एक अनोखा बंधन

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The Romantic
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Re: एक अनोखा बंधन

Unread post by The Romantic » 16 Dec 2014 09:31

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भौजी ने मेरे लंड के ऊपर अपनी टांग रखी और मेरे होठों को अपने होठों से रगड़ने लगीं| लंड तन के खड़ा हो गया|भौजी ने मेरे होठों को अपने होठों से अलग किया और बोलीं;

भौजी: जानू... आप मुझसे सम्भोग के लिए कहने में क्यों जिझकते हो?

मैं: वो मैं...

भौजी: बोलो ना?

मैं: जब मैं शहर से आया था तब मैंने कई बार देखा है की भैया आपसे सम्भोग के लिए कहते हैं ... और कभी भी कहते हैं... किसी के भी सामने...अलग बुला के आपको कहते हैं| और चूँकि आप मुझसे प्यार करते हो तो आप हरबार मना कर देते थे| अब मेरा मन भी कभी भी ये सब करने को करे और मैं भी अगर सबके सामने आपसे इस के लिए कहूँ तो मुझ में और भैया में फर्क क्या रहा? इसलिए मैं अपना मन मार के रह जाता हूँ| पर सच कहूँ तो मुझे मजा तब आता है जब आप कहते हो!

भौजी: (मेरे लंड पे अपना हाथ रखते हुए) आप दोनों में बहुत फर्क है|मैं आपसे प्यार करती हूँ| आपकी ख़ुशी के लिए जान हाजिर है! आप जब कहो...जहाँ कहो मैं आपको कभी मना नहीं करुँगी|

अब उन्होंने मेरा पजामे में हाथ डाल के बिना उसे नीच खिस्काय लंड बाहर निकल लिया और उसे जत्थों में पकड़ उसकी चमड़ी को ऊपर-नीचे करने लगीं| उन्होंने अपना मुंह मेरी तरफ बढ़ाया और एक बार फिर मेरे होठों को अपने मुंह में भर के चूसने लगीं| हालत ऐसी थी की अब झड़ा... मैंने अपने हाथ को उनके हाथ पे रख के रुकने को कहा| भौजी समझ गईं की मैं झड़ने की कगार पे हूँ| वो उठीं और अपनी साडी जाँघों तक चढ़ाई और अपना एक घुटना मोड़ के मेरे लंड पे बैठ गईं| मैंने इशारे से उन्हें कहा भी की आपकी योनि गीली नहीं है तो वो बोलीं;

भौजी: आपको देखते ही "ये" गीली हो जाती है|

मैं: आप शिकायत कर रहे हो या प्रशंसा (compliment) दे रहे हो?

भौजी: Compliment! इसी लिए तो आपकी "रसिका भाभी" आपके पीछे पड़ी हुई है| उस कलमुही को मौका मिला तो आपको रस्सी से बाँध कर अपना मकसद पूरा करा ले!

मैं: अच्छा जी! इतनी जलन होती है आपको उससे!

अब तक भौजी ने धीरे-धीरे ऊपर नीचे होना शुरू कर दिया था| उनकी योनि इतनी गीली नहीं थी जितनी मैं चूस के कर दिया करता था| इसलिए जब लंड अंदर जाता तो वो गर्दन पीछे झटक के योनि में हो रही रगड़ के बारे में बताती थीं|

भौजी: स्स्स्स्स्स्स....अह्ह्ह्हह्ह स्स्स्स्स्स्स अह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह .... उस दिन सिनेमा हॉल में भी एक लड़की थी जो आपको घूर रही थी!

मैं: अच्छा जी इसीलिए आप मुझसे चिपक के बैठ थे!

भौजी: हाँ... आअह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह.......स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स ........ जब भी कोई लड़की आपको देखती है तो मैं जल-भून के राख हो जाती हूँ! अन्न्न्ह्ह्ह्ह्ह !!!

मैं: तभी आप मुझसे इतना चिपक जाते हो जैसे बता रहे हो की इस प्लाट पे आपने कब्ज़ा कर लिया है!!

भौजी: ही ही ही ही ... स्स्सह्ह्ह अह्ह्ह्ह्हन्न्न्ह्ह्ह्ह !!!

भौजी की रफ़्तार अचानक ही तेज हो गई, और उनकी योनि में हो रहा घर्षण भी कम हो गया था| लंड बड़ी आसानी से अंदर फिसल जाता था| मुझे भौजी के चेहरे के भावों को देख के लगा की अब वो किसी भी समय स्खलित होने को हैं|

मुझे डर इस बात का था की अगर भौजी स्खलित हो गईं, तो उनका रस बहता हुआ मेरे पजामे को गीला कर देगा और उसकी महक बाकियों को हमपे शक करने को मजबूर कर देगी| और अगर इतनी रात गए अगर मैं कुऐं पे पजामा साफ़ करने गया तो कोई भी पूछेगा की इतनी रात को पजामे धोने की क्यों सूझी?

मैं: प्लीज...रुको!!

भौजी ने जैसे सुना ही नहीं ... या फिर जान के अनसुना कर दिया|

मैं: प्लीज....(मैंने भौजी के हाथ पकड़ लिए|)

मुझे इस तरह रोकने से वो व्याकुल हो गईं और उन्हें चिंता होने लगी की कहीं मुझे कोई कष्ट तो नहीं हो रहा|

भौजी: क..क...क्या हुआ? दर्द हो रहा है?

मैं: नहीं... पर आप स्खलित होने वाले थे ना?

भौजी: हाँ ...तो?

मैं: आपका योनि रस मेरे पजामे को भिगो देगा और......

भौजी: तो क्या हुआ? आप भी ना..... खमा खा....रोक दिया!

मैं: आपकी योनि रस सूंघते हुए आपकी छोटी बहन रसिका आ जाएगी और कहीं हंगामा ना खड़ा कर दे!

भौजी: वो मैं नहीं जानती.... (और भौजी ने फिर से ऊपर-नीचे होना शुरू कर दिया|)

अब मुझे कुछ तो करना ही था तो मैंने कमर से जोर लगाया और उन्हें चारपाई पे पटक के उनपे चढ़ गया और तेजी से लंड अंदर पेलने लगा| बीस धक्के और ….. फिर मैं और भौजी दोनों एक साथ स्खलित हो गए| भौजी ने मेरी टी-शर्ट के कॉलर को पकड़ के मुझे अपने मुंह से सटा लिया और मेरे होठों को चूसने लगीं|| मेरे लंड की आखरी बूँद तक उनकी योनि में समां गई| दोनों की धड़कनें सामान हुईं तब उन्होंने मेरे कॉलर को छोड़ा और मैं पीछे हो के बैठ गया परन्तु मेरा लंड अब भी उनकी योनि में था| हाँ वो सिकुड़ अवश्य गया था पर जैसे बाहर नहीं आना चाहता था|

मैं: देखो "इसे" भी (लंड की ओर इशारा करते हुए) भी आपकी "इसकी" (उनकी योनि की ओर इशारा करते हुए) आदत हो गई है|

भौजी: Likewise !!!

मैं: तो अब मैं जाऊँ?

भौजी: आपका मन कर रहा है जाने का?

मैं: नहीं

भौजी: तो फिर आज मेरे साथ ही सो जाओ!

मैं: और सुबह क्या होगा?

भौजी: वो सुबह देखेंगे|

मैं: अगर अपने बच्चे का ख़याल नहीं होता तो शायद सो जाता पर.... मैं नहीं चाहता की मेरी वजह से आप पे कोई लाँछन लगाये|

भौजी: कुछ नहीं बोलीं बस थोड़ा मायूस हो गईं|

मैं: भाड़ में जाए दुनिया दारी आज तो मैं आपके पास ही सोऊँगा|

मेरी बात सुनके उनके चेहरे पे फिर से वो ख़ुशी लौट आई| मैं भी यही चाहता था और उनकी इसी एक मुस्कान के लिए किसिस से भी लड़ने को तैयार था| मैंने लंड को उन्ही के पेटीकोट से पोंछा और मुझे ऐसा करते देख वो हंसने लगीं| फिर मैंने अपना पजामा ठीक किया और भौजी की साडी ठीक की| मैं उनकी बगल में लेट गया पर मैंने इस बार भौजी को अपना दाहिना हाथ तकिया नहीं बनाने दिया| वरना रात में मैं निकल कैसे पाता| मैंने अपना हाथ उनके स्तनों पे झप्पी की तरह डाल दिया और हम सो गए| रात में मुझे मूत आया तो मैं बड़ी सावधानी से उठा ताकि कहीं वो जाग ना जायें| अब मैं अगर सामने से निकलता तो दरवाजा लॉक कौन करता और वैसे भी दरवाजे की आहात से भौजी जग जाती इसलिए अब मेरे पास सिवाय दिवार फाँदने के और कोई रास्ता नहीं था| मैंने दिवार फांदी और मूत कर अपने बिस्तर पे लेट गया|

जैसे ही मैं लेटा...नेहा ने मेरी कमर पे अपना हाथ डाल के मुझसे झप्पी डाल के लिपट गई|

मैं: मेरी गुड़िया रानी जाग रही है?

नेहा: उम्म्म ... पापा जी आप कहाँ चले गए थे?

मैं: बेटा..... मैं बाथरूम गया था| क्या हुआ ...आपने फिर से कोई बुरा सपना देखा?

नेहा ने हाँ में सर हिलाया|

मैं: सॉरी बेटा...मैंने आपको अकेला छोड़ा| I Promise आगे से आपको कभी अकेला नहीं छोड़ूँगा|

मैंने उसका मन हल्का करने को एक कहानी सुनाई और नेहा मेरी छाती से चिपकी सो गई| सुबह मेरी आँख खुली तो नेहा अब भी मुझसे चिपकी हुई सो रही थी| इतने में भौजी आ गई और उसे उठाने लगीं;

मैं: रहने दो...बिचारी कल रात बहुत डर गई थी!

भौजी: क्यों?

मैं: बुरा सपना ... मैं जब आया तो ये जाग रही थी ... जैसे ही लेटा मुझसे चिपक गई| पूछने पे बताया की बुरा सपना था|

भौजी: गुड़िया... उठो! स्कूल नहीं जाना है|

नेहा: उम्म्म्म ....

नेहा कुनमुनाई ... मैंने भौजी को हाथ से इशारा किया की आप जाओ मैं उठाता हूँ| मैंने नेहा को गोद में लिया और वो कंधे पे सर रख के लेटी हुई थी और थोड़ा टहलने लगा|

मैं: गुड़िया... ओ ...मेरी गुड़िया!! उठो ... आप को स्कूल जाना है|

नेहा अपनी आँखें मलते हुए उठी और मेरी नाक पे Kiss किया और मुस्कुरा दी और हम दोनों अपनी नाक एक दूसरे के साथ रगड़ने लगे|! भौजी मुझे इस तरह दुलार करते हुए देख रहीं थी और मुस्कुरा रहीं थी| फिर नेहा मेरी गोद से उतरी और जाके अपनी मम्मी के गले लगी और उन्हें भी Kiss किया| भौजी ने नेहा को तैयार किया और फिर मैं उसे खुद स्कूल छोड़ आया| स्कूल में हेड मास्टर साहब मिले;

हेडमास्टर साहब: अरे भई मानु साहब... हमें पता चला वहाँ अयोध्या में क्या-क्या हुआ| वाह भई वाह!

मैं: हेडमास्टर साहब ... वो सब छोड़िये! ये बताइये की मेरी गुड़िया रानी पढ़ाई में कैसी है?

हेडमास्टर साहब: भई काश हम कह पाते की "Like Father Like Daughter!” पर नेहा पढ़ने में बहुत होशियार है|

मैंने उनसे कहा कुछ नहीं बस मन में सोचा की बिलकुल अपनी माँ पे गई है| खेर मैं वहाँ से जल्दी बात निपटा के घर आ गया|अब घर पहुँचा तो घर का माहोल ऐसा था जैसे आज आर या पार की बात हो| सबसे पहले मुझे पिताजी दिखाई दिए एक कोने से दूसरी कोने तक बेसब्री से चक्कर काटते हुए!

पिताजी: आओ बेटा...बैठो! मैंने अभी ठाकुर साहब को खबर भिजवाई है वो अभी अपनी बेटी के साथ आते ही होंगे| फैसला तुम्हें करना है!

मैं: मुझे? पर घर के बड़े तो आप लोग हैं...भला मैं फैसला कैसे करूँ?

पिताजी: बेटा तुम बड़े हो गए हो... समझदार भी, मुझे पूरा यकीन है की तुम जो भी फैसला करोगे वो बिलकुल सही फैसला होगा|

अब पिताजी ने इतनी बड़ी बात कहके मुझे बाँध दिया था और वो मुझसे अपेक्षा रखते थे की मैं सही फैसला लूँ जबकि एक तरफ मेरा प्यार है और दूसरी तरफ मेरी जिंदगी|

मैंने हाँ में सर हिला के उन्हें सहमति दी की मैं सही फैसला ही लूंगा| मैं वहाँ से बिना कुछ कहे बड़े घर आ गया और तैयार हो के बैठ गया और आँगन में चारपाई पे बैठ गया और आसमान में देखते हुए सोचने लगा की मुझे क्या करना चाहिए!
इतने में रसिका भाभी मुझे बुलाने आईं|

रसिका भाभी: मानु जी... आपने दीदी को सब कुछ क्यों बता दिया?

मैं: मैं अपने मन में मैल भर के नहीं रख सकता|

रसिका भाभी: अब तो मेरा यहाँ कोई हमदर्द नहीं बचा| मुझे तो इस घर से निकाल ही देंगे| (ये कहते हुए वो मगरमच्छ के आंसूं बहाने लगीं)

मैं: ये सब आपको उस दिन सोचना चाहिए था जब आप पर हैवानियत सवार थी| खेर आप यहाँ किस लिए आय थे?

रसिका भाभी: आपको काका बुला रहे हैं|

मैं: कह दो आ रहा हूँ|

दो मिनट बाद मैं वहाँ पहुँच गया और देखा तो दो चारपाइयाँ बिछी हुई थीं| एक पर ठाकुर साहब और उनकी बेटी बैठे थे और एक पर पिताजी और बड़के दादा| मैं भी पिताजी वाली चारपाई पे बैठ गया|

ठाकुर साहब: तो कहिये भाई साहब (मेरे पिताजी) क्या शादी की तरीक पक्की करने को बुलाया है?

पिताजी: नहीं ठाकुर साहब, बल्कि कुछ बातें स्पष्ट करने को आपको बुलाया है|

ठाकुर साहब: कैसी बातें?

पिताजी: आपने हमें कहा था की आपकी लड़की सुनीता इस शादी के लिए तैयार है पर जब उसकी मानु से बात हुई तो उसने कहा की वो ये शादी नहीं करना चाहती|

ठाकुर साहब: नहीं..नहीं..ऐसे कुछ नहीं है| हमारी बेटी शादी के लिए बिलकुल तैयार है|

पिताजी: यही बात हम बिटिया के मुँह से सुन्ना चाहते हैं|

ठाकुर साहब: देखिये भाई साहब ... ये हमारी बेटी है| हमने इसे बड़े नाजों से पाला है| ये हमारी मर्जी के खिलाफ नहीं जाएगी| इसके लिए जो हमने कह दिया वही अंतिम फैसला है| शहर में जर्रूर पढ़ी है पर अपने बाप का कहना कभी नहीं टालेगी|

पिताजी: देखिये ठाकुर साहब, शादी बच्चों ने करनी है ...और आगे निभानी भी है| तो बेहतर होगा की हम इनके फसिले को तवज्जो दें ना की हमारा फैसला इनपर थोप दें| तो बेहतर होगा की सुनीता ये बताये की उसके मन में क्या चल रहा है|

मैं हैरान पिताजी की बातें सुन रहा था की जो पिताजी परिवार में दब-दबा बना के रखते थे वो आज हम बच्चों पे फैसला छोड़ रहे हैं? इसकी वजह तो पूछनी बनती है ...पर अभी नहीं|

ठाकुर साहब: ठीक है...पर पहले मैं ये जानना चाहता हूँ की क्या मेरी लड़की आपको पसंद है?

पिताजी: जी बिलकुल है... परन्तु बच्ची की बात जर्रुरी है|

ठाकुर साहब: चल भई अब तू भी बोल दे अपने दिल की?

सुनीता क दम चुप! वो बस सर झुका के चुप-चाप बैठी हुई थी| मैंने उसे थोड़ा होसला देने के लिए कहा;

मैं: डरो मत सुनीता.... बोल दो सच! मैं जानता हूँ की तुम आगे पढ़ना चाहती हो|

ठाकुर साहब: (मुस्कुराते हुए बोले) तो हमने कब मना किया है इसे पढ़ने से?

सुनीता अब भी चुप थी| फिर उसके पिताजी ने उसकी पीठ पे हाथ रखा जिससे उसके मुँह से कुछ बोल फूटे;

सुनीता: जी मुझे... कोई ऐतराज नहीं!

ठाकुर साहब: देखा भाई साहब! मैंने कहा था न हमारी लड़की हमें कभी निराश नहीं करेगी|

पिताजी: चल भई अब तू भई अपना फैसला सुना दे?

अब सारी बात मुझ पे टिक गई| अब हाँ करूँ या ना उससे एक साथ तीन जिंदगियाँ बन या बिगड़ सकती थीं| हाँ करता हूँ तो सुनीता आगे पढ़ सकेगी पर भौजी का बुरा रो-रो के बुरा हाल हो जायेगा और ना करता हूँ तो भौजी खुश रहेंगी पर सुनीता की शादी किसी और से हो जाएगी जो शायद उसे पढ़ने भी ना दे| पर एक जिंदगी और थी जो मेरे हाँ कहने से खतरे में पड़ जाती, वो थी मेरे आने वाले बच्चे की! अब मैं बुरी तरह फँस गया था| इतने में चन्दर भैया और अजय भैया भी कोर्ट का काम निपटा के लौट आये और घर में चल रही बैठक में आके शामिल हो गए| अजय भैया बिलकुल मेरे साथ बैठे थे जब की चन्दर भैया के लिए एक कुर्सी माँगा दो गई| समझ तो दोनों चुके थे की यहाँ मेरी शादी की ही बात चल रही है और शायद उम्मीद भी कर रहे थे की मैं हाँ कर दूँगा|
मैंने तिरछी नजरों से देखा तो छप्पर के नीचे भौजी समेत सभी स्त्रियां बैठी हमारी बातें सुन रहीं थीं| जब पांच मिनट तक मेरे मुँह से शब्द नहीं फूटे तो ठाकुर साहब बोले;

ठाकुर साहब: मानु बेटा... कोई परेशानी है? हम आपसे बस यही तो कह रहे हैं की शादी अभी कर लो और उसके बाद आप पढ़ते रहो और दो साल बाद गोना कर लेंगे|

अब दिमाग को बोलने के लिए सही शब्द मिल गए थे;

मैं: क्षमा करें ठाकुर साहब पर मैं अभी ये शादी नहीं कर सकता और ना ही मैं रोका करने के हक़ में हूँ| मैं अभी इतना बड़ा नहीं हुआ की दो दिन में किसी भी व्यक्ति को पूरासमझ सकूँ...उसके व्यक्तित्व को जान सकूँ| ऐसा नहीं है की सुनीता अच्छी लड़की नहीं है पर हमें उतना समय नहीं मिला की हम एक दूसरे को जान सकें| वैसे भी हम दोनों अभी और पढ़ना चाहते हैं और आपकी बात माने तो अगले दो साल में आप गोना करना चाहते हो, तो तब तक तो सुनीता और मेरा कॉलेज भी खत्म नहीं हुआ होगा| ऐसे में शादी कर लेना और फिर अपने माँ-बाप पर बोझ बनके बैठ जाना ठीक नहीं होगा| तो जब तक मैं अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो जाता मैं शादी के बारे में सोच भी नहीं सकता|

सुनीता ने मेरी ओर देखा और हाँ में गर्दन हिला के मेरी बात का सम्मान प्रकट किया|

ठाकुर साहब: देखो बेटा... तुम्हारा जवाब बिलकुल स्पष्ट है ओर हम उसकी कदर करते हैं| हम तुम पर कोई जोर जबरदस्ती नहीं करेंगे ... यहाँ गाँव में तुम्हारी उम्र में लड़कों की शादी कर दी जाती है| इसीलिए हमने ये प्रस्ताव रखा| खेर अब तुम्हारी मर्जी नहीं है तो इसमें हमारा कोई जोर नहीं... पर यदि फिर भी तुम्हारा मन बदले तो हम अब भी इस रिश्ते के लिए तैयार हैं|

मैं: जी मैं सोच कर फैसला करता हूँ, फैसला कर के नहीं सोचता! (मेरी बातों से मेरा रवैया साफ़ झलक रहा था|)

ठाकुर साहब: जैसी तुम्हारी मर्जी बेटा! तो भाई साहब अब चला जाये?

पिताजी: अरे ठाकुर साहब पहले थोड़ा नाश्ता हो जाये|

ठाकुर साहब: जी नेकी ओर पूछ-पूछ !

सबने बैठ के नाश्ता किया और अभी जो कुछ हुआ उससे ये बात दाफ थी की ठाकुर साहब के मन में हमारे परिवार के लिए कोई मलाल नहीं था वरना वो अपनी अकड़ दिखा के चले जाते| नाश्ता शुरू होने से कुछ मिनट पहले मैं उठ के बड़े घर आ गया और छत की मुंडेर पर बैठ गया| छत की मुंडेर से नीचे दरवाजे पे कौन खड़ा है साफ़ दिख रहा था| दस मिनट बाद भौजी मुझे नाश्ते के लिए बुलाने आईं;

भौजी: चलिए नाश्ता कर लीजिये!

मैं: आपको क्या हुआ?

भौजी: कुछ नहीं...

मैं: रुको मैं नीचे आता हूँ|

नीचे आके मैंने उन्हीने इशारे से घर के अंदर बुलाया| हम बरामदे में खड़े थे....

मैं: क्या हुआ? आप मेरे फैसले से खुश नहीं?

भौजी: नहीं

मैं: पर क्यों?

भौजी: माँ-पिताजी कितने खुश थे... उन्हें सुनीता पसंद भी थी| फिर भी आपने मना कर दिया?

मैं: और आप? आपको ये शादी मंजूर थी? मुझे खोने का डर एक पल के लिए भी आपके मन में नहीं आया?

भौजी: हाँ आया था.... पर मैं इस सच से भाग भी नहीं सकती|

मैं: जानता हूँ पर कुछ सालों तक तो हम इस सच से दूर रह ही सकते हैं ना?

भौजी: तो आपने ये निर्णय स्वार्थी हो के किया? आपका मेरे प्रति मोह ने आपसे एक गलत फैसला करा दिया?

मैं भौजी के कन्धों पे अपने हाथ रखते हुए उन्हें धकेलते हुए दिवार तक ले गया और दिवार से सटा के उनकी आँखों में आँखें डालते हुए बोला;

मैं: हाँ....हूँ मैं स्वार्थी....और जब जब आपकी बात आएगी मैं स्वार्थी बन जाऊँगा| अगर स्वार्थी ना होता तो आपको भगा ले जाने की बात ना करता| आपकी एक ख़ुशी के लिए मैं कुछ भी कर सकता हूँ...कुछ भी....

बस इसके आगे मैं उनसे और कुछ नहीं बोला और घर से बहार निकल गया|


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Re: एक अनोखा बंधन

Unread post by The Romantic » 16 Dec 2014 09:32

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मन तो कह रहा था की कहीं और चल पर तभी बड़की अम्मा आ गेन और वो नाश्ते के लिए मुझे जोर दे के अपने साथ ले गईं| करीब पंद्रह मिनट बाद भौजी वहाँ आईं... उनकी आँखें नाम थीं...जैसे अभी-अभी रो के आईं हों| मैंने नाश्ते की प्लेट भौजी की ओर बढ़ा दी, क्योंकि मैं जानता था की वो मुझे कभी मना नहीं करेंगी| भौजी ने प्लेट ले ली और नास्ते के कुछ समय बाद, ठाकुर साहब ओर सुनीता दोनों चले गए| अब घर की बैठक में हिस्सा लेने की बारी थी| मैं जानता था की अब मुझे से सवाल जवाब किया जायेगा इसलिए मैं मानसिक रूप से पूरी तरह तैयार था| एक चारपाई पे मैं बैठ था ओर मेरी ही बगल में अजय भैया ओर चन्दर भैया बैठ थे| दूसरी पे पिताजी ओर बड़के दादा| तीसरी चारपाई पे माँ, बड़की अम्मा ओर भौजी बैठ थे| हमेशा की तरह भौजी ने डेढ़ हाथ का घूँघट काढ़ा हुआ था| रसिका भाभी को इस बैठक से कोई सरोकार नहीं था इसलिए उन्होंने इसमें हिस्सा लेने की नहीं सोची| इससे पहले की बात शुरू हो, वरुण को लेने रसिका भाभी के मायके से कोई आ गया था| जाने से पहले वरुण मुझसे मिलने आया, मुझसे गले मिला ओर "बाय चाचू" कह के चला गया| हैरानी की बात ये थी की उसने किसी और को कुछ नहीं कहा ओर ना ही उसके जाने से किसी को कोई फर्क पड़ा|

वरुण के जाने के बाद बैठक शुरू हुई!

पिताजी: बेटा हम तुम्हें डांटने-फटकारने के लिए यहाँ नहीं बैठे हैं| तुम ने जो किया अपनी समझ से किया और शायद ये सही फैसला भी था...

मैं: आपकी बात काटने के लिए क्षमा चाहता हूँ पिताजी पर मुझे आपको एक बात पे सफाई देनी है|

पिताजी: हाँ..हाँ बोलो

मैं: मेरा ये फैसला पक्षपाती था ... (ये सुन के भौजी की गर्दन झुक गई| शायद वो ये उम्मीद कर रहीं थीं की मैं आज सब सच कह दूँगा|)

मैं: वो इंसान है सुनीता! वो इस शादी के लिए कतई राजी नहीं थी| केवल अपने पिताजी के प्यार में विवश होकर हाँ कर रही थी| वो आगे और पढ़ना चाहती है...और उसके पिताजी दो साल में गोना करना चाहते हैं| इसी बात को मद्दे नजर रखते हुए मैंने ना कहा|

मेरा निर्णय बदलने के लिए ये बात पूरी तरह सच नहीं थी, पर सच तो मैं बोल ही नहीं सकता था ना!!!

पिताजी: बेटा हमें तुम्हारे निर्णय पे कभी संदेह नहीं था|

बड़के दादा: रही शादी की बात तो आज नहीं तो कल ...शादी तो होगी ही|

बड़के दादा ने ये बात बड़े तरीके से बोली की सभी हँस पड़े...सिवाय मेरे और भौजी के! खेर बात ख़त्म हुई और सब अपने-अपने काम में लग गए| पर मुझे अब भी एक बात पिताजी से पूछनी थी की आखिर उनका मेरे प्रति व्यवहार ऐसे कैसे बदल गया| पिताजी के खेतों की तरफ जाते हुए दिखाई दिए;

मैं: पिताजी...आपसे कुछ पूछना था|

पिताजी: हाँ बोलो|

मैं: आज से पहले आपने कभी मुझे इतनी छूट नहीं दी की मैं अपनी मर्जी से फैसला कर सकूँ|

पिताजी: वो इसलिए बेटा की अब तुम बड़े हो गए हो...अब मैं तुम्हें बाँध के नहीं रख सकता| यदि ऐसी कोशिश भी की तो तुम नहीं मानोगे...... इसलिए अब मैं फैसले तुम पर छोड़ देता हूँ| अगर तुम कोई गलत फैसला लोगे तो मैं तुम्हें रोकूँगा अवश्य| समझे?

मैं: जी

पिताजी: मैं चलता हूँ...भाईसाहब (बड़के दादा) के साथ कहीं जाना है|

और पिताजी चले गए ...

अब मैं अकेला रह गया था...इधर नेहा की स्कूल की घंटी बजी तो मैं उसे लेने चल दिया| मैं नेहा को ले कर घर आ रहा था| आज नेहा मेरी गोद में नहीं थी बल्कि मेरी ऊँगली पकड़ के चल रही थी| हम घर पहुंचे और मैं नेहा को सीधा भौजी के घर में ले गया| उसका बैग उतार के सही जगह रखा, फिर उसके कपडे बदले और उसके बाल बना रहा था| मेरी पीठ दरवाजे की तरफ थी और नेहा का मुँह मेरी तरफ था| अचानक नेहा हंसने लगी;

मैं: क्या हुआ नेहा? क्यों हँस रहे हो? (मैंने मुस्कुराते हुए पूछा)

तो नेहा ने अपने मुँह पे हाथ रख के अपनी हंसी रोकी| इतने में पीछे से आके किसी ने मेरी छाती पे अपने हाथ रखे और मुझसे चिपक गया| जब गर्दन पे गर्म सांस का एहसास हुआ तो पता चला की ये भौजी हैं|

भौजी: चलो खाना खा लो|

मैं: हम्म्म ...

भौजी: मेरे साथ खाना खाओगे या अकेले? (ये उन्होंने इसलिए पूछा था ताकि उन्हें ये पता चले की कहीं मैं उनसे नाराज तो नहीं|)

मैं: आपके साथ

भौजी: फिर आप यहीं रुको... मैं हमारा खाना यहीं ले आती हूँ| फिर मुझे आपसे बहुत सी बातें करनी हैं|

भौजी खाना ले आईं और पहले मैंने नेहा को खिलाया और फिर हमने खाया|

खाना खाने के पश्चात भौजी और मैं अलग-अलग चारपाई पे लेट गए| बात की शुरुवात भौजी ने की;

भौजी: क्या आपको मुझसे पहले कभी किसी से प्यार हुआ है?

मैं: आज ये सवाल क्यों?

भौजी: पता नहीं बस मन ने कहा...

मैं: हाँ हुआ है... एक बार नहीं तीन बार...पर मैं नहीं जानता की वो प्यार था या.... जब मैं L.K.G में था...तब मुझे एक लड़की बहुत अच्छी लगती थी| गुड़िया जैसी ... हमेशा मुस्कुराती हुई| मेरे जीवन का पहला kiss उसी के साथ था| Sliding वाले झूले के नीचे ... मैंने उसे पहली बार kiss किया था| उसके बाद जब मैं सातवीं में आया था तब हमारी क्लास में एक नई लड़की आई थी... गोल-मटोल सी थी और उस पे क्लास के सबसे कमीने तीन लड़के मरते थे| मैं तो उसके लिए जैसे पागल था...उसके आते ही मेरा ड्रेसिंग सेंस बदल गया| सुबह मैं बड़ा सज-धज के स्कूल जाता था...नहीं तो पहले जबरदस्ती स्कूल जाया करता था| पर उसके आने के बाद...कमीज एक दम इस्त्री की हुई..क्रीज वाली इस्त्री...शर्ट ढंग से अंदर की हुई, बालों में GEL !!! बालों को रोज अलग-अलग तरीके से बनता था... उसके घर के नंबर के लिए उसके दोस्त से सिफारिश की| पर उसकी दोस्त कामिनी निकली और उसे जा के साफ़ बता दिया| और जब उसने मेरी ओर पलट के देखा तो मेरी हालत खराब हो गई| उसकी सहेलियों को कितना मस्का लगाया...खिलाया-पिलाया... पर ना...आखिर एक दिन उसका नंबर मिल ही गया| मैं उसे फ़ोन करता पर कभी हिम्मत नहीं हुई की कुछ कह सकूँ| फिर एक दिन उसके साथ बैठने का मौका भी मिला पर कुछ नहीं बोल पाया...उसके सामने मेरी नानी मर जाती थी| फिर एक दिन पता चला की वो किसी और से प्यार करती है| दिल टूट गया ...पर कुछ समय बाद भूल गया! फिर जब दसवीं में था तो एक लड़की की तरफ आकर्षित हुआ...पर इससे पहले की उसे कुछ कह पाता...बोर्ड के पेपर से एक महीना बचा था...और वो आखरी दिन था जब मैंने उसे अपने सामने देखा था... उसके बाद एक महीने तक कोई बात नहीं..मैं तो शक्ल भी भूल गया था| बोर्ड के पेपरों के दौरान उससे मिला...पर कोई बात नहीं कह पाया| उसके बाद उसने स्कूल बदल लिया| उसके बाद कान पकडे की कभी प्यार-व्यार के चक्कर में नहीं पडूंगा| पर फिर आप मिले... और आगे आप जानते हो|

भौजी: पर इकरार तो पहले मैंने किया था ना?

मैं: इसी लिए तो मर मिटा आप पर!

कुछ देर चुप रहने के बाद भौजी बोलीं;

भौजी: आप अगर बुरा ना मानो तो एक बात कहूँ|

मैं: हाँ बोलो!

भौजी: आज सुबह से मैं कुछ सोच रही थी... मैंने सिर्फ और सिर्फ आपसे प्यार किया है...जब शादी हुई तो मन में बहुत हसीं सपने थे, जैसे की हर लड़की के मन में होते हैं| पर सुहागरात में जब अपने ही पति के मुँह से अपनी ही बहन का नाम सुना तो....सारे सपने टूट के चकना चूर हो गए| पर उसके बाद हमारे बीच जो नजदीकियाँ आईं ... क्या वो गलत नहीं? नाजायज नहीं? मुझे में और आपके भैया में फर्क क्या रहा|

मैं: आपकी इस बात का जवाब मेरे पास तो नहीं...और अगर होता भी है तो...मेरे कहने से शायद उस बात के मायने बदल जाएँ! आपके सवाल का जवाब आपके ही पास है|

भौजी: वो कैसे?

मैं: आप मेरे कुछ सवालों का जवाब हाँ या ना में दो...और सोच समझ के देना|

भौजी: ठीक है|

मैं: सबसे पहले ये बताओ की आप मुझे उतना ही चाहते हो जितना आप ने शादी से पहले सोचा था की आप अपने पति से प्रेम करोगे?

भौजी: हाँ

मैं: आपके पति ने आपसे धोका किया ये जानने के बाद आपके दिल में आपके पति के प्रति कोई प्रेमभाव नहीं रहा?

भौजी: हाँ

मैं: अगला सवाल थोड़ा कष्ट दायक है, पर आपके मन की शंका दूर करने के लिए पूछ रहा हूँ वरना मैं आप पर पूरा भरोसा करता हूँ| क्या शादी से पहले आपने कभी भी किसी के साथ सम्भोग किया था?

भौजी: बिलकुल नहीं|

मैं: सबसे अहम सवाल...थोड़ा सोच समझ के जवाब देना.... अगर आपका पति आपके प्रति ईमानदार होता...मतलब उनका किसी भी स्त्री के साथ कोई भी शारीरिक या मानसिक सम्बन्ध नहीं होता तो क्या फिर भी आप मुझसे प्यार करते? मेरे इतना नजदीक आते?

भौजी: (कुछ सोचते हुए) कभी नहीं!

मैं: अब मैं आपको इस सवाल जवाब का सार सुनाता हूँ| शादी से पहले आपके मन में कुछ सपने थे की आपका पति सिर्फ आपका होगा और किसी का नहीं .... परन्तु जब शादी के बाद सुहागरात में आपने अपने ही पति के मुँह से अपनी बहन का नाम सुना वो भी तब जब वो आपके साथ सम्भोग कर रहे थे तो आपका मन फ़ट गया| आप को वो प्यार नहीं मिला जिसकी आपने अपने पति के प्रति अपेक्षा की थी| शादी से पहले भी और शादी के बाद भी आपके मन में किसी और मर्द के प्रति कोई दुर्विचार नहीं आय| परन्तु मेरे प्रति आपके आकर्षण ने आपको हद्द पार करने पर विवश कर दिया और वो आकर्षण प्यार में तब्दील हो गया| केवल आपके लिए ही नहीं मेरे लिए भी...हमने शारीरिक सम्बन्ध स्थापित किये वो भी केवल प्रेम में पड़ कर| परन्तु उससे पहले जब आप मेरे गालों पे काटते थे तो मुझे वो एहसास बहुत अच्छा लगता था| उसके आलावा मेरे मन में कभी ही आपके साथ सम्भोग करने की इच्छा नहीं हुई...होती भी कैसे उस उम्र में मुझे इसके बारे में कुछ ज्ञान भी नहीं था| परन्तु जब आप हमारे घर दूसरी दफा आये और आपने अपने प्रेम का इजहार किया तब से...तब से मेरे मन में आपके प्रति ये गलत विचार आने लगे| जो की गलत था...मेरे मन में आपके प्रति समर्पण नहीं था| परन्तु मैंने कभी भी सपने में नहीं सोचा की मैं आपके साथ किसी भी तरह की जबरदस्ती करूँ और आज तक मैंने कभी भी आपके साथ जबरदस्ती नहीं की जिसे कल रात आपने जिझक का नाम दे दिया था| पर कुछ महीना भर पहले जब हमने पहली बार सम्भोग किया तब...मेरे मन में ग्लानि होने लगी पर आपके प्यार ने मुझे उस ग्लानि से बहार निकला और मैंने खुद को आपके प्रति समर्पित कर दिया|

यदि अचन्देर भैया ने आपके साथ वो धोका नहीं किया होता...आपकी अपनी छोटी बहन के साथ वो सब नहीं किया होता तो आपका मेरे प्रति ये प्यार कभी नहीं पनपता| रही अनैतिकता की तो.... समाज में हमारे रिश्ते के बारे में कोई नहीं जानता| रसिका भाभी जानती हैं पर उनकेजैसे लोग जिनके खुद के अंदर वासना भरी है वो इसे अनैतिक ही कहेंगे, परन्तु अगर कोई सच्चा आशिक़ इस कहानी को सुनेगा तो वो इसे "प्रेम" ही मानेगा| क्योंकि प्यार किया नहीं जाता....उसके लिए दिमाग नहीं चाहिए... बस दिल चाहिए और जब दो दिल मिल जाते हैं तो उस संगम को ही एक दूसरे के प्रति "आत्मसमर्पण" कहा जाता है|

इस समय मेरी और आपकी हालत एक सामान है| हम दोनों ही नहीं चाहते की कोई तीसरा हमारे बीच आये और हम दोनों ही ये जानते हैं की एक समय आएगा जब कोई तीसरा बीच में होगा परन्तु तब....तब आपके पास मेरी एक याद होगी| (ये मैंने उनकी कोख पे हाथ रखते हुए कहा)
ये याद हम दोनों को आपस में जोड़े रखेगी|

भौजी की आँख में आंसूं छलक आये थे.. शायद उनको उनकी दुविधा का जवाब मिल गया था|मैंने उनके आंसूं पोछे और उनके होठों को चूमा|

मैं: अच्छा अब बाबा मानु जी का प्रवचन समाप्त हुआ...अब आप हमें अदरक वाली चाय पिलायें अथवा बाबा जी क्रोधित हो जायेंगे और फिर वो क्या दंड देते हैं आपको पता है ना?

भौजी: ही..ही..ही.. जो आज्ञा बाबा जी! आपके दंड से बहुत डर लगता है! आप सारा दिन हमें तड़पाते हो और फिर रात में हमें बिना मांगे ही वरदान दे देते हो| इसलिए हम आपको अभी एक कड़क चाय पिलाते हैं|

इतना कह के भौजी चाय बनाने चलीं गईं और उनके मुख पे आई मुस्कराहट ने मेरी आधी चिंता दूर कर दी थी| मैंने नेहा को जगाया और उसकी किताब खुलवाई.... किताब में जितने चित्र थे सब पर उसने क्रेयॉन्स से निशाँ बना दिए थे| उन चित्रों को देख मुझे मेरे बचपन की बात याद आ गई और मैं हँस पड़ा| भौजी अंदर अदरक लेने आइन और मुझे हँसता हुआ देख मेरी ओर देख के मुस्कुराने लगीं|

भौजी: आप हँसते हुए कितने प्यार लगते हो! प्लीज ऐसे ही मुस्कुराते रहा करो|

मैं: मेरी हंसी आपसे जुडी है...आप अगर उदास रहोगे तो मैं कैसे मुस्कुरा सकता हूँ|

भौजी मेरी बात पे मुस्कुराईं और हाँ में सर हिलाके मेरी बात का मान रखा| बातें सामान्य हो गईं थी और अब कोई शिकवा नहीं था! चाय पीने के बाद मैं नेहा को साथ ले के बाग़ तक टहलने निकला| वहाँ पहुँच के देखा तो आग में आम के पेड़ थे और उनपे कच्चे आम लगे थे| मन किया की कुछ आम तोडूं और नेहा ने भी जिद्द की तो मैंने एक पत्थर का ढेला उठाया और मारा...पर निशाना नहीं लगा| फिर नेहा ने मारा...वो तो चार फुट भी नहीं गया और गिर गया| मैं हँस पड़ा...फिर मैंने नेहा से कहा की आप मिटटी के ढेले उठा के लाओ मैं मारता हूँ| नेहा एक-एक कर ढेले मुझे देती और मैं try करता| एक आध ढेला लग भी जाता परन्तु कमबख्त आप टूटता ही नहीं| मैंने देखा झाडी में एक डंडा पड़ा था, करीब आधे फुट का होगा| मैंने उसे घुमा के मार तो एक आम गिरा, नेहा उसे उठा लाइ| वो आम आधा पका हुआ था शायद इसीलिए टूट गया| मैंने उस आम को जेब में डाला और चूँकि कुछ अँधेरा हों लगा था तो हम वापस घर की ओर चलने लगे|


इतने में बाग़ से किसी ने मुझे पुकारा, ये सुनीता थी|

मैं: Hi ! कैसे हो आप?

सुनीता: ठीक हूँ...आपको शुक्रिया कहना था|

मैं: किस लिए?

सुनीता: आपके फैसले के लिए|

मैं: मैंने आप पर कोई एहसान नहीं किया...मैं भी यही चाहता था|

इतने में सुनीता ने एक थैली मेरी ओर बढ़ा दी|

मैं: ये क्या है?

सुनीता: आम हैं|

मैं: पर मुझे मिल गया...ये देखो (मैंने सुनीता को आम दिखाया)

सुनीता: हाँ..हाँ... मैंने आपका निशाना देखा है| अर्जुन की तरह निशाना लगाते हो!

मैं: तो आप छुप के मेरा निशाना देख रहे थे!

सुनीता: हाँ

मैं: पर आप यहाँ कर क्या रहे थे...I MEAN आप जो भी कर रहे थे मैंने उसमें आपको Disturb तो नहीं किया?

सुनीता: ये हमारा बगीचा है|

मैं: ओह सॉरी!

सुनीता: किस लिए?

मैं: बिना पूछे मैं यहाँ आम तोड़ रहा था|

सुनीता: यहाँ कोई कानून नहीं है| कोई भी तोड़ सकता है..वैसे भी हम दोस्त हैं तो आपको पूछने की भी कोई जर्रूरत नहीं थी| दरअसल मैं आपके घर ही आ रही थी ये आम देने, पिताजी ने भेजे हैं सब के लिए|

मैं: तो आप ही दे दो...

सुनीता: ठीक है...वैसे आप घर ही जा रहे हो ना?

मैं: हाँ क्यों?

सुनीता: रास्ते में बात करते हुए चलते?

मैं: Sure !

मैंने नेहा को गोद में उठाया ओर उसे मेरे द्वारा तोडा हुआ आम दे दिया| नेहा से सब्र नहीं हुआ ओर वो उसे मुँह में भर के दाँतों से काटने लगी| जैसे ही उसने पहली Bite ली उसे जोरदार खटास का एहसास हुआ और वो मुँह बनाने लगी| जैसे किसी छोटे बच्चे को आप निम्बू चटा दो तो वो कैसे मुँह बनाने लगता है| नेहा को मुँह बनाते देख दोनों खिल-खिला के हंसने लगे| ये हंसी दोनों के लिए जर्रुरी थी क्योंकि सुनीता भी बहुत दबाव में थी| घर पहुँच के सुनीता ने बड़की अम्मा को आम दिए और सब बहुत खुश थे| फिर बड़की अम्मा ने भी गुड के लड्डू बनाये थे| तो उन्होंने वो लड्डू टिफ़िन में पैक कर के दिए| सुनीता ख़ुशी-ख़ुशी अपने घर लौट गई और भौजी के मन में मेरे और सुनीता के बीच कुछ भी नहीं है ये देख के संतुष्टि हुई| ठाकुर साहब बुरे इंसान नहीं थे और ये बात उनके व्यवहार में साफ़ झलकती थी| कछ देर बाद पिताजी और बड़के दादा घर लौटे और उन्हें भी इस बात का पता चला और वो भी खुश थे की दोनों घरों के बीच कोई गलतफैमी या मन-मुटाव नहीं है| रात में सबने खाना खाया और सोने का समय था;

भौजी: आज मुझसे एक गलती हो गई|

मैं: क्या?

भौजी: आज मैंने आपको Good Morning Kiss नहीं दी|

मैं: (भौजी को छेड़ते हुए) आपने तो घोर पाप कर दिया! अब आपको क्या दंड दूँ?

भौजी: नहीं...नहीं... प्लीज| मैंने अपनी गलती का प्रायश्चित करना चाहती हूँ|

मैं: कैसे?

भौजी: आप थोड़ी देर बाद नेहा को लेने के लिए घर में आ जाना| वहीँ मैं प्रायश्चित करुँगी| ही..ही.. ही!!

मैं पंद्रह मिनट तक कुऐं के पास टहलता रहा फिर नेहा को आवाज देते हुए भौजी के घर में घुस गया| अंदर पहुंचा तो भौजी ने एक झटके में मेरा हाथ पकड़ के मुझे स्नान घर के पास खींच लिया|

मैं: क्या कर रहे हो?

मेरी पीठ दिवार से लगी हुई थी और भौजी मेरे ऊपर चढ़ी हुई थीं और वो मुझे बेतहाशा चूम रहीं थीं|

मैं: म्म्म्म....कोई आ जाएगा!

पर भौजी को जैसे कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा था| आखिर मैंने उनके जुड़े को अपने हाथ से खींचा और उनकी गर्दन पीछे की ओर तन गई ओर मैंने उनके गले पे अपने होंठ रख दिए| भौजी के मुँह से "स्स्स्स्स्स्स...अहह" की आवाज निकली| मैं किसी Vampire की तरह उनकी गार्डन पे अपने दाँत गड़ाए उन्हें चूम रहा था..काट रहा था...चूस रहा था| फिर मैंने उनके होठों पे अपने होंठ रख दिए और उनके होंठों को बारी-बारी चूसता रहा..चूमता रहा...ओर करीब पांच मिनट बाद अलग हुआ तो हम दोनों के होठों के बीच हमारे रस की एक पतली से तार लटक रही थी और जैसे ही हम दूर हुए वो तार और खीचने लगी और फिर चानक से टूट गई| एक हिस्सा भौजी के पास रह गया और एक मेरे पास|

मैं: बस! हो गया आपका प्रायश्चित| इसके आगे बाबा अपना कंट्रोल खो देंगे|

भौजी: तो किसने रोका है|

मैं: आज घर में सब मौजूद हैं| शायद आज कुछ नहीं होगा?

भौजी: फिर मैं आपसे नाराज हो जाऊँगी|

मैं: ऐसा जुल्म मत करो! देखते हैं.... ये बताओ की नेहा कहाँ है|

भौजी: भूसे वाले कमरे में अपनी तख्ती ढूंढ रही है|

मैं: क्या? पर वहाँ तख्ती रखी किसने?

भौजी: मैंने

मैं: पर क्यों?

भौजी: ताकि हमें कुछ समय अकेले मिल जाए|

मैं: आप बहुत शारती हो|

मैं बहार आया और नेहा को उसकी तख्ती ढूंढ के दी|

The Romantic
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Re: एक अनोखा बंधन

Unread post by The Romantic » 16 Dec 2014 09:33

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फिर उसे गोद में लेकर सोने लगा..पर बिना कहानी के उसे कहाँ नींद आती| मैंने उसे कहानी बना के सुना दी और वो मुझसे लिपट के सो गई| मेरी आँखें भी भारी हो रही थीं और मैं भी सो गया| रात के बारह बजे भौजी मेरे कान में खुसफुसाई;

भौजी: उठो ना...

मैं: नहीं...नेहा डर जाती है रात को| कल पक्का ....

भौजी: जानू उसे तो सुला दिया आपने पर मुझे कौन सुलायेगा?

मैं: आज कैसे भी एडजस्ट कर लो ...कल से आपको पहले सुलाऊँगा|

भौजी: हुँह... कट्टी!!!

मैं: अरे सुनो...

पर भौजी कुछ नहीं बोलीं और अंदर जाके दरवाजा अंदर से बंद कर लिया| ये पहली बार था की मैंने उन्हें नाराज किया था| हालाँकि उनका गुस्सा दिखावटी था पर मुझे नींद जोर से आई थी...मैं सो गया और जब सुबह आँख खुली तो मौसम बहुत रंगीन था| आज बारिश होना तो तय था, बादल गरज रहे थे और मिटटी की मीठी सी महक हवा में जादू बिखेर रही थी| मोर की आवाज गूंज रही थी... और आज घर में पकोड़े बनने की तैयार हो रही थी|

रात में नेहा चैन से सोई थी और उसे कोई डर नहीं लगा| अभी भी वो सो रही थी और मैंने भी उसे नहीं उठाया बस उसे गोद में ले के बड़े घर आ गया क्योंकि बारिश कभी भी हो सकती थी और ऊपर से ठंडी हवाओं से मौसम थोड़ा ठंडा हो गया था| मैंने नेहा को बड़े घर के बरामदे में लिटा दिया और एक हलकी सी चादर उस पे डाल दी| मैं उसी चारपाई पे बैठ गया और ठंडी-ठंडी हवा का आनंद लेने लगा| सुबह-सुबह ठंडी-ठंडी हवा का चेहरे को छूना बड़ा मन भावन एहसास था| इतने में भौजी आ गईं;

भौजी: चलिए नहा धो लीजिये?

मैं: जाता हूँ...पहले आप बताओ की रात कैसे गुजरी आपकी?

भौजी: जानते हुए भी पूछ रहे हो?

मैं: सॉरी यार ... आज से ध्यान रखूँगा|

भौजी: रहने दो! आप बस अपनी बच्ची का ख़याल रखो| (भौजी ने बनावटी गुस्सा दिखाते हुए कहा था|)

मैं: ठीक है|

भौजी: चलो नहा लो!

और भौजी नेहा को गोद में उठा के तैयार करने चलीं गईं| करीब पाँच मिनट हुए थे की बारिश शुरू हो गई| मेरे मन में एक ख्याल आया, मैं घर पे हूँ या बाहर...बारिश शुरू होते ही मेरा मन भीगने को करता है| ये ऐसा खींचाव है जिसे मैं चाह कर भी नहीं रोक पता और भीगता अवश्य हूँ| फिर चाहे कितनी ही डाँट पड़े| ये बात भौजी को नहीं पता थी..केवल माँ और पिताजी जानते थे| तो आज भी मेरा मन बारिश में भीगने को किया| मैं चारपाई से उठा और आँगन में खड़ा हो गया| मुँह ऊपर कर के आसमान से गिरती बारिश की बूंदों को देखने लगा| बारिश की बूंदें जब मुख पे गिरतीं तो बड़ा सकून मिलता| वही सकूँ जो धरती को तपने पे बारिश की बूंदों के गिरने से मिलता| मेरी पीठ प्रमुख दरवाजे की ओर थी, ओर भौजी वहाँ कड़ी मुझे देख रहीं थीं|

फिर वो बोलीं;

भौजी: जानू...सर्दी हो जाएगी..अंदर आ जाओ|

मैं कुछ नहीं बोला बस शारुख खान की तरह बाहें फैला दीं|

इस पोज़ में आसमान की ओर मुख कर के खड़ा था और भौजी मुझे अंदर आने को कह रहीं थीं पर मैं जानबूझ के उनकी बात को अनसुना कर रहा था| तभी अचानक वो भी पीछे से आके मुझ से चिपक गईं| उनके हाथ ठीक मेरे निप्पलों पर था जो टी-शर्ट के भीगने के कारन ओर ठन्डे पानी के कारन खड़े हो गए थे और टी-शर्ट के ऊपर से दिखाई दे रहे थे| मैंने भौजी के हाथों पे अपने हाथ रख दिए| शायद हमें आसमान से कोई देख रहा था जो इस दृश्य को और रोमांटिक बनाने में अपनी पूरी कसर लगा रहा था इसीलिए तो उसेन बारिश और बी तेज कर दी और अब हर बूँद जब नंगे शरीर जैसे हाथ या मुख पे पड़ती तो एक मीठी सी चोट का एहसास दिलाती|

मैं: कैसा लग रहा है भीग के?

भौजी: आपके साथ ....भीगने में और भी मजा आ रहा है|

मैं: मुझे लगा की आप नेहा को तैयार कर रहे हो?

भौजी: पिताजी (मेरे) ने मन कर दिया है की बारिश में स्कूल नहीं जाना| तो मैं यहाँ आपको देखने आई थी...मुझे पता था की आप इस बारिश में भीगने का कोई मौका नहीं छोड़ोगे!

मैं: (मैं भौजी की ओर पलटा ओर उन्होंने मुझे अब भी अपनी बाहों में जकड़ा हुआ था|) पर आपको कैसे पता की मुझे बारिश में भीगना अच्छा लगता है?

भौजी: नहीं पता था.... बस मन ने कहा!

मैं: ये संजोग ओ नहीं हो सकता की हमारा मन हमें एक दूसरे की पसंद ना पसंद और यहाँ तक की मानसिक स्थिति भी बता देता है?

भौजी: शायद हम आत्मिक रूप से भी जुड़ चुके हैं?

मैं: (भौजी की आँखों में आँखें डालते हुए) सच?

भौजी ने आँख बंद कर के सर हिलाया ओर हाँ में जवाब दिया|

अब तो माहोल बिलकुल रोमांटिक हो गया था और मैंने भौजी के चेहरे को अपने दोनों हाथों में थम और उनके होंठ जिन पे बारिश की एक बूँद ठहर गई थी उन्हें चूम लिया| भौजी भी मेरे चुम्बन का जवाब देने लगीं और मेरे होठों को पीने लगीं| मैं एक पल के लिए रुका क्योंकि मुझे डर था की कहीं कोई आ न जाए|

मैं: दरवाजा तो बंद कर लो?

भौजी: बंद नहीं कर सकते वरना अगर कोई आ गया तो शक करेगा की ये दोनों दरवाजा बंद कर के क्या कर रहे हैं?

मैं: फिर ??? (मैंने भौजी के चेहरे को अपने दोनों हाथों से छोड़ दिया)

भौजी: पर मैंने दोनों दरवाजे आपस में चिपका दिए हैं|

मैं: तो???

भौजी: Do Whatever you want to do? You don’t need my permission? और वैसे भी इतनी बारिश में कौन है जो भीगता हुआ यहाँ आये?

मैं: (भौजी के चेहरे पे आई बारिश की बूंदों को उँगलियों से हटते हुए) जान.. आप भूल रहे हो की छतरी नाम की एक चीज होती है जो भीगने से बचाती है!

भौजी: नहीं भूली जानू...पर छतरियाँ आपके कमरे में रखीं हैं तो अब यहाँ कौन आएगा भीगता हुआ?

मैं: हम्म्म...तो अब तो मौका भी है...दस्तूर भी...

ये कहते हुए मैंने उन्हें बाहों में भर लिया और उन्हें बरामदे में लगे खम्बे के सहारे खड़ा कर दिया| खम्बे की चौड़ाई तीन फुट थी और वो छत तक लम्बा था| खमब ठीक प्रमुख द्वार के सामने थे तो यदि उसकी आड़ में कोई खड़ा हो तो बाहर से कोई देख नहीं सकता की कौन खड़ा है और तो और बरामदे का वो खमबा आँगन के पास था... और हम उसके पास खड़े हो कर भी बारिश में भीग रहे थे क्योंकि अचानक हवा के चलने से पानी की बौछारें हवा के साथ बहती हुई टेढ़ी हो गईं थी और हमें भिगो रहीं थीं| बारिश में भीगे होेने के कारन भौजी की साडी, ब्लाउज, पेयिकत सब उनके जिस्म से चिपक गया था| ऊपर से उन्होंने अंदर ना ही ब्रा पहनी थी और ना ही पेंटी! उनके स्तन कपड़ों से चिपक के पूरा आकर ले चुके थे! इधर मेरे पजामे में जो उभार था वो और भी बड़ा हो रहा था| मैंने और देर ना करते हुए, भौजी बाईं टाँग को उठाया और उसे मोड़ के दिवार के साथ चिपका दिया| भौजी की साडी और पेटीकोट ऊपर उठा दिया और इधर भौजी ने मेरे पजामे का नाड़ा खोल दिया, परन्तु उसमें इलास्टिक भी लगी थी तो वो नीचे नहीं गिरा| भौजी ने पजामा थोड़ा नीहे खिसका के मेरे लंड को बहार निकला और अपनी योनि पे सेट किया| मैंने आगे बढ़ के हल्का सा Push किया और लंड धीरे-धीरे अंदर जाने लगा| परन्तु भौजी की योनि आज पनियाई हुई नक़हीं थी इसलिए अंदर काफी घर्षण था| उन्हें ज्यादा तकलीफ ना हो इसलिए मैंने कोई जल्दी नहीं दिखाई और धीरे-धीरे अंदर धकेलने लगा| भौजी को थोड़ी तो तकलीफ हो रही थी जिसके कारन वो अपने पंजों पर कड़ी हो गईं ताकि लंड को अंदर जाने से रोक सकें| इसलिए मैं रूक गया और भौजी के होठों को चूमने लगा और उनके स्तनों को हाथ से मसलने लगा| मेरी इस प्रतिक्रिया से उनकी सिसकारी फूटने लगी|

"स्स्स्स्स..अह्ह्ह्ह...जाणुउउउ...उम्म्म्म्म्म ....!" मैंने नीचे से हल्का सा और Push किया तो उनकी योनि में घर्षण कम हो चूका था और लंड आसानी से अंदर जा रहा था| अब मैं पंजों पे खड़ा हो गया ताकि लंड पूरी तरह से अंदर चला जाए और अपने शरीर का सारा भार उनके ऊपर डाल दिया|

भौज जोरों से सिसियाने लगीं थीं और उन्होंने अपने बाएं हाथ से मेरी गर्दन के इर्द-गिर्द फंदा कास लिया और दायें हाथ से मेरी पीठ और कमर को सहला रहीं थी| मैंने धक्कों की रफ़्तार बढ़ा दी और भौजी के मुंह से सीत्कारियां फूटने लगीं| अचानक से भौजी ने अपने दाँत मेरी गार्डन में धंसा दिए और वो चरमोत्कर्ष पे पहुँच गईं और स्खलित हो गईं| उनके रास से उनकी पूरी योनि गीली हो चुकी थी और अब मेरे हर Push के साथ लंड फिसलता हुआ अंदर-बाहर हो रहा था| अब तो फच-फच की आवाज आने लगी थी और अब मैं भी चरमोत्कर्ष पे पहुँच गया और झड़ने लगा| झड़ने के बाद दोनों निढाल हो चुके थे और हम उसी खम्भे के सहारे खड़े थे| जब दोनों सामान्य हुए तो मैंने भौजी को चूमना शुरू कर दिया ...उनके चेहरे पे जहाँ भी पानी की बूँद पड़ती मैं उसे चूम के पी जाता| फिर मैंने अपने लंड को बहार निकला जो अब शिथिल हो गया था और उसके निकलते ही भौजी के योनि में जो हमारा बचा-खुचा रस था वो उनकी जाँघों से होता हुआ बहने लगा और बहार आ गया|

भौजी गर्दन झुका के उस रस को बहता हुआ देख रहीं थीं, तो मैंने उनके चेहरे को ठुड्डी से पकड़ा और ऊपर उठाया| भौजी की नजरें झुकी हुई थी और मैंने उनके होठों को kiss किया| फिर हम अलग हुए और मैं वापस जखुले आँगन में आ गया;

भौजी: बस?

मैं: नहीं ... अब मन Couple Dance करने का कर रहा है|

भौजी: (शरमाते हुए) पर मुझे नहीं आता Dance!

मैं: तो मुझे कौन सा आता है! मैंने TV में देखा है...एक आधे step आते हैं और आज तो बस मन कर रहा है की आपको बाँहों में लेके किसी Slow Track पे Couple Dance करूँ|

भौजी: पर Radio कहाँ है?

मैं: कोई बात नहीं बस मन में जो गाना आये उसे गुनगुनाते हैं|

मैंने भौजी को अपने पास बुलाया और उनसे नीचे दिखे गए चित्रों की तरह चिपक के धीरे-धीरे Couple Dance करने लगे|

हम इसी तरह से करीब दस मिनट तक Dance करते रहे और जो गाना हम गन-गुना रहे थे वो था "मितवा"; कभी अलविदा न कहना फिल्म का| फिर मैंने भौजी को अपने दायें हाथ की ऊँगली पकड़ा के उन्हें गोल-गोल घुमाया...भौजी बिलकुल बेफिक्र हो के घूम रहीं थीं और ठीक दो मिनट बाद तालियों की आवाज आने लगी| पीछे मुड़ के देखा तो सब खड़े थे (बड़की अम्मा, पिताजी, चन्दर भैया, अजय भैया और माँ)...बारिश की रिम-झिम बूंदें अब भी गिर रहीं थीं| ताली बजाने की शुरुवात रसिका भाभी ने की थी! सबको सामने देख के हम बुरी तरह झेंप गए ऊपर से भौजी ने घूँघट भी नहीं काढ़ा था| भौजी तो अपना मुँह छुपा के सब के बीच से होती हुई भाग गईं और मुझे वहां सबके सामने अकेला छोड़ गईं| नेहा भागती हुई आई और मेरे पाँव में लिपट गई|

माँ ने मेरी ओर तौलिया फेंका;

माँ: (गुस्से में बोलीं) ये ले.. और कपडे बदल|

मैंने तौलिया लिया और नेहा को बरामदे में जाने के लिए बोला ओर अपने कमरे में घुस के खुद को पोंछा और कपडे बदल के आ गया|

बाहर बरामदे में सब बैठे थे और मैं भी वहीँ जाके खड़ा हो गया, खम्बे का सहारा ले के|

चन्दर भैया का तो मुँह सड़ा हुआ था, माँ भी गुस्से में थीं, पिताजी हालाँकि जानते थे की मैं बड़ा ही शांत सौभाव का हूँ पर उन्हें ये पता था की मैं भौजी को दोस्त मानता हूँ और उनके साथ बड़ा Open हूँ; बड़की अम्मा मुस्कुरा रहीं थी क्योंकि एक वो ही थीं जो की मेरी गलतियों पे पर्दा डाल दिया करती थीं और सब को चुप करा दिया करती थीं और अजय भैया, वो मेरे चंचल सौभाव के बारे में थोड़ा जानते थे और बैठे हुए मुस्कुरा रहे थे|

पिताजी: क्यों रे नालायक...ये क्या हो रहा था?

माँ: हाँ ... तुझे शर्म नहीं आती...अपनी भौजी के साथ बेशर्मी से नाच रहा था?

मैं: जी...नाच ही तो रहा था!

माँ: जुबान लड़ाता है?

पिताजी: लगता है कुछ ज्यादा ही छूट दे दी इसे?

बड़की अम्मा: अरे क्या हुआ? नाच ही तो रहा था...अपनी भौजी के साथ| थोड़ी दिल्लगी कर ली तो क्या हर्ज़ है? कम से कम बहु का मुँह तो खिला हुआ था, देखा नहीं आज कितना खुश थी और भूल गए सब...डॉक्टर साहिबा ने भी तो कहा था की उसे खुश रखें| आज है तो थोड़ा लाड-प्यार करता है...कल नहीं होगा तो?

मैंने सर झुका रखा था और बड़की अम्मा की बातें सुन रहा था पर जब उन्होंने कल नहीं होगा कहा तो मेरे पाँव तले जमीन खिसक गई| इतने दिनों में मैं भूल ही गया की हमें वापस भी जाना है..और इस प्यार-मोहब्बत में एक महीने कैसे फुर्र हुआ पता ही नहीं चला| अब मेरी शक्ल पे जो बारह बजे थे वो सब देख सकते थे और पिताजी ने भी जब ये बारह बजे देखे तो उन्होंने घडी ही तोड़ डाली ये कह के;

पिताजी: जब से आया है तब से अपनी लाड़ली नेहा (जो भौजी के पास थी|) और अपनी भौजी के साथ घूम रहा है| हमारे पास बैठे तब तुझे पता चले की मैंने तेरे चन्दर भैया को पैसे दिए थे टिकट बुक करवाने के जब ये और अजय लुक्खनऊ जा रहे थे की वापसी में टिकट लेते आना|

अब मेरी हालत तो ऐसी थी जैसे ना साँस अंदर जाए ना बहार आये! अब अगर ये बात भौजी को पता चली तो वो रो-रो कर अपनी तबियत ख़राब कर लेंगी| पिछली बार जब मजाक किया था तो उन्होंने खाट पकड़ ली थी और अब तो सच में जा रहा हूँ तब तो..... अब मुझे कैसे भी ये बात उनसे आज के दिन तो छुपानी थी वरना आज जो वो थोड़ा हंसी-खेलीं हैं वो वापस गम में डूब जाएँगी| जब चन्दर भैया की ओर देखा तो लगा जैसे उनके मन में अंदर ही अदंर लड्डू फुट रहे हों| बड़ी मुश्किल से वो अपनी ख़ुशी छुपाये हुए थे! अब मुझे बहुत सोच-समझ के आजका दिन बिताना था वरना मेरे चेहरे पे उड़ रही हवाइयाँ भौजी को गम में डूबा देतीं|

बड़की अम्मा: चलो मुन्ना...तुमहिं रविवार को जाना है..तब तक मैं तुम्हें तुम्हारी मन पसंद की साड़ी चीजें खिलाऊँगी| पर पहले पकोड़े खाने का समय है|

मैं: जी!

मैं सब के साथ रसोई के पास वाले छप्पर के नीचे बैठा था...बस मन में एक ही बात खाय जा रही थी की चलो मैं खुद को जैसे-तैसे रोक लूँगा पर अगर कोई और उनके पास जाके उनसे ये कह दे की हम वापस जा रहे हैं तो? इसका बस एक ही तरीका था की मुझे साये की तरह आज उनके आस-पास रहना होगा|
खेर बड़की अम्मा ने पकोड़े बनाने शुरू किये और तेल की खुशबु पूरे घर में महक रही थी| पकोड़े बनने के बाद, गर्म-गम चाय....वाह बही वाह ! पर काश ....काश मैं ऐसा कह पाता! मैंने पनि पलटे में पकोड़े लिए और चाय की प्याली हाथ में पकडे भौजी के घर में घुस गया| भौजी कमरे में अपना मुँह छुपाये बैठी थीं| उन्हें इस तरह देख के मेरी हँसी छूट गई, मेरी हँसी सुन के भौजी ने अपने मुख से हाथ हटाया;

भौजी: जानू बड़ी हँसी आ रही है आपको? पहले तो खुद मुझे dance करने में फँसा दिया| अब घर वाले सब क्या कहते होंगे?

मैं: मैंने फँसा दिया? आप मुझे वहां सब के सामने अकेला छोड़ के भाग आये उसका क्या? (मैंने प्यारभरे लहजे में उनसे शिकायत की)

भौजी: हाय राम! क्या कहा सबने?

मैं: ये तो शुक्र है की बड़की अम्मा ने बात को संभाल लिया और इसे दिल्लगी का नाम दे दिया वरना तो....(मैंने बात अधूरी छोड़ दी)

भौजी: वैसे जानू...उन्होंने सच ही तो कहा| (भौजी ने आँख मारी)

मैं: हाँ... चलो अब ये पकोड़े खाओ|

भौजी: आप खाओ मैं और ले आती हूँ|

मैं: वहां सब बैठे हैं...अब भी जाओगे?

भौजी: हाय राम! ना बाबा ना...नेहा...सुन बीटा..जाके एक प्लेट में और पकोड़े ले आ फिर हम तीनों बैठ के खाते हैं|

नेहा बाहर भागी और एक दूसरी पलटे में और पकोड़े और एक गिलास में चाय ले आई| हम तीनों ने मजे से पकोड़े खाय और अब पलटे में आखरी पीस बचा था| हम तीनों ने एक साथ उस पे हाथ मारा और वो पकोड़ा नेहा के हाथ लगा तो हम दोनों मुँह बनाने लगे| पर वो बच्ची इतनी छोटी नहीं थी| उसने उस पकोड़े के तीन टुकड़े किये और एक मुझे दिया, एक नभौजी को और एक खुद खा गई| मैंने नेहा के सर पे हाथ फेरा और ये भी नहीं देखा की मेरे वाले टुकड़े में हरी मिर्च थी जो जैसे ही दांतों तले आई तो मेरी सीटी बज गई| मेरे मुँह से "सी..सी..सी..सी..सी.." की आवाज निकलने लगी और नेहा खिल-खिला के हँसने लगी| शुरू-शुरू में तो भौजी ने भी मेरी सी..सी..सी.. का मजा लिया पर जब उन्हें लगा की मुझे कुह ज्यादा ही तेज मिर्ची लगी है तो नाजाने उन्हें क्या सूझी और उन्होंने मेरे होठों को kiss कर लिया और अपनी जीभ मेरे मुँह में डाल दी| उनके मुख से मुझे गोभी के पकोड़ी की सुगंध आ रही थी और करीब दो मिनट की चुसाई के बाद मेरी मिर्ची कुछ कम हुई| नेहा तक-तक़ी लगाये हमें देख रही थी और हम जब अलग हुए तो भौजी और मैं फिर एक बार झेंप गए| फिर हमने चाय पी और मैं उठ के बाहर आ गया| मैं और नेहा आँगन में खेल रहे थे ...नेहा ने बोल फेंकी और मैंने कुछ ज्यादा ही तेज शॉट मारा और बोल हवा में ऊँची गई..तभी मुझे चन्दर भैया भौजी के घर की ओर जाते हुए दिखाई इये ओर मुझे लगा की कहीं वो भौजी से सब बता ना दे! मैं भी उनके पीछे-पीछे जाने लगा इतने में फिसलन होने के कारन नेहा गिर पड़ी| मैं उनके पीछे नहीं गया ओर नेहा को उठाने के लिए भागा| मैंने नेहा को तुरंत उठाया..उसकी फ्रॉक मिटटी से सन गई थी..मैंने उसे गोद में उठाया और चूँकि वो रो रही थी तो उसे थोड़ा पुचकारा और चुप कराया फिर मैंने भौजी के घर के बहार पहुसंह के रूक गया और अंदर की बात सुनने लगा;

चन्दर भैया: (टोंट मारते हुए) मुझे नहीं पाता था की तुम्हें नाचना बड़ा अच्छा लगता है? खेर कर लो ऐश जब तक.......

इससे पहले की वो आगे कछ बोलते मैंने दरवाजे पे जोरदार मुक्का मारा और धड़धड़ाते हुए अंदर घुस गया|

मैं: उनकी कोई गलती नहीं है....मैंने उन्हें आँगन में खींच था जिससे वो भीग गईं|

चन्दर भैया ने मेरी ओर देखा ओर उनकी नजरों में चुभन साफ़ महसूस हो रही थी| अब तो मेरे और चन्दर भैया के बीच रिश्ते ऐसे थे जैसे की कभी रूस ओर अमेरिका के बीच थे| अंग्रेजी में जिसे Cold War कहते हैं| दोनों में से जो भी पहले हमला करे...जवाब देने को सामने वाल पूरी तरह से तैयार था| भैया कुछ नहीं बोले और चले गए और मैंने फ़ौरन बात घुमा दी और भौजी से नेहा के कपडे बदलने को कहा;

भौजी: अरे आप दोनों मिटटी में खेल के आरहे हो क्या?

मैं: वो हम क्रिकेट खेल रहे थे और बोल लेने को नेहा भागी और फिसल गई|

भौजी: पर आपको इसे गोद में लेने की क्या जरुरत थी? खामखा आपने अपने कपडे भी गंदे कर लिए|

मैं: आप हो ना ...

भौजी ने अपने निचले होंठ को काटा और बोलीं;

भौजी: हाँ..हाँ.. मैं तो हूँ ही आपके लिए!

जवाब में मैंने भौजी को आँख मारी और अपने कपडे बदलने चला गया|