कामुक-कहानियाँ शादी सुहागरात और compleet

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raj..
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Re: कामुक-कहानियाँ शादी सुहागरात और हनीमून

Unread post by raj.. » 06 Nov 2014 08:28

शादी सुहागरात और हनीमून--24

गतान्क से आगे…………………………………..

जब मुझे होश आया तो मैं एक बार फिर पहले की तरह उनकी गोद मे, उनकी एक बाँह ने पीछे से मेरी पीठ पकड़ के सहारा दिया था, मेरी जांघे उसी तरह फैली और उनका सख़्त बेकाबू लिंग उसी तरह मेरी यौन गुफा मे अंदर घुसा. कुछ देर मे मैं फिर उसी तरह, रस भीनी होके उनके धक्को के साथ कमर पकड़ के हल्के हल्के धक्के लगा रही थी. अभी भी मैं थकि सी थी लेकिन मन के आगे तन हर जाता है. तभी हम दोनो की आँखे एक साथ टेबल पे रखी तश्तरी मे , चाँदी के बार्क लगे पान के जोड़ो पे पड़ी. मेरी आँखो मे कल के रात की सारी सीन घूम गयी. उनकी आँखो ने भी इशारा किया और कमर के धक्के ने भी, उकसाया. और पान का एक जोड़ा मेरे होंठो मे आज मैं और ज़्यादा बोल्ड हो गयी थी और ज़्यादा छेड़ रही थी. कभी पान उनके होंठो पे चुला देती, कभी जव वो पास आते तो मैं पीछे झुक के दूर हो जाती और अपने उरोजो को उनके सामने उचका देती. लेकिन मेरे बालमा खिलाड़ी से कौन जीत सकता था. उसने मेरे सर को दोनो हाथो से पकड़ के पान और मेरे होंठ दोनो मुझेसे छीन लिया. फिर तो वो कस कस के मेरे होंठ अपने होंठो मे ले भींचते, चूसते और निचले होंठ को हल्के से काट लेते. उनकी ज़ुबान मेरे मूह के अंदर थी. फ़र्क सिर्फ़ ये था कि अब मैं भी कुछ कुछ रस लेना उनसे सीख गयी थी. अब जब उनके होंठ मेरे होंठो को चूस के हटते तो मेर होंठ भी उन्हे चूम लेते. और मेरे मूह मे घुसी उनकी जीभ जब मेरे मूह मे रस लेते हुए छेड़ छाड़ करती तो अब मेरी ज़ुबान भी हल्के से ही सही,

उनकी जीभ को छू लेती चूम लेती. पहले उन्होने मेरी जीभ को अपने मूह मे ले के चूसना शुरू किया तो देखा देखी मेने भी जब उनकी जीभ अगली बार मेरे मूह मे घुसी, तो मेने भी उसे कस के चूस लिया. कुछ इन चुंबनो का असर कुछ होंठो और पान के रस का असर, थोड़ी ही देर मे मैं पूरी तरह जागृत थी और अब मेरे कमर के धक्के भी. थोड़ी देर के लिए, मेने पीछे की ओर हाथ कर के सहारा लिया तो मुझे एक नया सहारा मिल गया फिर तो मेने कस के उनकी कमर को अपनी टाँगो मे लपेटा और हाथो के सहारे, पूरी ताक़त से उठा के नितंबो को पुश किया तो उनका लिंग सूत सूत कर के मेरी योनि के और अंदर. अब उन्होने भी उसी तरह से हाथ बिस्तर पे कर, कमर के पूरे ज़ोर से. कभी हम दोनो साथ साथ पुश करते और कभी बड़ी बड़ी से एक बार वो धकेलते. मैं बता नही सकती कितना अच्छा लग रहा था, जव उनका वो मोटा चर्म दंड अंदर जाता. चुंबन, आलिंगन सब कुछ छोड़ के बस अंदर बाहर अंदर बाहर. जब मैं धक्का मारने केलिए पीछे झुकती तो मेरे गदराए मस्त किशोर, सत्रह साल के जोबन खूब उचक के , उभर के उनके होंठो से रहा नही गया. फिर तो गचक सेउन्होने मेरे खड़े चूचुक को भर लिया और लगे चुभलाने,चूसने. फिर दूसरे उभार पे उनके हाथ की और वो भी कस कस के मसला जाने लगा.

कुछ देर तक तो उन्होने जम के मेरे निपल्स चूसे और फिर उरोजो के उपरी भाग पे अपने दाँत के निशान, पान के निशान. उन्होने कस के मुझे अपनी बाहो मे भर रखा था और फिर धीरे से वो नीचे की ओर लेट गये मुझे उपर लिए.

अब मैं उपर थी और वो नीचे.

उनका लिंग इस तरह धंसा था मेरे अंदर कि वो कुछ भी करते जैसे उसने मुझे चोदने की कसम खा रखी हो. मेने पढ़ रखा था, फोटो मे देख रखा था, विपाइत रति मेने पूरी कोशिश भी की लेकिन मुझेसे नही हुआ. मुस्करा कर उन्होने मेरी कमर पकड़ी और मुझे इशारे से सीधे होने को कहा और फिर कमर पकड़ के अपनी बाहो की ताक़त से मुझे उपर नीचे.. उपर नीचे करने लगे. कितनी ताक़त थी उनकी बाहो मे और जब मैं उपर नीचे होती उनके मोटे लिंग पे लगता मैं किसी मीठी शूली पे चढ़ रही हू. थोड़ी देर इसी तरह मुझे रस देने के बाद वो रुक गये और मैं उनके उपर झुक गयी.

मैं धक्के तो नही लगा पा रही थी पर अपनी कमर को आगे पीछे कर के मज़ा ले रही थी. फिर मेने उन्हे छेड़ना शुरू किया. अपने लंबे काले बाल झुक के मैं उनके मूह पे बिखेर देती और जब उनका मूह छिप जाता मैं हल्के से उन्हे छू लेती. और फिर मेरे उरोज.. मैं एक दम उनके मूह के पास ले जाती और जब वो चूमने के लिए होंठ बढ़ते,

मैं उन्हे उपर उठा लेती. कभी अपने मस्त जोबन उनकी छाती मे रगड़ देती. जो थरथराहट उनके लिंग मे हो रही थी, लग रह था वो भी किनारे के करीब है और मेरे तो पूरे तन बदन मे तरंगे दौड़ रही थी.

अचानक उन्होने फिर पलटा खाया. अब मैं फिर से नीचे थी. उन्होने मेरे नितंबो केनिचे ढेर सारे कुशन लगाए और अब मुझे लगभग दुहरा कर दिया. मेरे घुटने मेरे स्तनो के पास थे. और उन्होने कस कस के धक्के मारने शुरू किए. मेरे कानो के पास आके उन्होने पूछा, "क्यो रानी मज़ा आ रह है. ""हाँ, राजा हाँ मैं चूतड़ उछाल के बोली. म. ""मज़ा आ रहा है जानम. . दवाने मे( अभी भी झिझकने उनका दामन पूरी तरह नही छोड़ा था). "हाँ राजा हाँ, और कस के और औरब्हुत मज़ा आ रहा है दबवाने मे"हम दोनो मस्ती मे पागल हो गये थे. और पहले मैं किनारे पे पहुँची. मेरी योनि कस कस के उनके लिंग को पकड़ रही थी, दबा रही थी निचोड़ रही थी. फिर वो भी कैसे रुक पाते. एक बार फिर जम के बदिश शुरू हुई. वह झाड़ भी रहे थे फिर भी उनके धक्के नही रुक रहे थे. जब वो वो रुके तो.. सिर्फ़ मेरी योनि ही नही उनका वीर्य मेरी गोरी गोरी जाँघो पे देर तक बहता रहा.

अबकी बार मैं एक दम थक गयी थी. मुझे नही लग रहा था, आज रात मैं दुबारा किसी हालत मे, दुबराबाड़ी देर तक मैं पड़ी रही ऐसेही. उन्होने फिर सहारा देके मुझे बैठने की कोशिश की. बहुत मुश्किल से मैं पलंग के सिरहाने और उनके सहारे, अधलेति बैठी रही. थोड़ी देर तक तो वो भी चुप बैठे रहे, फिर उन्होने कुछ कुछ बाते शुरू की. और उनकी बाते भी.. बस मैं सुनती रही. वो मेरे गेसुओ से खेलते रहे, मेरे चेहरे को देखते. फिर उन्होने प्लेट मे से एक मिठाई उठाई और आधी मुझे खिलाई, बिना किसी छेड़ छाड़ के, इस समय तो वो अगर मेरे पास आने की ज़रा भी कोशिश करते तो मैं शायद झटक देती. थकान के साथ साथ पूरी देह, खास तौर से मेरी जाँघो मे इतना दर्द हो रहा था इतनी देर तक और कस के फैलाया था, इन्होने और छातियो मे भी. आधी मुझे खिला के आधी उन्होने खुद खा ली. इससे भूख और बढ़ गयी. वो प्लेट उठा के बिस्तर पे ही लाए, और फिर हम दोनो ने मिल के पूरी प्लेट भर की मिठाई सफाचट कर दी. और मिठाई भी खूब पौष्टिक काजू की बरफी, पाइस्ट के रोल. मुझे प्यास लगी और वो बिना कहे पानी लाए. मेने पानी पी के उनसे पूछा, हे अब मूह कैसे सॉफ करूँ तो उन्होने अपने होंठ मेरे होंठ रगड़ के दोनो के सॉफ कर दिए. मेने हंस के कहा, हे बदमाशी नही. उन्होने झट से कान छू लिए और मैं हंस पड़ी. पेट मे मिठाई गयी तो थकान भी कुछ कम हुई और दर्द भी. फिर अचानक वो बोले हे गुस्सा मत होना अपनी चीज़ मैं फिर भूल गया. मेने कब से सोचा था कि पहली रात तुम्हे दूँगा लेकिन भूल गया. मैं हंस के बोली, जाओ माफ़ किया आप भी क्या याद करेंगे लेकिन बताइए तो सही क्या चीज़ है.

"बताने की नही दिखाने की है, वो भी यहाँ नही सोफे पे चलो. "वो बोले और मैं लाख ना नुकुर करती हुई उनकी बाहों मे सवार सोफे पे पहुँच गयी. वहाँ राइडिंग टेबल से उन्होने एक बड़ी सी डायरी निकाली. मैं अपनी धुन मे मैं बोली अब तो इतना,

raj..
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Re: कामुक-कहानियाँ शादी सुहागरात और हनीमून

Unread post by raj.. » 06 Nov 2014 08:33

लेकिन बताइए शादी के पहले कितना याद किया. वो पास मे आ के बैठ गये और डायरी का सितम्बर का एक पन्ना खोला और उस पे हाथ रख के हंस के पूछा ये डेट याद है ना. वो डेटमैन अपनी बर्थ डेट भूल सकती हू वो डेट कैसे भूल सकती हू. ये वो दिन था जब मैं 'उनसे' सबसे पहले मसूरी मे मिली थी. एक दम खुश हो के मैं बोली हाँ और उन्होने हाथ हटाया मेरी फोटो.. जो उन्होने खींची थी. और उसके बाद हर पेज पे कुछ ने कुछ.. ढेर सारी कविताए और कयि पे मेरी फोटौ भी. वो बोले रोज तुम्हारी बेइंतहा याद आती थी, बस इसी लिए.. हर रोज तुम मेरे ख्यालो मे होती थी और तुमसे बतियाते जो कुछ मैं लिख लेता था, बस वो यहा टांक लेता था. मेने पन्ने पलते एक दिन भी नागा नही गया. रोमांच से मेरे रोगते खड़े हो गये. कोई मुझे इतना चाह सकता है, मेने सोचा भी नही था. मेरी आँखो मे पानी भर आया. मिलने के अगले दिन का पन्ना और उस पर एक कविता थी "तुम". वो बोला, उस दिन तुम लोगो को देहरादून मे छोड़ के आया तो रात भर नींद नही आई. उसी दिन लिखा था. मैं पढ़ने लगी,

मधुर मधुर तुम ,

मधुरिम मन के ,

आलंबन .

मेरे जीवन के तृप्त तुम्हे ,

देख होते है, त्रिशित नेयन ,

मन उपवन के.

रूप तुम्हारा, निर्मित करता ,

नित नूतन ,

चित्र सृजन के ,

तुम ही तो हो इस मधुबन मे ,

केंद्र बिंदु ,

नव आकर्षण के.


मैं तो एक दम सिहर गयी. मैं सोच भी नही सकती थी कि कोई इस तरह वो भी मेरे बारे मे सोचता होगा. कविता लिखने की बात तो दूर. मेने लाड से उसके घुंघराले बाल बिगाड़ दिए और बोली, बावारे तुम एक दम पागल हो.

और उस के बाद ढेर सारी कवितए मेरे बारे मे हाशिए मे लिखा मेरा नेम. और कुछ कविताओ के बाद एक सीरिस थी, केश, आँखे, अधर वो बोला रोज तुम मुझे सपने मे आ के तंग करती थी. इसलिए जैसा तुम दिखती थी, नेक **** वर्णें, सारे अंगो के. मैं प्यार से लताड़ के बोली, केसरे अंगो के वो हंस के बोला. हाँ पढ़ो तो सारे अंगो के.


मुझसे क्या छुपाव, दुराव. मेने पढ़ना शुरू किया. पहली कविता थी "केश"


उन्मुक्त कर दो केश,

मत बांधो इन्हे.

ये भ्रमर से डोलाते ,

मुख पर तुम्हारे,

चाँद की जैसे नज़र कोई उतारे.

दे रहे संदेश,

मत बांधो इन्हे.

खा रहे है खम दमकते भाल पे ,

छोड़ दो इनको ,

इन्ही के हाल पे ,

दे रहे आदेश ,

मत बांधो इन्हे.


और उसके बाद आँखो और फिर होंठो और उसके साथ साथ वो और ज़्यादा रसिक होते जा रहे थे. "मीन सी, कानो से बाते करती, आँखे, ढीठ डित, लज़ाई सकूचाई, मेरे सपने जहाँ जाके पल भर चुंबनो के स्वादों से लदी थकि पलके, कतर सी तिरछी भौंहे, और सुधा के सदन, मधुर रस मयि अधर, प्रतीक्ष्हरत मेरे अधर जीनेके स्वाद के स्नेह केलेकिन सबसे ज़्यादा कविताए जिन पे थी वे थे मेरेउरोज. पूरी 7 और एक से एक और सिर्फ़ उन पर ही नही मेरे निपल्स के बारे मे, उसके आस पास के रंग के बारे मे "

ये तेरे यौवन के रस कलश,

ये किशोर उभार,

खोल दो घाट पी लेने दो

मेरे अतृप्त नेयन, प्यासे आधार""व्याकुल है

मेरे कर युगल पाने को,

पागल है मेरा मन, ये ये आनंद शिखर,

उन पे शोभित कलश,

तनवी तेरी देह लता के ये फल चखने को"



raj..
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Re: कामुक-कहानियाँ शादी सुहागरात और हनीमून

Unread post by raj.. » 06 Nov 2014 08:37


मेरा तो मन खराब हो गया इन कविताओ को पढ़ के और मेने कई पन्ने पलट दिए. अब नितंबो का वर्णन था, "काम देव के उल्टे मृदंग, भारी घने नितंब. "कई इंग्लीश मे भी थी.

पुश अगेन्स्ट माइ हंग्री माउथ ,

ऐज दा टिप ऑफ माइ टंग स्लाइड्स अप दा स्लिपरी फरो ,

दट वेल्कम्स मे बिट्वीन रौज़ ऑफ डेलिकेट पिंक पेटल्स ,

थ्रस्ट अगेन्स्ट माइ गेनरस टंग.


वो बोले. पन्ने पीछे पलटो, 'वो' तो तुमने छोड़ ही दिया जिसके बारे मे पूच्छ रही थी. और वास्तव मे नितंब के पहले, नाभि के बाद थी वो, रस कूप, मदन स्थान"

करती रहोगी तुम नही नही,

शरमाती, इतलाती और बल पूर्वक खोल दूँगा

मैं हटा के लाज के सारे पहरे, पर्दे,

छिपी रहती होगी जो किरानो से भी. रस कूप,

गुलाबी पंखुड़ियो से बंद असाव का वो प्याला",


पढ़ते पढ़ते मेरी आँखे मस्ती से मुन्दि जा रही थी. मैं सोच भी नही सकती थी शब्द भी इतने रसीले हो सकते है. मैं वहाँ भी गीली हो रही थी, मेरे रस कूप एक बार फिर रस से छलक रहे थे. और जहाँ तक उनकी हालत थी, मुझे तो लगने लगा था कि कब तक मैं उनके पास रहती थी, उनका तो 'वो' खड़ा ही रहता था. मेने उनसे कहा कि, आप मेरे बारे मे आप बोलो मैं आपके मूह से सुनना चाहती हू. उन्होने डायरी के पन्ने खोले तो शरारत से मेने उसे बंद कर दिया और बोली ऐसे थोड़ी, तुरंत बना के कवि ऐसे जो भी आप के मन मे आए. तभी मुझे ध्यान आया, पढ़ने के बहाने उन्होने लाइट जला दी थी, और निर्वासना मैं, मेरा सब कुछ. शरमा के मेने उनकी आँखे अपनी हथेली बंद कर दी. वो बोले, अरे देखुगा तो नही बोलूँगा कैसे. मेने उनका हाथ अपने सीने पे रख के कहा, उंगलियो से देख के. फिर मेने कहा, मुझे अपनी प्रशंसा सुनना अच्छा लगता है और वो भी आपके मूह से. वो बोलने लगे,


"तेरे ये मदभरे, मतवाले, रस कलश, किशोर यौवन के उभार, रूप के शिखर,

'डज़ ऑफ जॉय', जवानी की जुन्हाई से नहाए जोबन, प्यासे है मेरे अधर,

इनेका रस पाने को, छू लेने को चख लेने को. चख लेने को सुधा रस"


और मेरी आँखे भी मस्ती मे बंद हो गयी. मेने खुद उनके प्यासे अधरो को खींच के अपने जोबन के उभारो पे लगा दिया. और अब उनकी उंगलिया भी सरक के और नीचेसीधे मेरे रस कूप पे और वो बोले जा रहे थे,

"तेरे ये भीगे गुलाबी प्रेम के स्वाद को चखने को बैचेन होंठ, थरथराते, लजाते,

ये गुलाबी पंखुड़िया किशोरखिलाने को बैठी ये कली ( उनकी उंगलिया अब मेरे भागोश्ठो का फैला के अंदर घुस चुकी थी),

ये सन्करि प्रेम गली, मेरे चुंबनो के स्वाद से सजी रस से पगी,

स्वागत करने को बैठी, भींच लेने को, कस लेने को, सिकोड लेने को

अपनी बाहो मे मेरे मिलन को उत्सुक बेचैन उत्थित काम दंड. "


हम दोनो रस से पेज बैठी हो रहे थे. मेरी आँखो के सामने शाम को पढ़ी वो किताब उनके 'काम रस' से सने वो पन्ने याद आ रहे थे जिसमे पति और पत्नी पहले मिलन मे ही कितने खुले कारनामे उनके कान मे फुसफुसा कर कहा,

". . . दंड या"वो हंस के धीरे से बोले,

"लंड घुसाने को तुम्हारी कसी किशोर चूत मेओर उसके साथ ही बाँध टूट गया.

मेरी जांघे अपने आप ही फैल गयी और कवि ने उन जाँघो के बीच प्रतीक्षारत मेरी योनि मे एक झटक मे ही पेल दिया. उनका एक पैर फर्श पे था और दूसरा सोफे पे,

मेरी फैली हुई गोरी गोरी किशोर जाँघो के बीच, मेरे रसीले जोबन को पकड़ केउन्होने कस के ऐसे धक्के मारे की मैं चीख पड़ी. मेरे मस्त रस से भरे उभारो को पकड़ के रगड़ते मसलते, वो बोले "तेरी इन मस्त मस्त"

"हाँ हाँ मेरे बलम मेरे साजन बोलो ना, मेरी मस्त मस्त क्या"उनको कस के अपनी बाहो मे जाकड़ के मैं बोली,

"तेरी ये मस्त मस्त चूचु.. चुचिया, मन करता है कस के मसल दू, दबा दू. "


"हाँ राजा हाँ मेरे साजन मसल दो मसल दो कस के, ये बैठी है तेरे लिए"

"जब मैं इन्हे देखता था ना तुम्हारे टाप के अंदर, उभरे ये उभार, ब्लाउस के अंदर मचलते, मुश्किल से रोक पाता था मैं, मन करता था बस छू लू,. . ओह ओह मसलने दो, रगड़ने दो, ये रस से भरे जोबन, ये रसीली चुचिया"

"तो ले लो ना ये तेरे ही तो है, रगड़ दो मसल दो, चूम लो चूस लो"


तभी उन्होने मेरी निगाह थोड़ी मोडी. पास मे ही एक बड़ा सा मिरर था और उसमे सोफे पे जो हो रहा था वो सब कुछ दिख रहा था. जिस तरह से वो मेरे चुचिया मसल रहे थे, मेरे निपल चूस रहे थे और फिर जब मेरी निगाह नीचे की ओर गयी तो मेने शरमा के आँखे बंद कर ली और उन्होने मेरे जोबन पे कस के कचक से काट लिया, और मेरी आँख खुल गयी. और मैं फिर देखने लगी नीचे,


क्रमशः……………………….

शादी सुहागरात और हनीमून--24

gataank se aage…………………………………..

jab mujhe hosh aya to main ek baar fir pahale ki tarah unki god me, unki ek baah ne piche se meri peeth pakad ke sahara diya tha, meri jaanghe usi tarah faili aur unka sakht bekabu ling usi tarah meri yaun gufa me andar ghusa. kuch der me main fir usi tarah, ras bhini hoke unke dhakko ke sath kamar pakad ke halke halke dhakke laga rahi thi. abhi bhi main thaki si thi lekineman ke age tan har jata hai. tabhi ham dono ki ankhe ek sath tebal pe rakhi tashtari me , chandi ke bark lage paan ke jodo pe padi. meri ankho me kal ke raat ki sari sin ghum gayi. unki ankho ne bhi ishara kiya aur kamar ke dhakke ne bhi, ukasaya. aur paan ka ek joda mere hotho meaj main aur jyada bold ho gayi thi aur jyada ched rahi thi. kabhi paan unke hontho pe chula deti, kabhi jav wo paas ate to main piche jhuk ke dur ho jati aur apne urojo ko unke saamne uchaka deti. lekin mere balama khilaadi se kaun jeet sakata tha. usne mere sar ko dono hatho se pakad ke paan aur mere honth dono mujhese chin liye. fir to wo kas kas ke mere honth apne hontho me le bhinchate, choosate aur nichale honth ko halke se kaat lete. unki juban mere muh ke andar thi. fark sirf ye tha ki ab main bhi kuch kuch ras lena unse seekh gayi thi. ab jab unke honth mere hontho ko choos ke hatate to mer honth bhi unhe chum lete. aur mere muh me ghusi unki jeebh jab mere muh me ras lete huye ched chad karati to ab meri juban bhi halke se hi sahi,

unke jeebh ko chu leti chum leti. pahale unhone meri jeebh ko apne muh me le ke choosane shuru kiya to dekha dekhi mene bhi jab unki jeebh agali baar mere muh me ghusi, to mene bhi use kas ke choos liya. kuch in chumbano ka asar kuch hontho aur paan ke ras ka asar, thodi hi der me main puri tarah jagrit thi aur ab mere kamar ke dhakke bhi. thodi der ke liye, mene piche ki or hath kar ke sahara liya to mujhe ek neya sahara mil gayafir to mene kas ke unki kamar ko apni taango me lapeta aur hatho ke sahare, puri takat se utha ke nitambo ko push kiya to unka ling sut sut kar ke meri yoni ke aur andar. ab unhone bhi usi tarah se hath bistar pe kar, kamar ke pure jor se. kabhi ham dono sath sath push karte aur kabhi badi badi se ek baar wo dhakelate. main bata nahi sakati kitane achcha lag raha tha, jav unka wo mota charm dand andar jata. chumban, alingan sab kuch chod ke bas andar bahar andar bahar. jab main dhakka marane keliye piche jhukati to mere gadaraye mast kishor, satrah saal ke joban khub uchak ke , ubhar ke unke hontho se raha nahi gaya. fir to gachak seunhone mere khade chuchuk ko bhar liya aur lage chubhalawne,

choosane. fir dusare ubhar pe unke hath ki aur wo bhi kas kas ke masala jane laga.

kuch der tak to unhone jam ke mere nipals choose aur fir urojo ke upari bhag pe apne daant ke nishan, paan ke nishan. unhone kas ke mujhe apni baaho me bhar rakha tha aur fir dhire se wo niche ki or let gaye mujhe upar liye.

ab main upar thi aur wo niche.

unka ling is tarah dhansa tha mere andar ki wo kuch bhi karte jaise usne mujhe ne chodane ki kasam kha rakhi ho. mene padh rakha tha, foto me dekh rakha tha, vipaait rati mene puri koshish bhi ki lekin mujhese nahi hua. muskara kar unhone meri kamar pakadi aur mujhe ishare se sidhe hone ko kaha aur fir kamar pakad ke apni baaho ki takat se mujhe upar niche.. upar niche karane lage. kitani takat thi unki baaho me aur jab main upaniche hoti unke mote ling pelagata main kisi mithi shuli pe chadh rahi hou. thodi der isi tarah mujhe ras dene ke baad wo ruk gaye aur main unke upar jhuk gayi.

main dhakke to nahi laga pa rahi thi par apni kamar ko age piche kar ke maja le rahi thi. fir mene unhe chedane shuru kiya. apne lambe kale baal jhuk ke main unke muh pe bikher deti aur jab unka muh chip jata main halke se unhe chu leti. aur fir mere uroj.. main ek dam unke muh ke paas le jati aur jab wo chumane ke liye honth badhate,

main unhe upar utha leti. kabhi apne mast joban unki chati me ragad deti. jo tharatharahat unke ling me ho rahi thi, lag rah tha wo bhi kinere ke karib hai aur mere to pure tan badan me tarange daud rahi thi.

achanek unhone fir palata khaya. ab main fir se niche thi. unhone mere nitambo keniche dher sare kushan lagaye aur ab mujhe lagabhag duhara kar diya. mere ghutane mere stano ke paas the. aur unhone kas kas ke dhakke marane shuru kiye. mere kano ke paas ake unhone poocha, "kyo rani maja aa rah hai. ""ha, raja ha main chutad uchal ke boli. m. ""maja aa raha hajanem. . davane me( abhi bhi jhijhakane unka daman puri tarah nahi choda tha). "ha raja ha, aur kas ke aur aurabahut maja aa raha he vane me"ham dono masti me pagal ho gaye the. aur pahale main kinere pe pahunchi. meri yoni kas kas ke unke ling ko pakad rahi thi, daba rahi thi nichod rahi thi. fir wo bhi kaise ruk pate. ek baar fir jam ke badish shuru huyi. vah jhad bhi rahe the fir bhi unke dhakke nahi ruk rahe the. jab wo wo ruke to.. sirf meri yoni hi nahi unka viry meri gori gori jaangho pe der tak behta raha.

abaki baar main ek dam thak gayi thi. mujhe nahi lag raha tha, aaj raat main dubara kisi halat me, dubarabadi der tak main padi rahi aisehi. unhone fir sahara deke mujhe baithane ki koshish ki. bahut mushkil se main palmg ke sirahane aur unke sahare, adhaleti baithi rahi. thodi der tak to wo bhi chup baithe rahe, fir unhone kuch kuch baate shuru ki. aur unki baate bhi.. bas main suneti rahi. wo mere gesuo se khelate rahe, mere chehare ko dekhte. fir unhone plet me se ek mithai uthai aur adhi mujhe khilai, bina kisi ched chad ke, is samay to wo agar mere paas ane ki jara bhi koshish karte to main shayad jhatak deti. thakan ke sath sath puri deh, khas taur se meri jaangho me itane dard ho raha tha itani der tak aur kas ke failaya tha, inhone aur chatiyo me bhi. adhi mujhe khila ke adhi unhone khud kha li. isase bhukh aur badh gayi. wo plet utha ke bistar pe hi laye, aur fir ham dono ne mil ke puri plet bhar ki mithayi safachat kar di. aur mithayi bhi khub paushhtikakaju ki barfi, piste ke rol. mujhe pyas lagi aur wo bina kahe pani laye. mene pani pi ke unse poocha, he ab muh kaise saaf karum to unhone apne honth mere honth ragad ke dono ke saaf kar diye. mene hans ke kaha, he badamashi nahi. unhone jhat se kaan chu liye aur main hans padi. pet me mithayi gayi to thakan bhi kuch kam huyi aur dard bhi. fir achanek wo bole he gussa mat hone apni cheej main fir bhul gaya. mene kab se socha tha ki pahali raat tumhe dunga lekin bhul gaya. main mhans ke boli, jao maf kiya aap bhi kya yaad karenge lekin bataiye to sahi kya cheej hai.

"batane ki nahi dikhane ki hai, wo bhi yaha nahi sofe pe chalo. "wo bole aur main lakh ne nukur karati huyi unki baho me savar sofe pe pahunch gayi. vaha riding tebal se unhone ek badi si dairy nikali. main apni dhun me main boli ab to itane,

lekin bataiye shadi ke pahale kitane yaad kiya. wo paas me aa ke baith gaye aur dairy ka sitmbar ka ek panne khola aur us pe hath rakh ke hans ke poocha ye date yaad hai ne. wo detamain apni barth date bhul sakati hu wo date kaise bhul sakati hu. ye wo din tha jab main 'unse' sabase pahale masuri me mili thi. ek dam khush ho ke main boli ha aur unhone hath hatayameri foto.. jo unhone khinchi thi. aur uske baad har pej pe kuch ne kuch.. dher sari kavitaye aur kayi pe meri fotau bhi. wo bole roj tumhari beintaha yaad ati thi, bas isi liye.. har roj tum mere khyalo me hoti thi aur tumase batiyate jo kuch main likh leta tha, bas wo yaha tamk leta tha. mene panne palate ek din bhi nega nahi gaya. roamch se mere rogate khade ho gaye. koyi mujhe itane chah sakata hai, mene socha bhi nahi tha. meri ankho me pani bhar aya. milane ke agale din ka panne aur us par ek kavita thi "tum". wo bola, us din tum logo ko deharadun me chod ke aya to raat bhar neend nahi ai. usi din likha tha. main padhane lagi,

madhur madhur tum ,

madhurim man ke ,

alamban .

mere jivan ke tript tumhe ,

dekh hote hai, trishhit neyan ,

man upavan ke.

rup tumhara, nirmit karata ,

nit nutan ,

chitr srijan ke ,

tum hi to ho is madhuban me ,

kendr bindu ,

nev akarshhan ke.

main to ek dam sihar gayi. main soch bhi nahi sakati thi ki koi is tarahavo bhi mere bare me sochata hoga. kavita likhane ki baat to dur. mene laad se uske ghumgharale baal bigad diye aur boli, bavare tum ek dam pagal ho.

aur us ke baad dher sari kavitaye mere bare me hashiye me likha mera nem. aur kuch kavitao ke baad ek siris thi, kesh, ankhe, adharavo bola roj tum mujhe sapane me aa ke tang karati thi. isliye jaisa tum dikhati thi, nekh **** varnen, sare ango ke. main pyar se latad ke boli, kyasare ango ke wo hans ke bola. ha padho to sare ango ke.

mujhese kya chupav, durav. mene padhane shuru kiya. pahali kavita thi "kesh"

unmukt kar do kesh,

mat baandho inhe.

ye bhramar se dolate ,

mukh par tumhare,

chand ki jaise najar koi utare.

de rahe sandesh,

mat baandho inhe.

kha rahe hai kham damakate bhal pe ,

chod do inko ,

inhi ke haal pe ,

de rahe adesh ,

mat baandho inhe.

aur uske baad ankho aur fir hontho aur uske sath sath wo aur jyada rasik hote ja rahe the. "min si, kano se baate karati, ankhe, dhith dith, lajayi sakuchayi, mere sapane jaha jake pal bharachumbano ke svado se ladi thaki palake, katar si tirachi bhaumhe, aur sudha ke sadan, madhur ras mayi adhar, pratikshharat mere adhar jineke svad ke sneh kelekin sabase jyada kavitaye jin pe thi ve the mereuroj. puri 7 aur ek se ek aur sirf un par hi nahi mere nipals ke bare me, uske as paas ke rmg ke bare me "

ye tere yauvan ke ras kalash, ye kishor ubhar, khol do ghat pi lena do mere atript neyan, pyase adhar""vyakul hai mere kar yugal paane ko, pagal hai mera man, ye ye amned shikhar, un pe shobhit kalash, tanvi teri deh lata ke ye fal chakhane ko"mera to man kharaab ho gaya in kavitao ko padh ke aur mene kai panne palat diye. ab nitambo ka varnen tha, "kaam dev ke ulte mridang, bhari ghane nitamb. "kai English me bhi thi.

push against my hungry mouth ,

as the tip of my tongue slides up the slippery furrow ,

that welcomes me between rows of delicate pink petals ,

thrust against my generous tongue.

show me the power of your desire ,

for my oral caress.

my exploring tongue lifts the hod ,

and finds your smooth firm pearl.

you squeal in that unique way,

signeling that i have found your special spot.

i harden in response.

thi to wo bole. panne piche palato, 'wo' to tumane chod hi diya jiske bare me poochh rahi thi. aur vastav me nitamb ke pahale, nebhi ke baad thi wo, ras kup, madan sthan"

karati rahogi tum nahi nahi, sharamati, ithalati aur bal purvak khol dunga main hata ke laaj ke sare pahare, parde, chipi rahti hogi jo kirano se bhi. ras kup, gulabi pankhudiyo se band asav ka wo pyala", padhate padhate meri ankhe masti se mundi ja rahi thi. main soch bhi nahi sakati thi shabd bhi itane rasile ho sakate hai. main vaha bhi gili ho rahi thi, mere ras kup ek baar fir ras se chalak rahe the. aur jaha tak unki halat thi, mujhe to lagane laga tha ki kab tak main unke paas rahati thi, unka to 'wo' khada hi rahata tha. mene unse kaha ki, aap nenejo mere bare mevo main apake muh se sunene chahati hu. unhone dairy ke panne khole to shararat se mene use band kar diya aur boli aise thodi, turant bane keashu kavi aise jo bhi aap ke man me aye. tabhi mujhe dhyan aya, padhane ke bahane unhone light jala di thi, aur nirvasane main, mera sab kuch. sharama ke mene unki ankhe apni hatheli band kar di. wo bole, are dekhuga to nahi bolundga kaise. mene unka hath apne sine pe rakh ke kaha, ungaliyo se dekh ke. fir mene kaha, mujhe apni prashansa sune achcha lagata hai aur wo bhi apake muh se. wo bolane lage,

"tere ye madabhare, matavale, ras kalash, kishor yauvan ke ubhar, rup ke shikhar,

'does of joy', javani ki junhai se nehaye joban, pyase hai mere adhar, ineka ras paane ko, chu lena ko chakh lena ko. chak lena ko sudha ras"aur meri ankhe bhi masti me band ho gayi. mene khud unke pyase adharo ko khinch ke apne joban ke ubhaaro pe laga diya. aur ab unki ungaliya bhi sarak ke aur nichesidhe mere ras kup pe aur wo bole ja rahe the,

"tere ye bhige gulabi prem ke svad ko chakhane ko baichen honth, tharatharate, lajate,

ye gulabi pankhudiya kishorakhilane ko bethi ye kali ( unki ungaliya ab mere bhagoshhtho ka faila ke andar ghus chuki thi), ye smkari prem gali, mere chumbano ke svad se saji ras se pagi, svagat karane ko bethi, bhinch lena ko, kas lena ka, sikod lena ko apni baaho me mera milan ko utsuk bechain utthit kaam dand. "

ham dono ras se page bethi ho rahe the. meri ankho ke saamne sham ko padhi wo kitaab unke 'kam ras' se sane wo panne yaad aa rahe the jisame pati aur patni pahale milan me hi kitane khul karamene unke kaan me fusafusa kar kaha,

". . . dand ya"wo hans ke dhire se bole,

"lund ghusane ko tumhari kasi kishor choot meaur uske sath hi baandh toot gaya.

meri jaanghe apne aap hi fail agai gayi aur kavi ne un jaangho ke beech pratikshharat meri yoni me ek jhatak me hi pel diya. unka ek pair farsh pe tha aur dusara sofe pe,

meri faili huyi gori gori kishor jaangho ke beech, mere rasile joban ko pakad keunhone kas ke aise dhakke mare ki main chikh padi. mere mast ras se bhare ubhaaro ko pakad ke ragadate masalate, wo bole "teri in mast mast"

"ha ha mere balam mere sajan bolo ne, meri mast mast kya"unko kas ke apni baaho me jakad ke main boli,

"teri ye mast mast chuchu.. chuchiya, man karata hai kas ke masal du, daba du. "

"ha raja ha mere sajan masal do masal do kas ke, ye bethi hai tere liye"

"jab main inhe dekhata tha ne tumhare tap ke andar, ubhare ye ubhar, blouse ke andar machalate, mushkil se rok pata tha main, man karata tha bas chu lu,. . oh oh masalane do, ragadane do, ye ras se bhare joban, ye rasili chuchiya"

"to le lo ne ye tere hi to hai, ragad do masal do, chum lo choos lo"

tabhi unhone meri nigah thodi modi. paas me hi ek bada sa mirar tha aur usame sofe pe jo ho raha tha wo sab kuch dikh raha tha. jis tarah se wo mere chuchiya masal rahe the, mere nipal choos rahe the aur fir jab meri nigah niche ki or gayi to mene sharama ke ankhe band kar li aur unhone mere joban pe kas ke kachak se kaat liya, aur meri ankh khul gayi. aur main fir dekhane lagi niche,

kramashah……………………….