संघर्ष

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rajaarkey
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Re: संघर्ष

Unread post by rajaarkey » 27 Dec 2014 02:59

गुलाबी के मुँह से इतनी बात सुनकर धन्नो भी मुँह बनाती बोल ही पड़ी "....खैर तेरी बुर की आग तो बुझ जाती है ना.....मेरी चिंता मत कर....तू ही लंड चोद्वा..."

फिर आगे बोली "तुझे तो आज भी ठाकुर साहेब मन से चोद्ते हैं.....मैं तेरी जैसी जवान नही हूँ, तो भला कौन पुच्छे मुझे..." गुलाबी तपाक से बोली ".....अब झांट जलाने वाली बात मत बोल...मैं जवान हूँ और तू बूडिया हो गई है..." तब धन्नो जबाव मे बोली "...तो क्या मैं जवान हूँ क्या....चालीस के उपर की हो गई ..." फिर गुलाबी भी तुनक कर कही ".....आरीए तो मैं कौन सी सोलह साल की कुँवारी हूँ.....मेरी भी तो उमर चालीस के उपर की हो ही गई..." तब धन्नो गुलाबी पर वार करते आगे बोली ".....बस तेरी उमर चालीस के उपर की है..जवानी तो वैसी की वैसी ही है ...." ये सब बातें करने के साथ साथ ही दोनो चौकी के बगल मे खड़ी हो ठाकुर साहेब को भी देख रहीं थीं जो सावित्री के बुर मे अपनी बीच वाली बड़ी उंगली गच गच पेल रहे थे और दोनो चुचिओ को चूस चूस कर लाल कर रहे थे. ठाकुर साहेब के चुचि चूसने और बीच वाली मोटी उंगली की चुदाई पा कर सावित्री अपने दोनो केले के तने की तरह की चिकनी और मांसल जांघों को छितरा चुकी थी. मस्ती मे आ कर आँखे भी मूंद ली थी. फिर धन्नो की बात का जबाव देती गुलाबी बोली "...तू भी क्या झांट सुलगाने वाली बात फिर कर दी....कि वैसी की वैसी ही जवान हूँ...." तब धन्नो बोली "झांट क्यों सुलग गई.....सच मे तू क्या कम जवान है...हरजाई....तेरे मर्द को किनारे कर के दूसरे मर्द रोज तेरी सवारी करते हैं, ....और तो और ... ठाकुर साहेब भी पीछे नही रहते तुझ पर चढ़ाई करने से....क्या जवान नही है तू..." दोनो ये सब बातें करने के साथ ही ये भी देख रही थीं कि सावित्री की बुर एकदम से गरम हो चुकी थी और ठाकुर साहेब अपने मोटी उंगली से चोद कर बुर को एक दम से लिबलिबा दिए थे. फिर अगले ही पल ठाकुर साहेब सावित्री के उपर आ गये और दोनो पैरों को खूब चौड़ा कर के उसकी चिकनी और मांसल जांघों पर अपनी गथीलि और सख़्त जाँघ को चढ़ा दिए. उनका लंड एकदम विशाल रूप ले चुका था. किसी लोहे की तरह सख़्त और भारी हो चुका था. सूपड़ा देखने से एकदम खूनी लाल और किसी बड़े टमाटर की तरह चमक रहा था. उस मोटे तननाए हुए भारी लंड पर ठाकुर साहेब अपने हाथ मे थूक ले कर लपेट दिए. लंड से चुदाई के लिए कर रहे तैयारी को गौर से दोनो आँखे फाड़ फाड़ कर देख रहीं थी. तभी तननाया और मोटा लंड पर थूक लगा कर ठाकुर साहेब ने सुपादे को गीली और लिसलीस्सी झांतो से भरी हुई और गरम हो चुकी बुर के मुँह पर भिड़ा दिया. लंड का सूपड़ा बुर की छेद के ठीक बीचोबीच फिट हो गया. दहकते हुए लाल सुपादे की गर्मी बुर के मुँह पर जैसे ही सटी की सावित्री उच्छल सी गई. लाल सुपादे की गर्मी काली बुर के अंदर दौड़ गई और सावित्री एक पल के लिए फिर सिहर कर मुँह खोल दी. सुपादे की गर्मी से हुई सावित्री के पूरे शरीर मे हुए हरकत को ठाकुर साहेब के साथ साथ दोनो, गुलाबी और धन्नो भी देख कर सनसना गईं. अब दोनो आपस मे कौन सी बातें कर रही थीं मानो भूल गईं. जांघों पर अपनी जाँघ चढ़ा कर और थूक से पूरी तरह से लापेस चुके लंड के चौड़े सुपादे को बुर के छेद मे कुच्छ पल तक ऐसे ही भिड़ाए रहने के बाद ठाकुर साहेब ने सावित्री के कंधे को एक हाथ से और लंड की जड़ को दूसरे हाथ से कस के पकड़ कर अपनी कमर को हवा मे पूरा उठा कर जैसे ही बुर मे चांपे की लंड का सुपाड़ा "गुपप..!" के आवाज़ के साथ बुर मे घुस गया. सुपाड़ा के बुर मे समाते ही सावित्री अपनी आँखे एकदम मूंद ली और मुँह पूरा खोल कर सिसकार उठी और उसकी जंघे भी मानो आपस मे सटा ने के लिए हरकत की लेकिन ठाकुर साहेब की जांघों के नीचे बुरी तरीके से दबे होने से बस हिल कर रह गईं. बुर मे घुस चुके चौड़े सुपाड़ा देखने से बहुत ही भयंकर लग रहा था. केवल सूपड़ा ही घुसने से बुर् की दोनो फांके पूरी तरह से फैल चुकी थीं और बुर की शक्ल भी एकदम से बदल गई थी. दोनो के साथ ठाकुर साहेब ने भी अपनी गर्दन को झुका कर एक नज़र अपने मोटे लंड के सुपादे को एक बार गौर से देखा जो बुर के दोनो फांकों को एकदम से फैला कर घुस कर मानो फँस गया था. उन्हे लगा कि अब सूपड़ा बाहर की ओर नही निकलेगा. तब अपने लंड पर वाले हाथ को भी सावित्री के दूसरे कंधे पर रख कर सावित्री के दोनो कंधों को कस के पकड़ लिए. फिर क्या था, एक जोरदार धक्का बुर मे मार ही दिया, लंड गीली हो चुकी बुर मे कच्छ के आवाज़ के साथ लगभग एक इंच तक घुस गया. फिर दूसरे पल ही दूसरा धक्का कुछ और ज़ोर से लगा कि एक इंच लंड और घुस कर फँस गया. दो ही धक्के मे सुपाड़ा और दो इंच लंड घुसते देख गुलाबी बोल पड़ी "...बाबू जी ....आप तो अपने मोटे बाँस को ऐसे पेल रहे हैं मानो किसी अधेड़ औरत की बुर हो....दो ही धक्कों मे आधा लंड गटक गई...." इतनी बात सुनकर धन्नो बोली "...ये नही देख रही है कि बाबू जी कितनी ज़ोर से धक्के मार रहे हैं. ...हरजाई... .तुझे तो कल की छोकरि आज अधेड़ लग रही है...." तब गुलाबी बोली "मैं अधेड़ थोड़ी कह रही हूँ री रंडी....जब तेरे साथ घूम फिर रही है तो कोई सील बंद कुँवारी थोड़ी बची है .....ना जाने कितनो से तुम उसे चुदवाइ होगी आज तक..." तब धन्नो भी जबाव मे पीच्चे नही रही और ठाकुर साहेब के आधे घुसे हुए लंड पर गौर से देखते बोली ".....हाँ री तू तो ऐसे बक रहीहै मानो मानो इससे रंडी का धंधा करवा रही हूँ.....अरे हरजाई विश्वास कर ....अभी इस खेल मे नई नई है ये..."

rajaarkey
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Re: संघर्ष

Unread post by rajaarkey » 27 Dec 2014 03:00

लेकिन गुलाबी चुटकी लेती हुई बात जारी रखना चाह रही थी सो फिर आगे बोली पड़ी "देख ले कैसे चित पसर के बुर मे लंड लीले हुई पड़ी है......तू कह रह है कि नई नई है इस खेल मे...हरजाई.." ये बात सावित्री के कानो मे जैसे ही पड़ी कि एक दम लज़ा गई लेकिन लंड लील रही सावित्री की आँखे पूरी तरह से बंद रही थीं और आधा लंड घुसाए हुए ठाकुर साहेब उसकी दोनो चुचिओ को फिर चूस रहे थे. उसकी दोनो साँवले रंग की चुचियाँ एक दम से गोल और कसी हुई ठोस थीं. उसकी घुंडीयाँ एकदम से काली जामुन की तरह थीं. इसलिए ठाकुर साहेब खूब मज़े से चुचिओ को मीस और काले जामुन की तरह की घुंडीओ को मुँह मे ले ले कर चूस रहे थे तो कभी दाँतों से काट रहे थे

. गुलाबी के इस बात से धन्नो बोली "..तू तो देखी कि नही...कितनी नाटक के बाद भला कैसे ठाकुर साहेब के नीचे आई है...किसी तरह से चुद्वाने को तैयार भी हुई तो...... तू उसे ऐसी बात बोल कि बिचक जाए ....अरे चोद्वा लेने दे..." तब गुलाबी बोली "अरे तो मैं क्या कह रही हूँ कि ना चुद्वाये...."

धन्नो: तू ऐसे बोलेगी तो कहीं वो लंड छ्टाका कर उठ ना जाय...

गुलाबी: हाँ रे हाँ ...अब भला लंड निकलने वाला है बुर मे से...वो भी बाबू जी का....एक बार घुस जाए फिर तो बिना उड़ेले कहाँ निकलने वाला है

इतनी बात जैसे ठाकुर साहेब के कान मे पड़ी कि अपने लंड को और अंदर की ओर चॅंप दिए और आधा इंच लंड और घुस गया. दोनो की नज़रें ठाकुर साहेब के लंड पर ही टिकी थीं जो बुर मे आधा से ज़्यादा ही घुस चुका था. सावित्री पूरी तरह चित लेटी हुई थी और ठाकुर साहेब अब उसके होंठो को भी अपने होंठो मे ले कर चूसने लगे. सावित्री की बुर मे खुजुली अब और तेज़ होने लगी. इसलिए अपने कमर को इधेर उधेर की ताकि लंड और अंदर की ओर घुसे. ऐसे देखकर गुलाबी बोली "बाबू जी ....घोड़ी हिनहीना रही है...अब सवारी सुरू करो....देखो...कितनी सवारों को झेल चुकी है ये घोड़ी...." फिर क्या था ठाकुर साहेब ने सावित्री के होंठो को अपने होंठो से आज़ाद कर दिया और उसके दोनो टाँगों को अपने कंधे पर चढ़ा लिए. फिर तो उसकी बुर का मुँह मानो और चौड़ा हो गया. और फिर सावित्री के दोनो कंधों को कस के पकड़ कर आधे से अधिक घुसे लंड को थोड़ा बाहर की ओर खींच कर दूसरे ही पल अंदर की ओर पेल दिए फिर उसी तरह लंड को अंदर बाहर कर के घच घच घच पेलने लगे. ऐसी चूडया से सावित्री को लगा मानो उसकी बुर फट जाएगी. इस तरह के करीब आठ दस धक्के खाते ही बुर का मुँह इतना खूल गया कि ठाकुर साहेब का समूचा लंड बुर मे समा गया. गुलाबी जैसे ही देखी कि ठाकुर साहेब का लंड जड़ तक घुस कर जा रहा है, मानो चिल्लाते बोली "....बाबू जी.....अब घोड़ी..दौड़ाने लायक तैयार है....सवारी तेज़ करो....थोड़ा घोड़ी को रफ़्तार दो बाबू जी....पूरी चाल ले रही है..." तब ठाकुर साहेब समझ गये कि बुर मे समूचा लंड घुस गया है और अब पूरी तेज़ी से चोद्ने की बारी है. फिर क्या था, ठाकुर साहेब उसके कंधे को और कस के पकड़ लिए और हुमच हुमच के तेज़ी से धक्के मार कर बुर चोद्ने लगे. उस कोठरी मे फ़च्छ फ़च्छ की आवाज़ शुरू हो गई. सावित्री भी सिसकारने लगी. साथ मे अपने चौड़े चूतड़ के दोनो बड़े बड़े हिस्से को चौकी मे उपर की ओर उठ उठा कर चुदवाने लगी. ऐसा देखते ही धन्नो भी चुप ना रह सकी और इस बार चिल्ला कर बोली "बाबू जी....और तेज़ चोदो...कस कस के चोदो ....देखो बाबू जी कैसे अपनी चूतड़ उठा कर दे रही है..." फिर आगे बोली "सबाश सावित्री....ऐसे ही चुद्वा...उठा दे दोनो चूतड़ बाबू जी के लंड पर....बुर को फेंक फेंक कर चोद्वा...." लेकिन तभी ठाकुर साहेब अपनी चुदाई का इंजन इतना तेज़ कर दिए कि सावित्री का मुँह खुला का खुला ही रह गया और सिसकार कर कोठरी मे उसकी भी आवाज़ गूँज उठी. "......एयेए आ ईयीई रे मई.....एयेए ह आ आही री माई....अया री बाप आही रे माई ...." फिर गुलाबी अपने पेटिकोट के उपर से ही बुर को खुजूलाते बोली "..माई बाप ही बोलेगी कि ....कुच्छ और बोलेगी..." फिर आगे तुरंत चिल्ला कर गुलाबी बोली "...बोल रे रंडी ...बोल ...कैसा लग रहा है री...कैसा लग रहा है लंड का खेल..." लेकिन सावित्री कुच्छ भी नही बोली और वैसे ही सिस्कार्ते हुए माइ बाप चिल्ला रही थी और मज़े मे अपने चूतड़ उठा उठा कर चोद्वा रही थी. कुच्छ भी नही बताने पर फिर गुलाबी सावित्री की चूतड़ पर एक ज़ोर से चिकोटी काटते पुछि ".....बता रे ...कुतिया ...लंड का कैसा स्वाद है...बोल ठीक लग रहा है ना...." तब सावित्री तेज़ धक्को मे ही सिस्कार्ते हुए बोली "...हां है आही आही रे ईयीई माई नीक बा ... आ नीक बा....आ री माई रे बाप बड़ा नीक लागत बा ..."

क्रमशः………………………………………..

rajaarkey
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Re: संघर्ष

Unread post by rajaarkey » 27 Dec 2014 03:00



Sangharsh--40

gataank se aage..........

is bar fir savitri harkat ki lekin tab tak bra khul gai aur jhat thakur saaheb uski bra ko alag kar diye. ab savitri ke badan par salwar aur uske andar chaddhi rah gai thi. aur us chaddhi ke andar ki bur ke andar ek garmi dhadhak rahi thi jise wo khud hi mahsus kar rahi thi. use yah bhi mahsus ho rahaa tha ki uski bur ke dono garam ho chuki fankon ke beech me kuchh geela ho rahaa hai. wo chuchion ke meesane ke kaaran thi. fir thakur saaheb uski ek chuchi ko apne munh me jaise hi liye ki savitri apni dhanp rahi ankhe khol kar dekhi to uski chuchi thakur saaheb ke munh me tha jise wo chus rahe the. savitri ekdam sharma gai aur dubara ankhe mund lee. thakur saaheb chuchi ke ghundi ko munh me kisi lemanchoos ki tarah le kar chus rahe the. aur dusre hath se dusri chuchi ko mees rahe the. savitri ki bur me mano chintian rengne lagi aur is vajah se savitri apne dono janghon ko apas me bheenchne jaisi harkat ki to thakur saaheb samajh gaye ki chuchion ka asar bur me suru ho gayaa hai. fir dusari chuchi ko munh me le kar teji se chusne lage aur ek hath se salwar ke upar se hi fuli hui pawroti ki tarah bur ke us hisse ko kas ke bheench liye jaise koi kisi aurat ki choti choti chuchion ko apne hatheli me pakad leta hai. aisa karne se savitri ke bur me uthi lahar ko thodi to raahat mili lekin laaz ke maare paani paani ho chuki savitri dusre hi pal bur ke uthaan par rakhe hath ko apne hathon se pakadna chaahi ki bagal me khadi gulabi jhat se uske haath ko fir dusar or jhatkaarte boli "....paniyaa rahi hai to theek se paniyaa.....ab idher udher mat kar....paniyaane de bur ko..." fir bagal me khadi dhanno ki or munh karke dheeme se gulabi boli "....chuchi ragadaate, chusaate hi paniyaane lagi...dekh....kaise pasar gai hai...." fir dono ki nazren thakur saaheb ke us hath par tik gai jisase savitri ke bur ko salwaar ke upar se hi masal rahe the. savitri har maslaahat ko ab kahar kahar ke jhel rahi thi. ankhen puri tarah se dhanp chuki thi. gulabi boli "....babu ji ....laagat hai ki ..paniyaa gayi hai puri........ab nikal hi do iske kapade...." lekin thakur saaheb uski chuchion ko chusne me hi jyade lutf utha rahe the. fir thakur saaheb ka hath salwar ke naade ko tatola ur ek jhatke se kheench kar nada khol diya. salwar kamar me dheeli ho gai. fir thakur saaheb uske dheele ho chuke salwar ko neeche ki or sarkaaya to savitri ne koi harkat nahi ki lekin jaise hi uski chaddhi ko neeche ki or khiskana chaha to uska ek hath anayas hi aa kar thakur saaheb ke hath ko mano pakadna chaha to bagal me sabkuch dekh rahi gulabi lapak kar savitri ke hath ko pakad kar dusari or kar di aur boli ".....lund khane ki baari aayi to ....fir ider udher kar rahi hai....kaisi hai reee...." fir gulabi teji se uske pair me fanse salwar ko dono pairon se nikal kar chauki ke bagal me fenk di aur dusre hi pal chaddhi ko kheeskaane lagi. ab savitri ko barasht nahi hui aur wo mano uth kar baith gai aur chaddhi ko pakad lee. itna dekh kar gulabi use chauki par vapas dhakel di aur thakur saaheb use kas kar pakad liye aur gulabi chaddhi kheeska kar dono pairon se jaise hi baahar ki to teeno ki aankhe fati ki fati rah gai. chaddhi me bur ke chhed ke saamne wala hissa puri tarah se geela ho chuka tha. aur bur bhi ekdam geeli ho chuki thi. savitri apni dono janghon ko apas me sata lee the aur ek hath se nangi ho chuki bur ko dhankane ka pryas kar rahi thi. lekin thakur saaheb apne hath se uske hath ko dusari or kar diye aur palak jhapakte hi uski jhanton se bhari pawroti ki tarah fuli hui gudaz bur par apna ek hath jamaa diye. hath ki ungliyan bur ke daraar ki or sarkane lagi. aur paniya chuki bur ke munh par ungli jaate hi ungli geeli ho gai. bur ke fankon ka hissa bahut hi garam tha. thakur saaheb munh me se chuchi ko baahar nikaal kar bole "...haa ree gulabi ...ye saali badi garam hai.....bur to geeli ho gai hai lund khane ke liye.... aaj ise jee bharke chodungaa...." fir apne munh ko dubara chuchion par rakh liye aur dono chuchion ko baari baari chusne lage. bur par rakhe hath ki badi ungli ko kach se bur ke chhed me jaise hi pele ki savitri apne dono janghon ko apas me bheench lee. lekin ungli adha se jyade hi geeli bur me sarak gai. fir thakur saaheb ne us ungli ko dheeme dheeme andar baahar karke pelne lage aur dheere dheere puri ungli bur me ghus gai. savitri bhi apni ankhe mundi hui apne dono janghon ke beech me itna failaav kar lee thi ki thakur saaheb aaram se apni ungli ko bur me pel rahe the. gulabi aur dhanno dono khadi ho kar sab kuchh dekh rahi thin. dhanno bhi andar hi andar garam ho gai thi. aur anayas hi apne saari ke upar se apni bur ko khujlayi to gulabi boli "...tu bhi lund lena chahati hai kya re....lagta hai ki tere gaanv wale teri bur ki pyas nahi bujha rahe hain...."