं जो सोच रहा हूँ.. वो सही भी है या नही.." वीरेंदर ने बात पूरी की भी नही थी की राज आ गया..," ये लो.. और ये खिड़की बंद रखना.. "

"खिड़की के बच्चे.. तूने ये तो बताया ही नही की तू गया कहाँ था.. रात को..?" वीरू ने आते ही सवाल दागा...

"बता दूँगा भाई.. अभी तो लेट हो रहा हूँ...?" कहते हुए राज बाथरूम में घुसने लगा...

"उसकी मा आई थी अभी यहाँ.. तुम्हे पूच्छ रही थी..." वीरू ने पाँसा फैंका..

"क्क्याअ? पर क्यूँ?.. मेरा मतलब कौन आई थी.. किसकी मा?" राज ने हड़बड़ा कर कहा...

"जिसके घर तू रात को गया था.. उसकी मा..? वीरू के ऐसा कहते ही राज का चेहरा सफेद पड़ गया.. उसकी हालत पर दोनो पेट पकड़कर हँसने लगे...

"क्या है भाई.. खंख़्वाह डरा दिया था... तूने स्नेहा को कुच्छ बता दिया क्या?" राज ने उनको हंसता देखकर राहत की साँस ली......

"नही.. अभी तक तो नही.. पर अभी बतावँगा.. तड़का लगाकर.. तू चला जा पहले.." वीरू ने हंसते हुए कहा...

"क्या है ये...? भाई तू भी ना.. मैं नही जाता स्कूल..." राज तौलिए को पटक कर वहीं बैठ गया..

"ठीक है.. मत जा.. जो मुझे नही पता वो तू बता देना..." खिलखिलाते हुए वीरू ने स्नेहा को हाथ दिया.. स्नेहा ने भी ताल से ताल मिलाई...

"प्लीज़ भाई.. तेरे हाथ जोड़ता हूँ.. मेरी इज़्ज़त का फालूदा क्यूँ निकाल रहा है.." राज दोनो हाथ जोड़कर गिड़गिदाने की मुद्रा में आ गया...

"क्यूँ जब मुँह काला करने गया था तब नही निकला इज़्ज़त का फालूदा..." वीरू और स्नेहा ज़ोर ज़ोर से हंस रहे थे.. राज का चेहरा देखने लायक हो गया था...

"ठीक है तो फिर.. तेरी भी बात मैं बताउन्गा वापस आकर.. जितना भोला बन रहा है.. उतना नही है ये.. स्कूल में एक भी लड़की इस'से बात नही करती.. सब को डरा के रखता है.." और राज की बात दोनो की जोरदार हँसी में दब कर रह गयी.. राज को कुच्छ बोलते ना बना तो वापस बाथरूम में घुस गया...

नहा धोकर मुँह फुलाए हुए ही राज स्कूल चला गया...

"चलो.. बताओ.. अब कैसे बनेगा.. नाश्ता..?" स्नेहा ने बटर और ब्रेड उठाए और वीरू के पास आ गयी

"राज! तुम्हे सर बुला रहे हैं..!"

राज आवाज़ से ही पहचान गया.. यह प्रिया थी.. उसकी आवाज़ में एक अजीब सी मिठास थी... जबकि रिया की आवाज़ में अल्हाड़पन झलकता था....

राज क्लास से बाहर निकला.. प्रिया पहले से ही बाहर थी.. प्रिया को उनदेखा करते हुए वा कुच्छ कदम आगे बढ़ा पर फिर प्रिया की और मूड गया," कौन्से सर?" राज की आवाज़ में रूखापन था...

"ववो.. सॉरी राज.. रियली..!" प्रिया उस'से नज़रें नही मिला पा रही थी..

"कौन्से सर बुला रहे हैं..?" राज ने उसकी बात को अनदेखा करने का दिखावा किया...

"क्या तुम मुझे माफ़ नही करोगे राज? तुम्हे पता है.. मुझे एक पल के लिए भी नींद नही आई... प्लीज़ माफ़ कर दो... कर दो ना.." प्रिया इधर उधर देख रही थी.. कहीं कोई देख तो नही रहा...

"माफ़ तो तुम मुझे कर दो.. मैं भी दूसरों के जैसा हूँ ना.. बदतमीज़..!" राज का गुस्सा तो उसकी पहली रिक्वेस्ट पर ही पिघलने लगा था.. अब तो वह सिर्फ़ दिखावा कर रहा था.. प्रिया को अपने लिए तड़प्ता देख राज को बहुत सुकून मिल रहा था...

"म्मेरा वो मतलब नही था राज.. मैं डर गयी थी.. तुम्हारी कसम... आज के..."

प्रिया ने अपनी बात पूरी की भी नही थी की वहाँ रिया आ धमकी," तुम्हे पता है राज.. ये सारी रात सुबक्ती रही.. मैं भी नही सो सकी.. इसके चक्कर में.. अब इसको माफी दे भी दो..." रिया ने अपना वोट प्रिया के पक्ष में डाला...

"अगर तुम नही बता रही की कौन्से सर बुला रहे हैं.. तो मैं वापस जा रहा हूँ..!" राज ने रिया की बात का कोई जवाब नही दिया...

"मैने झूठ बोला था.. तुमसे बात करने के लिए.. मैं तुम्हारी कसम...." और प्रिया की बात अधूरी ही रह गयी.. राज वापस मूड कर क्लास में चला गया...

" तू चिंता मत कर प्रिया... ये कहीं नही जाने वाला.. मैं सब समझ रही हूँ.. ये तुमसे बदला ले रहा है बस.. चल आ क्लास में चलते हैं.. आ ना!" रिया ने प्रिया का हाथ पकड़ कर क्लास की और खींच लिया...

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" अजीब आदमी है यार तू भी.. उस लड़की को ऐसे ही छ्चोड़ आया.. अंजान लड़कों के पास?" शमशेर को विकी की बात पर बहुत गुस्सा आया...

"चिंता मत कर भाई.. निहायत ही शरीफ लड़के हैं.. उसको प्यार से रखेंगे.. 2-4 दिन की तो बात है.. तब तक मैं मुरारी को निपटा लूँगा..." विकी फोन पर शमशेर से बात कर रहा था," वैसे भी तो उसको लोहरू छ्चोड़कर ऐसा ही करने का प्लान था.. लोहरू छ्चोड़ने पर बाद में टेन्षन आ सकती थी.. उसकी समझ में कुच्छ नही आएगा.. मैने उसको समझा रखा है की मेरी जान को ख़तरा हो सकता है.. अगर कुच्छ हो जाए तो तुम किसी भी सूरत में अपने बयान मत बदलना..."

"यार तुझे बयानो की पड़ी है... वो लड़के स्कूल में पढ़ते हैं यार.. डर जाएँगे.." शमशेर ने विकी से गुस्से में कहा...

"तू चिंता क्यूँ कर रहा है भाई.. स्नेहा बहुत समझदार है.. वो संभाल सकती है अगर कुच्छ उल्टा सीधा हुआ तो..! और मैने अपना एक आदमी भी आसपास जमा रखा है.. अगर कुच्छ होने भी लगा तो वो स्नेहा को मेरा नाम लेकर ले उड़ेगा..." विकी ने शमशेर को तसल्ली देने की कोशिश की..

"पर मान लो तुझे मल्टिपलेक्स मिल भी गया.. बाद में क्या होगा... उस बेचारी का!" शमशेर स्नेहा को लेकर चिंतित था...

"होना क्या है.. ज़्यादा से ज़्यादा उसका बाप उसका खर्चा नही देगा ना.. मैं दे दूँगा.. और बोल?" विकी ने जवाब दिया...

"यार.. तेरी यही बात ग़लत है.. तू सब चीज़ों को पैसे से तोल कर देखता है.. आख़िर वो तुझसे प्यार करती है.." शमशेर के मंन में अभी भी काई सवाल थे..

"तो मैं उस'से प्यार करता रहूँगा ना.. टाइम निकाल कर.. बहुत मस्त है साली.. ऐसी बाला मैने आज तक नही देखी..." विकी ने बत्तीसी निकालते हुए कहा...

"तेरा कुच्छ नही हो सकता भाई.. तू तो पॉलिटिशियन्स से भी एक कदम आगे बढ़ गया है.. खैर जैसा तू ठीक समझे...!" शमशेर ने टॉपिक पर बात करना व्यर्थ समझा..,"वैसे कहाँ रहते हैं.. वो लड़के..?"

"एस.एच.ओ. विजेंदर के घर के ठीक सामने... तू ये बता.. टफ से बात की या नही..."

"हां.. कर ली.. वो तो कह रहा था.. इतनी सी बात मुझे नही बोल सकता था क्या? खैर.. आज रात 8:00 बजे सीधा थाने चला जाना.. टफ और मुरारी वहीं मिलेंगे.. कर लेना जो बात करनी है.. खुलकर.. मैने सब समझा दिया है..." शमशेर ने बुझे मंन से कहा...

"थॅंक यू बॉस! तुस्सी ग्रेट हो.." कहकर विकी ने खुशी खुशी फोन काट दिया था.. वो मन ही मन उच्छल रहा था.. उसके एक ही तीर ने जाने कितने शिकार कर लिए थे... पर हाँ.. एक मासूम भी उसकी चपेट में आ गयी थी... स्नेहा!

" चलो! जनाब बुला रहे हैं?" सी.आइ.ए. थाना भिवानी के एक सिपाही ने ताला खोलते हुए सलाखों के अंदर मुरझाए से बैठे मुरारी से कहा.. शाम के करीब 5 बजे थे..

"देखा.. मैने कहा था ना.. तुम्हारा जनाब ज़्यादा देर तक मुझे ऐसे नही बैठा सकता.. कोई छ्होटा मोटा आदमी नही हूँ मैं.. बाद में उस'से निपाटूंगा भी... ये 'क़ानून' छ्होटे लोगों के लिए बनते हैं... हमारे लिए नही.. आ गया होगा फोन.. उपर से उसके किसी 'बाप' का...." मुरारी ने रुमाल से अपनी गर्दन पर छलक आए पसीने और मैल की पपड़ी सॉफ करते हुए कहा और चौड़ी छाती करके बाहर निकल लिया...

"अब हमें क्या पता साहब.. हम तो हुक़ुम के गुलाम हैं.. जैसा आदेश जनाब करेंगे, मान'ना पड़ेगा.. वैसे मेरी पूरी हुम्दर्दि आपके साथ है.. अगली बार भगवान की दया से जब आप मंत्री होंगे तो मैं आपसे ज़रूर मिलूँगा.. याद रखिएगा मेरा चेहरा..." सिपाही ने मासूमियत से कहते हुए अपने नंबर. बदवा लिए.. मुरारी की नज़र में..

मुरारी ने खुश होकर उसकी पीठ ठोनकी," यहाँ कुच्छ लेन देन नही चलता क्या रे?"

"सब चलता है साहब.. हर जगह चलता है ये तो... पर ना किसी को कुच्छ उपर मिलता.. ना नीचे.. जनाब डीजीपी हरयाणा के भतीजे हैं ना... हम तो बस इंतज़ार ही करते रहते हैं.. की कब दीवाली आएगी और कब बोनस मिलेगा.. साला तनख़्वाह के अलावा एक कप चाय भी नही नसीब होती फोकट में तो... इस थाने में... मेरी बदली ज़रूर करवा देना साहब...." सिपाही ने फिर से लाइन मारी...

"तुम चिंता मत करो बेटा.. मुझे कुर्सी मिलते ही तुम्हारी प्रमोशन पक्की.. पर ये बताओ.. बात किस'से करनी पड़ेगी.. लेन देन की.." मुरारी उसके कान में फुसफुसाया...

सिपाही ने कोई जवाब नही दिया.. टफ के ऑफीस के सामने पहुँच गये थे दोनो..," चलो साहब.. बाकी बातें बाद में..."

मुरारी अंदर घुस गया.. अंदर चल रहे ए.सी. की ठंड में मुरारी को अपना ऑफीस याद आ गया.....

टफ अपनी गद्देदार कुर्सी पर आराम से टेबल के नीचे पैर फैलाए हुए अढ़लेटा सा बैठा था.. उसके सामने 30 की उमर के आसपास के 2 पहलवान से दिखने वाले अच्छे घरों के लोग खड़े थे..

"मुझे बुलाया इनस्पेक्टर?" मुरारी ने गर्दन टेढ़ी करते हुए पूछा.. रस्सी जल चुकी थी.. पर बल अभी तक नही गये थे..

टफ ने जैसे मुरारी को सुना ही नही.. वह टेबल पर आगे की और झुका और सामने खड़े लोगों से बोला," बैठो!"

जैसे ही उन्न दोनो ने बैठने के लिए टेबल के सामने खड़ी कुर्सी खींची; टफ उबाल पड़ा...," सालो.. बैठने के लिए कुर्सी चाहिए तुम्हे.. हां? उधर बैठो.. नीचे!"

"जनाब हमारी भी कोई इज़्ज़त है.. बाहर गाँव वाले आए हुए हैं.. क्यूँ नाक कटवा रहे हो..?" उनमें से एक ने हाथ जोड़कर कहा...

"हूंम्म.. इज़्ज़त.. तुम्हारी भी इज़्ज़त है.. सालो.. जब गाँव की लड़कियों को खेतों में पकड़ते हो तो तब क्या तुम्हारी इज़्ज़त गांद मरवाने चली जाती है... तुम इज़्ज़त की बात करते हो.. बहनचो..." टफ खड़ा हो गया..," कपड़े निकालो... देखता हूँ तुम्हारी इज़्ज़त कितनी गहरी है..!"

"नही.. जनाब.. ये तो पागल है.. लो बैठ गये.. आप तो माई बाप हैं.. आपके सामने नीचे बैठने में भला कैसी शरम..?" कहते हुए दूसरा टपाक से दीवार के साथ साथ कर ज़मीन पर बैठ गया.. और पहले वाले को भी खींच कर बिठा लिया...

"राजेश!" टफ ने सिपाही को आवाज़ लगाई...

"जी.. जनाब.." राजेश तुरंत दरवाजे पर प्रकट हो गया...

"लड़की के बाप को बुलाकर लाओ...!"

"जी जनाब.." राजेश तुरंत गायब हो गया और जब वापस आया तो उसके साथ एक अधेड़ उम्र का आदमी था...

"नमस्ते जनाब!" आदमी ने कहा और अंदर आ गया.. उसकी आँखें भरी हुई थी..

"बोलो ताउ! क्या करना है इनका..?" टफ ने बड़े ही नरम लहजे में बात की..

उस आदमी ने नफ़रत और ग्लानि से ज़मीन पर बैठे दोनो की और देखा और अपनी नज़रें हटा ली..," सब कुच्छ आप पर छ्चोड़ दिया है जनाब.. अब हम तो किसी को मुँह दिखाने लायक रहे नही.. हमारी बेटी.." कह कह कर बुद्धा फूट फूट कर रोने लगा.. उसका गला भर आया...

"ठीक है.. आप जाकर मुंशी के पास बिटिया के बयान दर्ज करवा दो...! मैं कल इनको कोर्ट में प्रोड्यूस कर दूँगा..."

"एक मिनिट जनाब.. क्या हम अकेले में इनसे एक बार बात कर लें... इधर आना ताउ!" दूसरे वाले आदमी ने कहा...

"आप बात करना चाहते हो ताउ?" टफ ने पूचछा..

बुड्ढे ने कोई जवाब ना दिया.. उनके बुलाने पर वो इनकार नही कर सका और बरबस ही उनकी और चला गया....

कुच्छ क्षण दोनो आदमी उसके कान में ख़ुसर फुसर करते रहे.. बुड्ढे के अंदर का स्वाभिमान जाग उठा और कसकर एक तमाचा उनमें से एक को जड़ दिया.. दोनो टफ की वजह से खून का घूँट पीकर रह गये....

"क्या हुआ ताउ? क्या कह रहे हैं ये..." टफ ने दोनो को घूरते हुए कहा..

बुद्धा फफक पड़ा..," कह रहे है.. केस वापस ले लो वरना तुम्हारी छ्होटी बेटी को भी......" इस'से आगे वो ना बोल पाया....

टफ कितनी ही देर से अपने खून में आ रहे उबाल को रोके बैठा था..," कपड़े फाडो इन्न बेहन के लोड़ों के... और नगा करके घूमाओ बाहर.. तब आएगी इनको अकल..!"

टफ के मुँह से निकालने भर की देर थी.. राजेश अपने साथ दो और अपने ही जैसे हत्ते कत्ते पोलीस वालों को लेकर अंदर आ गया...

"हमें माफ़ कर दो साहब.. हमने तो खाली चुम्मि खाई थी.. और चूचियाँ दबाई थी बस..... प्लीज़.. जनाब.. इश्स बार छ्चोड़ दो.. नही.. प्लीज़ फाडो मत.. हम निकाल रहे हैं ना.." टफ का रौद्रा रूप देखकर दोनो अंदर तक दहल गये... और साथ में मुरारी भी.. उसके चेहरे पर पसीना छलक आया था.. और रौन्ग्ते खड़े हो गये थे...

सिपाहियों के कान तो बस अपने जनाब की आवाज़ ही जैसे सुनते थे... 2 मिनिट के बाद ही वो दोनो सिर्फ़ कcचे बनियान में खड़े थे...

"इतनी बे-इज़्ज़ती सहन नही होती जनाब.. हमारी भी पहुँच उपर तक है.. सेंटर में मिनिस्टर है हमारा मौसा...!" पहले वाले आदमी झक मार रहा था..

"एक मंत्री तो ये खड़ा.. तुम्हारे सामने.. इसको भी नंगा करके दिखाऊँ क्या?" टफ ने कहा तो मुरारी को झुर्झुरि सी आ गयी.. उसकी टाँगें काँपने लगी थे खड़े खड़े...

दोनो के मुँह अचानक सिल गये.. अब तक मुरारी पर तो उनका ध्यान गया ही नही था.. मुरारी को इश्स तरह भीगी बिल्ली बने खड़ा देख उनको अपनी औकात का अहसास हो गया....

"दोनो को हवालात में डाल दो.. शाम को इनकी गांद में मिर्ची लगानी है.... चलो ताउ जी.. आप बयान दर्ज करवा दो.." टफ ने कहा और फिर मुरारी की और घूरते हुए बोला..," बैठो.. मैं आता हूँ...!

साधू सा आलाप कर लेता हूँ ,

मंदिर जाकर जाप भी कर लेता हूँ ..

मानव से देव ना बन जाऊं कहीं,,,,

बस यही सोचकर थोडा सा पाप भी कर लेता हूँ

आपका दोस्त

राज शर्मा

(¨`·.·´¨) ऑल्वेज़

`·.¸(¨`·.·´¨) कीप लविंग &

(¨`·.·´¨)¸.·´ कीप स्माइलिंग !

`·.¸.·´ -- राज

girls school-44

hello dosto main yaani aapka dost raj sharma haajir hun next paart lekar

"Shukra hai Fracture nahi hai! maans fatne se soojan aa gayi hai.. theek hone mein 10-15 din lag jayenge.. main kuchh dawaiyan likh deti hoon.. time se lete rahna aur next monday ek baar aakar check kara jana... OK?" Hospital mein lady doctor Virender aur Raj ke paas khadi thi..," karte kya ho tum?"

"ji, padhte hain..10+2 mein" dono ek sath bol pade...

"tumhara dost sharmata bahut hai.." Doctor ne Raj ko prescription paper diya aur muskurate huye wahan se dusre patient ke paas chali gayi...

"kya baat thi.. tu sharma kyun raha tha oye?" Raj ne viru ke kaan ke paas munh lejakar kaha...

"meri pant nikalwa li thi yaar.. sharam nahi aayegi kya?" viru muskuraya aur achanak baat palat di..," chalein.. subah hone ko hai.."

"ek minute.. main bhai sahab ko dekhkar aata hoon... tu yahin leta rah tab tak.." Raj ne viru se kaha..

"kahan gaye wo..?"

"pata nahi.. abhi 20 minute pahle yahin thhe.. ek phone karne ki baat kahkar nikle thhe.. bahar hi honge.. main bulakar lata hoon.." kahkar Raj bahar nikal gaya...

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Kareeb 10-15 minute baad Raj wapas aaya," yaar wo to kahin dikhayi nahi diye... main har jagah dekh aaya.."

"chale toh nahi gaye hain.. Sneha room par akeli hai na.. wo usko bol bhi rahe the ki der lagi toh main aa jaunga..!" Viru ne Raj se kaha..

"par main parking mein gadi bhi dekh aaya hoon... wahin khadi hai.. gaye hote toh Gadi lekar nahi jate kya?" Raj ne sawaal kiya...

"fir toh yahin honge.. intjaar karte hain.. aur kya?" Viru ne Raj ki aur dekhte huye kaha...

Raj ne sahmati mein sir hilaya aur Virender ke paas hi baith gaya.....

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Sawera ho gaya tha.. Sneha ko sari raat neend nahi aayi.. yunhi karwate badalti huyi vicky ke baare mein sochti rahi...kitna pyara hai Mohan.. kitna apna sa hai.. 3 din mein hi wo uss'se kis kadar jud gayi thi.. uske door jaate hi usko lagta tha ki wo fir se nitant akeli ho gayi hai... Mohan ne ek sath hi usko kitni sari khushiyan de di... Mohan ke liye hi jiyungi ab... uske liye mar bhi jaaungi... Sneha ne man hi man socha aur angdayi lete huye ulti late gayi.. uska roop nikhar aaya tha.. ab har ang har pal jaise 'Mohan Mohan' hi pukarta rahta tha.. aaj gadi mein hi unhone kitni masti ki thi.. Sneha rah rah kar Vicky se lipat ja rahi thi.. 'pal' bhar ki bechaini bhi Sneha se sahan nahi ho rahi thi... Mohan ne wada kiya tha.. Rohtak jakar ek dost ke flat par rukenge aur wo uss'se wahan pahle din wala hi pyar fir se karega... ji bhar kar.. wo rohtak aa bhi gaye the.. par sneha se 2 pal ka bhi intzaar nahi ho raha tha.. wo rah rah kar Mohan se lipati ja rahi thi.....

aur shayad isiliye 'wo' hadsa hua.. agar wo Mohan ko iss tarah 'tang' na karti toh shayad Mohan haadse ko taal bhi leta.. Sochte huye Sneha ne ek lambi aah bhari.. aur karwat badalkar fir se seedhi ho gayi...

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kareeb 10 minute baad darwaje par dastak huyi.. Sneha ek dum se uthi aur darwaje ke paas jakar poochha," koun hai?"

"hum hain.. Darwaja kholo"

aawaj Viru ki thi.. Sneha ne jhat se darwaja khol diya..," aa gaye.. kya raha?"

"Bhaiya yahan nahi aaye hain kya..?" Raj ne ulta usi se sawaal kiya..

"kya matlab?" Sneha ka dil dhak se rah gaya..," kahan hain wo? yahan toh nahi aaye..

"Gadi toh unki wahin par khadi hai... fone karne ki kahkar nikle thhe.. hamne kareeb 1:30 gahnte unka intzaar kiya.. fir socha kya pata yahin aa gaye hon.. isiliye hum aa gaye..." Raj ne chintit swar mein uttar diya...

Sneha bina kuchh soche samjhe hi rone lagi...," unhone pahle hi kaha tha ki rohtak mein unko khatra hai.." subakti huyi Sneha ke gaalon se mote mote aansoo bahne lage..

Raj ne viru ko Bed par lita diya.. dono ki samajh mein nahi aa raha tha ki wo kya karein; kya kahein... kuchh der baad Raj uthkar Sneha ke paas aaya," aa jayenge.. aap ro kyun rahi hain.. hum chhod aayenge.. aapko jahan jana hai..."

Sneha ko kahan jana tha.. wo ab ja bhi kahan sakti thi... Mohan ke sang sapnon ka, armano ka jo gulistan Sneha ne apne dil mein sahej liya tha, uske aalawa ab iss jahan mein uska bacha hi kya tha.. papa? jisne mehaj apni Rajniti ke liye shatranj ki bisaat par mohre ki tarah se uska istemal kiya tha.. uske paas? nahi.. kabhi nahi! agar wo aisa sochti bhi toh kis munh se.. wah khud uske khilaf bagawat par utar aayi thi.. aur Shalini wala case surkhiyon mein aane par toh usko apne 'baap' se nafrat si ho gayi thi....

"chinta na karein aap... lijiye.. aap fone kar lijiye..." Raj ne apna fone uthakar Sneha ko de diya...

"oh haan.. par uska fone toh off hi rahta hai.. aksar.. chalo try karti hoon..!" ummeed ki kiran najar aane se uski subakiyan kuchh kam huyi aur usne Vicky ka no. dial kiya.. par jaisa Sneha ne socha tha waisa hi huaa.. fone off tha.. Sneha ko Mohan ki bhi chinta ho rahi thi aur apni bhi.. wah bed par baithkar apna sir pakadkar rone lagi....

"tum ro kyun rahi ho.. wo thodi bahut der mein aa hi jayenge.... waise tumhare paas ghar ka no. bhi toh hoga na.. wahan pata kar lijiye agar unhone ghar par fone kiya ho toh.. waise wo bhai sahab aapke lagte kya hain?" Viru bebas tha.. uske paas aakar uske aansoo nahi ponchh sakta tha...

kya batati Sneha.. kya naam deti 2 din pahle bane iss dil ke rishte ko.. usko darr tha ki agar wo sachchayi batati hai toh kahin dono darr kar kuchh ulta seedha na kar dein.. maslan police ko fone wagairah.. pratyuttar mein wo bilakh padi..," Mohan.. kahan ho tummmmmmm???"

Sneha ka wo karun pralaap sunkar dono ka dil dahal gaya.. Raj uske paas jakar baith gaya," aap aise na royein.. main chhod aaunga aapko jahan jana hai... dekhiye yahan par hum as a tudent rah rahe hain... kisi ne aapka rona sun liya toh log tarah tarah ki baatein karenge.. pls.. aap sabra se kaam lein.. wo aate hi honge..." Raj kah toh raha tha ki wo aa jayenge.. par chinta usko khud ko bhi hone lagi thi.. ab tak toh usko yahin par aa jana chahiye tha.. 3 ghante ke kareeb hone wale the usko gayab huye...

Sneha ne jaise taise khud ko sambhala..," kya main yahin rah sakti hoon.. jab tak wo nahi aata?" usne apne aansoo ponchh liye.. sach mein hi uska rona unn becharon ko museebat mein daal sakta tha.. aur khud usko bhi...

" kya?.. haan.. par.. mera matlab hai ki..." Raj ko koyi shabd hi na mila aage kuchh kahne ko.. kaise rah sakti hai wo yahan.. ladkon ke kamre mein.. Raj ne prashan soochak najron se Viru ki aur dekha...

"haan.. rah le behan.. jab tak tera dil kare tab tak rah yahin par.. main kah doonga.. meri behan hai.. logon ki aisi ki taisi..! log toh bolte hi rahte hain.." Viru ne faisla suna diya..

Sneha sunkar chowk padi.. usne apni julfein peechhe karke najrein uthakar Viru ki aur dekha.. kuchh pal toh wo vismay se apni aankhein faade huye usko dekhti rahi.. boojhe huye chehre par ek maddhaym si muskaan doud gayi.. aur aansoon fir se bahne lage.. usko yakin hi nahi ho raha tha ki usko 'bhai' mil gaya hai..

viru uski taraf dekhkar muskurane laga toh sneha se raha na gaya.. lagbhag doudti huyi si wo uske bed ki aur gayi aur ghutne jameen par rakhkar uski chhati par sir rakh liya.. aur subakti rahi...

"ab bhi kyun ro rahi hai tu.. main hoon na.. tera bhai.." Viru ne uska chehra apne haathon mein lekar upar uthaya...

"ro nahi rahi bhaiya.. samet nahi paa rahi hoon.. Raksha bandhan par mile iss anokhi khushi ko.. mera koyi bhai nahi tha.. aaj se pahle.." Sneha khil uthi..

"ab toh hai na.. Viru!" Viru ki aankhein chamak rahi thi...

"mujhe kyun bhool rahe ho.. main bhi toh hoon.." Raj bhi sneha ki barabar mein aa baitha...

"behti ganga mein haath dho raha hai.. kyun? chal aaja tu bhi" Viru ne kaha aur dono Raj ke chehre ko dekhkar khilkhila uthhe......

Vicky ke intzaar mein din kab 7 baj gaye teeno ko pata hi nahi chala.. Sneha rah rah kar bechain ho jati thi.. par ab usko apni nahi sirf Mohan ki chinta thi.. usko toh bhai mil gaye thhe.. par Mohan ka yun achanak gayab ho jana uski pareshani ka sabab bana hua tha.. Sneha rah rah kar khamosh ho jati aur shunya mein jhankne lagti...

"chinta kyun kar rahi ho sanu.. wo koyi bachche thhode hi hain.. aa jayenge.." Viru ne Sneha ka hath pakad kar uska dhyan wapas kheencha...

Sneha ne haan mein sir hilaya aur apni nam ho chali aankhon ko pounchh liya...

"Sneha toh hai hi abhi.. main school chala jaaun? kal bhi nahi ja paye thhe.." Raj ne khade hote huye poochha..

"theek hai.. tum naha lo.. waise bhi mujhe koyi khas dikkat toh hone nahi wali hai.. nashta karke nahi jaaoge kya?" viru bola....

"abhi toh main late ho raha hoon.. aakar hi dekhunga.. school mein kha loonga kuchh.. tumhare liye lakar de jata hoon..." Raj bahar nikalne laga...

"mere liye toh meri behan bana degi.. kyun Sneha?" Viru Sneha ko dekhkar muskuraya....

"par... mujhe khana banana nahi aata hai... kabhi banaya hi nahi.." Sneha ne najrein uthhakar Viru ko dekha...

"koyi baat nahi.. main sikha doonga na.. bus tum waisa karti jana jaise mein bataaunga.. Ja Raj Bread aur butter le aa..." Virender Sneha ko vyast rakhna chahta tha.. jab tak Vicky nahi aata... usko pata tha ki wo khali rahegi toh jyada pareshan rahegi...

Raj ne sneha ki aur dekha.. Sneha muskura padi..,"theek hai.. par kuchh ulta seedha ban gaya toh mujhe mat bolna baad mein.. pahle bol rahi hoon" aur hansne lagi...

Raj uski hansi ka jawaab hulki muskurahat se dekar bahar nikal gaya....

"kya baat hai bhaiya? Raj kuchh pareshan sa lag raha hai..?" Sneha ne Raj ke jate hi viru se poochha..

"hummm.. wahi toh main bhi dekh raha hoon.. kal se isko pata nahi kya ho gaya hai..?" Viru ne jawaab diya..

"aapne iss-se poochha ye rat ko kahan gaya tha...?"

"na.. par shayad mujhe pata hai ye kahan gaya hoga..?"

"kahan?" Sneha ko bhi utsukta huyi jaan'ne ki...

"Rahne do.. tumhare matlab ki baat nahi hai..." kahkar viru ne karwat badal li..

"batao na bhaiya.. aise kyun kar rahe ho.. main fir se ro padoongi..." Sneha ne uski baju pakad kar wapas apni taraf kheench liya....

" theek hai.. usko aane do.. pahle pakka toh kar loon.. main jo soch raha hoon.. wo sahi bhi hai ya nahi.." Virender ne baat poori ki bhi nahi thi ki raj aa gaya..," ye lo.. aur ye khidki band rakhna.. "

"khidki ke bachche.. tune ye toh bataya hi nahi ki tu gaya kahan thha.. Rat ko..?" Viru ne aate hi sawaal daga...

"bata doonga bhai.. abhi toh late ho raha hoon...?" kahte huye Raj bathroom mein ghusne laga...

"uski maa aayi thhi abhi yahan.. tumhe poochh rahi thhi..." Viru ne paansa fainka..

"kkyaaa? par kyun?.. mera matlab koun aayi thi.. kiski maa?" Raj ne hadbada kar kaha...

"jiske ghar tu raat ko gaya tha.. uski maa..? viru ke aisa kahte hi raj ka chehra safed pad gaya.. uski haalat par dono pate pakadkar hansne lage...

"kya hai bhai.. khamkhwah dara diya tha... tune sneha ko kuchh bata diya kya?" Raj ne unko hansta dekhkar raahat ki saans li......

"nahi.. abhi tak toh nahi.. par abhi bataaunga.. tadka lagakar.. tu chala ja pahle.." Viru ne hanste huye kaha...

"kya hai ye...? bhai tu bhi na.. main nahi jata school..." Raj touliye ko patak kar wahin baith gaya..

"theek hai.. mat ja.. jo mujhe nahi pata wo tu bata dena..." khilkhilate huye Viru ne Sneha ko hath diya.. Sneha ne bhi taal se taal milayi...

"pls bhai.. tere hath jodta hoon.. meri ijjat ka falooda kyun nikal raha hai.." Raj dono hath jodkar gidgidane ki mudra mein aa gaya...

"kyun jab munh kala karane gaya tha tab nahi nikla ijjat ka faalooda..." Viru aur Sneha jor jor se hans rahe thhe.. Raj ka chehra dekhne layak ho gaya tha...

"theek hai toh fir.. teri bhi baat main bataungaa wapas aakar.. jitna bhola ban raha hai.. utna nahi hai ye.. school mein ek bhi ladki iss'se baat nahi karti.. sab ko dara ke rakhta hai.." aur Raj ki baat dono ki jordar hansi mein dab kar rah gayi.. Raj ko kuchh bolte na bana toh wapas bathroom mein ghus gaya...

Naha dhokar munh fulaye huye hi Raj School chala gaya...

"chalo.. batao.. ab kaise banega.. nashta..?" Sneha ne butter aur bread uthaye aur viru ke paas aa gayi

"Raj! tumhe Sir bula rahe hain..!"

Raj aawaj se hi pahchan gaya.. yeh priya thi.. uski aawaj mein ek ajeeb si mithas thi... jabki Riya ki aawaj mein alhadpan jhalakta tha....

Raj class se bahar nikla.. Priya pahle se hi bahar thi.. Priya ko undekha karte huye wah kuchh kadam aage badha par fir Priya ki aur mud gaya," kounse Sir?" Raj ki aawaj mein rookhapan tha...

"wwo.. sorry Raj.. Really..!" Priya uss'se najrein nahi mila pa rahi thi..

"kounse sir bula rahe hain..?" Raj ne uski baat ko andekha karne ka dikhawa kiya...

"kya tum mujhe maaf nahi karoge Raj? tumhe pata hai.. mujhe ek pal ke liye bhi neend nahi aayi... plz maaf kar do... kar do na.." Priya idhar udhar dekh rahi thhi.. kahin koyi dekh toh nahi raha...

"maaf to tum mujhe kar do.. main bhi dusron ke jaisa hoon na.. badtameej..!" Raj ka gussa toh uski pahli request par hi pighalne laga tha.. ab toh wah sirf dikhawa kar raha tha.. Priya ko apne liye tadapta dekh Raj ko bahut sukoon mil raha tha...

"mmera wo matlab nahi tha Raj.. main darr gayi thi.. tumhari kasam... aaj ke..."

Priya ne apni baat poori ki bhi nahi thi ki wahan riya aa dhamki," tumhe pata hai Raj.. ye sari Rat subakti rahi.. main bhi nahi so saki.. iske chakkar mein.. ab isko maafi de bhi do..." Riya ne apna vote Priya ke paksh mein dala...

"agar tum nahi bata rahi ki kounse Sir bula rahe hain.. toh main wapas ja raha hoon..!" Raj ne Riya ki baat ka koyi jawab nahi diya...

"maine jhooth bola tha.. tumse baat karne ke liye.. main tumhari kasam...." aur priya ki baat adhoori hi rah gayi.. Raj wapas mud kar class mein chala gaya...

" tu chinta mat kar Priya... ye kahin nahi jane wala.. main sab samajh rahi hoon.. ye tumse badla le raha hai bus.. chal aa class mein chalte hain.. aa naaaa!" riya ne Priya ka hath pakad kar class ki aur kheench liya...

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" Ajeeb aadmi hai yaar tu bhi.. uss ladki ko aise hi chhod aaya.. anjaan ladkon ke paas?" Shamsher ko vicky ki baat par bahut gussa aaya...

"chinta mat kar bhai.. nihayat hi shareef ladke hain.. usko pyar se rakhenge.. 2-4 din ki toh baat hai.. tab tak main Murari ko nipta loonga..." Vicky fone par Shamsher se baat kar raha tha," waise bhi toh usko loharu chhodkar aisa hi karne ka plan tha.. Loharu chhodne par baad mein tension aa sakti thi.. uski samajh mein kuchh nahi aayega.. maine usko samjha rakha hai ki meri jaan ko khatra ho sakta hai.. agar kuchh ho jaye toh tum kisi bhi soorat mein apne bayan mat badalna..."

"yaar tujhe bayano ki padi hai... wo ladke school mein padhte hain yaar.. darr jayenge.." Shamsher ne vicky se gusse mein kaha...

"tu chinta kyun kar raha hai bhai.. Sneha bahut samajhdar hai.. wo sambhal sakti hai agar kuchh ulta seedha huaa toh..! aur maine apna ek aadmi bhi aaspaas jama rakha hai.. agar kuchh hone bhi laga toh wo Sneha ko mera naam lekar le udega..." Vicky ne Shamsher ko tasalli dene ki koshish ki..

"par maan lo tujhe multiplex mil bhi gaya.. baad mein kya hoga... uss bechari ka!" Shamsher Sneha ko lekar chintit tha...

"hona kya hai.. jyada se jyada uska baap uska kharcha nahi dega na.. main de doonga.. aur bol?" Vicky ne jawaab diya...

"yaar.. teri yahi baat galat hai.. tu sab cheejon ko paise se tol kar dekhta hai.. aakhir wo tujhse pyar karti hai.." Shamsher ke mann mein abhi bhi kayi sawaal thhe..

"to main uss'se pyar karta rahunga na.. time nikal kar.. bahut mast hai sali.. aisi bala maine aaj tak nahi dekhi..." Vicky ne batteesi nikalte huye kaha...

"tera kuchh nahi ho sakta bhai.. tu toh politicians se bhi ek kadam aage badh gaya hai.. khair jaisa tu theek samjhe...!" Shamsher ne topic par baat karna vyarth samjha..,"waise kahan rahte hain.. wo ladke..?"

"S.H.O. Vijender ke ghar ke theek saamne... tu ye bata.. Tough se baat ki ya nahi..."

"haan.. kar li.. wo toh kah raha tha.. itni si baat mujhe nahi bol sakta tha kya? khair.. aaj Raat 8:00 baje seedha thhane chala jana.. tough aur murari wahin milenge.. kar lena jo baat karni hai.. khulkar.. maine sab samjha diya hai..." Shamsher ne bujhe mann se kaha...

"thank u boss! tussi great ho.." kahkar vicky ne khushi khushi fone kaat diya tha.. wo man hi man uchhal raha tha.. uske ek hi teer ne jaane kitne shikar kar liye thhe... par haan.. ek maasoom bhi uski chapet mein aa gayi thi... Sneha!

" chalo! janab bula rahe hain?" C.I.A. thana Bhiwani ke ek sipahi ne tala kholte huye salaakhon ke andar murjhaye se baithe Murari se kaha.. Sham ke kareeb 5 baje the..

"Dekha.. maine kaha tha na.. tumhara janab jyada der tak mujhe aise nahi baitha sakta.. koyi chhota mota aadmi nahi hoon main.. baad mein uss'se nipatunga bhi... ye 'kanoon' chhote logon ke liye bante hain... hamare liye nahi.. aa gaya hoga fone.. upar se uske kisi 'baap' ka...." Murari ne Rumal se apni gardan par chhalak aaye pasine aur mail ki papdi saaf karte huye kaha aur choudi chhati karke bahar nikal liya...

"ab hamein kya pata sahab.. hum toh huqum ke gulam hain.. jaisa aadesh janaab karenge, maan'na padega.. waise meri poori humdardi aapke sath hai.. agli baar bhagwan ki daya se jab aap mantri honge toh main aapse jaroor miloonga.. yaad rakhiyega mera chehra..." Sipahi ne masoomiyat se kahte huye apne no. badhwa liye.. Murari ki najar mein..

Murari ne khush hokar uski peeth thonki," yahan kuchh len den nahi chalta kya re?"

"sab chalta hai sahab.. har jagah chalta hai ye toh... par na kisi ko kuchh upar milta.. na neeche.. janab DGP haryana ke bhatije hain na... hum toh bus intzaar hi karte rahte hain.. ki kab diwali aayegi aur kab bonus milega.. sala tankhwah ke alawa ek cup chay bhi nahi naseeb hoti fokat mein toh... iss thane mein... meri badli jaroor karwa dena sahab...." Sipahi ne fir se line mari...

"tum chinta mat karo beta.. mujhe kursi milte hi tumhari promotion pakki.. par ye batao.. baat kiss'se karni padegi.. len den ki.." Murari uske kaan mein fusfusaya...

Sipahi ne koyi jawab nahi diya.. Tough ke office ke saamne pahunch gaye thhe dono..," chalo sahab.. baki baatein baad mein..."

Murari andar ghus gaya.. Andar chal Rahe A.C. ki thand mein murari ko apna office yaad aa gaya.....

Tough apni gaddedar kursi par aaram se table ke neeche pair failaye huye adhleta sa baitha tha.. uske saamne 30 ki umar ke aaspas ke 2 pahalwan se dikhne wale achchhe gharon ke log khade thhe..

"mujhe bulaya inspector?" Murari ne gardan tedhi karte huye poochha.. rassi jal chuki thi.. par bal abhi tak nahi gaye the..

tough ne jaise Murari ko suna hi nahi.. wah table par aage ki aur jhuka aur saamne khade logon se bola," baitho!"

Jaise hi unn dono ne baithne ke liye table ke saamne khadi kursi kheenchi; tough ubal pada...," saalo.. baithne ke liye kursi chahiye tumhe.. haan? udhar baitho.. neeche!"

"janab hamari bhi koyi ijjat hai.. bahar gaanv wale aaye huye hain.. kyun naak katwa rahe ho..?" unmein se ek ne hath jodkar kaha...

"hummm.. ijjat.. tumhari bhi ijjat hai.. saalo.. jab gaanv ki ladkiyon ko kheton mein pakadte ho toh tab kya tumhari ijjat gaand marwane chali jati hai... tum ijjat ki baat karte ho.. behancho..." Tough khada ho gaya..," kapde nikalo... dekhta hoon tumhari ijjat kitni gahri hai..!"

"nahi.. janab.. ye toh pagal hai.. lo baith gaye.. aap toh mayi baap hain.. aapke saamne neeche baithne mein bhala kaisi sharam..?" kahte huye dusra tapak se deewar ke sath sat kar jameen par baith gaya.. aur pahle wale ko bhi kheench kar bitha liya...

"Rajesh!" Tough ne sipahi ko aawaj lagayi...

"ji.. janab.." Rajesh turant darwaje par prakat ho gaya...

"ladki ke baap ko bulakar laao...!"

"ji janab.." Rajesh turant gayab ho gaya aur jab wapas aaya toh uske sath ek adhed umra ka aadmi tha...

"namaste janaab!" aadmi ne kaha aur andar aa gaya.. uski aankhein bhari huyi thi..

"bolo taau! kya karna hai inka..?" Tough ne bade hi naram lahje mein baat ki..

uss aadmi ne nafrat aur glani se jameen par baithe dono ki aur dekha aur apni najrein hata li..," sab kuchh aap par chhod diya hai janaab.. ab hum toh kisi ko munh dikhane layak rahe nahi.. hamari beti.." kah kah kar buddha foot foot kar rone laga.. uska gala bhar aaya...

"theek hai.. aap jakar munshi ke paas bitiya ke bayan darj karwa do...! main kal inko court mein produce kar doonga..."

"ek minute janaab.. kya hum akele mein inse ek baar baat kar lein... idhar aana taau!" dusre wale aadmi ne kaha...

"aap baat karna chahte ho taau?" Tough ne poochha..

buddhe ne koyi jawab na diya.. unke bulane par wo inkar nahi kar saka aur barbas hi unki aur chala gaya....

kuchh kshan dono aadmi uske kaan mein khusar fusar karte rahe.. buddhe ke andar ka swabhiman jaag utha aur kaskar ek tamacha unmein se ek ko jad diya.. dono tough ki wajah se khoon ka ghoont peekar rah gaye....

"kya hua taau? kya kah rahe hain ye..." Tough ne dono ko ghoorte huye kaha..

Buddha fafak pada..," kah rahe hai.. case wapas le lo warna tumhari chhoti beti ko bhi......" iss'se aage wo na bol paya....

Tough kitni hi der se apne khoon mein aa rahe ubaal ko roke baitha tha..," kapde faado inn behan ke lodon ke... aur naga karke ghumaao bahar.. tab aayegi inko akkal..!"

Tough ke munh se nikalne bhar ki der thi.. Rajesh apne sath do aur apne hi jaise hatte katte police walon ko lekar andar aa gaya...

"hamein maaf kar do sahab.. hamne toh khali chummi khayi thi.. aur choochiyan dabayi thi bus..... pls.. janaab.. iss baar chhod do.. nahi.. pls fado mat.. hum nikal rahe hain na.." Tough ka roudra roop dekhkar dono andar tak dahal gaye... aur sath mein Murari bhi.. uske chehre par pasina chhalak aaya tha.. aur roungte khade ho gaye thhe...

Sipahiyon ke kaan toh bus apne janaab ki aawaj hi jaise sunte thhe... 2 minute ke baad hi wo dono sirf kachchhe baniyan mein khade thhe...

"itni be-ijjati sahan nahi hoti janab.. hamari bhi pahunch upar tak hai.. centre mein minister hai hamara mousa...!" Pahle wale aadmi jhak maar raha tha..

"ek mantri toh ye khada.. tumhare saamne.. isko bhi nanga karke dikhaaoon kya?" Tough ne kaha toh Murari ko jhurjhuri si aa gayi.. uski taangein kaanpne lagi thhi khade khade...

Dono ke munh achanak sil gaye.. ab tak murari par toh unka dhyan gaya hi nahi tha.. Murari ko iss tarah bheegi billi bane khada dekh unko apni aukat ka ahsaas ho gaya....

"dono ko hawalat mein daal do.. sham ko inki gaand mein mirchi lagani hai.... chalo taau ji.. aap bayan darj karwa do.." tough ne kaha aur fir Murari ki aur ghoorte huye bola..," baitho.. main aata hoon...!


rajaarkey
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Re: गर्ल'स स्कूल

Unread post by rajaarkey » 12 Dec 2014 03:45

गर्ल्स स्कूल पार्ट --45

हेलो दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा हाजिर हूँ नेक्स्ट पार्ट लेकर

टफ जैसे ही वापस ऑफीस में आया, मुरारी की हालत देखकर वो अपनी हँसी नही रोक पाया.. वो मुरारी को बैठने को बोलकर गया था.. और मुरारी ठीक उसी जगह जाकर नीचे बैठा हुआ था जिस जगह पर कुच्छ मिनिट पहले वो दो आदमी बैठे थे.. बिल्कुल उसी अंदाज में.. शरीफ आदमियों की तरह... उसके दोनो हाथ घुटनो पर रखे हुए थे..

" यहाँ आ जाओ.. उपर.. कुर्सी पर.." टफ ने अपनी कुर्सी पर जमाते हुए कहा....

मुरारी की जान में जान आई.. वो तो ये सोच रहा था कि उसके साथ भी अब कुच्छ ऐसा ही होने वाला है.. पर अभी भी उसके दिल को पूरी तसल्ली नही हुई थी..," आप कहो तो मैं तो नीचे भी बैठ जाउन्गा.. इनस्पेक्टर........ साहब! मैं तो ज़मीन से जुड़ा हुआ आदमी हूँ.." मुरारी ने थूक गटका....

"हां.. तुम्हारी ज़मीन कल देख ली थी.. रही सही.. आज रात को देख लेंगे.." टफ ने मुस्कुराते हुए कहा..

"कककक.. क्या मतलब...?" मुरारी सिहर उठा...

"कुच्छ नही.. किसी आदमी का फोन आया था.. कह रहा था..."

मुरारी की आँखें चमक उठी..," देल्ही से आया था क्या फोन????"

"देल्ही वालों को भूल जाओ मुरारी.. दरअसल उनके कहने पर ही आपकी हवा टाइट की गयी है.. पार्टी आपकी वजह से अपनी छवि बदनाम नही करना चाहती.. खैर जिसका भी फोन आया था.. कह रहा था की उसको पता है की इस वक़्त तुम्हारी बेटी कहाँ है..?" टफ ने वहाँ रखे एक गिलास पानी से अपना गला तर किया.. .

"प्लीज़ इनस्पेक्टर साहब.. मुझे उस आदमी से मिलवा देजिये.. मैं भी परेशान हूँ.. अपनी बेटी के लिए... चाहे आप जो भी खर्चा पानी कहें.. मैं देने को तैयार हूँ...

टफ ने उसकी बात को नज़रअंदाज करके अपनी बात जारी रखी...," उसका नाम विकी है.. मैने उसको बुलवाया है.. वो बस आने ही वाला होगा..."

"विकी कौन.. रोहतक वाला.. जो विरोधी पार्टी में वहाँ से टिकेट का दावेदार है..?" मुरारी के दिमाग़ में खलबली मच गयी...

"वो मुझे नही पता.. पर हां.. है वो रोहतक से ही.." टफ ने अंजान बनते हुए कहा..

"वही होगा ज़रूर.. उसकी ही साजिस है ये.. किसी ने मेरी बेटी को उसके साथ देखा भी था.. वारदात वाले दिन.. इनस्पेक्टर साहब.. उसने मेरी बेटी को बहला रखा है.. आप यकीन कीजिए..." मुरारी कुर्सी पर बैठा बैठा हाँफने लगा.. एक ही साँस में वो ये सब बोल गया था....

"मैं तो यकीन कर भी लूँ.. पर कोर्ट तो सबूत माँगेगा.. और तुम्हारी बेटी के बयान तुम्हारे खिलाफ है.. फिर भी चलो.. आने दो.. देखते हैं बात करके..." टफ ने कहा ही था की दरवाजे पर राजेश प्रकट हुआ," जनाब.. कोई विकी आया है.. कह रहा है.. आपसे मिलने का टाइम माँगा है...

"भेज दो उसको अंदर...!" टफ ने कहा... मुरारी का चेहरा तमतमा उठा...

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"नमस्कार जनाब!" विकी ने ऑफीस में दाखिल होते हुए कहा...

"नमस्कार! क्या तुम ही...."

"जी हां जनाब.. मैं ही विकी हूँ.. ये मुझे अच्छि तरह से जानते हैं..! क्यूँ नेता जी..?" विकी ने मुरारी की और आँख दबा दी..

"इनस्पेक्टर साहब..! मुझे 100 प्रतिशत विस्वास है कि यही आदमी मेरी बर्बादी के पिछे ही है.. आप इसको अभी गिरफ्तार कर लीजिए.. मैं बेकसूर हूँ.." रो ही तो पड़ा था मुरारी....

"तुम फ़ैसला सुना रहे हो की राय दे रहे हो...?" टफ ने दीवार के साथ कुर्सी सरकाते हुए कहा.....

"नही इनस्पेक्टर साहब.. मैं फ़ैसला कैसे सुना सकता हूँ.. फ़ैसला करने वाले तो आप हैं.. फिर भी मैं यकीन के साथ कह सकता हूँ की इसके पीछे इसीका हाथ है.. इसने मेरी बेटी बहका ली.. मुझे बदनाम कर दिया...." मुरारी को टफ ने बीच में ही टोक दिया...

"और शालिनी.. उसके कपड़े भी इसी ने फ़ाडे थे क्या?"

"ववो.. मैं बहक गया था.. गुस्से मैं था मैं.. मुझे माफ़ कर दो इनस्पेक्टर साहेब.. मैं शालिनी बिटिया से भी माफी माँग लूँगा.." मुरारी ने कहा..

विकी मुरारी का ये दब्बु रूप देखकर मुश्किल से अपनी हँसी रोक पा रहा था.. इनस्पेक्टर साहिब को इज़्ज़त जो बख्सनि थी..

"हाँ तो विकी जी.. क्या कहना है आपका..?" टफ विकी से मुखातिब हुआ...

"यही की मुझे पता है की इसकी लड़की इस वक़्त कहाँ है.. वो पोलीस के पास और कोर्ट में अपने बयान देना चाहती है.. इसी सिलसिले में किसी ने मुझसे कॉंटॅक्ट किया था..." विकी बोल ही रहा था की मुरारी बीच में टपक पड़ा..

"नही इनस्पेक्टर साहब.. इसकी सारी बातें झूठी हैं.. इसने खुद ये ड्रामा रचा है और अब यहाँ मुझे ब्लॅकमेल करने आया है..."

"तुम चुप हो जाओगे या मुझे तुम्हे हवालात में भेजना पड़ेगा...?" टफ ने रूखी आवाज़ में मुरारी से कहा," मैं कोई पागल तो नही हूँ.. मैं पूच्छ रहा हूँ ना सब कुच्छ.."

"जी!" मुरारी भीगी बिल्ली बन गया...

"हां तो विकी जी... ये ब्लॅकमेलिंग का क्या फंडा है.." टफ ने विकी से पूचछा...

"कुच्छ नही है जनाब! मैं इसको ब्लॅकमेल क्यूँ करूँगा.. इस जैसे लोगों की तो मैं शकल भी देखना नही चाहता.. मैं तो सिर्फ़ आपको जानकारी देने आया था.. वो भी इसीलिए की खुद इसकी बेटी ऐसा चाहती है..." विकी ने सहज भाव से कहा...

"हूंम्म.. तो कहाँ है लड़की.. चलिए उसके बयान लेकर कोर्ट में पेश कर देते हैं.. ये अपने आप भुगतेगा..!" टफ ने विकी से कहा.. कार्य वाही एक तरफ़ा चल रही थी.. हर तरफ से मुरारी को दबाया और डराया जा रहा था..

"चलिए.. मैं तो इसी काम से आया हूँ..!" विकी खड़ा हो गया...

"एक मिनिट.. दारोगा जी.. क्या मैं विकी से अकेले में बात कर सकता हूँ.." मुरारी को कुच्छ समझ नही आ रहा था.... उसका दिमाग़ खिसक चुका था...

"कर लीजिए.. मुझे क्या है.. हम तो दिलों को जोड़ने का ही काम करते हैं.. बशर्ते.. विकी जी को कोई ऐतराज ना हो तो..." कहकर टफ ने विकी की और देखा...

"नही.. मुझे इस घटिया इंसान से कोई बात नही करनी.. मैं तो रोज दुआ करता था की इसका असली चेहरा दुनिया के सामने आए... इसको 10 साल से कम तो क्या सज़ा होगी अब.. है ना जनाब?" विकी ने तिर्छि नज़रों से मुरारी का चेहरा देखते हुए कहा...

"हां.. अगर इसकी बेटी ने और शालिनी ने कोर्ट में इसके खिलाफ बयान दे दिए तो ये नही बच सकता.. हाँ अगर...!" टफ ने बात अधूरी छ्चोड़ दी...

"अगर क्या.. इनस्पेक्टर साहब.. मैं कुच्छ भी करने को तैयार हूँ.. मुझे बचा लीजिए प्लीज़.. मैं आपके पाँव पड़ता हूँ.. मैं कोई भी कीमत देने को तैयार हूँ..!" मुरारी कुर्सी से उठ गया...

"मैं ना तो आपको सज़ा से बचा सकता हूँ और ना ही सज़ा दिलवा सकता हूँ.. वैसे मेरी आपसे पूरी हुम्दर्दि है.. आख़िर आपके नीचे रहकर ही तो हमें काम करना है सारी उमर.. पर सब कुच्छ उन्न लड़कियों के ही हाथों में है..." टफ ने नकली सहानुभूति दर्शाते हुए कहा...

"पर एक तो आपके पास ही है ना.. कम से कम उसको तो समझा दीजिए.." मुरारी गिड़गिदा उठा था..

"एक से क्या होगा.. सज़ा तो दोनो की एक साथ ही मिलनी है.. अगर तुम्हारी लड़की वाला मामला सुलझता है तो मैं कोशिश कर सकता हूँ.. पर वो मामला तभी सुधार सकता है जब आपकी लड़की बयान ना दे.. या मीडीया को दिए बयानो से मुकर जाए.." टफ ने उसको इस उलझन से बाहर निकालने का रास्ता सुझाया.. और बाहर निकालने की चाबी सिर्फ़ विकी के पास ही थी..

"मैं अपनी बेटी को कैसे भी करके चुप करा दूँगा.. आप मुझे उस'से मिलवा दीजिए.." मुरारी हाथ जोड़कर गिड़गिडया..

"मिलवा दीजिए विकी जी.. अगर आप ठीक समझे.. बेचारे का भला हो जाएगा.. वैसे मुझे कोई दिक्कत नही है...." टफ ने चुटकी ली...

इस'से पहले विकी कुच्छ बोलता.. मुरारी उसके पैरों में गिर पड़ा..," विकी भाई.. एक बार बात कर लो प्लीज़.. मैं तुम्हे कभी हुल्के मैं नज़र नही आउन्गा.. और बोलो..."

विकी अपना मन सा बनाने की आक्टिंग करता हुआ टफ से बोला," ठीक है जनाब.. अगर आपको भी यही सही लगता है तो मैं बात कर लेता हूँ.. अकेले में...!"

"ठीक है.. तुम यहीं बैठो.. मुझे किसी काम से बाहर जाना है.. मैं आधे घंटे में आता हूँ.. " कहकर टफ बाहर निकल गया..

मुरारी भिखारी की तरह विकी के चेहरे को ताकने लगा...

"हां.. बोल मुरारी!" विकी ने मुरारी को घूरा...

"तू तो मुझसे भी बड़ा कमीना निकला रे.. सीधे मतलब की बात पर आजा.. बता.. मेरी बेटी मुझे सौंपने का क्या लेगा?" मुरारी की आवाज़ में गुस्सा और बेबसी सॉफ झलक रही थी...

"वो मल्टिपलेक्स!" विकी ने दो टुक जवाब दिया..

" जा ले ले... बदले में स्नेहा मुझे मिल जाएगी ना...." मुरारी ने कहा..

"मैने क्या उसका आचार डालना है? जहाँ चाहे चली जाए.. मुझे क्या? वैसे भी मैं तो लड़की को एक बार ही यूज़ करता हूँ...." विकी ने सिगरेट्टी निकाल कर सुलगा ली...

"ना.. ना.. मुझे चाहिए.. वो हरम्जदि... मंजूर हो तो बोलो..." मुरारी का चेहरा नफ़रत और कड़वाहट से भर उठा...

" तुझे मैं बता दूँ कि वो तेरे पास रहना नही चाहती.. नफ़रत करती है तुझसे.. तेरी शकल भी देखना नही चाहती... .. बयान में नही होने दूँगा.. मेरी गॅरेंटी..फिर तू क्या करेगा उसका ?" विकी ने उसकी आँखों में झाँकते हुए कहा..

मुरारी की आँखें लाल हो गयी.. नथुने फूल गये और किसी भेड़िए की तरह गुर्राने लगा," उसका वही करूँगा जो उसकी मा का किया था.. साली कुतिया... बेहन चोद.. उसको नंगी करके अपने सामने चुदवाउन्गा... फिर जंगली कुत्तों के आगे डाल दूँगा.. उसने सारी दुनिया को बता ही दिया की वो मेरी औलाद नही है... एक बार मुझे सौंप दे बस.. बोल मंजूर है की नही...?"

विकी के जहाँ से एक लंबी साँस आह के रूप में निकली.. कैसा है मुरारी? आदमी है या भेड़िया.. कुच्छ मिनिट के मौन के बाद बोला..," मजूर है.. लड़की तुम्हे मिल जाएगी.. मुझे मल्टिपलेक्स के कागज मिलने के बाद..."

"तो फिर मिलाओ हाथ.. तुम अपना फोन दो.. मैं अभी उसके मलिक को फोन करता हूँ.. तुम चाहो तो कल ही उसको पैसे देकर मल्टिपलेक्स अपने नाम करवा सकते हो..." मुरारी ने विकी का हाथ अपने हाथ मैं पकड़ लिया...

विकी ने अपना हाथ च्छुडवाया और ज़ोर ज़ोर से हँसने लगा...," तू क्या समझता है.. मैने इतनी मेहनत सिर्फ़ तुझसे नो ऑब्जेक्षन सर्टिफिकेट लेने के लिए की है.. नही! वो तो मैं कभी भी उसकी कनपटी पर रिवॉल्वेर रखकर खरीद सकता था... अब वो मल्टिपलेक्स तू खरीद कर मुझे देगा.. यानी पैसे तेरे होंगे.. और माल मुझे मिलेगा..!"

"मतलब तू समझता है की मैं अपने पास से तुझे 8 करोड़ रुपैया दूँगा... ?" मुरारी ने हैरत से उसकी और देखा...

"8 नही 10 करोड़.. और मुझे पता है की तू देगा.. क्यूंकी 10 करोड़ गँवाने 10 साल जैल में काटने से कहीं ज़्यादा आसान है तेरे लिए.. 10 सालों में तो तू पता नही कितने 10 करोड़ कमा लेगा...!" विकी ने कातिल मुस्कान मुरारी की और फैंकी...

मुरारी ने अपना सिर टेबल पर रख लिया और कुच्छ देर उधेड़बुन में पड़ा रहा... फिर अचानक उठकर बोला," मैं सिर्फ़ 8 करोड़ दूँगा.. और मुझे वो लौंडिया हाथ के हाथ चाहिए.. बोल कब दे सकता है...?"

"जब तुम चाहो.. पर अभी तो तुम्हारी 14 दिन की पोलीस कस्टडी है ना?" विकी ने मुरारी से सवाल किया...

"तुम्हे जब चाहे पैसे मिल जाएँगे.. तुम बताओ.. कब ला सकते हो स्नेहा को..?" मुरारी ने सवाल पर सवाल मारा...

" मैं बांके को बता दूँगा...! सोचकर.." विकी ने अजीब से अंदाज में बांके का नाम लिया...

"बांके... तुम बांके को कैसे जानते हो?" मुरारी चौंक कर उच्छल पड़ा....

"क्यूँ हैरानी हुई ना... मुझे किडनॅप करने कुच्छ चूजो को साथ लेकर आया था.. अभी मेरे गुसलखाने में क़ैद हैं तीनो.. अगर तुम आज नही मानते तो तुम पर एक केस और लगना था.. " विकी ज़ोर ज़ोर से हँसने लगा....

तभी टफ ने ऑफीस में प्रवेश किया..," लगता है कुच्छ सौदेबाज़ी हो गयी तुम दोनो की...?"

"नही.. इनस्पेक्टर साहब.. हम दोनो में कुच्छ ग़लतफ़हमियाँ थी.. जो आज साथ बैठने से दूर हो गयी.. वैसे विकी जी कह रहे हैं की ये स्नेहा को मनाने की कोशिश करेंगे... अपने बयान वापस लेने के लिए.. क्यूँ विकी जी?" मुरारी ने बात सपस्ट की...

"हां मुरारी जी.. " और कहते हुए विकी ने टफ की और आँख मारी...

"राजेश!" टफ ने आवाज़ लगाई....

"जी जनाब.."

"नेता जी को पूरी इज़्ज़त से हवालात में छ्चोड़ आओ.. सुबह मिलते हैं इनसे.. इनका ख़याल रखना..." टफ ने व्यंग्य किया...

"इनस्पेक्टर साहब.. अगर बुरा ना मानो तो.. मैं यहीं सो जाऊं... वहाँ मच्छर और गर्मी जान निकल देते हैं..."

"आप चिंता ना करें नेता जी.. सरकार कुच्छ ही दिनों में हवालात में भी एसी लगवाने पर विचार कर रही है... तब तक प्लीज़.. किसी तरह से काट लें...!" टफ ने मुस्कुराते हुए कहा...

"कब.. ये कैसे हो सकता है..? मुरारी को विस्वास नही हुआ..

"हो क्यूँ नही सकता नेता जी.. आजकल हवालात में आते ही नेता लोग हैं.. फिर कुच्छ ना कुच्छ तो सरकार को सोचना ही पड़ेगा.." टफ ने कहा और राजेश को उसे वहाँ से ले जाने को कहा....

"तू बुरा फँसेगा किसी दिन..!" मुरारी के जाते ही टफ ने विकी को आगे बढ़कर गले लगा लिया...," हो गया तुम्हारा काम?"

विकी कुच्छ ना बोला.. आँख बंद होते ही उसको स्नेहा का मासूम सा चेहरा दिखाई दिया.. वो बिल्कुल नंगी पड़ी थी.. जंगली कुत्तों के बीच.....

टफ और विकी दोनो थाने से निकल कर टफ के घर की और चल पड़े.. लगभग सारे रास्ते विकी चुप ही रहा...

"क्या बात है.. तुम्हे मल्टिपलेक्स मिल तो गया ना? या कुच्छ अड़चन है.. ?" टफ ने उसको गुम्सुम बैठे देख कहा....

"हूंम्म... हां.. मिल जाएगा!.......... कोई अड़चन नही है..अब!" विकी ने लंबी गहरी साँस छ्चोड़ी...

"फिर भी तू परेशान लग रहा है.. क्या बात है यार...? बता तो!" टफ ने उसका चेहरा देखते हुए पूचछा...

"नही... कुच्छ नही है... कुच्छ भी तो नही.. बस मुरारी का चेहरा देखकर ही उल्टियाँ सी आने लगती हैं.. बहुत कमीना है साला.. सौ कुत्ते मारकर ये 'एक' पैदा हुआ होगा..." विकी के जबड़े भिच गये.. पर वो आधी बात मन में ही पी गया.. कैसे बताता की वो भी इस बार 'उसके' कामीनेपन में हिस्सेदार होने वाला है... स्नेहा को उसे सौंपकर...'" बस! बहुत हो गया.. ये आख़िरी बार है..!" अचानक विकी के मुँह से निकला...

"क्या बहुत हो गया? क्या आख़िरी बार है? कहाँ अटका हुआ है भाई...?" टफ ने गाड़ी रोक दी...

"बस यार.. ये पॉलिटिक्स.. बहुत ही कुत्ति चीज़ है.. सोच रहा हूँ.. छ्चोड़ दूं.. जाने क्या क्या करवाती है साली... बस ये मल्टिपलेक्स मिल जाए.. उसके बाद में अपने बारे में सोचूँगा..." विकी की तबीयत सी खराब हो गयी थी.. उसको अपना शरीर टूट'ता हुआ लग रहा था...

"एक बात तो बता यार.. स्नेहा बयान नही देती ... ठीक है... पर क्या तू उसको सच्चाई बताएगा? क्यूंकी आज नही तो कल उसको वापस जाने पर पता लग ही जाएगा.. सच्चाई का... फिर क्या वो तुझ पर उल्टा केस नही ठोंक देगी....?" टफ को पूरी बात का ज्ञान नही था...

"तू छ्चोड़ ना यार.. स्नेहा को.. गाड़ी चला.. मेरे सिर में दर्द है..." विकी का सिर पहले ही स्नेहा के बारे में सोचकर फटा जा रहा था...

"ऐसे सिर दर्द करने से काम थोड़े ही चलेगा..? आगे का सोचकर तो चलना ही पड़ेगा... तूने सोचा है की अगर उसके बयानो का मुँह तेरी तरफ घूम गया तो क्या होगा? मुरारी की जगह तू मेरे थाने में बैठा होगा.. और मैं कुच्छ कर भी नही पाउन्गा......." टफ ने पते की बात कही थी...

"ऐसा नही होगा याआआर.. तू समझता क्यूँ नही है.... वो कभी ऐसा नही करेगी..?" विकी झल्लाते हुए बोला.. टफ उसको बार बार अंजाने में ही याद दिला रहा था की स्नेहा के साथ क्या होने वाला है...

"क्यूँ.. क्यूँ नही करेगी..?" टफ ने फिर उसके दिल के तारों को छेड़ा..

"हेययय भग्वाआअन... वो मुझसे प्यार करती है.. मेरे लिए मर सकती है.. मर जाएगी...! प्लीज़ तू ये बात बंद कर दे यार..." विकी का अंतर्मन उसको कचोट रहा था...

"और तू..??? तू नही करता क्या उस'से प्यार? तुझे अच्छि नही लगती क्या वो...? अगर तू जिंदगी के बारे में सोच ही रहा है तो वो क्यूँ तेरी जिंदगी का हिस्सा नही हो सकती...? तू ही तो कह रहा था भाई के सामने.. कि ऐसी लड़की तूने आज तक देखी ही नही..." टफ टॉपिक बंद करने को तैयार ही नही था.. उल्टा बात को और ज़्यादा कुरेद रहा था..

विकी झल्लाते हुए गाड़ी से उतर गया.. टफ भी उतर कर उसके पास चला गया...," किस'से भागने की कोशिश कर रहा है तू.. मुझसे? या अपने आप से..? कहाँ तक भाग सकता है भाग ले..

"विकी प्यार नही करता.. बस! मेरी लाइफ में प्यार के कोई मायने नही हैं.. मैं अपने लिए जीता था.. जीता हूँ.. और जियूंगा... ! मुझे वापस छ्चोड़ दे.. मुझे गाड़ी लेकर कहीं जाना है.. अभी.." विकी बिफर उठा.. अपने आप से ही..

"ठीक है.. नो प्राब्लम! चल आ.. वापस छ्चोड़ देता हूँ.." टफ ने उसको एक बार भी रुकने के लिए नही बोला... गाड़ी में बैठे और वापस थाने पहुँच गये..

" एक बात मानेगा?" विकी ने टफ से कहा..

"हां बोल!"

"मुझे एक बार और मुरारी से मिलने दे... अकेले में.. मुझे कुच्छ ज़रूरी बात करनी हैं.. आख़िरी बार.." विकी ने कहा..

"तू एक मिनिट यहीं ठहर.. मैं आता हूँ.." कहकर टफ ऑफीस में गया और कुच्छ देर बाद वापस आया," चल तू ऑफीस में बैठ.. मैं मुरारी को वहीं भेजता हूँ.."

"ठीक है.." कहकर विकी ऑफीस में जाकर बैठ गया...

कुच्छ देर बाद बदहाल मुरारी भी वहीं आ पहुँचा," क्या यार.. तूने मेरी मा चुदवा दी.. देख कितने मच्च्छार काट चुके हैं.."

"काम की बात कर.. स्नेहा तुझे कल ही मिल जाएगी.. बोल पैसे कहाँ दे रहा है..?" विकी ने कहा...

"जहाँ तू मुझे स्नेहा देगा.. वहीं.. टाइम भी तेरा.. जगह भी तेरी..." मुरारी ने दाँत पीसते हुए कहा....

"ठीक है.. कल शाम 6 बजे.. पानीपत से देल्ही की और जो दो नहरें जाती हैं.. बवाना से कुच्छ पहले उन्न दोनो नहरों के बीच मिलते हैं... कैसे करना है.. ये तुम बता दो.." विकी ने कहा..

"ओके! मेरे पास ऐसा प्लान है जिसमें हम में से कोई चीटिंग नही कर सकता.." और मुरारी प्लान बताने लगा...

सच में ही प्लान फुलप्रूफ था.. कहीं चीटिंग करने की गुंजाइश ना थी.. या तो दोनो पार्टियों को अपना अपना 'माल' मिल जाएगा.. या किसी को भी कुच्छ नही...," लाओ.. तुम्हारे फोन से अभी फोन कर दूं.. अपने किसी खास को.. बांके को तो तुम छ्चोड़ ही दोगे ना..." मुरारी ने कहा...

"हां.. जाते ही.."

विकी ने फोन ऑन करके मुरारी को दे दिया......

मुरारी ने फोन करके अपने किसी आदमी को सबकुच्छ समझा दिया.. और बाद में कहा," याद रखना.. मेरी जमानत होने तक किसी को भी खबर नही होनी चाहिए की स्नेहा हमारे पास है.. उसको क़ैद करके रखना है... समझ गये ना...!"

"यस सर..!"

"लो.. हो गयी बात!" मुरारी ने विकी को फोन दे दिया....

विकी बिना कोई शब्द बोले ऑफीस से बाहर निकल गया.. वह जाते हुए टफ से भी नही मिला....

विकी मुश्किल से 5 मिनिट ही चला था की उसका फोन बज उठा..

"ओह! फोन ऑफ करना तो भूल ही गया था.. उसने फोन उठाकर देखा.. कोई अंजान नंबर. था.. विकी ने फोन वापस डॅशबोर्ड पर रख दिया... कॉल स्नेहा की हो सकती थी...

बेल बंद हो जाने के बाद वह फोन को उठाकर ऑफ करने ही वाला था कि फिर से उसी नंबर. से कॉल आ गयी... कुच्छ सोचते हुए उसने फोन उठा लिया," हेलो!"

स्नेहा फोन लेकर बाहर भाग आई," जान! कहाँ रह गये तुम? मैं मर जाती तो?"

अचानक विकी को कुच्छ सूझा ही नही," मैं आकर बतौन्गा सानू.. तुम्हे नही पता मेरे साथ क्या हुआ..?"

"है राम! क्या हुआ.. तुम ठीक तो हो ना..?" स्नेहा ने अपने दिल पर हाथ रखकर पूछा... उसकी धड़कने बढ़ गयी थी...

"हां, अभी मैं बिल्कुल ठीक हूँ.. तुम चिंता ना करो..!"

"अब आ रहे हो ना मेरे पास..?" स्नेहा का दिल खुशी के मारे धड़क रहा था...

" तुम ठीक तो हो ना..?" विकी को ताज्जुब हुआ.. यूँही उसकी आँखें नम हो गयी थी..

"हां मैं बिल्कुल ठीक हूँ.. वीरू और राज भैया बहुत अच्छे हैं.. पता है.. मैने अपनी जिंदगी मैं पहली बार रक्षाबन्धन मनाया है.. मैने दोनो को राखी बँधी..... कितनी देर में आ रहे हो...?" स्नेहा फूली नही समा रही थी..

"अब नही आ सकता मैं.. कल आउन्गा.. बहुत दूर हूं.. और गाड़ी भी नही है मेरे पास..." विकी ने झूठ बोला..

स्नेहा मायूस हो गयी," हां.. गाड़ी तो मेडिकल में ही खड़ी है ना..?"

"हां.. अब रखूं..?" विकी ने कहा..

"नआईईई.. कुच्छ देर और बात करो ना... प्लीज़.. तुम्हे पता है.. तुमसे बात करते ही 'तुम्हारी चिड़िया' उच्छलने लगी है.. इसका क्या करूँ..?"

"मेरी चिड़िया..? क्या मतलब?? " विकी की कुच्छ समझ में नही आया..

"इसको तुमने चिड़िया ही तो कहा था.. छ्होटी सी..?" स्नेहा ने अपनी जांघें कस ली और उस 'चिड़िया' को फुदकने से रोकने की कोशिश करने लगी..

"श.. अच्च्छा.. हा हा हा" विकी फीकी सी हँसी हंसते हुए बोला..," कल आ रहा हूँ. ना.. अब फोन रख दो... मैं बहुत परेशान हूँ.. इस वक़्त.."

"अच्च्छा.." स्नेहा ने मुँह बना लिया... पर अचानक उसके चेहरे की रौनाक़ लौट आई," याद है ना तुमने क्या वादा किया था..?"

विकी का चेहरा मुरझा गया," हां याद है.. अब रख दो फोन.."

"हां हां रखती हूँ.. पहले बोलो.. आइ लव यू!" स्नेहा फोने रखना ही नही चाह रही थी...

" रखो ना यार फोन.. कह तो रहा हूँ.. कल आ जाउन्गा.." कहकर विकी ने फोन काट दिया....

स्नेहा कुच्छ देर यूँही फोन को देखती रही.. फिर अंदर जाते ही बोली," मोहन बहुत परेशान है.. वो किसी प्राब्लम में है.. अच्छे से बात भी नही कर पाया... आज आएगा भी नही..."

"तुम्हे यहाँ कोई दिक्कत है?" वीरू ने पूचछा...

"नही तो.. मैं तो यहाँ बहुत खुश हूँ.." स्नेहा ने चहकते हुए कहा..

"फिर क्यूँ चपर चपर लगा रखी है... चल आजा शतरंज खेलते हैं.." वीरू ने कहा.. एक ही दिन में वो कितना घुलमिल गये थे...

"अभी लाई.. दिन वाली बाज़ी का बदला भी लेना है मुझे.." कहते हुए स्नेहा ने चेस-बोर्ड उठाया और वीरू के पास बेड पर बाज़ी जमा दी... उसका अहसास तक नही था.. कि कोई उसको भी ऐसे ही चल चुका है.. जिंदगी की बिसात पर.. और वहाँ हारते ही मौत है.. सिर्फ़ मौत...

"जब से मैं स्कूल से आया हूँ.. तुम लोगों ने एक भी अक्षर पढ़ने नही दिया है.. तुम दोनो चाहते क्या हो आख़िर?" राज अपने बिस्तेर पर खीजा हुआ बैठा था.. स्कूल से आने के बाद दोनो ने उसके खूब मज़े लिए थे... प्रिया का जिकर कर कर के!

"ओहो.. राज भैया.. हमें पता है.. आजकल आप पढ़ तो यूँ भी नही रहे.. यहाँ आकर मेरी मदद करो ना.. आपका दिल भी लग जाएगा.." स्नेहा के साथ मिलकर वीरू ने भी ज़ोर का ठहाका लगाया...

"आख़िर तुम लोग चाहते क्या हो यार..? ठीक है.. लो! बंद कर दी किताब.." राज ने किताब बंद करके टेबल पर रखी और उनके साथ ही बेड पर आ बैठा," चल घोड़ा चल... घोड़ाआ चल चुहिया.. मरवाएगी क्या रानी को!!!!!"

स्नेहा को ग़लती का अहसास हो गया," थॅंक यू भैया.. तुम कितने अच्छे हो.. तुम साथ बैठे रहे तो मैं जीत ही जाउन्गि.. पर अपना ध्यान सामने वाली खिड़की मैं मत लगा लेना.." राज को छेड़ने का कोई मौका दोनो हाथ से नही जाने दे रहे थे...

"मैं तुम्हे कितनी बार बता चुका हूँ कि ऐसा कुच्छ नही है... अगर थोडा बहुत कुच्छ था भी तो वो कल ख़तम हो गया.. अब बंद करो यार इश्स टॉपिक को.. और कुच्छ नही है क्या बात करने को..?" राज ने कहा..

"जब तक तुम सच सच नही बता देते की कल रात तुम्हारी कितनी पिटाई हुई, हम तुम्हारा पीछा नही छ्चोड़ने वाले.. क्यूँ स्नेहा?" वीरू ने कहा...

"सही बात है भाई.. बिल्कुल सही बात है ये तो हो हो... हा हा.. और ये गयी तुम्हारी रानी... मैं जीत गयी.. वाउ.." स्नेहा खड़ी होकर कूदने लगी...

"जा मुँह धोकर आ पहले.. हाथी भी कभी टेढ़ा चलता है..?" वीरू ने हंसते हुए कहा...

"मैं नही खेलती.. बकवास गेम है..!" कहते हुए स्नेहा ने सारे प्यादे बिखरा दिए," बताओ ना राज.. क्या हुआ तुम्हारे साथ कल.. प्लीज़ बता दो.. हम हँसेंगे नही.. प्रोमिस! है ना भैया!" स्नेहा ने वीरू की और देखा और दोनो एक बार फिर खिलखिला पड़े...



Tough jaise hi wapas office mein aaya, Murari ki halat dekhkar wo apni hansi nahi rok paya.. wo murari ko baithne ko bolkar gaya tha.. aur murari theek usi jagah jakar neeche baitha huaa tha jis jagah par kuchh minute pahle wo do aadmi baithe thhe.. bilkul usi andal mein.. shareef aadmiyon ki tarah... uske dono hath ghutno par rakhe huye thhe..

" yahan aa jao.. upar.. kursi par.." Tough ne apni kursi par jamte huye kaha....

Murari ki jaan mein jaan aayi.. wo toh ye soch raha tha ki uske sath bhi ab kuchh aisa hi hone wala hai.. par abhi bhi uske dil ko poori tasalli nahi huyi thi..," aap kaho toh main toh neeche bhi baith jaaunga.. inspector........ sahab! main toh jameen se juda huaa aadmi hoon.." Murari ne thhook gatka....

"haan.. tumhari jameen kal dekh li thi.. rahi sahi.. aaj rat ko dekh lenge.." Tough ne muskurate huye kaha..

"kkkk.. kya matlab...?" Murari sihar utha...

"kuchh nahi.. kisi aadmi ka fone aaya tha.. kah raha tha..."

Murari ki aankhein chamak uthhi..," Delhi se aaya tha kya fone????"

"Delhi walon ko bhool jao murari.. darasal unke kahne par hi aapki hawa tight ki gayi hai.. party aapki wajah se apni chhawi badnaam nahi karna chahti.. khair jiska bhi fone aaya tha.. kah raha tha ki usko pata hai ki iss waqt tumhari beti kahan hai..?" Tough ne wahan rakhe ek gilas pani se apna gala tar kiya.. .

"pls inspector sahab.. mujhe uss aadmi se milwa dejiye.. main bhi pareshan hoon.. apni beti ke liye... chahe aap jo bhi kharcha pani kahein.. main dene ko taiyaar hoon...

tough ne uski baat ko najarandaj karke apni baat jari rakhi...," uska naam vicky hai.. maine usko bulwaya hai.. wo bus aane hi wala hoga..."

"Vicky koun.. Rohtak wala.. jo virodhi party mein wahan se ticket ka dawedaar hai..?" Murari ke dimag mein khalbali mach gayi...

"wo mujhe nahi pata.. par haan.. hai wo rohtak se hi.." Tough ne anjan bante huye kaha..

"wahi hoga jaroor.. uski hi sajis hai ye.. kisi ne meri beti ko uske sath dekha bhi tha.. wardaat wale din.. inspector sahab.. usne meri beti ko behla rakha hai.. aap yakin kijiye..." Murari kursi par baitha baitha haanfne laga.. ek hi saans mein wo ye sab bol gaya tha....

"main toh yakeen kar bhi loon.. par court toh saboot maangega.. aur tumhari beti ke bayan tumhare khilaf hai.. fir bhi chalo.. aane do.. dekhte hain baat karke..." tough ne kaha hi tha ki darwaje par Rajesh prakat hua," Janab.. koyi vicky aaya hai.. kah raha hai.. aapse milne ka time maanga hai...

"Bhej do usko andar...!" tough ne kaha... Murari ka chehra tamtama uthha...

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"Namaskar janab!" vicky ne office mein dakhil hote huye kaha...

"namaskar! kya tum hi...."

"ji haan janab.. main hi vicky hoon.. ye mujhe achchhi tarah se jaante hain..! kyun neta ji..?" Vicky ne murari ki aur aankh daba di..

"Inspector sahab..! mujhe 100 pratishat visvash hai ki yahi aadmi meri barbadi ke pichhe hi hai.. aap isko abhi giraftaar kar lijiye.. main bekasoor hoon.." ro hi toh pada tha murari....

"tum faisla suna rahe ho ki rai de rahe ho...?" Tough ne deewar ke sath kursi sarkate huye kaha.....

"nahi inspector sahab.. main faisla kaise suna sakta hoon.. faisla karne wale toh aap hain.. fir bhi main yakeen ke sath kah sakta hoon ki iske peechhe isika hath hai.. isne meri beti behka li.. mujhe badnaam kar diya...." Murari ko tough ne beech mein hi tok diya...

"aur shalini.. uske kapde bhi isi ne faade thhe kya?"

"wwo.. main behak gaya tha.. gusse main tha main.. mujhe maaf kar do inspector saheb.. main shalini bitiya se bhi maafi maang loonga.." Murari ne kaha..

vicky Murari ka ye dabbu roop dekhkar mushkil se apni hansi rok pa raha tha.. inspector sahib ko ijjat jo bakhsani thi..

"haan toh vicky ji.. kya kahna hai aapka..?" tough vicky se mukhatib huaa...

"yahi ki mujhe pata hai ki iski ladki iss waqt kahan hai.. wo police ke paas aur court mein apne bayan dena chahti hai.. isi silsile mein kisi ne mujhse contact kiya tha..." vicky bol hi raha tha ki Murari beech mein tapak pada..

"nahi inspector sahab.. iski sari baatein jhoothi hain.. isne khud ye drama racha hai aur ab yahan mujhe blackmail karne aaya hai..."

"tum chup ho jawoge ya mujhe tumhe hawalat mein bhejna padega...?" tough ne rukhi aawaj mein Murari se kaha," main koyi pagal toh nahi hoon.. main poochh raha hoon na sab kuchh.."

"ji!" murari bheegi billi ban gaya...

"haan toh vicky ji... ye blackmailing ka kya funda hai.." Tough ne vicky se poochha...

"kuchh nahi hai janab! main isko blackmail kyun karunga.. iss jaise logon ki toh main shakal bhi dekhna nahi chahta.. main toh sirf aapko jaankari dene aaya tha.. wo bhi isiliye ki khud iski beti aisa chahti hai..." Vicky ne sahaj bhav se kaha...

"hummm.. to kahan hai ladki.. chaliye uske bayan lekar court mein pesh kar dete hain.. ye apne aap bhugtega..!" Tough ne Vicky se kaha.. karya wahi ek tarfa chal rahi thi.. har taraf se Murari ko dabaya aur daraya ja raha tha..

"chaliye.. main toh isi kaam se aaya hoon..!" Vicky khada ho gaya...

"ek minute.. daroga ji.. kya main vicky se akele mein baat kar sakta hoon.." Murari ko kuchh samajh nahi aa raha tha.... uska dimag khisak chuka tha...

"kar lijiye.. mujhe kya hai.. hum toh dilon ko jodne ka hi kaam karte hain.. basharte.. vicky ji ko koyi aitraj na ho toh..." kahkar Tough ne vicky ki aur dekha...

"nahi.. mujhe iss ghatiya insaan se koyi baat nahi karni.. main toh roj duaa karta tha ki iska asli chehra duniya ke saamne aaye... isko 10 saal se kum toh kya saja hogi ab.. hai na janaab?" vicky ne tirchhi najron se Murari ka chehra dekhte huye kaha...

"haan.. agar iski beti ne aur shalini ne court mein iske khilaf bayan de diye toh ye nahi bach sakta.. haan agar...!" Tough ne baat adhoori chhod di...

"agar kya.. inspector sahab.. main kuchh bhi karne ko taiyar hoon.. mujhe bacha lijiye pls.. main aapke paanv padta hoon.. main koyi bhi keemat dene ko taiyar hoon..!" Murari kursi se uthh gaya...

"Main na toh aapko saja se bacha sakta hoon aur na hi saza dilwa sakta hoon.. waise meri aapse poori humdardi hai.. aakhir aapke neeche rahkar hi toh hamein kaam karna hai sari umar.. par sab kuchh unn ladkiyon ke hi hathon mein hai..." Tough ne nakli sahanubhooti darshate huye kaha...

"par ek toh aapke paas hi hai na.. kum se kum usko toh samjha dijiye.." Murari gidgida utha tha..

"ek se kya hoga.. saja toh dono ki ek sath hi milni hai.. agar tumhari ladki wala maamla sulajhta hai toh main koshish kar sakta hoon.. par wo maamla tabhi sudhar sakta hai jab aapki ladki bayan na de.. ya media ko diye bayano se mukar jaye.." Tough ne usko iss uljhan se bahar nikalne ka raasta sujhaya.. aur bahar nikalne ki chabi sirf Vicky ke paas hi thi..

"main apni beti ko kaise bhi karke chup kara doonga.. aap mujhe uss'se milwa dijiye.." Murari hath jodkar gidgidaya..

"Milwa dijiye Vicky ji.. agar aap theek samjhe.. bechre ka bhala ho jayega.. waise mujhe koyi dikkat nahi hai...." Tough ne chutki li...

iss'se pahle vicky kuchh bolta.. Murari uske pairon mein gir pada..," Vicky bhai.. ek baar baat kar lo pls.. main tumhe kabhi hulke main najar nahi aaunga.. aur bolo..."

vicky apna man sa banane ki acting karta hua tough se bola," Theek hai janab.. agar aapko bhi yahi sahi lagta hai toh main baat kar leta hoon.. akele mein...!"

"theek hai.. tum yahin baitho.. mujhe kisi kaam se bahar jana hai.. main aadhe ghante mein aata hoon.. " kahkar tough bahar nikal gaya..

Murari bhikhari ki tarah vicky ke chehre ko taakne laga...

"haan.. bol Murari!" Vicky ne Murari ko ghoora...

"tu toh mujhse bhi bada kamina nikla re.. seedhe matlab ki baat par aaja.. bata.. meri beti mujhe sounpne ka kya lega?" Murari ki aawaj mein gussa aur bebasi saaf jhalak rahi thi...

"wo multiplex!" vicky ne do took jawab diya..

" ja le le... badle mein Sneha mujhe mil jayegi na...." Murari ne kaha..

"maine kya uska aachar daalna hai? jahan chahe chali jaye.. mujhe kya? waise bhi main toh ladki ko ek baar hi use karta hoon...." Vicky ne cigarettee nikal kar sulga li...

"na.. na.. mujhe chahiye.. wo haramjadi... manjoor ho toh bolo..." Murari ka chehra nafrat aur kadwahat se bhar uthha...

" tujhe main bata doon ki wo tere paas rahna nahi chahti.. nafrat karti hai tujhse.. teri shakal bhi dekhna nahi chahti... .. bayan mein nahi hone doonga.. meri guarantee..fir tu kya karega uska ?" Vicky ne uski aankhon mein jhankte huye kaha..

Murari ki aankhein laal ho gayi.. nathune fool gaye aur kisi bhediye ki tarah gurrane laga," Uska wahi karronga jo uski maa ka kiya tha.. sali kutiya... behan chod.. usko nangi karke apne saamne chudwaaunga... fir jangli kutton ke aage daal dunga.. usne sari duniya ko bata hi diya ki wo meri aulad nahi hai... ek baar mujhe sounp de bus.. bol manjoor hai ki nahi...?"

Vicky ke jahan se ek lambi saans aah ke roop mein nikli.. kaisa hai Murari? Aadmi hai ya bhediya.. kuchh minute ke moun ke baad bola..," majoor hai.. ladki tumhe mil jayegi.. mujhe multiplex ke kagaj milne ke baad..."

"to fir milao hath.. tum apna fone do.. main abhi uske malik ko fone karta hoon.. tum chaho toh kal hi usko paise dekar multiplex apne naam karwa sakte ho..." Murari ne vicky ka hath apne hath main pakad liya...

vicky ne apna hath chhudwaya aur jor jor se hansne laga...," tu kya samajhta hai.. maine itni mehnat sirf tujhse no objection certificate lene ke liye ki hai.. nahi! wo toh main kabhi bhi uski kanpati par rivolver rakhkar khareed sakta tha... ab wo multiplex tu khareed kar mujhe dega.. yani paise tere honge.. aur maal mujhe milega..!"

"matlab tu samajhta hai ki main apne paas se tujhe 8 karod rupaiya doonga... ?" Murari ne hairat se uski aur dekha...

"8 nahi 10 karod.. aur mujhe pata hai ki tu dega.. kyunki 10 karod ganwane 10 saal jail mein kaatne se kahin jyada aasan hai tere liye.. 10 saalon mein toh tu pata nahi kitne 10 karod kama lega...!" Vicky ne katil muskaan Murari ki aur fainki...

Murari ne apna sir table par rakh liya aur kuchh der udhedbun mein pada raha... fir achanak uthkar bola," main sirf 8 karod doonga.. aur mujhe wo loundiya hath ke hath chahiye.. bol kab de sakta hai...?"

"jab tum chaho.. par abhi toh tumhari 14 din ki police custody hai na?" vicky ne Murari se sawaal kiya...

"tumhe jab chahe paise mil jayenge.. tum batao.. kab la sakte ho Sneha ko..?" Murari ne sawaal par sawaal mara...

" main baanke ko bata doonga...! sochkar.." Vicky ne ajjeb se andaj mein baanke ka naam liya...

"baanke... tum baanke ko kaise jaante ho?" Murari chounk kar uchhal pada....

"kyun hairani huyi na... Mujhe kidnap karne kuchh chooson ko sath lekar aaya tha.. abhi mere gusalkhane mein kaid hain teeno.. agar tum aaj nahi maante toh tum par ek case aur lagna tha.. " Vicky jor jor se hansne laga....

tabhi tough ne office mein pravesh kiya..," lagta hai kuchh soudebazi ho gayi tum dono ki...?"

"nahi.. inspector sahab.. hum dono mein kuchh galatfahmiyan thi.. jo aaj sath baithne se door ho gayi.. waise vicky ji kah rahe hain ki ye Sneha ko manane ki koshish karenge... apne bayan wapas lene ke liye.. kyun vicky ji?" Murari ne baat sapast ki...

"haan murari ji.. " aur kahte huye vicky ne tough ki aur aankh mari...

"Rajesh!" Tough ne aawaj lagayi....

"ji janab.."

"neta ji ko poori ijjat se hawalat mein chhod aao.. subah milte hain inse.. inka khayal rakhna..." Tough ne vyangya kiya...

"inspector sahab.. agar bura na mano toh.. main yahin so jaaoon... wahan machchhar aur garmi jaan nikal dete hain..."

"aap chinta na karein neta ji.. sarkaar kuchh hi dinon mein hawalat mein bhi AC lagwane par vichar kar rahi hai... tab tak pls.. kisi tarah se kaat lein...!" tough ne muskurate huye kaha...

"kab.. ye kaise ho sakta hai..? Murari ko visvas nahi hua..

"ho kyun nahi sakta neta ji.. aajkal hawalat mein aate hi neta log hain.. fir kuchh na kuchh toh sarkar ko sochna hi padega.." Tough ne kaha aur Rajesh ko use wahan se le jaane ko kaha....

"tu bura fansega kisi din..!" Murari ke jate hi tough ne vicky ko aage badhkar gale laga liya...," ho gaya tumhara kaam?"

Vicky kuchh na bola.. aankh band hote hi usko Sneha ka masoom sa chehra dikhayi diya.. wo bilkul nangi padi thi.. jangli kutton ke beech.....

Tough aur vicky dono thane se nikal kar tough ke ghar ki aur chal pade.. lagbhag sare raste Vicky chup hi raha...

"kya baat hai.. tumhe multiplex mil toh gaya na? ya kuchh adachan hai.. ?" Tough ne usko gumsum baithe dekh kaha....

"hummm... haan.. mil jayega!.......... koyi adachan nahi hai..ab!" vicky ne lambi gahri saans chhodi...

"fir bhi tu pareshan lag raha hai.. kya baat hai yaar...? bata toh!" tough ne uska chehra dekhte huye poochha...

"nahi... kuchh nahi hai... kuchh bhi toh nahi.. bus murari ka chehra dekhkar hi ultiyan si aane lagti hain.. bahut kamina hai saala.. sou kutte markar ye 'ek' paida hua hoga..." Vicky ke jabde bhich gaye.. par wo aadhi baat man mein hi pi gaya.. kaise batata ki wo bhi iss baar 'uske' kaminepan mein hissedar hone wala hai... Sneha ko use sounpkar...'" bus! bahut ho gaya.. ye aakhiri baar hai..!" achanak vicky ke munh se nikla...

"kya bahut ho gaya? kya aakhiri baar hai? kahan atka huaa hai bhai...?" Tough ne gadi rok di...

"bus yaar.. ye politics.. bahut hi kutti cheej hai.. soch raha hoon.. chhod doon.. jane kya kya karwati hai sali... Bus ye multiplex mil jaye.. uske baad mein apne baare mein sochunga..." Vicky ki tabiyat si kharaab ho gayi thi.. usko apna shareer toot'ta hua lag raha tha...

"ek baat toh bata yaar.. Sneha bayan nahi deti ... theek hai... par kya tu usko sachchayi batayega? kyunki aaj nahi toh kal usko wapas jane par pata lag hi jayega.. sachchayi ka... fir kya wo tujh par ulta case nahi thhok degi....?" Tough ko poori baat ka gyan nahi tha...

"tu chhod na yaar.. sneha ko.. gadi chala.. mere sir mein dard hai..." Vicky ka sir pahle hi Sneha ke baare mein sochkar fata ja raha tha...

"aise sir dard karne se kaam thode hi chalega..? aage ka sochkar toh chalna hi padega... tune socha hai ki agar uske bayano ka munh teri taraf ghoom gaya toh kya hoga? Murari ki jagah tu mere thane mein baitha hoga.. aur main kuchh kar bhi nahi paaunga......." Tough ne pate ki baat kahi thhi...

"aisaa nahi hoga yaaaaaar.. tu samajhta kyun nahi hai.... wo kabhi aisa nahi karegi..?" Vicky jhallate huye bola.. tough usko baar baar anjane mein hi yaad dila raha tha ki Sneha ke sath kya hone wala hai...

"kyun.. kyun nahi karegi..?" tough ne fir uske dil ke taaron ko chheda..

"heyyy bhagwaaaaan... wo mujhse pyar karti hai.. mere liye mar sakti hai.. mar jayegi...! pls tu ye baat band kar de yaar..." Vicky ka antarman usko kachot raha tha...

"aur tu..??? tu nahi karta kya uss'se pyar? tujhe achchhi nahi lagti kya wo...? agar tu jindagi ke baare mein soch hi raha hai to wo kyun teri jindagi ka hissa nahi ho sakti...? tu hi toh kah raha tha bhai ke saamne.. ki aisi ladki tune aaj tak dekhi hi nahi..." Tough topic band karne ko taiyar hi nahi tha.. ulta baat ko aur jyada kured raha tha..

Vicky jhallate huye gadi se utar gaya.. tough bhi utar kar uske paas chala gaya...," kiss'se bhagne ki koshish kar raha hai tu.. mujhse? ya apne aap se..? kahan tak bhag sakta hai bhag le..

"vicky pyar nahi karta.. bus! meri life mein pyar ke koyi mayne nahi hain.. main apne liye jeeta tha.. jeeta hoon.. aur jiyunga... ! mujhe wapas chhod de.. mujhe gadi lekar kahin jana hai.. abhi.." Vicky bifar utha.. apne aap se hi..

"theek hai.. no problem! chal aa.. wapas chhod deta hoon.." Tough ne usko ek baar bhi rukne ke liye nahi bola... gadi mein baithe aur wapas thane pahunch gaye..

" ek baat maanega?" Vicky ne Tough se kaha..

"haan bol!"

"mujhe ek baar aur murari se milne de... akele mein.. mujhe kuchh jaruri baat karni hain.. aakhiri baar.." Vicky ne kaha..

"tu ek minute yahin thhahar.. main aata hoon.." kahkar tough office mein gaya aur kuchh der baad wapas aaya," chal tu office mein baith.. main murari ko wahin bhejta hoon.."

"theek hai.." kahkar vicky office mein jakar baith gaya...

kuchh der baad badhaal Murari bhi wahin aa pahuncha," kya yaar.. tune meri maa chudwa di.. dekh kitne machchhar kaat chuke hain.."

"kaam ki baat kar.. Sneha tujhe kal hi mil jayegi.. bol paise kahan de raha hai..?" Vicky ne kaha...

"jahan tu mujhe Sneha dega.. wahin.. time bhi tera.. jagah bhi teri..." Murari ne daant peeste huye kaha....

"theek hai.. Kal sham 6 baje.. panipat se delhi ki aur jo do nahrein jati hain.. bawana se kuchh pahle unn dono nahron ke beech milte hain... kaise karna hai.. ye tum bata do.." Vicky ne kaha..

"OK! mere paas aisa plan hai jismein hum mein se koyi cheating nahi kar sakta.." aur murari plan batane laga...

sach mein hi plan fulproof tha.. kahin cheating karne ki gunjayish na thi.. ya toh dono partiyon ko apna apna 'maal' mil jayega.. ya kisi ko bhi kuchh nahi...," lao.. tumhare fone se abhi fone kar doon.. apne kisi khas ko.. Baanke ko toh tum chhod hi doge na..." murari ne kaha...

"haan.. jate hi.."

Vicky ne fone on karke Murari ko de diya......

Murari ne fone karke apne kisi aadmi ko sabkuchh samjha diya.. aur baad mein kaha," yaad rakhana.. meri jamanat hone tak kisi ko bhi khabar nahi honi chahiye ki Sneha hamare paas hai.. usko kaid karke rakhna hai... samajh gaye na...!"

"yes sir..!"

"lo.. ho gayi baat!" Murari ne vicky ko fone de diya....

Vicky bina koyi shabd bole office se bahar nikal gaya.. wah jate huye tough se bhi nahi mila....

vicky mushkil se 5 minute hi chala tha ki uska fone baj uthha..

"oh! fone off karna toh bhool hi gaya tha.. usne fone uthakar dekha.. koyi anjaan no. tha.. vicky ne fone wapas dashboard par rakh diya... call Sneha ki ho sakti thi...

bell band ho jane ke baad wah fone ko uthakar off karne hi wala tha ki fir se usi no. se call aa gayi... kuchh sochte huye usne fone utha liya," Hello!"

Sneha fone lekar bahar bhag aayi," jaan! kahan rah gaye tum? main mar jati toh?"

achanak vicky ko kuchh soojha hi nahi," main aakar bataunga Sanu.. tumhe nahi pata mere sath kya huaa..?"

"hai Ram! kya hua.. tum theek toh ho na..?" Sneha ne apne dil par hath rakhkar poochha... uski dhadkane badh gayi thi...

"haan, abhi main bilkul theek hoon.. tum chinta na karo..!"

"ab aa rahe ho na mere paas..?" Sneha ka dil khushi ke maare dhadak raha thha...

" tum theek toh ho na..?" vicky ko tajjub hua.. yunhi uski aankhein nam ho gayi thi..

"haan main bilkul theek hoon.. Viru aur Raj bhaiya bahut achchhe hain.. pata hai.. maine apni jindagi main pahli baar rakshabandhan manaya hai.. maine dono ko rakhi bandhi..... kitni der mein aa rahe ho...?" Sneha fooli nahi sama rahi thi..

"ab nahi aa sakta main.. kal aaunga.. bahut door hoon.. aur gadi bhi nahi hai mere paas..." Vicky ne jhooth bola..

Sneha mayoos ho gayi," haan.. gadi toh medical mein hi khadi hai na..?"

"haan.. ab rakhoon..?" vicky ne kaha..

"nayiiiii.. kuchh der aur baat karo na... pls.. tumhe pata hai.. tumse baat karte hi 'tumhari chidiya' uchhalne lagi hai.. iska kya karoon..?"

"meri chidiya..? kya matlab?? " vicky ki kuchh samajh mein nahi aaya..

"isko tumne chidiya hi toh kaha tha.. chhoti si..?" Sneha ne apni jaanghein kas li aur uss 'chidiya' ko fudakne se rokne ki koshish karne lagi..

"ohh.. achchha.. ha ha ha" vicky feeki si hansi hanste huye bola..," kal aa raha hoon. na.. ab fone rakh do... main bahut pareshan hoon.. iss waqt.."

"achchha.." Sneha ne munh bana liya... par achanak uske chehre ki rounaq lout aayi," yaad hai na tumne kya wada kiya tha..?"

Vicky ka chehra murjha gaya," haan yaad hai.. ab rakh do fone.."

"haan haan rakhti hoon.. pahle bolo.. I love you!" Sneha fone rakhna hi nahi chah rahi thi...

" rakho na yaar fone.. kah toh raha hoon.. kal aa jaaunga.." kahkar vicky ne fone kaat diya....

Sneha kuchh der yunhi fone ko dekhti rahi.. fir andar jaate hi boli," Mohan bahut pareshan hai.. wo kisi problem mein hai.. achchhe se baat bhi nahi kar paya... aaj aayega bhi nahi..."

"tumhe yahan koyi dikkat hai?" Viru ne poochha...

"nahi toh.. main toh yahan bahut khush hoon.." Sneha ne chahakte huye kaha..

"fir kyun chapar chapar laga rakhi hai... chal aaja shatranj khelte hain.." viru ne kaha.. ek hi din mein wo kitna ghulmil gaye thhe...

"abhi laayi.. din wali baazi ka badla bhi lena hai mujhe.." kahte huye Sneha ne chess-board uthaya aur Viru ke paas bed par baazi jama di... uska ahsaas tak nahi tha.. ki koyi usko bhi aise hi chal chuka hai.. jindagi ki bisaat par.. aur wahan haarte hi mout hai.. sirf mout...

"jab se main school se aaya hoon.. tum logon ne ek bhi aksar padhne nahi diya hai.. tum dono chahte kya ho aakhir?" Raj apne bister par khija huaa baitha tha.. school se aane ke baad dono ne uske khoob maje liye thhe... Priya ka jikar kar kar ke!

"oho.. Raj bhaiya.. hamein pata hai.. aajkal aap padh toh yun bhi nahi rahe.. yahan aakar meri madad karo na.. aapka dil bhi lag jayega.." Sneha ke sath milkar viru ne bhi jor ka thahaka lagaya...

"aakhir tum log chahte kya ho yaar..? theek hai.. lo! band kar di kitab.." Raj ne kitab band karke table par rakhi aur unke sath hi bed par aa baitha," chal ghoda chal... Ghodaaa chal chuhiya.. marwayegi kya Rani ko!!!!!"

Sneha ko galati ka ahsaas ho gaya," thank you bhaiya.. tum kitne achchhe ho.. tum sath baithe rahe toh main jeet hi jaaungi.. par apna dhyan saamne wali khidki main mat laga lena.." Raj ko chhedne ka koyi mouka dono hath se nahi jane de rahe thhe...

"main tumhe kitni baar bata chuka hoon ki aisa kuchh nahi hai... agar thoda bahut kuchh tha bhi toh wo kal khatam ho gaya.. ab band karo yaar iss topic ko.. aur kuchh nahi hai kya baat karne ko..?" Raj ne kaha..

"jab tak tum sach sach nahi bata dete ki kal raat tumhari kitni pitayi huyi, hum tumhara peechha nahi chhodne wale.. kyun Sneha?" Viru ne kaha...

"sahi baat hai bhai.. bilkul sahi baat hai ye toh ho ho... ha ha.. aur ye gayi tumhari Rani... main jeet gayi.. wow.." Sneha khadi hokar koodne lagi...

"ja munh dhokar aa pahle.. hathi bhi kabhi tedha chalta hai..?" viru ne hanste huye kaha...

"main nahi khelti.. bakwas game hai..!" kahte huye Sneha ne sare pyade bikhra diye," batao na Raj.. kya huaa tumhare sath kal.. pls bata do.. hum hansenge nahi.. promice! hai na bhaiya!" Sneha ne viru ki aur dekha aur dono ek baar fir khilkhila pade...

rajaarkey
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Re: गर्ल'स स्कूल

Unread post by rajaarkey » 12 Dec 2014 03:49

गर्ल्स स्कूल पार्ट --46

हेलो दोस्तो उधर रिया ओर प्रिया की बात सुनते है वह दोनो इस टाइम क्या कर रही हैं

" रिया?"

"हूंम्म्म.." रिया ने किताब से नज़र हटा कर प्रिया की और देखा..

"मैने राज के साथ बहुत ग़लत किया ना?" प्रिया सारा दिन उदास बैठी रही थी.. स्कूल में भी.. घर में भी..

"अब भूल भी जा बात को.. कुच्छ नही होगा.. एक दो दिन में सब ठीक हो जाएगा.." रिया ने उसको दिलासा दी...

"मुझे नही लगता! वो मुझसे नफ़रत करने लगा है.. आज मेरी और क्लास में एक बार भी नही देखा.." प्रिया पागल सी हो गयी थी.. राज के लिए..

"अच्च्छा.. तुझे कैसे पता..?" रिया ने सवाल किया....

प्रिया उठकर रिया के पास आकर बैठ गयी," मैं आज सारा दिन उसी को देख रही थी.. एक अक्षर भी नही पढ़ा स्कूल में आज!"

" वीरेंदर आज स्कूल क्यूँ नही आया..?" रिया ने अपने वाले की बात छेड़ दी..

"अब मुझे क्या पता? राज से पूच्छ लेती.." प्रिया ने कहा...

"वो तो तुझे पूच्छना चाहिए था.. एक बात बटाओ?" रिया ने इस अंदाज में अपने होंटो को गोल करके कहा मानो वह बहुत बड़ा राज खोलने वाली है...

"क्या?" प्रिया गौर से उसके चेहरे को देखने लगी...

"वो लड़की जिसको हुमने आज सुबह खिड़की से देखा था... इनमें से किसी की भी बेहन नही हो सकती..!" रिया ने खुलासा किया..

"क्या कह रही हो.. तो फिर कौन हो सकती है..?" प्रिया के दिल पर साँप सा लेट गया..

"ये तो मुझे नही पता.. पर बेहन तो इनमें से किसी की है ही नही.. मुझे आज फॅमिली रेकॉर्ड वाला रिजिस्टर ऑफीस में रखकर आने को बोला था, सैनी सर ने.. मैने दोनो का रेकॉर्ड चेक किया था.. दोनो में से किसी की कोई बेहन नही है..!" रिया ने अपने विस्वास की वजह बताई....

"तुम कहना क्या चाहती हो? प्लीज़ मुझे डराव मत.." प्रिया जाने क्या सोचकर डर गयी थी..

"अच्च्छा हुआ.. जो मैं कहना चाहती हूँ.. तुम बिना कहे ही समझ गयी... जमाना बहुत खराब है प्रिया.. आज कल ये लड़के रूम्स पर गंदी लड़कियों को लाते हैं.." रिया ने तो प्रिया की साँस ही रोक दी..

"पर वो तो बहुत ज़्यादा सुंदर थी?" प्रिया ने भोलेपन से कहा...

"अरे मैं कॅरक्टरवाइज़ 'गंदी' बोल रही हूँ.. शकल सूरत से क्या होता है..? आज कल अच्छे घरों की लड़कियाँ भी उपर के खर्चे के लिए 'ग़लत काम' करती हैं.. तुमने कभी सुना नही क्या?" रिया अपने मन में जाने क्या क्या ख़याली पुलाव पका रही थी...

प्रिया ने सहमति में सिर हिलाया," हां... सुना तो है!... पर राज ऐसा नही हो सकता.. नही.. मैं नही मानती...मेरा राज ऐसा नही हो सकता!" प्रिया ने खुद को दिलासा देने की कोशिश की... पर उसका दिल बैठ गया था..

"तुम क्या कहना चाहती हो? वीरेंदर है ऐसा.. वो तो बिल्कुल नही हो सकता.. वो तो लड़कियों की तरफ देखता भी नही.." रिया ने अपने वाले का पक्ष लिया.. बातों ही बातों में वो भूल चुकी थी की उनकी बात सिर्फ़ शक और कल्पना पर शुरू हुई थी...

" तो राज भी ऐसा नही हो सकता.. उसकी गॅरेंटी मैं लेती हूँ..." प्रिया ने ताल ठोनकी..

"क्यूँ नही हो सकता.. वो इतना शरीफ भी नही है.. जितना तुझे लगता है.. तुझे एक बात बताऊं.. कल रात उसने मुझे चुटकी काटी थी.. यहाँ पर.. मैने तुझे ऐसे ही नही बताया..." रिया ने अपने पिच्छवाड़े पर हाथ लगाकर बताया...

प्रिया ये भूल गयी की कल रात उसने खुद को राज के सामने रिया बताया था..," नही.. तू झूठ बोल रही है.. हो ही नही सकता.. झूठ बोल रही है ना.. सच सच बता प्लीज़!"

रिया ने प्रिया के सिर पर हाथ रख दिया," सच्ची.. तुम्हारी कसम.. काटी थी..!"

"यहीं पर?" प्रिया ने अपने नितंबों को छ्छू कर कहा..

"हां!"

"तो तूने उसको थप्पड़ क्यूँ नही मारा.. मैं उसको छ्चोड़ूँगी नही.." प्रिया जलन के मारे उबल पड़ी....

"मम्मी बाहर खड़ी थी.. मैं बाथरूम में कपड़े लेने गयी.. तब की बात है.. बोल! मैं क्या बोलती..?" रिया ने तो प्रिया को रुला ही दिया... प्रिया बेड पर उल्टी लेट गयी.. और सूबक'ने लगी.. 4 दिन पहले का प्यार जाने कितने मोड़ ले चुका था.. कच्ची उमर का प्यार ऐसा ही होता है!

"चल आ खिड़की में से देखते हैं.. वो अभी भी यहाँ है की नही?" रिया ने प्रिया को उठाते हुए कहा...

"मुझे नही देखना किसी को.. अब क्या देखना रह गया है.. मैं उसको कितना अच्च्छा समझती थी..." प्रिया ने रिया का हाथ झटकते हुए कहा...

"मैं तो देख कर आउन्गि.. तुझे नही चलना तो मत चल..!" रिया ने कहा और ज़ीने में जाकर खड़ी हो गयी.. पर सामने वाली खिड़की बंद थी.. रिया वापस लौटने वाली थी की तभी प्रिया भी पीछे पीछे आ गयी..

"खिड़की बंद है.." रिया ने प्रिया की और मुड़ते हुए धीरे से कहा..

"रुक जा.. मैं खुल्वाति हूँ खिड़की.." गुस्से मैं जली भूनी आई प्रिया उपर से एक मोटा सा पत्थर का टुकड़ा लेकर आई और उसको धुमम से खिड़की पर दे मारा...

अंदर बैठे तीनो इस आवाज़ को सुनकर चोंक गये.. स्नेहा खिलखिलते हुए बोली," लो राज! तुम्हारा फिर से बुलावा आ गया.. आज नही जाओगे क्या..?" राज ने छेड़ छाड़ की बातें छ्चोड़कर सब कुच्छ उनको बता दिया था..

"देखो प्लीज़.. अब तो मेरा मज़ाक मत बनाओ.. तुमको बता दिया सब कुच्छ तो इसका मतलब ये तो नही..." राज उनके मज़ाक सुन सुन कर पक चुका था... वीरू की आँख लग गयी थी...

"सॉरी.. पर मैं देख तो लूं.. कैसी है तुम्हारी गर्लफ्रेंड.." कहते हुए स्नेहा बिस्तेर से उठी और खिड़की के सामने जाकर खिड़की खोल दी...

स्नेहा की दोनो लड़कियों से नज़र मिली.. एक बिना कोई भाव अपनी आँखों में लिए खड़ी थी.. और दूसरी फुफ्कार रही थी.. जैसे ही प्रिया ने स्नेहा को देखा.. उसने खिड़की में से गली की और थूका और उपर भाग गयी.. रिया भी उसके पिछे पिछे निकल ली..

"तुम बिल्कुल सही कह रहे थे राज.. दोनो हूबहू एक जैसी हैं.. तुम्हारी गर्लफ्रेंड कौनसी है.. गरम वाली.. की नरम वाली!" स्नेहा ने खिड़की बंद करते हुए राज से कहा...

"कोई नही है.. मेरी छ्चोड़ो.. तुम अपनी बात पूरी बताओ... गाड़ी बदल'ने के बाद क्या हुआ?" राज बड़े गौर से स्नेहा की कहानी सुन रहा था...

"ठंड रख यार.. ये सिर्फ़ हमारा वहाँ भी तो हो सकता है.. कल पूच्छ लेंगे उस'से..!" रिया ने सुबक्ती हुई प्रिया को दिलासा देते हुए कहा," मैं पूच्छ लूँगी कल.. वैसे भी अगर वो कोई ऐसी वैसी लड़की होती तो सामने थोड़े आती..."

"मैं एक बार चली जाउ?" प्रिया उठ कर बैठ गयी...

"कहाँ?"

प्रिया ने अपने आपको शांत करने की कोशिश करते हुए कहा," राज के पास... उनके कमरे पर.."

"व्हाट.. तुझे पता है तू क्या कह रही है?" रिया बिस्तेर से उच्छल पड़ी...

" हां पता है... वो इसी बात की धोंस जमा रहा है ना की वो मुझसे प्यार करता है... इसीलिए जान जोखिम में डाल कर रात को हमरे घर आ गया... मैं क्या उस'से प्यार नही करती.. मैं क्या जा नही उसके पास.. हिसाब बराबर हो जाएगा.. उसके बाद भी अगर उसने मुझे माफ़ नही किया तो मैं भी कभी उस'से बात नही करूँगी... मैं जाउ ना?" प्रिया ने रिया का हाथ अपने हाथों में लेते हुए पूचछा...

रिया से कुच्छ देर तो कुच्छ बोलते ही ना बना.. वा आँखें फाडे प्रिया को देखती रही.. फिर अचानक संभाल कर बोली," तू पागल है क्या? थोड़ी बहुत भी अकल नही बची क्या अब.. रात को दरवाजे से बाहर पैर रखने का मतलब पता है ना तुझे... काट के रख देंगे पापा.. तुझे भी.. और राज को भी.. ऐसी पागल बातें मत कर.. और आ चल कर सोते हैं.. मम्मी भी आने वाली ही होगी.. चल आजा.." रिया ने प्रिया का हाथ पकड़ कर उसको उठाया और अपने साथ बाहर खींच लिया.. दरवाजे को ताला लगाया और उसको हाथ पकड़े पकड़े ही नीचे ले गयी....

" आ गयी तुम.. मैं बस उपर आने ही वाली थी.. ज़्यादा शोर मत करना.. तुम्हारे पापा कल रात से सोए नही हैं.. उठ गये तो गुस्सा करेंगे...! जल्दी से अपना दूध ख़तम करो और सो जाओ!" मम्मी ने कहा और अपने बेडरूम में चली गयी... उनके पापा के पास!

"देख रिया.. आज पापा भी गहरी नींद में होंगे.. प्लीज़ जाने दे ना! ... मैं बस 5 मिनिट मैं आ जाउन्गि..." प्रिया ने उसके कान में धीरे से कहा...

"तू है ना.. अपने साथ साथ मुझे भी मरवाएगी.. देख प्रिया.. मेरे सामने ऐसी बात मत कर.. मुझे डर लग रहा है... सो जा चुपचाप!" कहकर रिया ने अपना दूध ख़तम किया.. और बिस्तर पर लेट गयी... प्रिया भी क्या करती.. बेचारी.. प्यार का भूत उसके सिर पर बुरी तरह सवार हो चुका था.. वह लेट तो गयी.. पर नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी.. उसकी आँखों में तो अब राज बस चुका था..

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करीब एक घंटा बीट गया.. घर की सब लाइट्स बंद थी.. प्रिया ने अपना सिर उठाकर रिया को देखा.. वह दूसरी और मुँह किए सो रही थी.. नींद में उसका नाइट स्कर्ट उसकी जांघों से कहीं ज़्यादा उपर उठा हुआ था.. पॅंटी उसके नितंबों से बुरी तरह चिपकी हुई थी.. ,"नालयक!" कहते हुए प्रिया ने उसका स्कर्ट नीचे खींच दिया.. प्रिया को राज के द्वारा रिया के नितंबों पर काटी गयी चुटकी याद आ गयी... वह बेचैन हो उठी.. खड़ी होकर बाथरूम में गयी और फिर बिना कुच्छ किए ही वापस आ गयी.. मम्मी पापा के बेडरूम का दरवाजा आराम से खोल कर देखा.. वो अंदर से बंद था..

प्रिया वापस लौट आई.. वह गहरी असमन्झस में थी.. समझ नही आ रहा था की करे तो क्या करे... अंतत: उसके ज़ज्बात उसके भय पर हावी हो गये.. चुपके से मैं गेट की चाबी उठाई और दबे पाँव बाहर निकल गयी...

आँगन में जाने के बाद उसने आँगन की लाइट्स ऑफ कर दी.. धीरे से ताला खोला और ताला दरवाजे में ही टँगे रहने दिया.. उसके हाथ पैर बुरी तरह काँप रहे थे.. एक पल को वापस मूडी.. राज और फिर भगवान को याद किया.. और सारे समाज और घर वालों के डर को दरकिनार कर देहरी लाँघ गयी.. इज़्ज़त की देहरी..

प्रिया ने घर से बाहर कदम रखा ही था की उसकी मम्मी जमहाई लेते हुए अपने बेडरूम से बाहर निकली... बाथरूम में जाकर आई और फिर प्रिया और रिया के बेडरूम में चली गयी.. देखा बेड पर अकेली रिया ही सो रही है..

"रिया... आ रिया.." मम्मी ने रिया को पकड़कर हिल्या.. रिया गहरी नींद में थी...," उम्म्म्मममममम.. क्या है?" वह कसमसाई और करवट बदलकर फिर से चित्त हो गयी...

"ऱियाआअ!" मम्मी ने उसको ज़ोर से झकझोरा...

" क्या है मम्मी.. सोने दो ना!" रिया ने नींद में ही कहा...

"प्रिया कहाँ है?" उसकी मम्मी चिंतित सी हो गयी थी..

"होगी.. बाथरूम में.. मुझे क्या पता..?" और अचानक ही रिया चोंक कर उठ बैठी.. उसको सोने से पहले की प्रिया की बात याद आ गयी... कहीं..?," बाथरूम में होगी मम्मी.. आप सो जाओ जाकर.." रिया काँप सी उठी.. अब क्या होगा.. अगर... उसने मन ही मन सोचा..

"बाथरूम की तो कुण्डी बंद है बाहर से.. कहाँ गयी कारामजलि.. मुझे तुम्हारे लक्षण अच्छे नही लग रहे कुच्छ दीनो से.. तुम फोन वोन तो नही रखती हो ना..?"

रिया ने मम्मी की बातों पर ध्यान ही नही दिया..," मम्मी.. वो उपर चली गयी होगी पढ़ने.. उसका काफ़ी काम बाकी था.. मैं देखकर आती हूँ.." कहकर रिया उपर भाग गयी.. मम्मी ने उसको रोकने की कोशिश भी की.. पर तब तक तो वो सीढ़ियों पर जा चुकी थी...

" इनको भी पढ़ने का टाइम ही नही पता.. जब देखो किताब खोलकर बैठ जाती हैं... अब देखो ना.. ये भी कोई पढ़ने का टाइम है भला...?" अंगड़ाई लेकर बाहर निकले अपने पति को देखकर वो बोली.... विजेंदर की नींद पूरी हो गयी थी.. शाम 6 बजे से ही सोया हुआ था वो...

"अरे भाई.. आजकल कॉंपिटेशन का जमाना है.. टाइम देखकर पढ़ेंगी तो पिछे नही रह जाएँगी भला....." विजेंदर ने कहा और अपनी बीवी के पास आकर बेड पर बैठ गया," पर इनको कह दो.. रात को उपर पढ़ने की कोई ज़रूरत नही है... अगर पढ़ना है तो यहीं पढ़ें.. नीचे...!"

" मैने तो जाने कितनी बार कहा है जी.. पर माने तब ना! कहती हैं.. टी.वी. की आवाज़ में डिस्टर्ब होती हैं.." मम्मी ने सफाई दी...

" तुम कभी पिछे जाकर देखती भी हो क्या? पढ़ती भी हैं या... चलो उपर चलते हैं..." विजेंदर यही समझ रहा था की दोनो अभी तक उपर पढ़ रही हैं.. उसको ये अहसास भी नही था की प्रिया सोने के बाद गायब हुई है.. और अब रिया उसको देखने गयी है...

" मेरे तो घुटनो में दर्द है जी.. मुझसे नही चढ़ा जाता बार बार उपर...." मम्मी ने कहा ही था की रिया नीचे आ गयी.. और पापा को वहीं बैठा पाकर सहम गयी..," व्व वो.. उपर ही ... है.. मम्मी.. अपना काम कर रही है.. अभी आ जाएगी.. 10 -15 मिनिट में..." रिया ने हकलाते हुए कहा.....

विजेंदर के पॉलिसिया दिमाग़ में रिया की बातों में गड़बड़ की बू आई..कुच्छ सोचते हुए.. वो खड़ा हुआ और बोला," आइन्दा से तुम दोनो नीचे ही पढ़ा करो.. टी.वी. नही चलेगा... और कहकर वापस अपने कमरे में चला गया," कुच्छ खाने को है क्या? भूख लगी है!"

" है जी.. अभी लाती हूँ.. आप बैठो.." कहकर उसकी मम्मी किचन में चली गयी...

"रिया बिस्तर पर बैठी बैठी काँप रही थी.. और दुआ कर रही थी की प्रिया जल्दी आ जाए.. और उसके मम्मी पापा को पता ना चले...

"अरे.. आज मैने दरवाजा खुला ही छ्चोड़ दिया..! किचन से आँगन का बल्ब जलते ही उसकी नज़र दरवाजे पर टँगे ताले पर पड़ी... वह बाहर गयी और दरवाजा लॉक करके वापस आ गयी.. रिया का दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा...

उसकी मम्मी ने अंदर आकर चाबी स्लॅब पर रख दी थी.. रिया ने हिम्मत करके चाबी उठाई और मम्मी के बेडरूम में जाते ही ताला फिर खोल आई.. भाग कर...

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उधर राज और वीरू सो गये थे.. स्नेहा अपने मोहन के ख़यालो में खोई हुई थी और जल्दी से सुबह होने का इंतजार कर रही थी.. दरवाजे पर हुई दस्तक से वह चौंक गयी.. बिस्तर से उठी और राज को उठाने की सोची...," इश्स वक़्त यहाँ मोहन के अलावा और कौन आ सकता है.." ये सोचकर वा खिल उठी और एकदम से जाकर दरवाजा खोल दिया....

सामने अपने सिर और चेहरे को चुननी से ढके प्रिया खड़ी थी.. दरवाजा खुलते ही वह भाग कर अंदर आ गयी और चुननी उतार दी... स्नेहा ने पहचान लिया..," प्रिया?"

प्रिया ने सहमति में सिर हिलाया और कमरे में नज़रें दौड़ाई.. राज ज़मीन पर बिस्तर बिच्छाए चैन से सोया पड़ा था..

"तुम कौन हो?" प्रिया सोचकर आई थी की जाते ही उस लड़की तो खबर लेनी ही है.. पर यहाँ तो डर के मारे उसकी आवाज़ ही मुश्किल से निकल पा रही थी...

"मैं इनकी बेहन हूँ.." स्नेहा ने मुस्कुराते हुए कहा...

"किसकी..?" प्रिया ने कांपति हुई आवाज़ में पूचछा..

"दोनो की.. क्या तुम यही पूच्छने के लिए आई हो.. इतना डरी हुई क्यूँ हो.. आओ बैठहो..." स्नेहा ने प्यार से अपनी होने वाली भाभी के चेहरे को उसकी थोड़ी पर हाथ लगाकर उपर उठाया...

" पर ये तो सगे भाई नही हैं ना.. फिर तुम दोनो की बेहन कैसे हुई..?" प्रिया ने भोलेपन से पूचछा...

"क्या खून का रिश्ता ही रिश्ता होता है... सग़ी तो मैं इनमें से किसी की भी नही हूँ.. पर दोनो मेरे लिए अपनो से कहीं बढ़कर हैं... तुम बैठो ना.. मैं राज भैया को जगाती हूँ..!" स्नेहा ने उसका हाथ पकड़ कर अपनी और खींचा...

प्रिया के दिल को बड़ी तसल्ली मिली.. ये सब सुनकर.. उसने तो यूँही जान आफ़त में डाल ली थी..," नही.. अब मैं जा रही हूँ.. घर वाले जाग गये तो..."

"प्लीज़.. सिर्फ़ एक मिनिट.." और स्नेहा जाकर राज को जगाने लगी... ," राज.. राज! देखो ना कौन आया है..?

राज हड़बड़ा कर उठ बैठा और जैसे ही उसने प्रिया को अपने कमरे में खड़े देखा वा उच्छल पड़ा.. एक बार को तो उसको अपनी आँखों पर विस्वास ही नही हुआ," तूमम्म????? यहाँ क्यूँ आई हो.. मतलब.. कैसे आ गयी? डर नही लगा..." राज ने खड़े होते हुए अपने कपड़ों को ठीक किया...

प्रिया अपने हाथ बाँधे.. सिर झुकाए.. खड़ी थी.. वह अभी भी काँप ही रही थी.. जाने घर से निकलते हुए उसमें कहाँ से इतनी हिम्मत आ गयी थी..

"बेचारी पहले ही डरी हुई है.. तुम और डरा दो इसको.. तुम्हारे लिए इतनी हिम्मत करके आई है.. अब तो प्यार से बात कर लो..." स्नेहा ने तुनक्ते हुए कहा...

सहमी हुई सी प्रिया राज को इतनी प्यारी लग रही थी की उसका दिल चाह रहा था.. अभी के अभी उसको बाहों में भरकर उसका हर अंग चूम डाले.. उसके रोम रोम को महसूस कर ले.. पर ये सब करना सोचने से कहीं ज़्यादा मुश्किल था...," पूच्छ ही तो रहा हूँ.. घर वाले जाग गये तो क्या होगा?"

" मैं बस सॉरी बोलने आई थी...!" प्रिया ने नज़रें उठाकर रात भर के लिए अपने मन में राज का प्यारा चेहरा क़ैद कर लिया...

"ओहो.. कितनी बार सॉरी बोलॉगी.. बोल तो दी थी.. स्कूल में..!" राज उसके सामने आकर खड़ा हो गया...

प्रिया को लगा राज की नज़रें उसके शरीर में गड़ रही हैं.. उसका बदन अकड़ने सा लगा था.. डर के बावजूद," पर तुमने माफ़ कहाँ किया था!" उसने राज की नज़रों से नज़रें मिलाई.. दिल किया की कल रात की अधूरी हसरत अभी पूरी कर ले.. लिपट जाए राज से.. और अपने बदन को ढीला छ्चोड़कर उसमें समा जाने दे.. पर हिम्मत दोनो में से किसी में नही थी.. स्नेहा जो पास खड़ी थी..

"पागल.. माफ़ क्या करना था.. मैं नाराज़ नही था.. मैं तो यूँही बस..." राज के हाथ प्रिया के चेहरे की और बढ़े.. पर बीच में ही रुक गये... अचानक दरवाजा खुला और रिया बदहवास सी कमरे में घुस आई.. वह इतनी हड़बड़ाहट में थी की उनके उपर गिरते गिरते बची... उसके पैरों में खड़े रहने की हिम्मत बची ही नही थी.. वह अंदर आते ही बेड पर बैठ गयी...," सब कुच्छ ख़तम हो गया प्रिया.. सब कुच्छ ख़तम हो गया... समझ लो मारे गये... ओह माइ गॉड!"

प्रिया उसकी बात का मतलब समझ कर धदाम से ज़मीन पर आ गिरी.. राज ने उसको संभाला और रिया से बोला," क्या हुआ रिया?"

स्नेहा को तो बोलने का भी अवसर नही मिला....

"सब कुच्छ ख़तम हो गया राज.. मैने इसको माना किया था.. पर फिर भी ये आ गयी.. इतना सा भी नही सोचा इसने... पापा जान से मार डालेंगे... छ्चोड़ेंगे नही..." रिया ने हानफते हुए कहा...

प्रिया ने तो ज़ोर ज़ोर से रोना शुरू कर ही दिया था.. अगर राज उसके मुँह पर हाथ रखकर.. उसको चुप रहने के लिए ना कहता तो," साफ साफ बताओ ना रिया.. बात क्या है...?"

कमरे में इतनी फुसफुसाहट सुनकर वीरेंदर की नींद खुल गयी.. आँखें खोलकर उपर देखते हुए जैसे ही उसने प्रिया और रिया को वहाँ देखा.. वह भी चौक पड़ा..," ये क्या तमाशा लगा रखा है? क्या मुसीबत आ गयी आख़िर.. रात को तो चैन से सो जाया करो.. ये कोई इश्क़ फरमाने का टाइम है.."

"चुप हो जाओ वीरू भैया.. बाहर कोई सुन लेगा.." स्नेहा जाकर वीरू के पास बैठ गयी...

"क्या आफ़त आ गयी.. बताओ तो सही..?" वीरू ने इश्स बार धीरे से कहा...

प्रिया ने जैसे तैसे करके अपने आपको संभाला और उठकर रिया के पास जाकर खड़ी हो गयी,"पापा जाग गये क्या..?"

"हां! पापा भी जाग गये और मम्मी भी.. मम्मी ने मुझे उठाया था.. ये पूच्छने के लिए की तुम कहाँ हो.. मैने उपर आकर देखा और वापस जाकर झूठ बोल दिया.. की तुम उपर पढ़ रही हो.. फिर मम्मी पापा के लिए खाना बनाने लगी.. मैने तुम्हारा कितना इंतजार किया.. मम्मी ने वापस ताला लगा दिया था.. वो भी खोला.. पर तुम नही आई प्रिया.." कहते हुए रिया रोने लगी...

" फिर उनको पता लग गया क्या?" प्रिया का दिल बैठ गया...

" खाना खा कर पापा और मम्मी तुम्हे बुलाने उपर चले गये.. अब तक तो उनको पता लग ही गया होगा..." रिया ने रोते रोते ही बताया...

"पर तू क्यूँ यहाँ आई पागल.. अब तू भी फँसेगी.." प्रिया के चेहरे पर मायूसी और डर ने डेरा डाल रखा था...

तीनो उनके बीच हो रही बात को ध्यान से सुन रहे थे....

" तो मैं अब और क्या करती.. तुझे पता नही चलता तो तू वापस चली जाती.. और फिर तेरा क्या होता.. पता है ना...

वीरेंदर काफ़ी देर से चुपचाप बातें सुन रहा था.. जो कुच्छ हुआ.. उस पर वह भी दुखी था.. पर अब किया ही क्या जा सकता है...,"वापस तो अब भी जाना ही पड़ेगा..!"

" नही.. मैं घर वापस नही जाउन्गि..!" प्रिया ने नज़रें उठाकर राज के चेहरे की और देखा...

राज की तो कुच्छ समझ में आ ही नही रहा था.. "अब क्या किया जाए..?"

"एक आइडिया है...!" स्नेहा ने कहा....

"क्या.. जल्दी बताओ ना.." राज तुरंत बोला...

"यहाँ से सभी भाग चलते हैं.... अभी के अभी..." स्नेहा को तो जैसे भागना ही सबसे अच्च्छा लगता था.. स्वच्छन्द आकाश के नीचे खुली हवा मैं.. जहाँ कोई बंधन ना हो.. उसको अहसास नही था शायद की हमारे समाज में लड़की के 'भागने' का क्या मतलब होता है... कहकर उसने चारों के चेहरे की और देखा.. प्रिया और रिया की तरफ से कोई रिक्षन नही आया.. राज भी मुँह बनाए खड़ा रहा.. पर वीरेंदर से ना रुका गया," क्यूँ नही.. बस इसी बात की कमी रह गयी है.. भाग चलो...!" उसने मुँह पिचकाया...

"अरे मैं कोई हमेशा के लिए भागने को थोड़े ही कह रही हूँ.. इनके मम्मी पापा का गुस्सा शांत नही होता.. तब तक.. बाद में फोन करके माफी माँग लेंगे... क्यूँ राज?"

"वैसे हम साधारण लोगों के लिए ये सब इतना आसान नही होता स्नेहा.. जितनी आसानी से तुमने कह दिया.. भागने का मतलब अपने घर परिवार और सारे समाज से कट जाना होता है.. हमेशा के लिए... वापस आना मुमकिन नही.. और कुच्छ सोचो..." राज ने कहा..

"और कुच्छ तो तुम्ही सोचो फिर.." स्नेहा भी मुँह बनाकर रिया और प्रिया की लाइन मैं बैठ गयी...

"जो कुच्छ सोचना है.. ये दोनो सोच लेंगी.. इसको ही फितूर सवार हुआ था ना.. रात में घर से निकलने का.. तुम क्यूँ परेशान हो रहे हो..?" वीरू ने लेटे लेटे ही कहा...

वीरू के मुँह से ऐसी बात सुनकर रिया को रोना आ गया..," ठीक है प्रिया.. चल कहीं और चलें.. अब हमें ही भुगतना पड़ेगा.. ग़लती भी तो हमने ही की है.. "

"रूको! मैं भी साथ चलूँगा..." राज ने रिया का हाथ पकड़ लिया....

" मैं रिया हूँ.. प्रिया नही.." रिया ने सुबक्ते हुए मासूमियत से कहा..

"पता है मुझे..!" राज ने कहा...

स्नेहा ने विचलित होकर वीरू की और देखा... वह भी कहने ही वाली थी.. "मैं भी चालूंगी.." पर वीरू को ऐसे छ्चोड़कर कैसे जाती..?

"राज.. इधर आकर खड़ा होने में मदद कर ज़रा.." वीरू ने हाथ का सहारा लेकर बैठते हुए कहा...

राज उसके पास गया और उसको सहारा देकर खड़ा कर दिया.. वीरू ने चोट वाली जाँघ पर एक दो बार...वजन बना कर देखा," चलो.. 'भाग' कर देखते हैं..."

मुरझाए हुए सभी के चेहरे वीरू के इस अंदाज पर खिलखियाए बिना ना रह सके.. खास तौर से रिया का चेहरा.. वह तो वीरू पर फिदा ही हो गयी थी...

"तुम्हे चोट लगी है क्या? इसीलिए स्कूल में नही आए क्या तुम आज.." रिया ने वीरू को पहली बार टोका...

वीरू ने उसकी बात का कोई जवाब नही दिया," सोच लो.. हम चार लोग हैं.. बाहर का खर्चा बहुत होगा....

" उसकी चिंता मत करो.. मैं हूँ ना.." स्नेहा चाहक उठी थी," और फिर मोहन आकर फोन करेगा ही.. उसको भी वहीं बुला लेंगे.... क्या कहते हो..?"

"फिर ठीक है.. पर निकलेंगे कैसे?" वीरू ने बाहर निकलने की तैयारी शुरू कर दी...

खामोश खड़ी रिया ने सब लोगों को गिना.. वो तो 5 हैं.. फिर वीरू 4 की बात क्यूँ कर रहा है.. हिचकिचाते हुए बोली," मैं भी हूँ!"

" तुम क्या करोगी? तुम तो वापस जा सकती हो ना..." राज ने कहा...

" मैं कैसे जा सकती हूँ अब.. वापस आकर घर वालों ने मुझे भी तो ढूँढा होगा... वैसे भी प्रिया के बिना मैं नही रह सकती.. वो जब वापस आएगी.. मैं भी आ जाउन्गि...!" रिया ने वीरू की और देखते हुए कहा.. उसको विश्वास था की वीरू पक्का टाँग अड़ाएगा...

" फिर तो मम्मी पापा को भी बुला लो ना... उन्होने क्या जुर्म कर दिया ऐसा.. वो भी तुम दोनो के बगैर कैसे रहेंगे.. आख़िर!" वीरू ने टेढ़ी नज़र से रिया पर व्यंग्य किया.. रिया राज के पिछे छिप गयी..

"ले चल यार.. जब उखल में सिर दे ही लिया है तो मूसल से क्या डरना...!" राज ने वीरू से रिक्वेस्ट सी की.....

"अरे मैं तो तेरे भले के लिए ही कह रहा हूँ.. तू कन्फ्यूज़ रहेगा.. कौनसी रिया है और कौन प्रिया? तुझे प्राब्लम नही है तो मुझे क्या.. मुझे कौनसा इसको पीठ पर बैठकर ले जाना है.." वीरू की बात पर सभी मुँह पर हाथ रख कर हँसने लगे...

"तेरी पीठ पर तो चढ़कर रहूंगी बेटा!" रिया मन ही मन सोचकर खिल उठी...

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फिर वही बात, होनी टाली ही नही जा सकती.. वरना भगवान ने तो रिया की कारून फरियाद सुन ही ली थी.. जीने मैं चढ़ते हुए.. विजेंदर का पैर फिसल गया और वो स्लिप करता हुआ 3 स्टेप्स नीचे आकर रुका.. उसका घुटना ज़ख्मी हो गया था...

पिछे पिछे उपर चढ़ रही उनकी मुम्मी ने पहले अपने आपको बचाया और फिर बैठकर विजेंदर को," आप ठीक तो है ना..?"

"आ.. मुझे नीचे ले चलो.. मर गया री मा..!" विजेंदर अपना घुटना पकड़ कर सीढ़ियों पर ही बैठ गया था...

उसकी बीवी उसको सहारा देकर नीचे ले गयी और वापस ले जाकर बेड पर लिटा दिया और रिया को आवाज़ लगाई," रिया.. जल्दी आ.."

रिया वहाँ थी कहाँ जो आती..

" उसको क्यूँ परेशान कर रही हो.. सोने दो बेचारी को.. बेवजह परेशान होगी.. कुच्छ खास चोट नही है.. एक दो दिन में ठीक हो जाएगी.. तुम बस यहाँ पर थोड़ी मालिश कर दो.. बहुत दुख रहा है.." विजेंदर ने पिच्छवाड़े को हाथ लगाते हुए इशारा किया...

"प्रिया को तो बुला लाऊँ.. पहले..?"

"रहने दो.. वो वहीं सो गयी होगी क्या पता.. सुबह अपने आप आ जाएगी..." विजेंदर का पूरा ध्यान अब अपनी चोट पर था...

"ठीक है.." उसने कहा और 'मूव' उठाकर लाई और दरवाजा बंद करके विजेंदर की पॅंट निकाल कर मालिश करने लगी...

"बस बहुत हो गया.. सो जाओ अब..!" विजेंदर ने कहा..

" ठीक है जी.. कुच्छ दिक्कत हो तो उठा लेना.." कहकर उसकी बीवी ने लाइट बंद करी और साथ लेटकर सो गयी.................

वो सब एक एक करके बाहर निकालने की तैयारी कर ही रहे थे की अचानक किसी ने उनका दरवाजा खटखटाया.. लड़कियों समेत सभी सहम गये..," अब क्या करें?" इशारों ही इशारों में सब ने एक दूसरे से पूचछा...

दोबारा फिर दस्तक हुई.. इस बार कुच्छ ज़्यादा ही जोरदार.. डर कर प्रिया और रिया एक दूसरी से चिपक गयी..

"तुम सब बाथरूम में घुस जाओ.. मैं देखता हूँ..!" राज ने तीनो को बाथरूम में बंद कर दिया और नींद में होने का नाटक करता हुआ दरवाजे के पास गया," कूऊउउउन्न है भाई?"

"दरवाजा खोलो!" बाहर से आई आवाज़ एकद्ूम कड़क थी..

"पर बताओ तो तुम हो कौन?" राज आवाज़ सुनकर ही डर गया था...

" मैं विकी.. सॉरी.. मोहन का दोस्त हूँ.. दरवाजा खोलो जल्दी.." बाहर से आवाज़ आई..

मोहन का नाम सुनकर राज को थोड़ी राहत पहुँची.. पर दरवाजा खोलते हुए डर अब भी उसके दिल में कायम था.. कुण्डी खोलकर उसने दरवाजा हूल्का सा खोल दिया.. बाकी काम टफ ने खुद ही कर दिया.. बिना देर किए टफ कमरे के अंदर था..

"स्नेहा तुम्हारे पास है ना!" टफ ने सीधे सीधे सवाल किया...

टफ के डील डौल और उपर से उसकी रफ आवाज़ ने राज को झूठह बोलने पर

विवश कर ही दिया..," क्क्कौन स्नेहा..? हम किसी स्नेहा को नही जानते... क्क्कौन है... आप?"

" देखो भाई.. डरने की कोई ज़रूरत नही है.. मैं मोहन का दोस्त हूँ.. अजीत! उसने ही मुझे स्नेहा को यहाँ से ले जाने को बोला है.. बता दो.. कहाँ है वो..?" टफ ने अपना लहज़ा निहायत ही नरम कर लिया.. फिर भी राज को तसल्ली ना हुई.. वीरू चुपचाप बेड पर बैठा सब कुच्छ देख सुन रहा था...

" ववो.. मोहन का फोन आया था.. वो तो चली गयी.. मोहन ने ही बुला लिया उसको.." राज ने फिर झूठ बोला...

" देखो.. मुझे पूरा यकीन है कि तुम झूठ बोल रहे हो.. पर अगर ये सच है तो स्नेहा की जान ख़तरे में है.. ये जान लो! अगर तुम उस लड़की की जान बचना चाहते हो तो प्लीज़ बता दो.. वो है कहाँ..?" टफ ने कमरे में छान बीन शुरू करने से पहले उस'से आख़िरी बार पूचछा...

राज की नज़रें झुक गयी.. स्नेहा की जान ख़तरे में होने की बात कहकर टफ ने उसको असमन्झस में डाल दिया था... उसको समझ नही आ रहा था.. कि वो क्या करे!

वीरू आख़िरकार बोल ही पड़ा," राज! स्नेहा को निकल लाओ बाथरूम से.." कहते हुए उसने अपने पैर से बेड के नीचे रखी बेसबॉल की स्टिक को आगे सरका लिया.. किसी अनहोनी का मुक़ाबला करने के लिए...

दरवाजा खोलो स्नेहा.. मोहन का दोस्त है कोई.. बाहर आ जाओ!" राज ने बाथरूम का दरवाजा थपथपाया...

स्नेहा दरवाजा खोलकर बाहर निकल आई.. रिया और प्रिया अभी भी बाथरूम में ही छिपि हुई थी..

"तुम्ही हो स्नेहा..?" टफ ने स्नेहा से सवाल किया..

स्नेहा ने अपनी नज़रें उठाकर जवाब दिया," जी.. आप मोहन के दोस्त हैं..?"

"हाँ.. और मैं तुम्हे लेने आया हूँ.. अभी तुम्हे मेरे साथ चलना होगा!"

" पर मैं कैसे मान लूँ.. आप उनके दोस्त हैं.. उनसे बात करा दीजिए मेरी.." स्नेहा ने कहा..

" देखो ज़िद करने का वक़्त नही है.. मैं तुम्हारी बात करा देता.. पर उसका फोन फिलहाल ऑफ है.. ये देखो.. ये उसी का नंबर. है ना.. देखो कितनी बार बात हुई हैं उस'से आज मेरी.. अभी कुच्छ घंटे पहले तक वो मेरे ही साथ था... वो आ नही सकता था.. इसीलिए मुझे भेज दिया.. अब जल्दी चलो.. वरना अनर्थ हो जाएगा..." टफ ने उसको अपनी कॉल डीटेल दिखाई..

" पर इसमें तो आपने नंबर. विकी नाम से सेव किया हुआ है.." स्नेहा ने आशंकित नज़रों से टफ की और देखा

"हां.. वो मैं उसको विकी ही बोलता हूँ.. प्यार से..." टफ को भी टेढ़ी उंगली इस्तेमाल करनी पड़ी...

स्नेहा के पास विश्वास करने के अलावा कोई और चारा बचा ही नही था... मोहन ने एक बार उसको बोला भी था.. की लोहरू छ्चोड़ने के बाद वो उसको लेने के लिए किसी दोस्त को भी भेज सकता है..

" हम कहाँ जाएँगे..अभी..!" स्नेहा ने आख़िरी सवाल किया...

"कहाँ जाना चाहती हो..?"

"लोहरू! वहाँ मोहन के दोस्त शमशेर की ससुराल है.." स्नेहा ने कहा..

टफ ने राहत की साँस ली..," शमशेर से बात कर्वाउ क्या अभी?"

" नही रहने दो.. वैसे भी मैं उन्हे नही जान'ती.. पर..." कहकर स्नेहा ने वीरू की और देखा...

" पर क्या? .... बोलो?" टफ ने कहा..

" मेरे साथ मेरी 2 सहेलियाँ भी जाएँगी.." स्नेहा ने झिझकते हुए कहा...

" कहाँ हैं तुम्हारी सहेलियाँ? ले चलो.. मुझे क्या प्राब्लम है भला? टफ ने कमरे में नज़र दौड़कर बाथरूम के दरवाजे पर नज़र टीका दी..

" एक मिनिट.." स्नेहा ने कहा और बाथरूम से दोनो को बाहर निकल लाई.. दोनो लाइन में खड़ी थी.. प्रिया रिया के पिछे चिपकी खड़ी थी...

"वाह भाई वाह.. ये तो एक दूसरी की फोटोकॉपी हैं.. चलो.. जल्दी चलो..!" टफ ने दोनो को गौर से देखते हुए कहा...

" आप दोनो रहने दो भैया... खंख़्वाह पड़ोस वालों को शक होगा.. अब हम चले तो जाएँगे ही.." स्नेहा ने वीरू और राज की और देखते हुए कहा..

राज का साथ चलने का बहुत मॅन था.. उसके तो सारे अरमान ही धरे के धरे रह गये.. उसने वीरू की और देखा...

"नही स्नेहा! हम भी साथ ही चलेंगे..!" वीरू ने स्टिक उठाई और उसके सहारे खड़ा हो गया.. स्नेहा को किसी भी जोखिम में वो अकेला नही छ्चोड़ना चाह रहा था....

राज के तो बिन बोले ही वारे न्यारे हो गये...

" भाई.. जिसको भी चलना है.. जल्दी से नीचे चलकर गाड़ी में बैठो.. हमारे पास टाइम नही है इतना.." टफ ने झल्लाते हुए कहा...

उसके बाद किसी ने देर नही लगाई.. वहाँ से निकलने की जल्दी तो उन्हे भी थी.. किस्मत से अब उनको रास्तों पर भटकना नही पड़ेगा.. सभी जाकर गाड़ी में बैठ गये..

टफ ने रोड पर निकलते ही शमशेर के पास फोन किया..," हां भाई.. ले आया हूँ.. स्नेहा को.. शुक्रा है.. अभी तक पहुँचा नही था वो..!"

"कौन है.. मोहन है क्या?" स्नेहा ने आगे गर्दन निकालते हुए कहा..

" नही शमशेर है.. लो भाई.. एक बार बात करना..."

" नमस्ते सर!" स्नेहा ने झिझकते हुए कहा.. विकी ने स्नेहा को बता रखा था कि शमशेर टीचर है..

" नमस्ते बेटा..! किसी बात की फिकर मत करना.. ठीक है ना..." शमशेर ने प्यार से कहा...

" जी.. अब सब ठीक है.. मैं तो डर गयी थी.." स्नेहा ने भी उतनी ही विनम्रता से जवाब दिया..

" ओ.के. मेरा नंबर. भी ले लेना.. कोई दिक्कत हो तो फोन कर देना.. वैसे टफ भी हमारा भाई ही है.. उसको फोन देना ज़रा.." शमशेर ने कहा...

" ये लो सर!" स्नेहा की आँखें चमक उठी.. अब उसको कोई फिकर नही थी.. वो सही आदमी के साथ थे...

" विकी कहाँ है अब?" शमशेर ने टफ से पूचछा..

" पता नही भाई.. उसका तो फोन ऑफ आ रहा है..मेरे पास से तो निकल गया था.. 7 8 बजे के आसपास..." टफ ने जवाब दिया..

" पता नही यार.. वो कैसे लाइन पर आएगा.. चल अच्च्छा.. रखता हूँ..!" कहकर शमशेर ने फोन काट दिया....