खूनी हवेली की वासना compleet

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raj..
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Re: खूनी हवेली की वासना

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 13:17

खूनी हवेली की वासना पार्ट --28

गतान्क से आगे........................

कल्लो के करीब होने के वजह से अब रूपाली को उसको चूचियाँ नज़र नही आ रही थी. बस उन दोनो के जिस्म के बीच रूपाली अपने हाथ घुसाकर चूचियाँ दबाए जा रही थी. कल्लो की उखड़ी हुई गरम साँस उसको अपने गले पर महसूस हो रही थी जो धीरे धीरे उसके पुर जिस्म को गरम कर रही थी.

नशे की सी हालत में कल्लो आहें भर रही थी और जब रूपाली ने एक बार फिर उसके निपल्स को दबाया तो वो और भी रूपाली से सॅट गयी. और तब पहली बार रूपाली को उसकी छातियाँ अपनी खुद की छातियों पर महसूस हुई.

एक अजीब सा मज़ा उसके शरीर में भर गया. पहली बार था के किसी और औरत की छातियाँ उसको अपनी छातियों पर महसूस हो रही थी और रूपाली के आनंद की जैसे कोई सीमा नही रही.

और यही वो वक़्त था जब उसको पहली बार समझ आया के क्यूँ कल्लो उसको बार बार अपनी चूचियाँ दबाने को कहती रहती है.

कल्लो की चूचियो का दबाव जब उसकी अपनी चूचियो पर पड़ा तो रूपाली ने भी अपने हाथ चूचियो से हटाकर कल्लो के पीठ पर रख लिए और उससे सॅट गयी. ऐसा करने का उसका इरादा बस यही था के अपनी चूचियों के और ज़ोर से कल्लो की चूचियों पर दबाए. ऐसा करने से उसके सीने में ऐसे एक करेंट सा दौड़ रहा था और वो और कस्के कल्लो से सटी जा रही थी.

कल्लो फ़ौरन समझ गयी के रूपाली क्या करने की कोशिश कर रही है. उसके हाथ रूपाली की पीठ से हटे और दोनो के जिस्म के बीच आते हुए साइड रूपाली की जवान होती चूचियो पर आ गये.

वो पहला मौका था के रूपाली ने अपने जिस्म पर अपने सिवाय किसी और के हाथों को महसूस किया था. कल्लो ने उसकी चूचियो को एक ही पल में ऐसे रगड़ दिया के दर्द की एक लहर उसके पुर जिस्म में दौड़ गयी.

"आआहह कल्लो" रूपाली बोली "धीरे से"

उधर कल्लो भी उसका इशारा समझ गयी. रूपाली ने उसको रोकने की कोई कोशिश नही की थी. उसने अपने हाथों को थोड़ा सा ढीला छ्चोड़ा और रूपाली की चूचियों को मसल्ने लगी.

रूपाली ने पूरी तरह से कल्लो से लिपट गयी. कल्लो कर सर उसके कंधे पर और उसका कल्लो के कंधे पर ऐसे था जैसे दोनो गले मिल रही हों. कल्लो ने एक बार फिर अपने हाथ का दबाव बढ़ाया और पूरे ज़ोर से रूपाली की चूचियो को दबाने लगी.

उधर रूपाली का जिस्म थोड़ी देर के लिए ऐंठ गया और फिर अपने आप ही ढीला पड़ता चला गया. उसके पूरे शरीर में आनंद की एक लहर सी दौड़ गयी और उसे ऐसा लगने लगा जैसे के वो नशे में हो, जैसे हवा में उड़ रही हो. कल्लो के जिस्म पर उसके गिरफ़्त ढीली पड़ गयी और वो धीरे धीरे बिस्तर पर गिरती चली गयी.

कल्लो ने उसको सहारा देकर सीधा लिटाया. रूपाली की आँखें अब बंद हो चली थी. 2 हाथ अब भी उसकी चूचियाँ दबा रहे थे.

"आआअहह छ्होटी मालकिन" उसको कल्लो की आवाज़ सुनाई दी तो उसने अपनी आँखें खोली "कितनी सख़्त हैं आपकी चूचियाँ"

रूपाली ने आँखें खोलकर देखा. अंधेरे में भी अब उसको साफ दिखाई दे रहा था. कल्लो साइड में लेटी उसके उपेर झुकी हुई थी. उसके बाल खुले हुए थे और उसकी चूचियाँ नीचे को और लटक रही थी.

अचानक कल्लो के हाथ रूपाली के सीने से हटे और वो सीधी होकर बैठ गयी. रूपाली ने नज़र घूमाकर देखा के वो क्या कर रही है. कल्लो अपनी कमर पर बँधी सारी को ढीला कर रही थी.

"पूरी नंगी?" रूपाली ने मन ही मन सोचा और उसको समझ नही आया के क्या करे.

और उसका शक सही निकला. कल्लो ने पहले अपनी सारी और फिर अपना पेटिकट उतारकर वहीं बिस्तर के नीचे गिरा दिया और पूरी नंगी होकर रूपाली से आकर सॅट गयी.

रूपाली को साइड से अपने हाथ पर कल्लो का पेट और उसकी नंगी जाँघ महसूस हुई.

"कल्लो?" उसके मुँह से सवाल की शकल में नाम निकला

"ष्ह्ह्ह्ह्ह" कल्लो ने अपने होंठों पर अंगुली रखते हुए कहा "बस मज़े लो. आज में आपको पहली बार जन्नत की सैर करती हूँ"

और फिर कल्लो ने वो किया जिसके लिए रूपाली बिल्कुल तैय्यार नही थी पर उसने कल्लो को रोकने की कोशिश भी नही की.

साइड में लेटी हुई कल्लो सरक कर पूरी तरह रूपाली के उपेर आ गयी. उसके वज़न के नीचे रूपाली को एक पल के लिए तकलीफ़ हुई पर अगले ही पल जैसे उसके जिस्म ने खुद ही अपने आपको अड्जस्ट कर लिया और कल्लो का वज़न उसे बिल्कुल भी महसूस होना बंद हो गया.

रूपाली को अब अपनी कोई होश नही रही और वो एक लाश की तरह बिस्तर पर लेटी रही. कल्लो अपनी टाँगें उसके दोनो तरफ रखे उसके उपेर सवार थी और बस रूपाली नीचे आँखें बंद किए लेटी एक अंजाने से एहसास में डूबी जा रही थी.

कल्लो की गरम साँस उसको अपने चेहरे पर महसूस हुई और फिर उसके होंठ अपने माथे पर. उसने रूपाली के माथे को चूमा, फिर बारी बारी उसके दोनो गालों को, फिर उसके गले पर, फिर नाइटी के उपेर से ही उसकी दोनो छातियो को एक एक करके चूमा और धीरे धीरे नीचे सरकने लगी.

रूपाली ने एक बार फिर आँखें खोलकर देखा. पूरी तरह से नंगी कल्लो उसके उपेर बैठी सी हुई थी और उसके जिस्म को चूमते हुए धीरे धीरे नीचे सरक रही थी. रूपाली ने एक आह भरी और फिर अपनी आँखें बंद कर ली.

उसकी टाँगों को चूमते हुए कल्लो रूपाली के घुटनो तक आई और फिर उसकी पिंदलियों पर हाथ रख कर नाइटी को उपेर सरकाने लगी.

"मुझे भी नंगी करेगी क्या?" रूपाली के दिमाग़ में सवाल बिजली की तरह उठा पर कल्लो को रोकने की ना तो उसमें हिम्मत थी और ना ही ताक़त. अपना जिस्म उसको किसी चिड़िया के पंख की तरह हल्का महसूस हो रहा था. आँखें भारी हो रही थी और उसमें जैसे इतनी भी जान नही बची थी के अपने हाथ उपेर उठा सके.

कल्लो ने धीरे धीरे उसकी नाइटी को रूपाली के पेट तक सरका दिया. सोते वक़्त रूपाली नाइटी के नीचे ना तो पॅंटी पेहेन्ति थी और ना ही ब्रा. नाइटी के उपेर सरकते ही उसे ठंडी हवा सीधी अपनी चूत पर महसूस हुई.

"नंगी कर दिया मुझे" रूपाली की दिमाग़ में फिर ख्याल उठा. ये पहली बार था के उसकी चूत किसी और के सामने खुली थी, भले ही वो कोई और एक औरत ही थी.

कल्लो यहाँ भी आकर रुकी नही. उसने नाइटी को सरकाना जारी रखा और थोड़ी ही देर बाद रूपाली की चूचियाँ भी पूरी खुली हुई थी. और फिर कल्लो ने रूपाली के कंधो को सहारा देकर थोड़ा उपेर किया और नाइटी को पूरी तरह उतार कर नीचे फेंक दिया.

"मैं नंगी हूँ ... नंगी" रूपाली का दिमाग़ फिर चिल्लाया. ठंडी हवा अब उसको अपने पूरे जिस्म पर महसूस हो रही थी.

कुच्छ देर अपने जिस्म पर जब उसे कुच्छ भी महसूस नही हुआ तो उसने आँखें खोल कर देखा. कल्लो उसकी बगल में बैठी उसको निहार रही थी.

"मालकिन" जब उसने देखा के रूपाली उसकी तरफ देख रही है तो वो बोली "बहुत सुंदर हो आप. ये कच्चे आम तो आज मैं ही खाऊंगी"

इससे पहले के रूपाली को कुच्छ समझ आता, कल्लो नीचे को झुकी और रूपाली का छ्होटा सा निपल अपने मुँह में ले लिया.

"कल्लो !!! क्या कर रही?" रूपाली बस इतना ही कह सकी. कल्लो को रोकने की ताक़त उसमें अब भी जैसे नही थी.

"बस आप मज़े लो" कल्लो ने कहा और फिर रूपाली के जिस्म पर ऐसे टूट पड़ी जैसे बरसो के भूखे को खाना मिल गया हो.

वो सरक कर फिर पूरी तरह रूपाली के उपेर आ गयी और अपने दोनो हाथों में रूपाली की चूचियाँ को पकड़कर बारी बारी चूसने लगी.

रूपाली को अब अपना कोई होश नही था. उसको बस इतना पता था के उसके जिस्म में एक करेंट सा उठ रहा था जो उसके दिमाग़ को सुन्न और उसकी आँखों को भारी कर रहा था.

कल्लो के हाथ उसको अब अपने पूरे जिस्म पर महसूस हो रहे थे. कभी पेट पर, कभी टाँगो पर, कभी छाती पर, कभी चेहरे पर.

फिर वो हाथ सरक कर रूपाली की टाँगो के बीच गया और सीधा उसको चूत पर आ गया. रूपाली का पूरा जिस्म ज़ोर से हिला, उसकी कमर ने ज़ोर का झटका खाया, एक लहर उसकी टाँगो के बीच से उठकर उसके दिमाग़ से टकराई और फिर रूपाली को कुच्छ याद नही रहा.

भारी होती आँखें अब पूरी तरह बंद हो गयी और रूपाली अपने होश पूरी तरह खो बैठी.

..................

अपनी जीप में बैठा ख़ान गाओं से गुज़रता पोलीस स्टेशन की तरफ जा रहा था. तभी उसकी नज़र सामने सड़क पर चलती बिंदिया पर पड़ी.

दोपहर का वक़्त था. सड़क पर बिंदिया के सिवा कोई नही था. ख़ान ने उसके करीब ले जाकर जीप रोकी.

"कहाँ जा रही हो?"

बिंदिया रुक गयी.

"बस यहीं थोड़ा कुच्छ काम से जा रही थी साहब"

ख़ान ने बिंदिया को एक नज़र उपेर से नीचे तक देखा. एक पुरानी सी सारी में लिपटी वो गाओं की सीधी सादी औरत थी. कद उसका थोड़ा लंबा था और उसको देखकर ही कोई ये कह सकता था के इस औरत ने शारीरिक काम बहुत किया है. उसका पूरा शरीर एकदम गठा हुआ था, कहीं चर्बी का ज़रा भी नाम-ओ-निशान नही.

"वो चंदू के साथ सोती है वो, पता नही कब्से ऐसा चल रहा है" अचानक ख़ान को जै की कही बात याद आई.

बिंदिया को देख कर कोई ये नही कह सकता था के ऐसा हो सकता है. उसकी शकल को देख कर तो लगता था के वो एक अपनी इज़्ज़त संभालने वाली औरत है.

"क्या जै ग़लत हो सकता है?" ख़ान ने दिल ही दिल में सोचा

"कुच्छ काम था साहिब?" बिंदिया की आवाज़ सुनकर ख़ान का ध्यान टूटा.

"हां ऐसा करना के शाम को ज़रा चोव्कि आ जाना" उसने बिंदिया से कहा

"क्यूँ?"

"कुच्छ सवाल करने हैं तुमसे"

"मैं जितना जानती थी पहले ही बता चुकी हूँ. इससे ज़्यादा मुझे कुच्छ नही पता साहब" बिंदिया ने फिर वही 2 टूक़ जवाब दिया.

ख़ान जानता था के वो इस औरत के साथ ज़ोर ज़बरदस्ती से काम नही ले सकता था और ना ही उसपर पोलीस वाला रोब झाड़ सकता था. इसको कुच्छ कहना मतलब सीधा ठाकुर खानदान से उलझना, मतलब सीधा एक फोन किसी नेता या मंत्री या किसी पहुँचे हुए आदमी को, मतलब ख़ान के लिए मुसीबत.

"अगर जै ग़लत हुआ तो?" ख़ान ने दिमाग़ में फिर सवाल उठा "अगर मैने इस औरत पर ऐसा कोई इल्ज़ाम लगाया तो बखेड़ा खड़ा हो सकता है"

"देखो" ख़ान ने कहना शुरू किया

"अगर जै झूठ बोल रहा है तो?" ख़ान का दिमाग़ फिर चिल्लाया "पर वो झूठ क्यूँ बोलेगा. वो जानता है के उसको मौत की सज़ा होने वाली है"

"हां कहिए" बिंदिया ने ख़ान को सोचते देख फिर सवाल किया

"चान्स तो लेना पड़ेगा" ख़ान ने दिल ही दिल में सोचा "इस बार जै की कही बात पर यकीन करना पड़ेगा"

"मैं जानता हूँ के तुमने जो मुझे बताया उससे कहीं ज़्यादा जानती हो तुम और छुपा रही हो" उसने आख़िर में अंधेरे में तीर चलाने का फ़ैसला कर ही लिया.

"क्या मतलब?" बिंदिया ने चौंकते हुए पुचछा

"मतलब ये के या तो तुम सीधे सीधे मेरे हर सवाल का सही जवाब दो और मुझे सब बता दो नही तो मैं सबको बता दूँगा" ख़ान के दिल की धड़कन तेज़ हो गयी.

उसने आस पास नज़र दौड़ाई ये तसल्ली करने के लिए के अगर यहाँ थप्पड़ पड़ा तो कोई देख तो नही रहा. किसी औरत से वो पहली बार पंगा ले रहा था.

"कमाल हैं" उसने दिल ही दिल में सोचा "एक मामूली औरत से इसलिए डरना पड़ रहा है के वो एक बड़े घर में काम करती है.

"क्या बता देंगे सबसे?" बिंदिया ने हैरत से पुछा

"तुम्हारा राज़" ख़ान ने मुस्कुराते हुए कहा

"कौन सा राज़?" बिंदिया के चेहरे का रंग बदल रहा था.

क्रमशः........................................

खूनी हवेली की वासना पार्ट --28

gataank se aage........................

Kallo ke kareeb hone ke vajah se ab Rupali ko usko chhatiyan nazar nahi aa rahi thi. Bas un dono ke jism ke beech Rupali apne haath ghusakar chhatiyan dabaye ja rahi thi. Kallo ki ukhdi hui garam saans usko apne gale par mehsoos ho rahi thi jo dheere dheere uske poore jism ko garam kar rahi thi.

Nashe ki si halat mein Kallo aahen bhar rahi thi aur jab Rupali ne ek baar phir uske nipples ko dabaya to vo aur bhi Rupali se sat gayi. Aur tab pehli baar Rupali ko uski chhatiyan apni khud ki chhatiyon par mehsoos hui.

Ek ajeeb sa maza uske shareer mein bhar gaya. Pehli baar tha ke kisi aur aurat ki chhatiyan usko apni chhatiyon par mehsoos ho rahi thi aur Rupali ke aanand ki jaise koi seema nahi rahi.

Aur yahi vo waqt tha jab usko pehli baar samajh aaya ke kyun Kallo usko baar baar apni chhatiyan dabane ko kehti rehti hai.

Kallo ki chhatiyon ka dabav jab uski apni chhatiyon par pada toh Rupali ne bhi apne haath chhatiyon se hatakar Kallo ke peeth par rakh liye aur usse sat gayi. Aisa karne ka uska irada bas yahi tha ke apni chhatiyon ke aur zor se Kallo ki chhatiyon par dabaye. Aisa karne se uske seene mein aise ek current sa daud raha tha aur vo aur kaske Kallo se sati ja rahi thi.

Kallo fauran samajh gayi ke Rupali kya karne ki koshish kar rahi hai. Uske haath Rupali ki peeth se hate aur dono ke jism ke beech aate hue side Rupali ki jawan hoti chhatiyon par aa gaye.

Vo pehla mauka tha ke Rupali ne apne jism par apne sivaay kisi aur ke haathon ko mehsoos kiya tha. Kallo ne uski chhatiyon ko ek hi pal mein aise ragad diya ke dard ki ek lehar uske poore jism mein daud gayi.

"Aaaahhh Kallo" Rupali boli "Dheere se"

Udhar Kallo bhi uska ishara samajh gayi. Ruapli ne usko rokne ki koi koshish nahi ki thi. Usne apne haathon ko thoda sa dheela chhoda aur Rupali ki chhatiyon ko masalne lagi.

Rupali ne poori tarah se Kallo se lipat gayi. Kallo kar sar uske kandhe par aur uska Kallo ke kandhe par aise tha jaise dono gale mil rahi hon. Kallo ne ek baar phir apne haath ka dabaav badhaya aur poore zor se Rupali ki chhatiyon ko dabane lagi.

Udhar Rupali ka jism thodi der ke liye ainth gaya aur phir apne aap hi dheela padta chala gaya. Uske poore shareer mein aanand ki ek lehar si daud gayi aur use aisa lagne laga jaise ke vo nashe mein ho, jaise hawa mein ud rahi ho. Kallo ke jism par uske giraft dheeli pad gayi aur vo dheere dheere bistar par girti chali gayi.

Kallo ne usko sahara dekar sidha litaya. Rupali ki aankhen ab band ho chali thi. 2 haath ab bhi uski chhatiyan daba rahe the.

"AAAAAHHHH Chhoti malkin" Usko Kallo ki aawaz sunai di toh usne apni aankhen kholi "Kitni sakht hain aapki choochiyan"

Rupali ne aankhen kholkar dekha. Andhere mein bhi ab usko saaf dikhai de raha tha. Kallo side mein leti uske uper jhuki hui thi. Uske baal khule hue the aur uski chhatiyan niche ko aur latak rahi thi.

Achanak Kallo ke haath Rupali ke seene se hate aur vo sidhi hokar beth gayi. Rupali ne nazar ghumakar dekha ke vo kya kar rahi hai. Kallo apni kamar par bandhi saree ko dheela kar rahi thi.

"Poori nangi?" Rupali ne man hi man socha aur usko samajh nahi aaya ke kya kare.

Aur uska shak sahi nikla. Kallo ne pehle apni saree aur phir apna petticot utarkar vahin bistar ke niche gira diya aur poori nangi hokar Rupali se aakar sat gayi.

Rupali ko side se apne haath par Kallo ka pet aur uski nangi jaangh mehsoos hui.

"Kallo?" Uske munh se sawal ki shakal mein naam nikla

"Shhhhhh" Kallo ne apne honthon par anguli rakhte hue kaha "Bas maze lo. Aaj mein aapko pehli baar jannat ki sair karati hoon"

Aur phir Kallo ne vo kiya jiske liye Rupali bilkul taiyyar nahi thi par usne Kallo ko rokne ki koshish bhi nahi ki.

Side mein leti hui Kallo sarak kar poori tarah Rupali ke uper aa gayi. Uske vazan ke niche Rupali ko ek pal ke liye takleef hui par agle hi pal jaise uske jism ne khud hi apne aapko adjust kar liya air Kallo ka vazan use bilkul bhi mehsoos hona band ho gaya.

Rupali ko ab apni koi hosh nahi rahi aur vo ek laash ki tarah bistar par leti rahi. Kallo apni taangen uske dono taraf rakhe uske uper sawar thi aur bas Rupali niche aankhen band kiye leti ek anjane se ehsaas mein doobi ja rahi thi.

Kallo ki garam saans usko apne chehre par mehsoos hui aur phir uske honth apne maathe par. Usne Rupali ke maathe ko chooma, phir baari baari uske dono gaalon ko, phir uske gale par, phir nighty ke uper se hi uski dono chhatiyon ko ek ek karke chooma aur dheere dheere niche sarakne lagi.

Rupali ne ek baar phir aankhen kholkar dekha. Poori tarah se nangi Kallo uske uper bethi si hui thi aur uske jism ko choomte hue dheere dheere niche sarak rahi thi. Rupali ne ek aah bhari aur phir apni aankhen band kar li.

Uski taangon ko choomte hue Kallo Rupali ke ghutno tak aayi aur phir uski pindliyon par haath rakh kar nighty ko uper sarkane lagi.

"Mujhe bhi nangi karegi kya?" Rupali ke dimag mein sawal bijli ki tarah utha par Kallo ko rokne ki na toh usmein himmat thi aur na hi taqat. Apna jism usko kisi chidiya ke pankh ki tarah halka mehsoos ho raha tha. Aankhen bhaari ho rahi thi aur usmein jaise itni bhi jaan nahi bachi thi ke apne haath uper utha sake.

Kallo ne dheere dheere uski nighty ko Rupali ke pet tak sarka diya. Sote waqt Rupali nighty ke niche na toh panty pehenti thi aur na hi bra. Nighty ke uper sarakte hi use thandi hawa sidhi apni choot par mehsoos hui.

"Nangi kar diya mujhe" Rupali ki dimag mein phir khyaal utha. Ye pehli baar tha ke uski choot kisi aur ke saamne khuli thi, bhale hi vo koi aur ek aurat hi thi.

Kallo yahan bhi aakar ruki nahi. Usne nighty ko sarkana jaari rakha aur thodi hi der baad Rupali ki chhatiyan bhi poori khuli hui thi. Aur phir Kallo ne Rupali ke kandho ko sahara dekar thoda uper kiya aur nighty ko poori tarah utar kar niche phenk diya.

"Main nangi hoon ... NANGI" Rupali ka dimag phir chillaya. Thandi hawa ab usko apne poore jism par mehsoos ho rahi thi.

Kuchh der apne jism par jab use kuchh bhi mehsoos nahi hua toh usne aankhen khol kar dekha. Kallo uski bagal mein bethi usko nihar rahi thi.

"Malkin" Jab usne dekha ke Rupali uski taraf dekh rahi hai toh vo boli "Bahut sundar ho aap. Ye kachche aam toh aaj main hi khaoongi"

Isse pehle ke Rupali ko kuchh samajh aata, Kallo niche ko jhuki aur Rupali ka chhota sa nipple apne munh mein le liye.

"Kallo !!! kya kar rahi?" Rupali bas itna hi keh saki. Kallo ko rokne ki taaqat usmein ab bhi jaise nahi thi.

"Bas aap maze lo" Kallo ne kaha aur phir Rupali ke jism par aise toot padi jaise barso ke bhookhe ko khana mil gaya ho.

Vo sarak kar phir poori tarah Rupali ke uper aa gayi aur apne dono haathon mein Rupali ki chhatiyon ko pakadkar baari baari choosne lagi.

Rupali ko ab apna koi hosh nahi tha. Usko bas itna pata tha ke uske jism mein ek current sa uth raha tha jo uske dimag ko sunn aur uski aankhon ko bhaari kar raha tha.

Kallo ke haath usko ab apne poore jism par mehsoos ho rahe the. Kabhi pet par, kabhi taango par, kabhi chhati par, kabhi chehre par.

Phir vo haath sarak kar Rupali ki taango ke beech gaya aur sidha usko choot par aa gaya. Rupali ka poora jism zor se hila, uski kamar ne zor ka jhatka khaya, ek lehar uski taango ke beech se uthkar uske dimag se takrayi aur phir Rupali ko kuchh yaad nahi raha.

Bhaari hoti aankhen ab poori tarah band ho gayi aur Rupali apne hosh poori tarah kho bethi.

Apni jeep mein betha Khan gaon se guzarta police station ki taraf ja raha tha. Tabhi uski nazar saamne sadak par chalti Bindiya par padi.

Dopahar ka waqt tha. Sadak par Bindiya ke siwa koi nahi tha. Khan ne uske kareeb le jakar Jeep roki.

"Kahan ja rahi ho?"

Bindiya ruk gayi.

"Bas yahin thoda kuchh kaam se ja rahi thi Sahab"

Khan ne Bindiya ko ek nazar uper se neeche tak dekha. Ek purani si saree mein lipti vo Gaon ki sidhi saadi aurat thi. Kad uska thoda lamba tha aur usko dekhkar hi koi ye keh sakta tha ke is aurat ne sharirik kaam bahut kiya hai. Uska poora shareer ekdam gantha hua tha, kahin charbi ka zara bhi naam-o-nishan nahi.

"Vo Chandu ke saath soti hai vo, pata nahi kabse aisa chal raha hai" Achanak Khan ko Jai ki kahi baat yaad aayi.

Bindiya ko dekh kar koi ye nahi keh sakta tha ke aisa ho sakta hai. Uski shakal ko dekh kar toh lagta tha ke vo ek apni izzat sambhalne wali aurat hai.

"Kya Jai galat ho sakta hai?" Khan ne dil hi dil mein socha

"Kuchh kaam tha sahib?" Bindiya ki aawaz sunkar Khan ka dhyaan toota.

"Haan aisa karna ke shaam ko zara chowki aa jana" Usne Bindiya se kaha

"Kyun?"

"kuchh sawal karne hain tumse"

"Main jitna jaanti thi pehle hi bata chuki hoon. Isse zyada mujhe kuchh nahi pata Sahab" Bindiya ne phir vahi 2 took jawab diya.

Khan janta tha ke vo is aurat ke saath zor zabardasti se kaam nahi le sakta tha aur na hi uspar police wala rob jhaad sakta tha. Isko kuchh kehna matlab sidha thakur khandaan se ulajhna, matlab sidha ek phone kisi neta ya mantri ya kisi pahunche hue aadmi ko, matlab Khan ke liye museebat.

"Agar Jai galat hua toh?" Khan ne dimag mein phir sawal utha "Agar maine is aurat par aisa koi ilzaam lagaya toh bakheda khada ho sakta hai"

"Dekho" Khan ne kehna shuru kiya

"Agar Jai jhooth bol raha hai toh?" Khan ka dimag phir chillaya "Par vo jhooth kyun bolega. Vo janta hai ke usko maut ki saza hone wali hai"

"Haan kahiye" Bindiya ne Khan ko sochte dekh phir sawal kiya

"Chance toh lena padega" Khan ne dil hi dil mein socha "Is baar Jai ki kahi baat par yakeen karna padega"

"Main janta hoon ke tumne jo mujhe bataya usse kahin zyada jaanti ho tum aur chhupa rahi ho" Usne aakhir mein andhere mein teer chalane ka faisla kar hi liya.

"Kya matlab?" Bindiya ne chaunkte hue puchha

"Matlab ye ke ya toh tum sidhe sidhe mere har sawal ka sahi jawab do aur mujhe sab bata do nahi toh main sabko bata doonga" Khan ke dil ki dhadkan tez ho gayi.

Usne aas paas nazar daudayi ye tasalli karne ke liye ke agar yahan thappad pada toh koi dekh toh nahi raha. Kisi aurat se vo pehli baar panga le raha tha.

"Kamal hain" Usne dil hi dil mein socha "Ek mamuli aurat se isliye darna pad raha hai ke vo ek bade ghar mein kaam karti hai.

"Kya bata denge sabse?" Bindiya ne hairat se puchha

"Tumhara raaz" Khan ne muskurate hue kaha

"Kaun sa raaz?" Bindiya ke chehre ka rang badal raha tha.

kramashah........................................


raj..
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Re: खूनी हवेली की वासना

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 13:18

खूनी हवेली की वासना पार्ट --29

गतान्क से आगे........................

ख़ान समझने की कोशिश कर रहा था के ये रंग डर का है या गुस्से का.

"तुम्हारा और चंदू का राज़" उसने सीधे चोट की

और अगले ही पल वो समझ गया के उसका तीर निशाने पर लगा है. जै सच कह रहा था.

"क्या मतलब है आपका?" बिंदिया ने हकलाते हुए पुछा

"देखो बिंदिया" ख़ान ने थोड़ा अकल्मंदी से काम लेना ठीक समझा. ज़ाहिर सी बात थी के बिंदिया इतनी आसानी से तो मानने वाली नही थी

"मैं तो यहाँ नया ही हूँ तो इसलिए मुझे तो ये बातें पता नही हो सकती. किसी ने बताया ही है मुझे. किसी ऐसे ने जिसने के तुम्हें देखा है. अब सोच लो. ये बात झूठ ही सही, पर अगर उड़ गयी तो तुम्हारा क्या बनेगा. उस लड़के के साथ जिसे तुम अपना बेटा कहती हो ....."

"बस" बिंदिया ने बात काट दी "सरासर झूठ है ये. किसने बताया आपको?"

ये ऐसे नही मानेगी. ख़ान ने दिल ही दिल में सोचा.

"जब वो छ्होटा था तबसे ही रह रहा है ना वो तुम्हारे साथ. तो मुझे क्या पता के कब्से ऐसा कर रही हो तुम उसके साथ. इसलिए एक नाबालिग से ऐसा रिश्ता बनाने के जुर्म में, या यूँ कहो के ऐसा तुमने किया इस बात की शक की बिना पर मैं तुम्हें गिरफ्तार कर सकता हूँ. बाद में भले झूठ साबित हो, पर फिर बात उड़ तो जाएगी ही. और वो भी एक ऐसा बच्चे जो अपाहिज था? गूंगा था?"

वो खुद भी दिल में जानता था के ये बात कितनी बड़ी बकवास है. कोई भी अकल्मंद पढ़ा लिखा आदमी हँसेगा उसकी बात पर. पर गाओं की एक अनपढ़ औरत शायद फस जाए. और उसका शक सही निकला.

"क्या पूछना चाहते हैं आप?" जिस तरह से बिंदिया के चेहरे का रंग उड़ चुका था उससे ख़ान समझ गया था के वो यक़ीनन चंदू के साथ सो रही थी.

"यहाँ नही" उसने बिंदिया से कहा "शाम को थाने आ जाना

"शाम को नही आ पाऊँगी" बिंदिया ने जवाब दिया

"तो कल आ जाना" ख़ान ने कहा और जीप स्टार्ट की

"किसी से कहेंगे तो नही ना आप?" बिंदिया ने डरते डरते सवाल किया

"तो मतलब बात सच है?" ख़ान ने मुस्कुराते हुए पुछा

बिंदिया को देख कर ही लग रहा था के वो शरम से मरी जा रही है.

"किसने बताया आपको?" बिंदिया ने नज़र नीची किए हुए सवाल किया

"इश्क़ और मुश्क़ च्छुपाए नही च्छुपते मेरी जान" ख़ान ने कोरे पॉलिसिया अंदाज़ में कहा और जीप आगे बढ़ा दी.

थाने पहुँचकर वो अपनी टेबल पर बैठा और जेब से अपना मोबाइल निकाला.

2 मिस्ड कॉल्स.

पहली डॉक्टर. अस्थाना की. इसी ने ठाकुर साहब का पोस्ट मॉर्टेम किया था.

दूसरी ठाकुर के वकील देवधर की. ख़ान ने दिन में 2 बार इसका नंबर ट्राइ किया था पर उसने उठाया नही था.

पहली कॉल ख़ान ने डॉक्टर. अस्थाना को मिलाई.

"हां डॉक्टर. साहब" दूसरी तरफ से कॉल रिसीव होने पर उसने कहा

"एक बात बताना चाहता हूँ आपको" अस्थाना ने कहा

"हां कहिए"

"पहले आप भरोसा दिलाएँ के किसी से इस बात का ज़िक्र नही करेंगे"

ख़ान चौंक पड़ा.

"मैं ज़ुबान देता हूँ" उसने सोचते हुए कहा

दूसरी तरफ थोड़ी देर खामोशी रही.

"देखिए ये बात आपको बताने की वजह से मेरी जान भी जा सकती है इसलिए प्लीज़ अपना वादा भूलना मत" अस्थाना बोला

"आप बेफिकर रहिए" ख़ान बोला "ये बात मेरे से आगे नही जाएगी"

फिर थोड़ी देर खामोशी.

"पोस्ट मॉर्टेम रिपोर्ट में एक बात लिखी नही थी मैने" अस्थाना आख़िर में बोल पड़ा

"कौन सी बात?" ख़ान ने पुचछा

"देखिए इसमें मैं कुच्छ नही कर सकता था. मुझपर बहुत दबाव था के मैं इस बात का रिपोर्ट में कोई ज़िक्र ना करूँ. धमकी दी गयी थी मुझे"

"कौन सी बात?" ख़ान ने फिर पुछा

फिर थोड़ी देर खामोशी.

"पोस्ट मॉर्टेम में ठाकुर साहब के जिस्म पर किसी औरत के वेजाइनल डिसचार्ज के ट्रेसस मिले थे" अस्थाना ऐसे बोला जैसे दुनिया का सबसे बड़ा राज़ बता रहा हो

ख़ान को उसकी बात का मतलब समझने में एक पल लगा.

"मतलब ......"

"जी हां" अस्थाना उसकी बात ख़तम करने से पहले ही बोल पड़ा "ठाकुर साहब मरने से कुच्छ वक़्त पहले ही किसी के साथ हम-बिस्तर हुए थे"

ख़ान पे जैसे एक बॉम्ब सा गिरा

"इतनी ज़रूरी बात पोस्ट मॉर्टेम से निकाल दी आपने?"

"दबाव था मुझपर" अस्थाना बोला

ख़ान उसकी बात समझ गया. वो एक पोलीस वाला होते हुए एक मामूली नौकरानी से डर रहा था, अस्थाना तो बेचारा एक सीधा शरीफ डॉक्टर था.

"और अब ये क्यूँ बता रहे हैं आप मुझे?" ख़ान ने पुछा

"ठाकुर साहब का एक एहसान था मुझपर. मैं भी चाहता हूँ के उनका क़ातिल पकड़ा जाए. इसलिए मैने ये बात भी आपको बता दी के शायद इससे कुच्छ मदद मिले"

"और ये बात ग़लत हुई तो?" ख़ान ने सवाल किया

"पोस्ट मॉर्टेम रिपोर्ट की ओरिजिनल अनेडिटेड कॉपी अब भी मेरे पास है" अस्थाना बोला

थोड़ी देर फिर खामोशी रही.

"ये बात सच है" अस्थाना ने कहा और फोन रख दिया

ख़ान का दिमाग़ जैसे चक्कर खा गया.

ठाकुर हमबिस्तर हुआ था किसी के साथ. पर किसके? उसकी बीवी तो इस काम की थी ही नही.

और ज़ाहिर सी बात है के इसीलिए इस बात को दबाया गया. अगर बीवी नही तो कौन सो रही थी ठाकुर के साथ?

ज़रूर ठाकुर के बेटो ने ही इस बात को पोस्ट मॉर्टेम रिपोर्ट से हटवाया होगा.

और उस रात फोन भी तो मुझे किसी औरत ने ही किया था, खून की जानकारी देने के लिए जो बाद में सामने नही आई.

सोचते सोचते ख़ान ने देवधर का नंबर मिलाया.

"मैं आपसे ठाकुर साहब की वसीयत के बारे में पुच्छना चाह रहा था" देवधर के फोन उठाने पर ख़ान ने कहा.

"जी पुछिये" देवधर बोला

"कौन है बेनिफिशीयरी?" ख़ान ने पुचछा

"वैसे तो मैं ये बात आपको बताने से इनकार कर सकता हूँ पर फिर आप कोर्ट से ऑर्डर लाएँगे के ये इन्फर्मेशन आपको मर्डर इन्वेस्टिगेशन के लिए चाहिए और फिर वैसे भी ये वसीयत अब खोली ही जाएगी इसलिए मैं बता ही देता हूँ" देवधर ऐसे बोला जैसे ख़ान पर एहसान कर रहा हो

"ह्म्‍म्म्मम" ख़ान ने अपना गुस्सा पीते हुए हामी भरी

"5 लोग हैं बेनिफिशीयरी" देवधर बोला

ठाकुर के 3 बेटे, 1 बेटी और बीवी. ख़ान ने दिल ही दिल में सोचा

"ठाकुर साहब के 3 बेटे, बेटी और उनकी नौकरानी की बेटी पायल" ख़ान पर उस दिन का दूसरा बॉम्ब आकर गिरा.

वो अभी सोच ही रहा था के उसने सही सुना या ग़लत के फिर तीसरा बॉम्ब भी आ गिरा.

"वैसे तो ये वसीयत ठाकुर साहब बदलना चाहते थे पर अब वो रहे नही तो यही अप्लिकबल विल है"

"बदलना चाहते थे?" ख़ान ने पुछा

"हां मरने से 2 दिन पहले फोन किया था मुझे पर फिर बिज़ी होने की वजह से ना मैं उनसे मिलने जा सका और ना वो मिलने आ सके"

अगले दिन सुबह ख़ान देवधर के ऑफीस में उसके सामने बैठा था.

"काफ़ी इंटेरेस्ट है आपको विल में. कहीं अपना नाम तो एक्सपेक्ट नही कर रहे थे?" देवधर ने हस्ते हुए पुछा

"काश ऐसा होता के हमें भी कोई लाखों करोड़ों की जयदाद छ्चोड़के जाता" ख़ान ने मुस्कुराते हुए कहा "पर अपना तो वही हाल है के सारा दिन मेहनत करके कमाओ तो 2 वक़्त की रोटी खाओ"

ख़ान की बात पर दोनो हस पड़े.

"वसीयत के लिए इतना दूर आने की क्या ज़रूरत थी आपको? फोन पर ही बात कर लेते" देवधर ने कहा

"नही असल में आया तो मैं किसी और काम से हूँ. सोचा आपसे भी मिलता चलूं"

"ज़रूर" देवधर ने वसीयत निकालते हुए कहा "कहिए क्या जानना चाहते हैं"

"वसीयत कब बदली गयी थी?" ख़ान ने सवाल किया

"यही कोई 3 साल पहले"

"क्या बदलाव था?"

"पहले 4 लोगों के नाम थे, 3 साल पहले पायल का भी नाम जोड़ दिया था ठाकुर साहब ने"

"4 लोग?" ख़ान ने शक्की अंदाज़ में सवाल किया

"हां" देवधर वसीयत की तरफ देखता हुआ बोला "ठाकुर साहब के 4 बच्चे"

"और ठकुराइन?"

"उनका नाम तो कोई 12-13 साल पहले ही हटा दिया था ठाकुर साहब ने" देवधर सिगरेट जलाते हुए बोला.

हाथ बढ़ा कर उसने एक सिगरेट ख़ान को ऑफर की.

"ठकुराइन का नाम हटाने की कोई वजह?" ख़ान ने सिगरेट का कश लगते हुए कहा

"कोई वजह तो ज़रूर होगी ही ख़ान साहब पर अगर आप ये उम्मीद कर रहे हैं के मुझे वजह पता है तो ग़लत उम्मीद कर रहे हैं"

"आप वकील थे" ख़ान ने उम्मीद भरे आवाज़ में कहा

"और सिर्फ़ वकील बने रहने में भलाई थी मेरी. ज़्यादा अपनी नाक उनके घर के मामलो में घुसाता तो मुझे काट के फेंक देते और नया वकील रख लेते"

"आपका कोई ख्याल के ऐसा क्यूँ हुआ हो सकता है के ठकुराइन को वसीयत से निकाल दिया गया?"

देवधर ने इनकार में गर्दन हिलाई.

"कोई ख्याल के घर की नौकरानी की बेटी को जायदाद का हिस्सेदार क्यूँ बनाया गया?"

देवधर ने फिर इनकार में सर हिलाया.

"आपको अजीब नही लगा?" ख़ान ने पुछा

"लगा था पर जब मैने पुछा के ऐसा क्यूँ तो मुझे सिर्फ़ ये कहा के वो नौकरानी की बच्ची को भी कुच्छ देकर जाना चाहते हैं क्यूंकी उसकी माँ उनकी बहुत देखभाल करती है"

"ह्म्‍म्म्मममम" ख़ान सोचते हुए बोला

थोड़ी देर दोनो खामोशी से सिगरेट के कश लगते रहे

"जब ठकुराइन का नाम हटाया गया था विल से, उस वक़्त कौन कौन था विल में?" कुच्छ देर बाद ख़ान बोला

"देखिए पहले 6 लोग थे" देवधर आराम से कुर्सी से टेक लगाता हुआ कहने लगा "ठाकुर साहब के 4 बच्चे, उनकी पत्नी और उनका भतीजा जै. कोई 15 साल पहले जै का नाम हटा दिया गया, फिर ठकुराइन का और अब पायल का नाम जोड़ दिया गया"

क्रमशः........................................

खूनी हवेली की वासना पार्ट --29

gataank se aage........................

Khan samajhne ki koshish kar raha tha ke ye rang darr ka hai ya gusse ka.

"Tumhara aur Chandu ka raaz" Usne sidhe chot ki

Aur agle hi pal vo samajh gaya ke uska teer nishane par laga hai. Jai sach keh raha tha.

"Kya matlab hai aapka?" Bindiya ne haklate hue puchha

"Dekho Bindiya" Khan ne thoda akalmandi se kaam lena theek samjha. Zahir si baat thi ke Bindiya itni aasani se toh maanne wali nahi thi

"Main toh yahan naya hi hoon toh isliye mujhe toh ye baaten pata nahi ho sakti. Kisi ne bataya hi hai mujhe. Kisi aise ne jisne ke tumhein dekha hai. Ab soch lo. Ye baat jhooth hi sahi, par agar ud gayi toh tumhara kya banega. Us ladke ke saath jise tum apna beta kehti ho ....."

"Bas" Bindiya ne baat kaat di "Sarasar jhooth hai ye. Kisne bataya aapko?"

Ye aise nahi manegi. Khan ne dil hi dil mein socha.

"Jab vo chhota tha tabse hi reh raha hai na vo tumhare saath. Toh mujhe kya pata ke kabse aisa kar rahi ho tum uske saath. Isliye ek nabalig se aisa rishta banane ke jurm mein, ya yun kaho ke aisa tumne kiya is baat ki shak ki bina par main tumhein giraftar kar sakta hoon. Baad mein bhale jhooth saabit ho, par phir baat ud toh jaayegi hi. Aur vo bhi ek aisa bachche jo apahij tha? Goonga tha?"

Vo khud bhi dil mein jaanta tha ke ye baat kitni badi bakwaas hai. Koi bhi akalmand padha likha aadmi hasega uski baat pat. Par gaon ki ek anpadh aurat shayad phas jaaye. Aur uska shak sahi nikla.

"Kya puchha chahte hain aap?" Jis tarah se Bindiya ke chehre ka rang ud chuka tha usse Khan samajh gaya tha ke vo yakeenan Chandu ke saath so rahi thi.

"Yahan nahi" Usne Bindiya se kaha "Shaam ko thaane aa jana

"Shaam ko nahi aa paoongi" Bindia ne jawab diya

"Toh kal aa jana" Khan ne kaha aur Jeep start ki

"Kisi se kahenge toh nahi na aap?" Bindiya ne darte darte sawal kiya

"Toh matlab baat sach hai?" Khan ne muskurate hue puchha

Bindiya ko dekh kar hi lag raha tha ke vo sharam se mari ja rahi hai.

"Kisne bataya aapko?" Bindiya ne nazar nichi kiye hue sawal kiya

"Ishq aur mushq chhupaye nahi chhupte meri jaan" Khan ne kore policiya andaz mein kaha aur Jeep aage badha di.

Thane pahunchkar vo apni table par betha aur jeb se apna mobile nikala.

2 missed calls.

Pehli Dr. Asthana ki. Isi ne Thakur Sahab ka post mortem kiya tha.

Doosri Thakur ki vakeel Devdhar ki. Khan ne din mein 2 baar iska number try kiya tha par usne uthaya nahi tha.

Pehli call Khan ne Dr. Asthana ko milayi.

"Haan Dr. Sahab" Doosri taraf se call receive hone par usne kaha

"Ek baat batana chahta hoon aapko" Ashthana ne kaha

"Haan kahiye"

"Pehle aap bharosa dilayen ke kisi se is baat ka zikr nahi karenge"

Khan chaunk pada.

"Main zubaan deta hoon" Usne sochte hue kaha

Doosri taraf thodi der khamoshi rahi.

"Dekhiye ye baat aapko batane ki vajah se meri jaan bhi ja sakti hai isliye please apna wada bhoolna mat" Asthana bola

"Aap befikar rahiye" Khan bola "Ye baat mere se aage nahi jayegi"

Phir thodi der khamoshi.

"Post morten report mein ek baat likhi nahi thi maine" Asthana aakhir mein bol pada

"Kaun si baat?" Khan ne puchha

"Dekhiye ismein main kuchh nahi kar sakta tha. Mujhpar bahut dabav tha ke main is baat ka report mein koi zikr na karun. Dhamki di gayi thi mujhe"

"Kaun si baat?" Khan ne phir puchha

Phir thodi der khamoshi.

"Post mortem mein Thakur sahab ke jism par kisi aurat ke vaginal discharge ke traces mile the" Ashana aise bola jaise duniya ka sabse bada raaz bata raha ho

Khan ko uski baat ka matlab samajhne mein ek pal laga.

"Matlab ......"

"Ji haan" Asthana uski baat khatam karne se pehle hi bol pada "Thakur Sahab marne se kuchh waqt pehle hi kisi ke saath ham-bistar hue the"

Khan pe jaise ek bomb sa gira

"Itni zaroori baat post mortem se nikaal di aapne?"

"Dabaav tha mujhpar" Asthana bola

Khan uski baat samajh gaya. Vo ek police wala hote hue ek mamuli naukrani se darr raha tha, Asthana toh bechara ek sidha shareef doctor tha.

"Aur ab ye kyun bata rahe hain aap mujhe?" Khan ne puchha

"Thakur Sahab ka ek ehsaan tha mujhpar. Main bhi chahta hoon ke unka qatil pakda jaaye. Isliye maine ye baat bhi aapko bata di ke shayad isse kuchh madad mile"

"Aur ye baat galat hui toh?" Khan ne sawal kiya

"Post mortem report ki original unedited copy ab bhi mere paas hai" Asthana bola

Thodi der phir khamoshi rahi.

"Ye baat sach hai" Asthana ne kaha aur phone rakh diya

Khan ka dimag jaise chakkar kha gaya.

Thakur hambistar hua tha kisi ke saath. Par kiske? Uski biwi toh is kaam ki thi hi nahi.

Aur zahir si baat hai ke isiliye is baat ko dabaya gaya. Agar biwi nahi toh kaun so rahi thi Thakur ke saath?

Zaroor Thakur ke beto ne hi is baat ko post mortem report se hatvaya hoga.

Aur us raat phone bhi toh mujhe kisi aurat ne hi kiya tha, khoon ki jankari dene ke liye jo baad mein saamne nahi aayi.

Sochte sochte Khan ne Devdhar ka number milaya.

"Main aapse Thakur sahab ki vaseeyat ke baare mein puchhna chah raha tha" Devdhar ke phone uthane par Khan ne kaha.

"Ji puchhiye" Devdhar bola

"Kaun hai beneficiary?" Khan ne puchha

"Vaise toh main ye baat aapko batane se inkaar kar sakta hoon par phir aap court se order layenge ke ye information aapko murder investigation ke liye chahiye aur phir vaise bhi ye vaseeyat ab kholi hi jayegi isliye main bata hi deta hoon" Devdhar aise bola jaise Khan par ehsaan kar raha ho

"Hmmmmm" Khan ne apna gussa peete hue haami bhari

"5 log hain beneficiary" Devdhar bola

Thakur ke 3 bete, 1 beti aur biwi. Khan ne dil hi dil mein socha

"Thakur sahab ke 3 bete, beti aur unki naukrani ki beti Payal" Khan par us din ka doosra bomb aakar gira.

Vo abhi soch hi raha tha ke usne sahi suna ya galat ke phir teesra bomb bhi aa gira.

"Vaise toh ye vaseeyat Thakur Sahab badalna chahte the par ab vo rahe nahi toh yahi applicable will hai"

"Badalna chahte the?" Khan ne puchha

"Haan marne se 2 din pehle phone kiya tha mujhe par phir busy hone ki vajah se na main unse milne ja saka aur na vo milne aa sake"

Agle din subah Khan Devdhar ke office mein uske saamne betha tha.

"Kaafi interest hai aapko will mein. Kahin apna naam toh expect nahi kar rahe the?" Devdhar ne haste hue puchha

"Kaash aisa hota ke hamen bhi koi lakhon karodon ki jaydad chhodke jata" Khan ne muskurate hue kaha "Par apna toh vahi haal hai ke sara din mehnat karke kamao toh 2 waqt ki roti khao"

Khan ki baat par dono has pade.

"Vaseeyat ke liye itna door aane ki kya zaroorat thi aapko? Phone par hi baat kar lete" Devdhar ne kaha

"Nahi asal mein aaya toh main kisi aur kaam se hoon. Socha aapse bhi milta chalun"

"Zaroor" Devdhar ne vaseeyat nikalte hue kaha "Kahiye kya jaanna chahte hain"

"Vaseeyat kab badli gayi thi?" Khan ne sawal kiya

"Yahi koi 3 saal pehle"

"Kya badlav tha?"

"Pehle 4 logon ke naam the, 3 saal pehle Payal ka bhi naam jod diya tha Thakur sahab ne"

"4 log?" Khan ne shakki andaz mein sawal kiya

"Haan" Devdhar vaseeyat ki taraf dekhta hua bola "Thakur sahab ke 4 bachche"

"Aur Thakurain?"

"Unka naam toh koi 12-13 saal pehle hi hata diya tha Thakur Sahab ne" Devdhar cigarette jalate hue bola.

Haath badha kar usne ek cigarette Khan ko offer ki.

"Thakurain ka naam hatane ki koi vajah?" Khan ne cigarette ka kash lagate hue kaha

"Koi vajah toh zaroor hogi hi Khan Sahab par agar aap ye ummeed kar rahe hain ke mujhe vajah pata hai toh galat ummeed kar rahe hain"

"Aap vakeeel the" Khan ne ummeed bhare aawaz mein kaha

"Aur sirf vakeel bane rehne mein bhalai thi meri. Zyada apni naak unke ghar ke mamlo mein ghusata toh mujhe kaat ke phenk dete aur naya vakeel rakh lete"

"Aapka koi khyaal ke aisa kyun hua ho sakta hai ke thakurain ko vaseeyat se nikal diya gaya?"

Devdhar ne inkaar mein gardan hilayi.

"Koi khyaal ke ghar ki naukrani ki beti ko Jaaydad ka hissedar kyun banaya gaya?"

Devdhar ne phir inkaar mein sar hilaya.

"Aapko ajeeb nahi laga?" Khan ne puchha

"Laga tha par jab maine puchha ke aisa kyun toh mujhe sirf ye kaha ke vo naukrani ki bachchi ko bhi kuchh dekar jana chahte hain kyunki uski maan unki bahut dekhbhal karti hai"

"Hmmmmmmm" Khan sochte hue bola

Thodi der dono khamoshi se cigarette ke kash lagate rahe

"Jab Thakurain ka naam hataya gaya tha will se, us waqt kaun kaun tha will mein?" Kuchh der baad Khan bola

"Dekhiye pehle 6 log the" Devdhar aaram se kursi se tek lagata hua kehne laga "Thakur sahab ke 4 bachche, unki patni aur unka bhateeja Jai. Koi 15 saaal pehle Jai ka naam hata diya gaya, phir thakurain ka aur ab Payal ka naam jod diya gaya"

kramashah........................................


raj..
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Re: खूनी हवेली की वासना

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 13:19

खूनी हवेली की वासना पार्ट --30

गतान्क से आगे........................

ठीक जैसा की जै ने कहा था, 15 साल पहले उसका नाम वासेयत से हटाने की बात कर रहे थे जब उसको हवेली से निकल दिया था, ख़ान ने सोचा.

कोई एक घंटे बाद ख़ान ने शहर के बीच बने कब्रिस्तान के पास गाड़ी लाकर रोकी. ठीक आज ही के दिन उसकी माँ का इंतेक़ाल हुआ था और तबसे उसने ये आदत बना ली थी के हर महीने उस तारीख को कब्रिस्तान आता था.

सुबह के तकरीबन 11 बज रहे थे जब ख़ान ने सेंट्रल जैल के सामने अपनी जीप रोकी.

बाहर ब्लॅक कलर की एक मर्सिडीस खड़ी थी. ख़ान कार देखते ही समझ गया के ये गाड़ी हवेली की थी.

"जै से मिलने हवेली से कौन आया?" ख़ान सोच ही रहा था के उसको अपने सवाल का जवाब मिल गया. जैल का दरवाज़ा खुला और अंदर से कामिनी बाहर निकली.

और हमेशा की तरह ख़ान उसको फिर बस देखता ही रह गया. वो सावले रंग की आम सी शकल सूरत की लड़की थी पर उसके पूरे अंदाज़ में कुच्छ ऐसा था के नज़र बस उसपर अटक कर रह जाती थी.

ख़ान जीप में बैठा उसको देखता रहा. कामिनी जैल से बाहर निकली, अपनी गाड़ी में बैठी और चली गयी.

कुच्छ देर बाद ख़ान जै के सामने बैठा था. जै उसकी नज़र में सॉफ ज़ाहिर सवाल को देखकर फ़ौरन समझ गया के वो क्या पुच्छना चाह रहा था.

"पूरी हवेली में बस यही है शायद जिसे मेरे बेगुनाह होने पर यकीन है. आज मिलने चली आई थी" जै ने जवाब दिया

"कुच्छ ऐसा बताया इसने जिससे हमें मदद मिले?"

"कहाँ सर" जै ने जवाब दिया "सीधी सादी लड़की है बेचारी. घर में सब इसको भोली कहके बुलाते हैं"

"ह्म्‍म्म्म" ख़ान ने जवाब दिया

"आपको कुच्छ पता चला?" जै बोला

"तुम्हारी बात सही निकली बिंदिया के बारे में"

"आपने बात की उससे?" जै ने फ़ौरन सवाल किया

ख़ान ने हां में सर हिलाया

"क्या बोली?"

"डर गयी थी काफ़ी. मिलने आने वाली थी आज मुझसे और मैं उम्मीद कर रहा था के आज कुच्छ कोशिश करूँगा पता करने का उससे पर फिर मुझे कुच्छ काम था तो शहर चला आया.

"और किसी से बात?"

"नही यार. और सच कहो तो मुझे यही नही पता के बिंदिया से भी क्या पुछु. मुझे तो इतना भी यकीन नही के इसको कुच्छ पता भी है. अंधेरे में तीर चलाने वाली बात है"

"अगर उससे नही तो भूषण से बात करने की कोशिश कीजिए. काफ़ी टाइम से है वो हवेली में, सारी ज़िंदगी यहीं गुज़ारी है उसने अपनी. शायद कुच्छ पता चले"

"और उसकी भी कोई दुखती रग है?"

जै हस पड़ा

"नही दुखती रग तो नही है पर कमज़ोर है एक, गांजा. 2 कश साथ बैठा कर लगवा दीजिए, जो जानता है सब उगल देगा"

"ठीक है. करता हूँ बात, फिलहाल तो चलूं. एक दो काम और हैं मुझे"

तकरीबन 1 बजे ख़ान फिर गाओं पहुँचा. पता चला के बिंदिया उससे मिलने आई थी पर फिर इंतेज़ार करके चली गयी.

थोड़ी देर पोलीस स्टेशन में रुकने के बाद ख़ान अपने कमरे पर पहुँचा. दोपहर के 2 बज रहे थे, गर्मी और लू पूरे ज़ोर पर थी. सब अपने अपने घरो में दुब्के हुए थे.

वो खाना खाने को तैय्यार हो ही रहा था के दरवाज़ा खटखटने की आवाज़ आई. उसने उठकर दरवाज़ा खोला.

सामने बिंदिया खड़ी थी.

"तुम"? बिंदिया के अपने घर पर आया देखकर ख़ान चौंक पड़ा "यहाँ क्या कर रही हो?'

"थाने गयी थी सुबह पर पता चला के आप ही नही हो" बिंदिया ने कहा

"हां कुच्छ काम निकल आया था इसलिए जाना पड़ गया था" ख़ान बोला

"तो मैने सोचा के आपके घर जाकर ही मिल आऊँ"

"शाम को आ जाती. इतनी दोपहर में यहाँ आने की क्या ज़रूरत थी"

"नही कोई बात नही. इधर से गुज़र रही थी तो सोचा के आपसे मिलती ही चलूं. शाम को हवेली में ज़रा ज़्यादा काम होता है इसलिए शायद आना होता या नही"

साली ऐसे जता रही है जैसे मुझसे मिलने आकर मुझपे एहसान करती, एक बड़ा आदमी शामिल हो जाए तो पोलिसेवला अकेला कुच्छ नही उखाड़ सकता, , ख़ान ने दिल ही दिल में सोचा.

"आओ अंदर आओ" उसने बिंदिया से कहा और दरवाज़े से हट गया.

ख़ान एक छ्होटे से सरकारी क्वॉर्टर में रहता था, 2 कमरे और किचन, टाय्लेट, बस.

बिंदिया अंदर आई तो ख़ान ने उसको ढंग से देखा. बाहर धूप तेज़ थी जिसकी वजह से वो एक पल के लिए बिंदिया को गौर से देख नही पाया था पर जब वो अंदर आई तो ख़ान ने एक नज़र उसपर डाली. उसने एक काले रंग की सारी

डाल रखी थी जिसके पल्लू को उसने अपने उपरी जिस्म पर चादर की तरह लपेट रखा था.

"बैठो" ख़ान ने सामने रखी एक कुर्सी की तरफ इशारा किया.

बिंदिया ने अब तक जो पल्लू अपने उपेर लपेट रखा था हटा दिया. अब उसकी सारी की पल्लू आम तौर पर उसके कंधे पर था जैसा की अक्सर सारी पहनी हुई औरतों का होता है. सारी के नीचे उसने एक स्लीव्ले ब्लाउस पहना हुआ

था.

"कहो" उसने एक दूसरी कुर्सी पर बैठते हुए कहा.

"मैं क्या कहूँ" बिंदिया बोली "आपने बुलाया था, आप कहिए के क्या चाहते हैं"

"ख़ास कुच्छ नही" ख़ान ने अपनी टेबल का ड्रॉयर खोलते हुए कहा "बस कुच्छ सवालों के जवाब"

"आपके सवाल मैं जानती हूँ और मेरा जवाब है हां" बिंदिया बोली

"हां?" ड्रॉयर में कुच्छ ढूँढते हुए ख़ान ने गर्दन उठाकर बिंदिया की तरफ देखा.

जवाब में बिंदिया उठकर सीधी खड़ी हो गयी और उसने अपनी सारी का पल्लू नीचे गिरा दिया. अगले ही पल ख़ान समझ गया के गर्मी होते हुए भी उसने यहाँ आते हुए अपनी सारी का पल्लू और उपेर क्यूँ लपेट रखा था.

उसका ब्लाउस एक तो स्लीव्ले और उपेर से बिल्कुल ट्रॅन्स्परेंट था. ब्लाउस के नीचे उसने कोई ब्रा नही पहेन रखी थी. ट्रॅन्स्परेंट ब्लाउस के नीचे उसकी बड़ी बड़ी चूचियाँ सीधे ख़ान की नज़रों के सामने थी.

ख़ान समझ गया के बिंदिया ने उसके डराने धमकाने का क्या मतलब निकाला था.

"मैं आपके सामने हूँ और जब तक आप यहाँ हैं, जब आप चाहेंगे आ जाऊंगी. बस मेरी इज़्ज़त मत उच्छालना नही तो मेरे पास मरने के अलावा और कोई चारा नही बचेगा"

ख़ान ने एक नज़र उसपर उपेर से नीचे तक डाली. उसके सामने खड़ी औरत की एक जवान बेटी थी पर उसके बावजूद खुद उसके जिस्म में कहीं कोई ढीलापन नही था. पेट पर कोई चर्बी नही और जिस्म अब भी पूरे शेप में था.

ब्लाउस के अंदर से झाँकति चूचियाँ ब्रा ना होने के बावजूद भी अब तक तनी हुई थी.

"चोदने की हिसाब से माल बुरा नही है" ख़ान के दिल में ख्याल आया.

एक पल को उसने फिलहाल मौके का फ़ायदा उठाने की सोची पर फिर अपना ख्याल बदल दिया.

"अपने आप को ढको प्लीज़" उसने ड्रॉयर से पेन और अपनी डाइयरी निकाली "और बैठ जाओ"

क्रमशः........................................

खूनी हवेली की वासना पार्ट --30

gataank se aage........................

Theek jaisa ki Jai ne kaha tha, 15 saal pehle uska naam vaseyat se hatane ki baat kar rahe the jab usko haweli se nikal diya tha, Khan ne socha.

Koi ek ghante baad Khan ne shehar ke beech bane kabristan ke paas gaadi lakar roki. Theek aaj hi ke din uski maan ka inteqaal hua tha aur tabse usne ye aadat bana li thi ke har mahine us tareekh ko kabristan aata tha.

Subah ke takreeban 11 baj rahe the jab Khan ne Central Jail ke saamne apni jeep roki.

Bahar black color ki ek mercedes khadi thi. Khan Car dekhte hi samajh gaya ke ye gaadi Haweli ki thi.

"Jai se milne haweli se kaun aaya?" Khan soch hi raha tha ke usko apne sawal ka jawab mil gaya. Jail ka darwaza khula aur andar se Kamini bahar nikli.

Aur hamesha ki tarah Khan usko phir bas dekhta hi reh gaya. Vo saawle rang ki aam si shakal surat ki ladki thi par uske poore andaz mein kuchh aisa tha ke nazar bas uspar atak kar reh jaati thi.

Khan Jeep mein betha usko dekhta raha. Kamini Jail se bahar nikli, apni gaadi mein bethi aur chali gayi.

Kuchh der baad Khan Jai ke saamne betha tha. Jai uski nazar mein saaf zahir sawal ko dekhkar fauran samajh gaya ke vo kya puchhna chah raha tha.

"Poori haweli mein bas yahi hai shayad jise mere begunah hone par yakeen hai. Aaj milne chali aayi thi" Jai ne jawab diya

"Kuchh aisa bataya isne jisse hamen madad mile?"

"Kahan Sir" Jai ne jawab diya "Sidhi saadi ladki hai bechari. Ghar mein sab isko bholi kehke bulate hain"

"Hmmmm" Khan ne jawab diya

"Aapko kuchh pata chala?" Jai bola

"Tumhari baat sahi nikli Bindiya ke baare mein"

"Aapne baat ki usse?" Jai ne fauran sawal kiya

Khan ne haan mein sar hilaya

"Kya boli?"

"Darr gayi thi kaafi. Milne aane wali thi aaj mujhse aur main ummeed kar raha tha ke aaj kuchh koshish karunga pata karne ka usse par phir mujhe kuchh kaam tha toh shehar chala aaya.

"Aur kisi se baat?"

"Nahi yaar. Aur sach kaho toh mujhe yahi nahi pata ke Bindiya se bhi kya puchhun. Mujhe toh itna bhi yakeen nahi ke isko kuchh pata bhi hai. Andhere mein teer chalane wali baat hai"

"Agar usse nahi toh Bhushan se baat karne ki koshish kijiye. Kaafi time se hai vo Haweli mein, saari zindagi yahin guzari hai usne apni. Shayad kuchh pata chale"

"Aur uski bhi koi dukhti rag hai?"

Jai has pada

"Nahi dukhti rag toh nahi hai par kamzor hai ek, Gaanja. 2 kash saath bithake lagva dijiye, jo janta hai sab ugal dega"

"Theek hai. Karta hoon baat, filhal toh chalun. Ek do kaam aur hain mujhe"

Takreeban 1 baje Khan phir gaon pahuncha. Pata cala ke Bindiya usse milne aayi thi par phir intezaar karke chali gayi.

Thodi der police station mein rukne ke baad Khan apne kamre par pahuncha. Dopahar ke 2 baj rahe the, garmi aur loo poore zor par thi. Sab apne apne gharo mein dubke hue the.

Vo khana khaane ko taiyyar ho hi raha tha ke darwaza khatkhatane ki aawaz aayi. Usne uthkar darwaza khola.

Saamne Bindiya khadi thi.

"Tum"? Bindiya ke apne ghar par aaya dekhkar Khan chaunk pada "Yahan kya kar rahi ho?'

"Thaane gayi thi subah par pata chala ke aap hi nahi ho" Bindiya ne kaha

"Haan kuchh kaam nikal aaya tha isliye jana pad gaya tha" Khan bola

"Toh maine socha ke aapke ghar jakar hi mil aaoon"

"Shaam ko aa jaati. Itni dopahar mein yahan aane ki kya zaroorat thi"

"Nahi koi baat nahi. Idhar se guzar rahi thi toh socha ke aapse milti hi chalun. Shaam ko haweli mein zara zyada kaam hota hai isliye shayad aana hota ya nahi"

Saali aise jata rahi hai jaise mujhse milne aakar mujhpe ehsaan karti, Ek bada aadmi shaamil ho jaaye toh policewala akela kuchh nahi ukhaad sakta, , Khan ne dil hi dil mein socha.

"Aao andar aao" Usne Bindiya se kaha aur darwaze se hat gaya.

Khan ek chhote se sarkari quarter mein rehta tha, 2 kamre aur kitchen, toilet, bas.

Bindiya andar aayi toh Khan ne usko dhang se dekha. Bahar dhoop tez thi jiski vajah se vo ek pal ke liye Bindiya ko gaur se dekh nahi paya tha par jab vo andar aayi toh Khan ne ek nazar uspar daali. Usne ek kaale rang ki saree

daal rakhi thi jiske pallu ko usne apne upari jism par chadar ki tarah lapet rakha tha.

"Betho" Khan ne saamne rakhi ek kursi ki taraf ishara kiya.

Bidniya ne ab tak jo pallu apne uper lapet rakha tha hata diya. Ab uski saree ki pallu aam taur par uske kandhe par tha jaisa ki aksar saree pehni hui auraton ka hota hai. Saree ke niche usne ek sleeveless blouse pehna hua

tha.

"Kaho" Usne ek doosri kursi par bethte hue kaha.

"Main kya kahun" Bindiya boli "Aapne bulaya tha, aap kahiye ke kya chahte hain"

"Khaas kuchh nahi" Khan ne apni table ka drawer kholte hue kaha "Bas kuchh sawalon ke jawab"

"Aapke sawal main janti hoon aur mera jawab hai haan" Bindiya boli

"Haan?" Drawer mein kuchh dhoondhte hue Khan ne gardan uthakar Bindiya ki taraf dekha.

Jawab mein Bindiya uthkar sidhi khadi ho gayi aur usne apni saree ka pallu neeche gira diya. Agle hi pal Khan samajh gaya ke garmi hote hue bhi usne yahan aate hue apni saree ka pallu aur uper kyun lapet rakha tha.

Uska blouse ek toh sleeveless aur uper se bilkul transparent tha. Blouse ke neeche usne koi bra nahi pehen rakhi thi. Transparent blouse ke neeche uski badi badi chhatiyan sidhe Khan ki nazron ke saamne thi.

Khan samajh gaya ke Bindiya ne uske darane dhamkane ka kya matlab nikala tha.

"Main aapke saamne hoon aur jab tak aap yahan hain, jab aap chahenge aa jaoongi. Bas meri izzay mat uchhalna nahi toh mere paas marne ke alawa aur koi chara nahi bachega"

Khan ne ek nazar uspar uper se neeche tak daali. Uske saamne khadi aurat ki ek jawan beti thi par uske bavajood khud uske jism mein kahin koi dheelapan nahi tha. Pet par koi charbi nahi aur jism ab bhi poore shape mein tha.

Blouse ke andar se jhaankti chhatiyan bra na hone ke bavajood bhi ab tak tani hui thi.

"Chodne ki hisab se maal bura nahi hai" Khan ke dil mein khyaal aaya.

Ek pal ko usne filhal mauke ka fayda uthane ki sochi par phir apna khyaal badal diya.

"Apne aap ko dhako pls" Usne drawer se pen aur apni diary nikali "Aur beth jao"

kramashah........................................