खूनी हवेली की वासना compleet

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raj..
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Re: खूनी हवेली की वासना

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 13:15

खूनी हवेली की वासना पार्ट --25

गतान्क से आगे........................

"कहना क्या चाह रहे हो?" ख़ान ने हल्के गुस्से से पुछा

"सोचिए"

ख़ान ने एक पल के लिए सोचा और फिर हैरत से जै की तरफ देखा

"बकवास कर रहे हो तुम"

जै ने इनकार में गर्दन हिलाई

"तुम्हें कैसे पता?"

"अपनी आँखों से देखा मैने" जै मुस्कुराते हुए बोला

"और अगर ऐसा ना हुआ तो?"

"जो चीज़ मैने खुद अपनी आँखों से देखी, बार बार देखी, वो ग़लत कैसी हो सकती है ख़ान साहब?"

"अगर तुम्हारी बात सच भी है जै तो काफ़ी कुच्छ इस बात पे भी डिपेंड करता है के बिंदिया जानती कितना है, और क्या जानती है"

जै ने हाँ में गर्दन हिलाई.

"मैं उसको इस बात की धमकी देकर डराउ भी पर अगर उसको हक़ीक़त में कुच्छ नही पता तो सब डरना धमकाना बेकार है"

जै ख़ान की बात सुनकर चुप चाप हां में गर्दन हिलाता रहा.

"वैसे एक बात तो है" ख़ान ने कहा "एक बात पर वो बौखला तो गयी थी"

"किस बात पर?"

"मैने उससे पुछा के ठाकुर के साथ उसका रिश्ता कैसा था और इस पर वो ऐसे चौंक पड़ी जैसे मैने ये पुच्छ लिया हो के ठाकुर के साथ वो आखरी बार कब सोई थी"

"हो तो सकता है" जै ने हामी भारी "चाची काफ़ी सालों से उनसे अलग ही सो रही है और आक्सिडेंट के बाद से तो वो बिस्तर से हिल भी नही पाती. ऐसी हालत में इतने सालों तक चाचा किसी औरत के साथ ना रहें हो ये यकीन करने काबिल बात है नही"

"हां और घर की नौकरानी जो हर पल हाज़िर रहती है उससे आसान क्या होगा"

ख़ान ने बात में बात जोड़ी

"और ख़ास तौर से अगर नौकरानी इतनी गरम हो के अपने बेटे की उमर के लड़के के साथ सोती हो" जै ने बात ख़तम करते हुए कहा

"चलो मैं देखता हूं के ये बात कहाँ पहुँचती है. फिलहाल तो तुम उम्मीद ही करो बस के वो बिंदिया कुच्छ जानती हो"

जै चुप रहा.

"अगर पहले सवाल का जवाब मिल जाए तो दूसरा सवाल अपने हाल हो जाएगा" ख़ान ने कहा

"पहला सवाल?"

"हां" ख़ान ने कहा "अगर किसी तरह ये समझ आ जाए के बंद कमरे के अंदर सबकी नज़र बचा कर खून कैसे हुआ तो अंदाज़ा लगाया जा सकता है के खूनी कौन है"

"कमरा बंद कहाँ था" जै बोला "दरवाज़ा खुला हुआ था"

"उस दरवाज़े के बाहर तो 2 लोग बैठे थे मेरे भाई" ख़ान ने कहा "दरवाज़े को छ्चोड़कर तो कमरा तो बंद था ना. खिड़की की सिट्कॅनी अंदर से लगी हुई थी"

"जब मैं अंदर दाखिल हुआ तो सिर्फ़ ये देखा था के खिड़की बंद है, सिट्कॅनी के बारे में तो मैं भी कुच्छ नही कह सकता"

"हां अगर सामने लाश पड़ी हो तो खिड़की की सिट्कॅनी की तरफ किसका ध्यान जाता है. वैसे ......." ख़ान कहता कहता रुक गया

"वैसे?" जै ने पुछा

"कुच्छ आया है दिमाग़ में, पहले एक बार खुद देख लूँ, बाद में बताऊँगा"

थोड़ी देर बाद ख़ान अपनी जीप में सवार वापिस गाओं की तरफ चल पड़ा.

उसी शाम वो फिर एक बार हवेली में था. उसकी किस्मत थी के हवेली के सब लोग कहीं गये हुए थे और सिर्फ़ एक पायल और भूषण ही हवेली में थे.

ख़ान ठाकुर के कमरे में खिड़की के सामने खड़ा था.

कमरे में सब कुच्छ वैसा ही था जैसा की पहले, कुच्छ ख़ास बदला नही गया था सिवाय इसके के ज़मीन पर वो कालीन बदल दी गयी थी. ठाकुर के खून के धब्बो वाली कालीन हटा दी गयी थी.

ख़ान बड़े ध्यान से खिड़की की तरफ देख रहा था. खिड़की पर नीचे की तरफ सिर्फ़ एक सिट्कॅनी थी जिसको नीचे कुंडे में गिरने पर खिड़की बंद होती थी. आम तौर पर खिड़कियों में उपेर की तरफ भी सिटकनी होती है जिसको चढ़ा कर खिड़की लॉक की जा सकती है पर इस खिड़की में नही. यहाँ सिर्फ़ एक ही सिट्कॅनी थी.

और ख़ान के दिमाग़ में 2 बाते घूम रही थी जिसपे उसको खुद हैरत थी के उसने ऐसा पहले क्यूँ नही सोचा.

1. खून होने के बाद हवेली में तूफान सा आ गया था. हर किसी का ध्यान जै की तरफ था. तो क्या ये मुमकिन नही के जिसने भी खून किया, वो उस मौके का फ़ायडा उठाकर कमरे में दाखिल हुआ और धीरे से सिट्कॅनी लगा दी जिससे ये लगे के खिड़की पहले से ही अंदर से बंद थी.

2. दूसरी बात के लिए ख़ान ने सिट्कॅनी उपेर की और खिड़की खोली. उसने सिट्कॅनी को घुमा कर टेढ़ा नही किया, बस सीधा सीधा ही उपेर की ओर खींच दी. फिर वो खिड़की पर चढ़ा और बाहर कूद गया. बाहर निकल कर उसने खिड़की को धीरे से बंद करना शुरू किया. जब खिड़की के दोनो किवाड़ तकरीबन बंद हो ही गये तो उसने एक झटके से खिड़की को बंद कर दिया.

झटका लगने की वजह से उपेर की और सीधी खींची हुई सिट्कॅनी नीचे कुंडे में जा गिरी और खिड़की अंदर की तरफ से बंद हो गयी.

कल्लो से आखरी बार बात करने के बाद रूपाली के दिल को जैसे सुकून सा मिल गया था. उसका ये डर के कल्लो कहीं किसी से ये ना कह दे के रूपाली ने उनको देखा था अब जा चुका था. बल्कि कल्लो का उससे डर कर ये विनती करना के वो किसी से शिकायत ना करे उसको और हौसला दे रहा था.

इसके बाद कुच्छ दिन तक रूपाली की कल्लो से इस बारे में कोई बात नही हुई. कल्लो अब भी काफ़ी संभाल गयी थी. रूपाली ने कई बार कोशिश की पर कल्लो तो शंभू काका से इस तरह दूर रहने लगी थी जैसे काका में काँटे उग आए हों. चाहकर भी रूपाली उन दोनो को फिर साथ में नही देख सकी.

उस दिन वो अपने कमरे में बिस्तर पर बैठी पढ़ रही थी. एग्ज़ॅम्स पास आ रहे थे और पिच्छले कुच्छ दिन से उसका ध्यान पढ़ाई में नही लग रहा था. फैल होने का मतलब वो अच्छी तरह जानती थी इसलिए अपने बाप के डर से किताबों में सर खपा रही थी.

तभी कल्लो उसके कमरे में दाखिल हुई और झाड़ू लगाने लगी. उसने सफेद एक सलवार कमीज़ पहेन रखा था और गले में दुपट्टा नही था.

पढ़ते पढ़ते रूपाली ने एक नज़र कल्लो पर डाली और फिर किताब की तरफ देखने लगी. पर उस एक झलक में उसे जो दिखाई दिया उसने रूपाली को दोबारा नज़र उठाने पर मजबूर कर दिया.

कल्लो झुकी हुई झाड़ू लगा रही थी और उसकी कमीज़ के गले से काले रंग में बंद उसकी चूचियाँ सॉफ दिखाई दे रही थी.

रूपाली ने चोर नज़र से फिर एक बार कल्लो की चूचियो की तरफ देखा. उसकी बड़ी बड़ी काली छातियाँ हर बार रूपाली की नज़र को जैसे बाँध सी लेती थी और इस बार भी यही हुआ. पहले चोर नज़र से देखती रूपाली अब बेख़बर होकर कल्लो की चूचियो को घूर रही थी. जब भी झाड़ू लगाने के लिए कल्लो हाथ हिलाती, उसकी चूचियाँ हिलती और ना जाने क्यूँ उनको देखने में रूपाली को एक अजीब सा मज़ा आने लगा.

उसका इस तरह से देखना कल्लो से छुपा ना रहा. उसको एहसास हो गया के रूपाली क्या देख रही थी और वो फ़ौरन खड़ी होकर अपनी कमीज़ ठीक करने लगी.

"ऐसे क्या देख रही हो बीबी जी" कल्लो शरमाते हुए बोली

और ना जाने कहाँ से रूपाली के अंदर इतनी हिम्मत आई पर इससे पहले के उसको खुद भी एहसास होता, वो बोल पड़ी.

"कितने बड़े बड़े हैं तेरे"

जब रूपाली को एहसास हुआ के वो क्या बोल गयी तो उसने खुद अपनी ज़ुबान काट ली. उसकी बात सुनकर कल्लो भी शर्मा सी गयी.

"आप भी ना बीबी जी" कल्लो बोली "कैसी बातें करती हैं"

और इस बार रूपाली ने ग़लती से नही पर खुद जान भूझ कर बात आगे बढ़ाई.

"नही सच कह रही हूँ" वो बोली "बहुत ज़्यादा बड़े हैं तेरे"

"जानती हूँ" कल्लो अपना गला ठीक करते हुए बोली "मुसीबत ही है ये भी एक"

"मुसीबत क्यूँ?" रूपाली ने पुछा

"अजीब से लगते हैं इतने बड़े बड़े" कल्लो ने फिर झाड़ू लगाना शुरू कर दिया "सबसे पहले सबकी नज़र यहीं पड़ती है"

"सब कौन" रूपाली ने शरारत से पुछा

"सब मतलब सब" कल्लो बोली "जैसे के आपकी नज़र भी तो यहीं पड़ी ना जबकि आप तो खुद एक लड़की हो"

"ह्म्‍म्म" रूपाली बोली "तो अच्छी बात होगी ना. सब तुझे ही देखते होंगे"

कल्लो इस बात पर हस पड़ी

"कोई घूर घूर कर आपकी छातियो को देखे तो इसमें अच्छा क्या है. आपके खुद के इतने बड़े होते तो पता चलता"

इस बात पर रूपाली भी हस पड़ी.

"वैसे मर्द घूर घूर कर देखे तो समझ आता है पर आप ऐसे क्या देख रही थी?"

"पता नही" रूपाली बच्चे की तरह इठलाते हुए बोली "अच्छे लग रहे थे तेरे"

"आपके खुद के पास भी तो हैं"

"हां पर तेरे जैसे बड़े बड़े नही हैं" रूपाली ने जवाब दिया

कुच्छ देर तक कल्लो खामोशी से झाड़ू लगाती रही और फिर अपना काम ख़तम करके जाने लगी.

"रुक" रूपाली ने उसो पिछे से आवाज़ दी. कल्लो उसकी तरफ पलटी.

"एक बार और दिखा दे ना" रूपाली ने कहा

कल्लो जैसे उसकी बात सुन कर सकते में आ गयी.

"कैसी बात कर रही हो मालकिन"

"अर्रे मुझसे क्या शर्मा रही है. मैं भी तो लड़की ही हूँ" रूपाली ने कहा

"फिर भी" कल्लो शर्मा गयी "इसका मतलब ये थोड़े ही है के मैं दुनिया जहाँ की औरतों को दिखाती फिरुन्गि"

"दुनिया जहाँ की नही बस मुझे दिखा दे" रूपाली उसको चिड़ाते हुए बोली

"अपने देख लो ना अगर इतना शौक है तो" कल्लो भी हासकर बोली

"वो तो रोज़ ही देखती हूँ. आज तू दिखा दे"

कल्लो ने इनकार में गर्दन हिला दी.

"देख मैं तेरे और शंभू काका के बारे में ......"

"दिखाती हूँ" कल्लो ने उसकी बात भी पूरी नही होने दी और नीचे को झुक गयी

"ऐसे नही" रूपाली ने कहा

"तो फिर?" कल्लो ने पुछा

"पूरा खोलके दिखा" रूपाली ऐसे अड़ गयी थी जैसे कोई छ्होटा बच्चा किसी खिलोने की ज़िद कर रहा हो

"नही बिल्कुल नही" कल्लो उठकर सीधी खड़ी हो गयी

"तो फिर मैं मम्मी पापा को ..... " रूपाली ने कहना शुरू ही किया था के कल्लो ने फिर उसकी बात काट दी

"ठीक है"

क्रमशः........................................

खूनी हवेली की वासना पार्ट --25

gataank se aage........................

"Kehna kya chah rahe ho?" Khan ne halke gusse se puchha

"Sochiye"

Khan ne ek pal ke liye socha aur phir hairat se Jai ki taraf dekha

"Bakwaas kar rahe ho tum"

Jai ne inkaar mein gardan hilayi

"Tumhein kaise pata?"

"Apni aankhon se dekha maine" Jai muskurate hue bola

"Aur agar aisa na hua toh?"

"Jo cheez maine khud apni aankhon se dekhi, baar baar dekhi, vo galat kaisi ho sakti hai Khan Sahab?"

"Agar tumhari baat sach bhi hai Jai toh kaafi kuchh is baat pe bhi depend karta hai ke Bindiya jaanti kitna hai, aur kya jaanti hai"

Jai ne haam mein gardan hilayi.

"Main usko is baat ki dhamki dekar daraoon bhi par agar usko haqeeqat mein kuchh nahi pata toh sab darana dhamkana bekaar hai"

Jai Khan ki baat sunkar chup chap haan mein gardan hilata raha.

"Vaise ek baat toh hai" Khan ne kaha "Ek baat par vo baukhla toh gayi thi"

"Kis baat par?"

"Maine usse puchha ke Thakur ke saath uska rishta kaisa tha aur is par vo aise chaunk padi jaise maine ye puchh liya ho ke Thakur ke saath vo aakhri baar kab soyi thi"

"Ho toh sakta hai" Jai ne haami bhari "Chachi kaafi saalon se unse alag hi so rahi hai aur accident ke baad se toh vo bistar se hil bhi nahi paati. Aisi haalat mein itne saalon tak Chacha kisi aurat ke saath na rahen ho ye yakeen karne kaabil baat hai nahi"

"Haan aur ghar ki naukrai jo har pal haazi rehti hai usse aasan kya hoga"

Khan ne baat mein baat jodi

"Aur khaas taur se agar naukrani itni garam ho ke apne bete ki umar ke ladke ke saath soti ho" Jai ne baat khatam karte hue kaha

"Chalo main dekhta hoon ke ye baat kahan pahunchti hai. Filhal toh tum ummeed hi karo bas ke vo Bindiya kuchh jaanti ho"

Jai chup raha.

"Agar pehle sawal ka jawab mil jaaye toh doosra sawal apne hal ho jaayega" Khan ne kaha

"Pehla sawal?"

"Haan" Khan ne kaha "Agar kisi tarah ye samajh aa jaaye ke band kamre ke andar sabki nazar bacha kar khoon kaise hua toh andaza lagaya ja sakta hai ke khooni kaun hai"

"Kamra band kahan tha" Jai bola "Darwaza khula hua tha"

"Us darwaze ke bahar toh 2 log bethe the mere bhai" Khan ne kaha "Darwaze ko chhodkar toh kamra toh band tha na. Khidki ki sitkani andar se lagi hui thi"

"Jab main andar daakhil hua toh sirf ye dekha tha ke khidki band hai, sitkani ke baare mein toh main bhi kuchh nahi keh sakta"

"Haan agar saamne laash padi ho to khidki ki sitkani ki taraf kiska dhyaan jata hai. vaise ......." Khan kehta kehta ruk gaya

"Vaise?" Jai ne puchha

"Kuchh aaya hai dimag mein, pehle ek baar khud dekh loon, baad mein bataoonga"

Thodi der baad Khan apni jeep mein sawar vaapis gaon ki taraf chal pada.

Usi shaam vo phir ek baar Haweli mein tha. Uski kismat thi ke haweli ke sab log kahin gaye hue the aur sirf ek Payal aur Bhushan hi haweli mein the.

Khan Thakur ke kamre mein khidki ke saamne khada tha.

Kamre mein sab kuchh vaisa hi tha jaisa ki pehle, kuchh khaas badla nahi gaya tha sivaay iske ke zameen par vo kaaleen badal di gayi thi. Thakur ke khoon ke dhabbo wali kaaleen hata di gayi thi.

Khan bade dhyaan se khidki ki taraf dekh raha tha. Khidki par neeche ki taraf sirf ek sitkani thi jisko neeche kunde mein girane par khidki band hoti thi. Aam taur par khidkiyon mein uper ki taraf bhi sitakni hoti hai jisko chadha kar khidki lock ki ja sakti hai par is khidki mein nahi. Yahan sirf ek hi sitkani thi.

Aur Khan ke dimag mein 2 baatin ghoom rahi thi jispe usko khud hairat thi ke usne aisa pehle kyun nahi socha.

1. Khoon hone ke baad haweli mein toofan sa aa gaya tha. Har kisi ka dhyaan Jai ki taraf tha. Toh kya ye mumkin nahi ke jisne bhi khoon kiya, vo us mauke ka faayda uthakar kamre mein daakhil hua aur dheere se sitkani laga di jisse ye lage ke khidki pehle se hi andar se band thi.

2. Doosri baat ke liye Khan ne sitkani uper ki aur khidki kholi. Usne sitkani ko ghuma kar tedha nahi kiya, bas sidha sidha hi uper ki aur khinch di. Phir vo khidki par chadha aur bahar kood gaya. Bahar nikal kar usne khidki ko dheere se band karna shuru kiya. Jab khidki ke dono kiwaad takreeban band ho hi gaye toh usne ek jhatke se khidki ko band kar diya.

Jhatka lagne ki vajah se uper ki aur sidhi khinchi hui sitkani neeche kunde mein ja giri aur khidki andar ki taraf se band ho gayi.

Kallo se aakhri baar baat karne ke baad Rupali ke dil ko jaise sukoon sa mil gaya tha. Uska ye darr ke Kallo kahin kisi se ye na keh de ke Rupali ne unko dekha tha ab ja chuka tha. Balki Kallo ka usse darr kar ye vinti karna ke vo kisi se shikayat na kare usko aur hausla de raha tha.

Iske baad kuchh din tak Rupali ki Kallo se is baare mein koi baat nahi hui. Kallo ab bhi kaafi sambhal gayi thi. Rupali ne kai baar koshish ki par Kallo toh Shambhu Kaka se is tarah door rehne lagi thi jaise Kaka mein kaante ug aaye hon. Chahkar bhi Rupali un dono ko phir saath mein nahi dekh saki.

Us din vo apne kamre mein bistar par bethi padh rahi thi. Exams paas aa rahe the aur pichhle kuchh din se uska dhyaan padhai mein nahi lag raha tha. Fail hone ka matlab vo achhi tarah jaanti thi isliye apne baap ke darr se kitabon mein sar khapa rahi thi.

Tabhi Kallo uske kamre mein daakhil hui aur jhaadu lagane lagi. Usne safed ek salwar kameez pehen rakha tha aur gale mein dupatta nahi tha.

Padhte padhte Rupali ne ek nazar Kallo par daali aur phir kitaab ki taraf dekhne lagi. Par us ek jhalak mein use jo dikhai diya usne Rupali ko dobara nazar uthane par majboor kar diya.

Kallo jhuki hui jhaadu laga rahi thi aur uski kameez ke gale se kaale rang mein band uski chhatiyan saaf dikhai de rahi thi.

Rupali ne chor nazar se phir ek baar Kallo ki chhatiyon ki taraf dekha. Uski badi badi kaali chhatiyan har baar Rupali ki nazar ko jaise baandh si leti thi aur is baar bhi yahi hua. Pehle chor nazar se dekhti Rupali ab bekhabar hokar Kallo ki chhatiyon ko ghoor rahi thi. Jab bhi jhaadu lagane ke liye Kallo haath hilati, uski chhatiyan hilati aur na jaane kyun unko dekhne mein Rupali ko ek ajeeb sa maza aane laga.

Uska is tarah se dekhna Kallo se chhupa na raha. Usko ehsaas ho gaya ke Rupali kya dekh rahi thi aur vo fauran khadi hokar apni kameez theek karne lagi.

"Aise kya dekh rahi ho Bibi ji" Kallo sharmate hue boli

Aur na jaane kahan se Rupali ke andar itni himmar aayi par isse pehle ke usko khud bhi ehsaas hota, vo bol padi.

"Kitne bade bade hain tere"

Jab Rupali ko ehsaas hua ke vo kya bol gayi toh usne khud apni zubaan kaat li. Uski baat sunkar Kallo bhi sharma si gayi.

"Aap bhi na Bibi ji" Kallo boli "Kaisi baaten karti hain"

Aur is baar Rupali ne galti se nahi par khud jaan bhoojh kar baat aage badhai.

"Nahi sach keh rahi hoon" Vo boli "Bahut zyada bade hain tere"

"Jaanti hoon" Kallo apna gala theek karte hue boli "Museebat hi hai ye bhi ek"

"Museebat kyun?" Rupali ne puchha

"Ajeeb se lagte hain itne bade bade" Kallo ne phir jhaadu lagana shuru kar diya "Sabse pehle sabki nazar yahin padti hai"

"Sab kaun" Rupali ne sharat se puchha

"Sab matlab sab" Kallo boli "Jaise ke aapki nazar bhi toh yahin padi na jabki aap toh khud ek ladki ho"

"Hmmm" Rupali boli "Toh achhi baat hogi na. Sab tujhe hi dekhte honge"

Kallo is baat par has padi

"Koi ghoor ghoor kar aapki chhatiyon ko dekhe toh ismein achha kya hai. Aapke khud ke itne bade hote toh pata chalta"

Is baat par Rupali bhi has padi.

"Vaise mard ghoor ghoor kar dekhe to samajh aata hai par aap aise kya dekh rahi thi?"

"Pata nahi" Rupali bachche ki tarah ithlate hue boli "Achhe lag rahe the tere"

"Aapke khud ke paas bhi toh hain"

"Haan par tere jaise bade bade nahi hain" Rupali ne jawab diya

Kuchh der tak Kallo khamoshi se jhaadu lagati rahi aur phir apna kaam khatam karke jaane lagi.

"Ruk" Rupali ne uso pichhe se aawaz di. Kallo uski taraf palti.

"Ek baar aur dikha de na" Rupali ne kaha

Kallo jaise uski baat sun kar sakte mein aa gayi.

"Kaisi baat kar rahi ho malkin"

"Arrey mujhse kya sharma rahi hai. Main bhi toh ladki hi hoon" Rupali ne kaha

"Phir bhi" Kallo sharma gayi "Iska matlab ye thode hi hai ke main duniya jahan ki auraton ko dikhati phirungi"

"Duniya jahan ki nahi bas mujhe dikha de" Rupali usko chidate hue boli

"Apne dekh lo na agar itna shauk hai toh" Kallo bhi haskar boli

"Vo toh roz hi dekhti hoon. Aaj tu dikha de"

Kallo ne inkaar mein gardan hila di.

"Dekh main tere aur Shambhu Kaka ke baare mein ......"

"Dikhati hoon" Kallo ne uski baat bhi poori nahi hone di aur neeche ko jhuk gayi

"Aise nahi" Rupali ne kaha

"Toh phir?" Kallo ne puchha

"Poora kholke dikha" Rupali aise ad gayi thi jaise koi chhota bachcha kisi khilone ki zid kar raha ho

"Nahi bilkul nahi" Kallo uthkar sidhi khadi ho gayi

"Toh phir main mummy papa ko ..... " Rupali ne kehna shuru hi kiya tha ke Kallo ne phir uski baat kaat di

"Theek hai"

kramashah........................................


raj..
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Re: खूनी हवेली की वासना

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 13:16

खूनी हवेली की वासना पार्ट --26

गतान्क से आगे........................

कल्लो ने एक बार दरवाज़े के बाहर नज़र डाली और बंद करके दरवाज़े के पास खड़े खड़े अपनी कमीज़ उपेर को उठाई. रूपाली आँखें फाडे देखने लगी. कल्लो को नंगी वो पहले भी देख चुकी थी पर आज जब अपनी मर्ज़ी से वो उसके आगे नंगी हो रही थी तो रूपाली को अलग ही मज़ा आ रहा था.

और उससे कहीं ज़्यादा मज़ा उसको इसलिए आ रहा था के वो कल्लो को मजबूर कर रही थी.

कल्लो ने अपनी कमीज़ उठाकर गले तक कर दी. उसके बड़ी बड़ी चूचियाँ ब्रा में रूपाली के सामने आ गयी.

"ब्रा खोल" रूपाली ने कहा

तभी बाहर से रूपाली की माँ की आवाज़ आई. वो कल्लो को आवाज़ देकर बुला रही थी.

"आई मालकिन"

कल्लो ने चिल्ला कर जवाब दिया और फ़ौरन अपनी कमीज़ नीचे करके कपड़े ठीक करती कमरे से बाहर निकल गयी.

रूपाली अभी अभी स्कूल से वापिस आई थी और अपने कमरे में चेंज कर रही थी. घर पर उस वक़्त सिर्फ़ एक कल्लो ही मौजूद थी और उसका भाई भी आते ही खेलने के लिए भाग गया था. थॅकी हुई रूपाली ने अपने कपड़े बदले और थोड़ी देर के लिए बिस्तर पर गिर गयी.

कल जब से उसने कल्लो को अपने सामने कमीज़ उठाए खड़ा देखा था तबसे उसके दिल-ओ-दिमाग़ में एक अजीब सी हलचल मची हुई थी. कल्लो की बड़ी बड़ी चूचियाँ बार बार उसकी नज़रों के सामने आ जाती थी और जाने क्यूँ उसका दिल करता था के वो एक बार उन्हें च्छुकर देखे.

कभी उसके दिमाग़ में ऐसी बातें सोचकर गिल्ट और शरम आती के वो ऐसी गंदी बातें सोच रही है वो भी अपने घर की नौकरानी के बारे में तो कभी उसके दिल में एक अजीब सा रोमांच भर जाता ये सोचकर के वो फिर कल्लो को ऐसा करने के लिए मजबूर कर सकती है.

दोस्त के नाम पर उसकी सहेली उसकी अपनी माँ और दोस्त उसका छ्होटा भाई थे. वो उस इलाक़े के ठाकुर की बेटी थी इसलिए स्कूल में उसके टीचर भी उसके साथ बड़े अदब से बात करते थे.

घर के 2 नौकर रखवाली के लिए उसके और उसके भाई के साथ स्कूल जाते थे और सारा दिन स्कूल के बाहर बैठे रहते थे. इस वजह से स्कूल की बाकी लड़कियाँ उससे दूर ही रहती थी. बस कुच्छ लड़कियाँ ही थी जो उससे बात करती थी और वो भी ऐसी थी जो किताबों में ही डूबी रहती थी.

केयी बार तो रूपाली ने ये भी सुना था के उन किताबी लड़कियों के साथ रहने की वजह से उसको भी बाकी लड़कियाँ बहेनजी कहती थी इसलिए उससे दूर ही रहती थी.

वो एक गर्ल्स स्कूल में पढ़ती थी इसलिए लड़को के नाम पर वो किसी को भी नही जानती थी. बस जिस एक लड़के से वो बात करती थी वो उसका अपना भाई ही था.

लड़कों के साथ एक लड़की का क्या रिश्ता हो सकता है उसको ये बात भी पिक्चर्स देख देख कर ही पता चली थी और जानती थी के स्कूल की कुच्छ लड़कियों का ऐसा चक्कर है कुच्छ बाहर के लड़कों के साथ.

पर जिन लड़कियों से उसकी दोस्ती थी उनकी आशिक़ी अपनी किताबों के साथ थी. और रूपाली के साथ तो हर वक़्त 2 पहेलवान होते थे जिसकी वजह से उसका किसी लड़के के करीब जाना ना-मुमकिन सा ही था.

और इन सब बातों की वजह से सेक्स की तरफ उसकी जानकारी ना के बराबर थी. गाओं के एक लड़कियों के स्कूल में पढ़ने वाली उस लड़की को सेक्स का कोई ग्यान नही था. सेक्स क्या होता है, क्यूँ होता है, बच्चे कैसे पैदा होते हैं, कहाँ से पैदा होते हैं कुच्छ नही जानती थी वो.

उसके लिए सेक्स के साथ पहला सामना अपने माँ बाप और घर के नौकरों को सेक्स करते हुए देखना ही था. कुच्छ दिन बाद उसने अपनी एक सहेली से इस बारे में बात की जो थी तो खुद भी बहेनजी ही पर रूपाली जानती थी के उसको कुच्छ ना कुच्छ तो पता होगा ही.

रूपाली ने उसको ये नही बताया था के उसने किसी देखा पर उसकी दोस्त ने उसे समझाया के उसने क्या देखा था.

पहली बार जब रूपाली को पता चला के बच्चे कैसे पैदा होते हैं और कहाँ से बाहर आते हैं तो उसका दिल धक से रह गया था. दिल ही दिल में उसने कहीं ये कसम भी खा ली थी के वो कभी बच्चे पैदा नही करेगी.

उसकी सहेली ने उसे एक बाइयालजी की किताब दिखा कर समझाया था के सेक्स क्या होता है, कैसे होता है और रूपाली यही सोचती रह गयी के ये लेसन उनकी बाइयालजी क्लास में बिना पढ़ाए छ्चोड़ क्यूँ दिया गया था.

"पर ये सब अब बदलने वाला है" रूपाली ने दिल ही दिल में सोचा.

वो 12थ स्टॅंडर्ड में थी और एग्ज़ॅम होने वाले थे मतलब कुच्छ ही महीने बाद वो कॉलेज जाएगी. उनके गाओं में कोई कॉलेज नही था और उसके लिए उसे पास के शहर जाना पड़ता.

गाओं से कुच्छ और लड़के लड़की भी कॉलेज के लिए रोज़ाना शहर जाते थे और शाम को घर लौट आते थे इसलिए रूपाली को ये खबर थी के अपने माँ बाप को मनाने के लिए उसे ज़्यादा मेहनत नही करनी पड़ेगी. बस ये सोचकर परेशान थी के अगर ये 2 पहलवान कॉलेज के लिए भी रोज़ उसके साथ शहर गये तो मुसीबत हो जाएगी.

कॉलेज के बारे में रूपाली ने सुना था के वहाँ लड़के लड़कियाँ साथ में पढ़ते हैं और किसी की किसी से बात करने पर कोई रोक टोक नही थी. उसको दिल ही दिल में पता नही कैसे ये यकीन हो गया था के वो कॉलेज जाएगी और वहाँ उसको एक अच्छा सा लड़का मिलेगा जिससे वो भी प्यार करेगी.

और फिर उस लड़के के साथ फिल्म देखने जाया करेगी जैसे की टीवी पर दिखाते हैं.

और फिर उन दोनो की शादी हो जाएगी.

और फिर बच्चे होंगे.

"नही" बच्चे सोचते ही रूपाली की सोच का सिलसिला फ़ौरन टूट गया "बच्चे नही पैदा करूँगी मैं. हे भगवान ... छ्ह्हीईई"

सोचती हुई वो बिस्तर से उठ बैठी.

उसके बहुत तेज़ भूख लगी हुई थी. बाथरूम जाकर उसने अपना हाथ मुँह धोया और खाने के लिए बाहर निकल ही रही थी के कमरे का दरवाज़ा खुला और कल्लो खाने की प्लेट लिए अंदर आ गयी.

"अर्रे तू यहाँ क्यूँ ले आई" रूपाली ने उसको देखकर पुछा "मैं नीचे आ ही रही थी"

"नही कोई बात नही" कल्लो ने कहा "मुझे लगा के आप थक गयी होंगी तो मैं यहीं ले आई"

"टेबल पे रख दे" उसने कल्लो को इशारा किया और टवल से अपना मुँह सॉफ करने लगी.

हाथ मुँह धोते वक़्त कुच्छ पानी उसके कपड़ो पर गिर गया था जिसकी वजह से उसकी हल्के पीले रंग की कमीज़ कंधो और चूचियो पर गीली हो गयी थी. उस गीली कमीज़ के नीचे उसका काले रंग का ब्रा सॉफ नज़र आ रहा था.

"मुझे काला नही पसंद" कल्लो ने अचानक उसकी तरफ देखते हुए कहा

"मतलब?" रूपाली को उसकी बात का मतलब समझ नही आया.

कल्लो ने उसकी छातियो की तरफ इशारा किया जहाँ उसकी कमीज़ हल्की से कहीं कहीं से उसकी छातियो पर चिपक गयी थी.

"काला ब्रा" कल्लो ने अंगुली दिखाते हुए कहा "काला पसंद नही है मुझे"

रूपाली को एक पल के लिए शरम सी आ गयी और उसने फ़ौरन अपनी कमीज़ ठीक की.

"तो काला पेहेन्ति क्यूँ है तू?" रूपाली ने पुचछा

"काला कहाँ पहना है" कल्लो ने फ़ौरन अपने गिरेबान की तरफ देखा

"अभी नही पहले तो पहना था" रूपाली शरारत से मुस्कुराते हुए बोली

कल्लो समझ गयी के उसका इशारा पहले कब की तरफ था.

"क्या करूँ बीबी जी" कल्लो बोली "यहाँ दुकान में जाओ तो 3 ही रंग मिलते हैं, काला, सफेद या क्रीम कलर"

उसकी बात पर दोनो हस पड़ी.

"उमर के हिसाब से तो आपके भी काफ़ी बड़े हैं" कल्लो ने फिर उसकी चूचियो की तरफ इशारा किया.

कल की रूपाली जो इतने खुले तरीके से कल्लो को अपनी छातियाँ दिखाने पर मजबूर कर रही थी आज अपनी बात पर शर्मा बैठी. शायद इसलिए क्यूंकी आज इशारा उसके अपने जिस्म की तरफ था.

"चल जा ना" उसने बात टालते हुए कहा "खाना खाने दे मुझे"

"आज नही देखोगी?" कल्लो ने पुछा

"क्या?"

"ये ...." कल्लो ने अपनी दोनो चूचियो को कमीज़ के उपेर से पकड़ते हुए कहा.

एक पल में सब उल्टा हो गया. जहाँ रूपाली इस सोच में थी के कल्लो को डराकर उसकी चूचिया देखेगी कल्लो के खुद ही कहने पर जैसे सकते में आ गयी.

पहली बार उसको एहसास हुआ के आख़िर वो एक बच्ची थी और कल्लो एक खेली खाई औरत.

"क्या हुआ मालकिन?" कल्लो ने अपनी चूचियाँ अपने हाथों में दबाते हुए कहा "आज नही देखोगी? आज तो घर पर कोई है भी नही"

रूपाली के मुँह से एक बोल ना फूटा. कल्लो अपनी चूचियाँ अपने हाथों में पकड़े रूपाली के करीब आ खड़ी हुई.

"आपको पसंद हैं मेरे?"

रूपाली सिर्फ़ हां में सर हिलाकर रह गयी.

"देखोगी?"

"रूपाली ने फिर हां में सर हिलाया.

कल्लो ने अपने हाथों से अपनी कमीज़ का पल्लू अपनी गर्दन तक उठा दिया. सफेद रंग की ब्रा में बंद उसकी चूचियाँ एक बार फिर रूपाली की आँखों के सामने आ गयी.

हमेशा की तरह इस बार भी रूपाली चुप चाप उसकी चूचियो पर नज़र जमाकर रह गयी. दोनो चूचियाँ बा-मुश्किल ब्रा में समा रही थी.

"क्या पसंद है आपको इनमें?" कल्लो ने पुछा

"कितनी बड़ी हैं तेरी" इस बार रूपाली ने जवाब दिया.

'इससे पहले किसी की देखी हैं आपने?"

रूपाली ने सॉफ झूठ बोलते हुए इनकार में अपनी गर्दन हिला दी. उसने अपनी माँ को पूरी तरह नंगी देखा हुआ था पर ये बात वो कल्लो से तो नही कह सकती थी.

"झूठ बोल रही हैं आप" कल्लो ने कहा तो रूपाली का कलेजा मुँह को आ गया.

"इसको कैसे पता के मैने अपनी माँ को नंगी देखा है" दिल ही दिल में रूपाली ने सोचा

"क्यूँ अपनी खुद की रोज़ नही देखती क्या?" कल्लो ने हस्ते हुए कहा तो रूपाली की जान में जान आई और वो भी हस पड़ी.

"बस अपनी ही देखी हैं. मेरा मतलब था के मैने तेरे अलावा और किसी औरत की नही देखी"

"अच्छे से देखनी हैं?" कल्लो ने पुछा

रूपाली के दिल की धड़कन तेज़ हो चली. वो जानती थी के कल्लो का क्या मतलब था. उसने हां में सर हिलाया.

"लो देख लो" कहते हुए कल्लो ने अपनी ब्रा को नीचे से पकड़ा और अपनी छातियों के उपेर कर दिया. दोनो नंगी छातियाँ ब्रा से बाहर निकल आई.

रूपाली की आँखें खुली रह गयी. ये सच था के वो खुद भी एक लड़की थी पर अपने सामने किसी औरत को इतने करीब से नंगी देखने का उसका ये पहला मौका था, ख़ास तौर से तब जबकि सामने वाली औरत खुद उसे ही दिखाने

के लिए नंगी हो रही थी.

कल्लो अपने हाथों से कमीज़ और ब्रा पकड़े चुप चाप रूपाली के सामने खड़ी रही और रूपाली उसकी चूचियो को ऐसे देखने लगी जैसे कोई रिसर्च वर्क कर रही हो. वो दिल ही दिल में कल्लो की चूचियो और अपनी चूचियो को

मिलाने लगी.

उसकी खुद की चूचियाँ एकदम गोरी थी और कल्लो की एकदम काली.

उसकी खुद की चूचियाँ अभी छ्होटी थी बिल्कुल कच्चे अमरूद की तरह और उसने अभी ब्रा पहेनना शुरू ही किया था जबकि कल्लो की बहुत बड़ी बड़ी थी.

उसकी खुद की चूचियाँ एकदम तनी हुई थी बिल्कुल एवरेस्ट की छोटी की तरहजबकि कल्लो की नीचे को लुढ़की हुई थी, शायद बहुत बड़ी थी इसलिए.

उसके खुद के निपल्स छ्होटे छ्होटे और ब्राउन कलर के थे जैसे किस मिस के दाने हों जबकि कल्लो के बड़े बड़े और काले रंग के थे.

क्रमशः........................................

खूनी हवेली की वासना पार्ट --26

gataank se aage........................

Kallo ne ek baar darwaze ke bahar nazar daali aur band karke darwaze ke paas khade khade apni kameez uper ko uthayi. Rupali aankhen phaade dekhne lagi. Kallo ko nangi vo pehle bhi dekh chuki thi par aaj jab apni marzi se vo uske aage nangi ho rahi thi toh Rupali ko alag hi maza aa raha tha.

Aur usse kahin zyada maza usko isliye aa raha tha ke vo Kallo ko majboor kar rahi thi.

Kallo ne apni kameez uthakar gale tak kar di. Uske badi badi chhatiyan bra mein Rupali ke saamne aa gayi.

"Bra khol" Rupali ne kaha

Tabhi bahar se Rupali ki maan ki aawaz aayi. Vo Kallo ko aawaz dekar bula rahi thi.

"Aayi malkin"

Kallo ne chilla kar jawab diya aur fauran apni kameez neeche karke kapde theek karti kamre se bahar nikal gayi.

Rupali abhi abhi school se vaapis aayi thi aur apne kamre mein change kar rahi thi. Ghar par us waqt sirf ek Kallo hi maujood thi aur uska bhai bhi aate hi khelne ke liye bhaag gaya tha. Thaki hui Rupali ne apne kapde badle aur todi der ke liye bistar par gir gayi.

Kal jab se usne Kallo ko apne saamne kameez uthaye khada dekha tha tabse uske dil-o-dimag mein ek ajeeb si halchal machi hui thi. Kallo ki badi badi chhatiyan baar baar uski nazron ke saamne aa jaati thi aur jaane kyun uska dil karta tha ke vo ek baar unhen chhukar dekhe.

Kabhi uske dimag mein aisi baaten sochkar guilt aur sharam aati ke vo aisi gandi baaten soch rahi hai vo bhi apne ghar ki naukrani ke baare mein toh kabhi uske dil mein ek ajeeb sa romanch bhar jata ye sochkar ke vo phir Kallo ko aisa karne ke liye majboor kar sakti hai.

Dost ke naam par uski saheli uski apni maan aur dost uska chhota bhai the. Vo us ilaake ke thakur ki beti thi isliye school mein uske teacher bhi uske saath bade adab se baat karte the.

Ghar ke 2 naukar rakhwali ke liye uske aur uske bhai ke saath school jaate the aur sara din school ke bahar bethe rehte the. Is vajah se school ki baaki ladkiyan usse door hi rehti thi. Bas kuchh ladkiyan hi thi jo usse baat karti thi aur vo bhi aisi thi jo kitabon mein hi doobi rehti thi.

Kayi baar toh Rupali ne ye bhi suna tha ke un kitabi ladkiyon ke saath rehne ki vajah se usko bhi baaki ladkiyan behenji kehti thi isliye usse door hi rehti thi.

Vo ek girls school mein padhti thi isliye ladko ke naam par vo kisi ko bhi nahi jaanti thi. Bas jis ek ladke se vo baat karti thi vo uska apna bhai hi tha.

Ladkon ke saath ek ladki ka kya rishta ho sakta hai usko ye baat bhi pictures dekh dekh kar hi pata chali thi aur jaanti thi ke school ki kuchh ladkiyon ka aisa chakkar hai kuchh bahar ke ladkon ke saath.

Par jin ladkiyon se uski dosti thi unki aashiqi apni kitabon ke saath thi. Aur Rupali ke saath toh har waqt 2 pehelwan hote the jiski vajah se uska kisi ladke ke kareeb jana na-mumkin sa hi tha.

Aur in sab baaton ki vajah se sex ki taraf uski jaankari na ke barabar thi. Gaon ke ek ladkiyon ke school mein padhne wali us ladki ko sex ka koi gyaan nahi tha. Sex kya hota hai, kyun hota hai, bachche kaise paida hote hain, kahan se paida hote hain kuchh nahi jaanti thi vo.

Uske liye sex ke saath pehla saamna apne maan baap aur ghar ke naukron ko sex karte hue dekhna hi tha. Kuchh din baad usne apni ek saheli se is baare mein baat ki jo thi toh khud bhi behenji hi par Rupali jaanti thi ke usko kuchh na kuchh toh pata hoga hi.

Rupali ne usko ye nahi bataya tha ke usne kisi dekha par uski dost ne use samjhaya ke usne kya dekha tha.

Pehli baar jab Rupali ko pata chala ke bachce kaise paida hote hain aur kahan se bahar aate hain toh uska dil dhak se reh gaya tha. Dil hi dil mein usne kahin ye kasam bhi kha li thi ke vo kabhi bachche paida nahi karegi.

Uski saheli ne use ek biology ki kitaab dikha kar samjhaya tha ke sex kya hota hai, kaise hota hai aur Rupali yahi sochti reh gayi ke ye lesson unki biology class mein bina padhaye chhod kyun diya gaya tha.

"Par ye sab ab badalne wala hai" Rupali ne dil hi dil mein socha.

Vo 12th standard mein thi aur exam hone wale the matlab kuchh hi mahine baad vo college jaayegi. Unke gaon mein koi college nahi tha aur uske liye use paas ke shehar jana padta.

Gaon se kuchh aur ladke ladki bhi college ke liye rozana shehar jaate the aur shaam ko ghar laut aate the isliye Rupali ko ye khabar thi ke apne maan baap ko manane ke liye use zyada mehnat nahi karni padegi. Bas ye sochkar pareshan thi ke agar ye 2 pehalwan college ke liye bhi roz uske saath shehar gaye toh museebat ho jaayegi.

College ke baare mein Rupali ne suna tha ke vahan ladke ladkiyan saath mein padhte hain aur kisi ki kisi se baat karne par koi rok tok nahi thi. Usko dil hi dil mein pata nahi kaise ye yakeen ho gaya tha ke vo college jaayegi aur vahan usko ek achha sa ladka milega jisse vo bhi pyaar karegi.

Aur phir us ladke ke saath film dekhne jaaya karegi jaise ki TV par dikhate hain.

Aur phir un dono ki shaadi ho jaayegi.

Aur phir bachche honge.

"Nahi" Bachche sochte hi Rupali ki soch ka silsila fauran toot gaya "Bachche nahi paida karungi main. Hey Bhagwan ... Chhhiiiiii"

Sochti hui vo bistar se uth bethi.

Uske bahut tez bhookh lagi hui thi. Bathroom jakar usne apna haath munh dhoya aur khane ke liye bahar nikal hi rahi thi ke kamre ka darwaza khula aur Kallo khane ki plate liye andar aa gayi.

"Arrey tu yahan kyun le aayi" Rupali ne usko dekhkar puchha "Main niche aa hi rahi thi"

"Nahi koi baat nahi" Kallo ne kaha "Mujhe laga ke aap thak gayi hongi toh main yahin le aayi"

"Table pe rakh de" Usne kallo ko ishara kiya aur towel se apna munh saaf karne lagi.

Haath munh dhote waqt kuchh paani uske kapdo par gir gaya tha jiski vajah se uski halke peele rang ki kameez kandho aur chhatiyon par geeli ho gayi thi. Us geeli kameez ke niche uska kaale rang ka bra saaf nazar aa raha tha.

"Mujhe kala nahi pasand" Kallo ne achanak uski taraf dekhte hue kaha

"Matlab?" Rupali ko uski baat ka matlab samajh nahi aaya.

Kallo ne uski chhatiyon ki taraf ishara kiya jahan uski kameez halki se kahin kahin se uski chhatiyon par chipak gayi thi.

"Kaala bra" Kallo ne anguli dikhate hue kaha "Kala pasand nahi hai mujhe"

Rupali ko ek pal ke liye sharam si aa gayi aur usne fauran apni kameez theek ki.

"Toh kala pehenti kyun hai tu?" Rupali ne puchha

"Kala kahan pehna hai" Kallo ne fauran apne girebaan ki taraf dekha hai

"Abhi nahi pehle toh pehna tha" Rupali shararat se muskurate hue boli

Kallo samajh gayi ke uska ishara pehle kab ki taraf tha.

"Kya karun Bibi ji" Kallo boli "Yahan dukaan mein jao toh 3 hi rang milte hain, kala, safed ya cream color"

Uski baat par dono has padi.

"Umar ke hisaab se toh aapke bhi kaafi bade hain" Kallo ne phir uski chhatiyon ki taraf ishara kiya.

Kal ki Rupali jo itne khule tarike se Kallo ko apni chhatiyan dikhane par majboor kar rahi thi aaj apni baat par sharma bethi. Shayad isliye kyunki aaj ishara uske apne jism ki taraf tha.

"Chal ja na" Usne baat taalte hue kaha "Khana khaane de mujhe"

"Aaj nahi dekhogi?" Kallo ne puchha

"Kya?"

"Ye ...." Kallo ne apni dono chhatiyon ko kameez ke uper se pakadte hue kaha.

Ek pal mein sab ulta ho gaya. Jahan Rupali is soch mein thi ke Kallo ko darakar uski chhatiyan dekhegi Kallo ke khud hi kehne par jaise sakte mein aa gayi.

Pehli baar usko ehsaas hua ke aakhir vo ek bachchi thi aur Kallo ek kheli hayi aurat.

"Kya hua malkin?" Kallo ne apni chhatiyan apne haathon mein dabate hue kaha "Aaj nahi dekhoge? Aaj toh ghar par koi hai bhi nahi"

Rupali ke munh se ek bol na phoota. Kallo apni chhatiayn apne haathon mein pakde Rupali ke kareeb aa khadi hui.

"Aapko pasand hain mere?"

Rupali sirf haan mein sar hilakat reh gayi.

"Dekhogi?"

"Rupali ne phir haan mein sar hilaya.

Kallo ne apne haathon se apni kameez ka pallu apni gardan tak utha diya. Safed rang ki bra mein band uski chhaityan ek baar phir Rupali ki aankhon ke saamne aa gayi.

Hamesha ki tarah is baar bhi Rupali chup chap uski chhatiyon par nazar jamakar reh gayi. Dono chhatiyan ba-mushkil bra mein sama rahi thi.

"Kya pasand hai aapko inmen?" Kallo ne puchha

"Kitni badi hain teri" Is baar Rupali ne jawab diya.

'Isse pehle kisi ki dekhi hain aapne?"

Rupali ne saaf jhooth bolte hue inkaar mein apni gardan hila di. Usne apni maan ko poori tarah nangi dekha hua tha par ye baat vo Kallo se toh nahi keh sakti thi.

"Jhooth bol rahi hain aap" Kallo ne kaha toh Rupali ka kaleja munh ko aa gaya.

"Isko kaise pata ke maine apni maan ko nangi dekha hai" Dil hi dil mein Rupali ne socha

"Kyun apni khud ki roz nahi dekhti kya?" Kallo ne haste hue kaha toh Rupali ki jaan mein jaan aayi aur vo bhi has padi.

"Bas apni hi dekhi hain. Mera matlab tha ke maine tere alawa aur kisi aurat ki nahi dekhi"

"Achhe se dekhni hain?" Kallo ne puchha

Rupali ke dil ki dhadkan tez ho chali. Vo jaanti thi ke Kallo ka kya matlab tha. Usne haan mein sar hilaya.

"Lo dekh lo" Kehte hue Kallo ne apni bra ko niche se pakda aur apnichhatiyon ke uper kar diya. Dono nangi chhatiyan bra se bahar nikal aayi.

Rupali ki aankhen khuli reh gayi. Ye sach tha ke vo khud bhi ek ladki thi par apne saamne kisi aurat ko itne kareeb se nangi dekhne ka uska ye pehla mauka tha, khaas taur se tab jabki saamne wali aurat khud use hi dikhane

ke liye nangi ho rahi thi.

Kallo apne haathon se kameez aur bra pakde chup chap Rupali ke saamne khadi rahi aur Rupali uski chhatiyon ko aise dekhne lagi jaise koi research work kar rahi ho. Vo dil hi dil mein Kallo ki chhatiyon aur apni chhatiyon ko

milane lagi.

Uski khud ki chhatiyan ekdam gori thi aur Kallo ki ekdam kaali.

Uski khud ki chhatiyan abhi chhoti thi aur usne abhi bra pehenna shuru hi kiya tha jabki Kallo ki bahut badi badi thi.

Uski khud ki chhatiyan ekdam tani hui thi jabki kallo ki niche ko ludkhi hui thi, shayad bahut badi thi isliye.

Uske khud ke nipples chhote chhote aur brown color ke the jabki Kallo ke bade bade aur kaale rang ke the.

kramashah........................................


raj..
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Re: खूनी हवेली की वासना

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 13:17

खूनी हवेली की वासना पार्ट --27

गतान्क से आगे........................

"ऐसे ही देखती रहोगी क्या?" कल्लो ने सवाल किया तो रूपाली का ध्यान टूटा.

उसने सवालिया नज़र से कल्लो की तरफ देखा.

"च्छुकर नही देखोगी?" कल्लो ने कहा तो रूपाली के दिल की धड़कन तेज़ हो चली. ये सच था के वो खुद ये मंज़र देखना चाहती थी पर उसने देखने से आगे कुच्छ भी नही सोचा था. हाथ लगाने के बारे में तो बिल्कुल भी

नही.

जब कल्लो ने देखा के रूपाली कुच्छ जवाब नही दे रही तो उसने खुद अपने हाथ से रूपाली का हाथ पकड़ा और अपनी छाती पर रख दिया.

रूपाली को समझ नही आया के एक दूसरी औरत की छाती को अपने हाथ में पकड़कर उसे कैसा लग रहा था. कल्लो की बड़ी मुलायम छाती उसके हाथ में थी या यूँ कह लो के उसने बस उसकी छाती पर हाथ रखा हुआ था. वो इतनी बड़ी थी एक उसके हाथ में मुश्किल से समा रही थी. वो बस अपना हाथ वैसे ही रखे खड़ी रही.

"कोई बात नही अच्छे से च्छुकर देख लो. बहुत मंन था ना आपका मेरी देखने का?"

कल्लो ने कहा तो रूपाली ने उसकी पूरी छाती पर हाथ फिराना शुरू कर दिया. वो ऐसे हाथ फिरा रही थी जैसे किसी छ्होटे बच्चे के सामने कोई नयी अजब चीज़ आ गयी हो और वो उसको च्छुकर देख रहा था के ये क्या

है पर समझ नही पा रहा था के क्या करे.

उसका हाथ धीरे धीरे कल्लो की पूरी छाती पर फिरा. फिर उसका ध्यान उस बड़े से काले निपल की तरफ गया और उसने उसको अपनी अंगुलियों के बीच पकड़ लिया.

"आअहह रूपाली बीबी" निपल पकड़ते ही कल्लो के मुँह से आह निकल पड़ी "दबाओ"

"दबाओ?" उसकी बात सुनकर रूपाली ने सोचा "क्या दबाऊं?"

उसके चेहरे को देखकर कल्लो समझ गयी और उसने अपना हाथ रूपाली के हाथ पर रखकर खुद दबाना शुरू कर दिया.

रूपाली को बड़ा अजीब लगा पर वो कल्लो का इशारा समझ गयी. उसको समझ नही आया के दबाकर क्या होना था पर उन बड़ी बड़ी नरम छातियो को दबाने में उसको भी अजीब सा मज़ा आया. उसने अपने एक हाथ से छाती को धीरे धीरे दबाना शुरू कर दिया.

"ज़ोर से दबाओ"

कल्लो के कहने पर रूपाली ने अपने हाथ का दबाव बढ़ा दिया. अचानक कल्लो ने उसका दूसरा हाथ पकड़कर अपनी दूसरी छाती पर रख दिया.

"दोनो दबाओ"

अब रूपाली कल्लो के सामने खड़ी अपने दोनो हाथों से उसकी चूचियाँ दबा रही थी. अजीब सिचुयेशन हो गयी थी. कल्लो उसको और ज़ोर से दबाने को कह रही थी और रूपाली को समझ नही आ रहा था के क्यूँ पर एक अजीब सा मज़ा आ रहा था. उसके हाथ कल्लो की चूचियो में इस तरह जा रहे थे जैसे के वो आटा गूँध रही हो.

"आआहह" कल्लो ने फिर ज़ोर से आह भरी "चूसो"

रूपाली चौंक पड़ी. वो जानती थी के कल्लो क्या कह रही है पर इससे पहले के वो कुच्छ कहती या करती, कल्लो ने उसके सर के पिछे अपना हाथ और आगे को खींचते हुए उसका मुँह अपनी छाती पर दबा दिया.

वो बड़ा सा निपल सीधा रूपाली के मुँह में गया.

"छियीयीयियी" रूपाली फ़ौरन पिछे हटी और ज़ोर से चिल्लाई "छ्ह्ह्ह्हीइ छ्हीइ छ्ही"

वो अपने होंठ ऐसे अपने हाथ से सॉफ करने लगी जैसे कोई बहुत गंदी चीज़ मुँह में चली गयी हो.

उस दिन बात सिर्फ़ इतनी ही बढ़ पाई थी के कल्लो ने अपना निपल रूपाली के मुँह में दे दिया था जिसपर रूपाली को जैसे उल्टी सी आ गयी थी. वो खुद एक लड़की थी जो औरत बनने की कगार पर खड़ी थी और उसने कभी सपने में भी नही सोचा था के उसके मुँह में एक दूसरी औरत का निपल आएगा. हां वो कल्लो की चूचियाँ देखकर उत्तेजित ज़रूर होती थी पर ये शायद प्रक्रतिक था.

एक औरत को यूँ इस तरह से नंगी देखना उसमें सेक्स की भावनाएँ पैदा करता था पर इससे ज़्यादा कुच्छ और नही.

जब रूपाली छि छि करते हुए कल्लो से दूर हो गयी तो कल्लो भी खामोशी से कमरे से बाहर निकल गयी. फिर कुच्छ दिन तक ना तो और कुच्छ हुआ और ना ही कल्लो या रूपाली ने खुद एक दूसरे के करीब आने की कोशिश की. बात भी बस ज़रूरत के हिसाब से होती थी.

उस दिन रूपाली का जनमदिन था. वो 18 साल की हो गयी. 12थ क्लास की एक्षमन्स वो दे चुकी थी और अपने घरवालो को शहर जाकर कॉलेज में पढ़ने के लिए राज़ी भी कर चुकी थी. उसके जनमदिन की खुशी में उसके पिता ने एक पार्टी रखी थी जिसमें काफ़ी बड़ी बड़े लोग आए हुए थे. कुच्छ पॉलिटीशियन, कुच्छ पोलिसेवाले और कुच्छ आस पास के इलाक़े के ठाकुर घरानो के लोग.

उस पार्टी में खुद ठाकुर शौर्या सिंग भी शामिल था. उन्होने जब उस दिन रूपाली को उसका तोहफा दिया था तब रूपाली को कहीं ख्वाबों में भी इस बात का एहसास नही था के यही इंसान आगे चलकर उसका ससुर बनेगा.

सारी शाम पार्टी चलती रही. जब तक लोग धीरे धीरे गये, तब तक रात के 12 बज चुके थे. कल्लो भी उस दिन अपने घर नही गयी थी और पार्टी में मेहमानो के खाने पीने का ख्याल रख रही थी.

जब पार्टी ख़तम हुई तो रूपाली की माँ ने कल्लो को रात वहीं रुक जाने के लिए कहा. आधी रात को अकेले अपने घर जाना एक औरत के लिए ठीक नही था इसलिए कल्लो भी वहीं रुकी. वो पहले भी कई बार ऐसे रात में रुकी थी और किचन में ही चादर बिछाकर सो जाती थी. उस रात भी ऐसा ही हुआ. रूपाली काफ़ी थॅकी हुई थी इसलिए मेहमआनो के जाते ही अपने कमरे में जाकर सो गयी.

उस वक़्त उसकी माँ और कल्लो घर की सफाई में लगे हुए थे.

रात को अचानक एक आहट पर रूपाली की आँख खुली. उसको ऐसा लगा के दरवाज़ा खोलकर कोई उसके कमरे में दाखिल हुआ है. अंधेरा होने की वजह से उसको ये तो नज़र नही आया के कौन है पर कमरे में दीवार पर लगी घड़ी पर उसने नज़र डाली तो देखा के 3 बज रहे हैं. अंधेरे में सिर्फ़ घड़ी के काँटे चमक रहे थे, और कुच्छ नज़र नही आ रहा था.

"माँ?" उसकी मान अक्सर रात को उसके कमरे में आकर देखती के वो ठीक से तो सो रही है. उस रात भी शायद माँ ही आई होगी सोचकर रूपाली ने आवाज़ दी.

कोई जवाब नही आया पर एक साया धीरे से उसके बिस्तर के पास आकर खड़ा हो गया.

"कौन है?" रूपाली ने आँखें मलते हुए कहा

"मैं हूँ बीबी जी" आवाज़ कल्लो की थी.

"क्या हुआ?" रूपाली ने पुछा

"कुच्छ नही" कल्लो ने कहा और वो रूपाली के बिस्तर पर आकर बैठ गयी

रूपाली खुद भी उठकर बैठ गयी और अपने बिस्तर पर लगे स्विच को ढूँढने लगी ताकि बल्ब जला सके. तभी उसको अपने हाथ पर कल्लो का हाथ महसूस हुआ.

कल्लो ने उसका हाथ पकड़कर लाइट जलाने से रोक दिया.

"क्या हुआ?" रूपाली ने फिर पुचछा

"ष्ह" कल्लो ने चुप रहने का इशारा किया और रूपाली का हाथ पकड़कर अपने जिस्म पर रख लिया.

रूपाली को फ़ौरन एहसास हो गया के उसका हाथ कल्लो की छाती पर है.

"क्या कर रही है?" कहते हुए रूपाली ने अपना हाथ वापिस खींचे की कोशिश की पर कल्लो ने उसका हाथ मज़बूती से पकड़कर अपनी छाती पर रखा हुआ था.

"नींद आ रही है मुझे" रूपाली ने फिर अपना हाथ हटाने की कोशिश की.

"बस थोड़ी देर दबा दो बीबी जी" कहते हुए कल्लो ने खुद अपने हाथ से रूपाली के हाथ को अपनी छातियो पर दबाना शुरू कर दिया

"क्यूँ?" रूपाली ने पुछा

"मेरा बहुत दिल कर रहा था इसलिए आपके कमरे में चली आई. बस थोड़ी देर" कल्लो ने रूपाली के थोड़ा करीब आते हुए कहा

वो दोनो रूपाली के बिस्तर के बीच बैठे हुए थे. एक बार फिर कल्लो की छातियो पर अपना हाथ पड़ते ही रूपाली को थोड़ा अच्छा सा लगा. फिर वही बड़ी बड़ी छातियाँ जिन्हें देखकर वो उत्तेजित हो जाती थी उसके हाथ में थी. उसने अपना हाथ को थोड़ा सा छाती पर दबाया.

"आआहह" कल्लो के मुँह से आ निकल गयी "ऐसे ही.... थोड़ा ज़ोर से"

रूपाली ने एक हाथ से कल्लो की छाती को ज़ोर ज़ोर से दबाना शुरू कर दिया. लग रहा था जैसे किसी मुलायम सी चीज़ में उसकी अँगुलिया धस जाती थी.

"दबाती रहो मालकिन" कहते हुए कल्लो खिसक कर थोड़ा और उसके करीब आ गयी. अब वो बिस्तर पर बिल्कुल एक दूसरे के आमने सामने बैठी थी.

रूपाली अपने एक हाथ से अब पूरे ज़ोर से कल्लो की एक छाती को दबा रही थी. अजीब सा मंज़र था. कमरे में बिल्कुल अंधेरा था जिसमें वो एक दूसरे को देख नही सकती थी, बस जिस्म का साया सा ही नज़र आ रहा था. कल्लो ने सारी पहेन रखी थी जिसका पल्लू हटा हुआ था और ब्लाउस के उपेर से रूपाली छाती दबा रही थी. रूपाली ने अपनी एक नाइटी पहेन रखी थी.

थोड़ी देर बाद रूपाली ने खुद ही अपना दूसरा हाथ उठाया और कल्लो की दूसरी छाती पर रख दिया.

"आआहह मालकिन" कल्लो ने आह भारी "कितना मज़ा आ रहा है. जादू है आपके हाथों में, मसल डालो मेरी चूचियाँ"

रूपाली के दिमाग़ में फिर वही सवाल उठा के भला यूँ चूचियाँ डबवाने में क्या मज़ा आ रहा है कल्लो को पर उस वक़्त उसने इस बात पर इतना ध्यान नही दिया. हक़ीकत तो ये थी के यूँ किसी दूसरी औरत के जिस्म को च्छुना उसको अच्छा लग रहा था.

अचानक कल्लो ने अपने हाथ भी अपनी छातियो के करीब लाई और कुच्छ करने लगी. पहले तो रूपाली को समझ नही आया पर अगले पल ही अंदाज़ा हो गया के कल्लो अपना ब्लाउस खोल रही थी. रूपाली ने अपने हाथ पिछे हटा लिए और अंधेरे में कल्लो की तरफ देखने लगी. ज़्यादा कुच्छ नज़र नही आ रहा था पर जब एक सफेद रंग का ब्रा नज़र आया तो रूपाली समझ गयी के कल्लो ने अपना ब्लाउस उतार दिया है.

कमरे में घुप अंधेरा था और उपेर से कल्लो खुद भी बिल्कुल काली थी. रूपाली के सामने जैसे सिर्फ़ एक सफेद रंग की ब्रा ही थी, और कुच्छ दिखाई नही दे रहा था.

"मुझे काले रंग की पसंद नही हैं" उसको कल्लो की बात याद आई.

कुच्छ पल बाद ही वो ब्रा भी अपनी जगह से हटी और बिस्तर पर जा गिरी. रूपाली जानती थी के अब कल्लो उपेर से पूरी नंगी बैठी है.

उसके बिना कल्लो के कुच्छ कहने का इंतेज़ार किए अंदाज़े से अपने हाथ फिर कल्लो के सीने की तरफ बढ़ाए. इस बार उसके हाथ में पूरी तरह से नंगी चूचियाँ आई.

कल्लो की चूचियाँ ऐसे गरम थी जैसे उसको बुखार हो रखा हो. रूपाली के ठंडे हाथ पड़ते ही रूपाली और कल्लो दोनो के जिस्म में करेंट दौड़ गया.

"आआहह छोटी मालकिन" अपने गरम जिस्म पर ठंडे हाथों के पड़ते ही एक पल के लिए कल्लो का जिस्म काँपा "दबाओ"

रूपाली को बताने की ज़रूरत नही थी. वो कल्लो के कहने से पहले ही उसकी चूचियो को इस तरह दबा रही थी जैसे उनमें से पानी निचोड़ने की कोशिश कर र्है हो. अब तक कल्लो उसके काफ़ी करीब आ चुकी थी और उसकी उखड़ी हुई साँसें रूपाली को अपने चेहरे पर महसूस हो रही थी.

अब तक दोनो की आँखें अंधेरे की आदि हो चुकी थी और रूपाली को हल्का हल्का सा नज़र आने लगा था. कल्लो ने अब भी अपनी सारी पहनी हुई थी पर उपेर से पूरी तरह नंगी रूपाली के सामने बैठी हुई थी. उसके. दोनो चूचियाँ रूपाली के हाथों में स्पंज बॉल्स जैसी लग रही थी जिन्हें रूपाली पूरी जान से दबा रही थी.

उसकी चूचियाँ को अंधेरे में निहारती रूपाली का ध्यान फिर एक बार उन बड़े बड़े निपल्स की तरफ गया. पिच्छली बार जब कल्लो ने वो निपल उसके मुँह में डाला था तो रूपाली बुरी तरह बिदक गयी थी और अब भी अगर कल्लो फिर कोशिश करती तो रूपाली शायद फिर घबरा जाती. चूचियाँ दबाते दबाते उसने अपने हाथ निपल्स पर सहलाए तो हैरान हो उठी. कल्लो के दोनो निपल्स इस तरहा से उठे हुए थे जैसे उनके अंदर हवा भर गयी हो.

रूपाली ने कई बार नहाते हुए अपने निपल्स पर हाथ लगाया था पर जहाँ तक उसको पता था, निपल्स दबे हुए और सॉफ्ट होते थे पर उस वक़्त कल्लो के निपल्स एकदम कड़क थे. रूपाली ने दोनो निपल्स को अपनी अंगुलियों के बीच लेकर दबाया.

ऐसा करते ही उसके करीब बैठी कल्लो एकदम आकर उससे सॅट गयी. उसने अपना चेहरा रूपाली के कंधे पर रख दिया और अपने दोनो हाथों रूपाली के पीठ पर रख कर उसको पकड़ लिया.

"जादू है आपके हाथों में ... जादू .. कितनी बार दबवाई हैं मैने पर ऐसा मज़ा कभी नही आया" उसके कंधे पर सर रखे रखे कल्लो ने कहा

क्रमशः........................................

खूनी हवेली की वासना पार्ट --27

gataank se aage........................

"Aise hi dekhti rahogi kya?" Kallo ne sawal kiya toh Rupali ka dhyaan toota.

Usne sawaliya nazar se Kallo ki taraf dekha.

"Chhukar nahi dekhogi?" Kallo ne kaha toh Rupali ke dil ki dhadkan tez ho chali. Ye sach tha ke vo khud ye manzar dekhna chahti thi par usne dekhne se aage kuchh bhi nahi socha tha. Haath lagane ke baare mein toh bilkul bhi

nahi.

Jab Kallo ne dekha ke Rupali kuchh jawab nahi de rahi toh usne khud apne haath se Rupali ka haath pakda aur apni chhati par rakh diya.

Rupali ko samajh nahi aaya ke ek doosri aurat ki chhati ko apne haath mein pakadkar use kaisa lag raha tha. Kallo ke badi mulayam chhati uske haath mein thi ya yun keh lo ke usne bas uski chhati par haath rakha hua tha. Vo itni badi thi ek uske haath mein mushkil se sama rahi thi. Vo bas apna haath vaise hi rakhe khadi rahi.

"Koi baat nahi achhe se chhukar dekh lo. Bahut mann tha na aapka meri dekhne ka?"

Kallo ne kaha toh Rupali ne uski poori chhati par haath phirana shuru kar diya. Vo aise haath phira rahi thi jaise kisi chhote bachche ke saamne koi naya ajab cheez aa gayi ho aur vo usko chhukar dekh raha tha ke ye kya

hai par samajh nahi pa raha tha ke kya kare.

Uska haath dheere dheere Kallo ki poori chaati par phira. Phir uska dhyaan us bade se kaale nipple ki taraf gaya aur usne usko apni anguliyon ke beech pakad liya.

"Aaahhh Rupali Bibi" Nipple pakadte hi Kallo ke munh se aah nikal padi "Dabao"

"Dabao?" Uski baat sunkar Rupali ne socha "Kya dabaoon?"

Uske chehre ko dekhkar Kallo samajh gayi aur usne apna haath Rupali ke haath par rakhkar khud dabana shuru kar diya.

Ruapli ko bada ajeeb laga par vo Kallo ka ishara samajh gayi. Usko samajh nahi aaya ke dabakar kya hona tha par un badi badi naram chhatiyon ko dabane mein usko bhi ajeeb sa maza aaya. Usne apne ek haath se chhati ko dheere dheere dabana shuru kar diya.

"Zor se dabao"

Kallo ke kehne par Rupali ne apne haath ka dabav badha diya. Achanak Kallo ne uska doosra haath pakadkar apni doosri chhati par rakh diya.

"Dono dabao"

Ab Rupali Kallo ke saamne khadi apne dono haathon se uski chhatiyan daba rahi thi. Ajeeb situation ho gayi thi. Kallo usko aur zor se dabane ko keh rahi thi aur Rupali ko samajh nahi aa raha tha ke kyun par ek ajeeb sa maza aa raha tha. Uske haath Kallo ki chhatiyon mein is tarah ja rahe the jaise ke vo aata goondh rahi ho.

"Aaaahhh" Kallo ne phir zor se aah bhari "Chooso"

Rupali chaunk padi. Vo jaanti thi ke Kallo kya keh rahi hai par isse pehle ke vo kuchh kehti ya karti, Kallo ne uske sar ke pichhe apna haath aur aage ko khinchte hue uska munh apni chhati par daba diya.

Vo bada sa nipple sidha Rupali ke munh mein gaya.

"cHHHHHIIIII" Rupali fauran pichhe hati aur zor se chillayi "Chhhhhiii chhhiii chhhii"

Vo apne honth aise apne haath se saaf karne lagi jaise koi bahut gandi cheez munh mein chali gayi ho.

Us din baat sirf itni hi badh paayi thi ke Kallo ne apna nipple Rupali ke munh mein de diya tha jispar Rupali ko jaise ulti si aa gayi thi. Vo khud ek ladki thi jo aurat banne ki kagar par khadi thi aur usne kabhi sapne mein bhi nahi socha tha ke uske munh mein ek doosri aurat ka nipple aayega. Haan vo Kallo ki chhatiayn dekhkar uttejit zaroor hoti thi par ye shayad prakratik tha.

Ek aurat ko yun is tarah se nangi dekhna usmein sex ki bhavnayen paida karta tha par isse zyada kuchh aur nahi.

Jab Rupali chhi chhi karte hue Kallo se door ho gayi toh Kallo bhi khamoshi se kamre se bahar nikal gayi. Phir kuchh din tak na toh aur kuchh hua aur na hi Kallo ya Rupali ne khud ek doosre ke kareeb aane ki koshish ki. Baat bhi bas zaroorat ke hisaab se hoti thi.

Us din Rupali ka janamdin tha. Vo 18 saal ki ho gayi. 12th class ki examns vo de chuki thi aur apne gharwalo ko shehar jakar college mein padhne ke liye raazi bhi kar chuki thi. Uske janamdin ki khushi mein uske pita ne ek party rakhi thi jismein kaafi badi bade log aaye hue the. Kuchh politician, kuchh policewale aur kuchh aas paas ke ilaake ke thakur gharano ke log.

Us party mein khud Thakur Shaurya Singh bhi shaamil tha. Unhone jab us din Rupali ko uska tohfa diya tha tab Rupali ko kahin khwabon mein bhi is baat ka ehsaas nahi tha ke yahi insaan aage chalkar uska sasur banega.

Saari sham party chalti rahi. Jab tak log dheere dheere gaye, tab tak raat ke 12 baj chuke the. Kallo bhi us din apne ghar nahi gayi thi aur party mein mehmaano ke khaane peene ka khyaal rakh rahi thi.

Jab party khatam hui toh Rupali ki maan ne Kallo ko raat vahin ruk jaane ke liye kaha. Aadhi raat ko akele apne ghar jana ek aurat ke liye theek nahi tha isliye Kallo bhi vahin ruki. Vo pehle bhi kai baar aise raat mein ruki thi aur kitchen mein hi chadar bichhakar so jaati thi. Us raat bhi aisa hi hua. Rupali kaafi thaki hui thi isliye mehmano ke jaate hi apne kamre mein jakar so gayi.

Us waqt uski maan aur Kallo ghar ki safar mein lage hue the.

Raat ko achanak ek aahat par Rupali ki aankh khuli. Usko aisa laga ke darwaza kholkar koi uske kamre mein daakhil hua hai. Andhera hone ki vajah se usko ye toh nazar nahi aaya ke kaun hai par kamre mein diwar par lagi ghadi par usne nazar daali toh dekha ke 3 baj rahe hain. Andhere mein sirf ghadi ke kaante chamak rahe the, aur kuchh nazar nahi aa raha tha.

"Maan?" Uski maan aksar raat ko uske kamre mein aakar dekhti ke vo theek se toh so rahi hai. Us raat bhi shayad maan hi aayi hogi sochkar Rupali ne aawaz di.

Koi jawab nahi aaya par ek saya dheere se uske bistar ke paas aakar khada ho gaya.

"Kaun hai?" Rupali ne aankhen malte hue kaha

"Main hoon Bibi ji" Aawaz Kallo ki thi.

"Kya hua?" Rupali ne puchha

"Kuchh nahi" Kallo ne kaha aur vo Rupali ke bistar par aakar beth gayi

Rupali khud bhi uthkar beth gayi aur apne bistar par lage switch ko dhoondhne lagi taaki bulb jala sake. Tabhi usko apne haath par Kallo ka haath mehsoos hua.

Kallo ne uska haath pakadkar light jalane se rok diya.

"Kya hua?" Rupali ne phir puchha

"Shhhhhh" Kallo ne chup rehne ka ishara kiya aur Rupali ka haath pakadkar apne jism par rakh liya.

Rupali ko fauran ehsaas ho gaya ke uska haath Kallo ki chhati par hai.

"Kya kar rahi hai?" Kehte hue Rupali ne apna haath vaapis khinche ki koshish ki par Kallo ne uska haath mazbooti se pakadkar apni chhati par rakha hua tha.

"Neend aa rahi hai mujhe" Rupali ne phir apna haath hatane ki koshish ki.

"Bas thodi der daba do Bibi Ji" Kehte hue Kallo ne khud apne haath se Rupali ke haath ko apni chhatiyon par dabana shuru kar diya

"Kyun?" Rupali ne puchha

"Mera bahut dil kar raha tha isliye aapke kamre mein chali aayi. Bas thodi der" Kallo ne Rupali ke thoda kareeb aate hue kaha

Vo dono Rupali ke bistar ke beech bethe hue the. Ek baar phir Kallo ki chhatiyon par apna haath padte hi Rupli ko thoda achha sa laga. Phir vahi badi badi chhatiyan jinhen dekhkar vo uttejit ho jaati thi uske haath mein thi. Usne apna haath ko thoda sa chhati par dabaya.

"Aaaahhhh" Kallo ke munh se aah nikal gayi "Aise hi.... thoda zor se"

Rupali ne ek haath se Kallo ki chhati ko zor zor se dabana shuru kar diya. Lag raha tha jaise kisi mulayam si cheez mein uski anguliyan dhas jaati thi.

"Dabati raho maalkin" Kehte hue Kallo khisak kar thoda aur uske kareeb aa gayi. Ab vo bistar par bilkul ek doosre ke aamne saamne bethi thi.

Rupali apne ek haath se ab poore zor se Kallo ki ek chhati ko daba rahi thi. Ajeeb sa manzar tha. Kamre mein bilkul andhera tha jismein vo ek doosre ko dekh nahi sakti thi, bas jism ka saya sa hi nazar aa raha tha. Kallo ne saaree pehen rakhi thi jiska pallu hata hua tha aur blouse ke uper se Rupali chhati daba rahi thi. Rupali ne apni ek nighty pehen rakhi thi.

Thodi der baad Rupali ne khud hi apna doosra haath uthaya aur Kallo ki doosri chhati par rakh diya.

"Aaaahhh malkin" Kallo ne aah bhari "Kitna maza aa raha hai. Jadoo hai aapke haathon mein, Masal daalo meri chhatiyan"

Rupali ke dimag mein phir vahi sawal utha ke bhala yun chhatiyan dabvane mein kya maza aa raha hai Kallo ko par us waqt usne is baat par itna dhyaan nahi diya. Haqeeat toh ye thi ke yun kisi doosri aurat ke jism ko chhuna usko achha lag raha tha.

Achanak Kallo ne apne haath bhi apni chhatiyon ke kareeb laaye aur kuchh karne lage. Pehle toh Rupali ko samajh nahi aaya par agle pal hi andaza ho gaya ke Kallo apna blouse khol rahi thi. Rupali ne apne haath pichhe hata liye aur andhere mein Kallo ki taraf dekhne lagi. Zyada kuchh nazar nahi aa raha tha par jab ek safed rang ka bra nazar aaya toh Rupali samajh gayi ke Kallo ne apna blouse utaar diya hai.

Kamre mein ghup andhera tha aur uper se Kallo khud bhi bilkul kaali thi. Rupali ke saamne jaise sirf ek safed rang ki bra hi thi, aur kuchh dikhai nahi de raha tha.

"Mujhe kaale rang ki pasand nahi hain" Usko Kallo ki baat yaad aayi.

Kuchh pal baad hi vo bra bhi apni jagah se hati aur bistar par ja giri. Rupali jaanti thi ke ab Kallo uper se poori nangi bethi hai.

Uske bina Kallo ke kuchh kehne ka intezaar kiye andaze se apne haath phir Kallo ke seene ki taraf badhaye. Is baar uske haath mein poori tarah se nangi chhatiyan aayi.

Kallo ki chhatiyan aise garam thi jaise usko bukhar ho rakha hao. Rupali ke thande haath padte hi Rupali aur Kallo dono ke jism mein current daud gaya.

"Aaaahhh choti malkin" Apne garam jism par thande haathon ke padte hi ek pal ke liye Kallo ka jism kaanpa "Dabao"

Rupali ko batane ki zaroorat nahi thi. Vo Kallo ke kehne se pehle hi uski chhatiyon ko is tarah daba rahi thi jaise unmein se pani nichodne ki koshish kar rhai ho. Ab tak Kallo uske kaafi kareeb aa chuki thi aur uski ukhdi hui saansen Rupali ko apne chehre par mehsoos ho rahi thi.

Ab tak dono ki aankhen andhere ki aadi ho chuki thi aur Rupali ko halka halka sa nazar aane laga tha. Kallo ne ab bhi apni saree pehni hui thi par uper se poori tarah nangi Rupali ke saamne bethi hui thi. Uske dono chhatiyan Rupali ke haathon mein sponge balls jaisi lag rahi thi jinhen Rupali poori jaan se daba rahi thi.

Uski chhatiyon ko andhere mein niharti Rupali ka dhyaan phir ek baar un bade bade nipples ki taraf gaya. Pichhli baar jab Kallo ne vo nipple uske munh mein dala tha toh Rupali buri tarah bidak gayi thi aur ab bhi agar Kallo phir koshish karti toh Rupali shayad phir ghabra jaati. Chhatiyan dabate dabate usne apne haath nipples par sehlaye toh hairan ho uthi. Kallo ke dono nipples is tarha se uthe hue the jaise unke andar hawa bhar gayi ho.

Rupali ne kai baar nahate hue apne nipples par haath lagaya tha par jahan tak usko pata tha, nipples dabe hue aur soft hote the par us waqt Kallo ke nipples ekdam kadak the. Rupali ne dono nipples ko apni anguliyon ke beech lekar dabaya.

Aisa karte hi uske kareeb bethi Kallo ekdam aakar usse sat gayi. Usne apna chehra Rupali ke kandhe par rakh diya aur apne dono haathon Rupali ke peeth par rakh kar usko pakad liya.

"Jadoo hai aapke haathon mein ... jadoo .. Kitni baar dabvayi hain maine par aisa maza kabhi nahi aaya" Uske kandhe par sar rakhe rakhe Kallo ne kaha

kramashah........................................