खानदानी चुदाई का सिलसिला

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rajaarkey
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Re: खानदानी चुदाई का सिलसिला

Unread post by rajaarkey » 30 Dec 2014 03:06

कुच्छ सेकेंड तक सब शांत रहा. कोई हरकत नही हुई. 2 आँखें बाबूजी के आधे नंगे बदन को घूर रही थी. ढलते हुए सूरज की रोशनी खिड़की से अंदर उनके बदन पे थी और उनका कसा हुआ बदन गम्छे में बहुत सेक्सी लग रहा था. उनकी टाइट गांद की शेप को वो दोनो आँखें गौर से घूर रही थी.

''अररी कम्मो पिला दे जल्दी से अपने रस से भरी चाइ ...सुबह से अकेला हूँ ....आजा तेरे होंठो से पी लूँ ....रात का गुज़ारा हो जाएगा....'' बाबूजी अब भी काग़ज़ को देखते हुए बोले. अचानक से उन्हे चाइ की चुस्की लेने की आवाज़ सुनाई पड़ी और वो खिल उठे. मंद मंद मुस्कुराते हुए पिछे मुड़े तो मुस्कान की जगह मूह खुला का खुला रह गया. सामने मुन्नी खड़ी थी..........उसकी नज़रें उनके चेहरे पे थी और हाथों में कप जिसे वो साइड टेबल पे रखने जा रही थी. मुन्नी का चेहरा भी एक दम से बदल गया. पहले अश्चर्य और फिर डर के भाव उसके चेहरे पे आ गए. कम्मो ने उसे कमरे में भेज के ग़लती कर दी थी. उसपे बड़ी ग़लती ये हुई कि कमरे में घुसते हुए उसने कुच्छ कहा नही....बाबूजी का आधा नंगा बदन देख के वो शर्मा गई थी ...उसपे बाबूजी ने जो आदेश उसे दे दिया उसको पूरा करना एक और बड़ी ग़लती हुई......पर वो भी क्या करती ...पहली ग़लती की वजह से उसने बाबूजी की बात मान के चुप चाप कमरे से जाना ठीक समझा.

उसे उम्मीद नही थी कि बाबूजी कम्मो से इस तरीके की बातें भी करते होंगे...और उपर से जो उन्होने बाद में कहा...रात वाली बात....हाइईइ दैयाआ.....क्या ये बाबू ...और कम्मो....हाीइ राअंम्म.... इसी पेशोपश में वो कप रख रही थी कि बाबूजी मूड गए.

''तू...यहाँ...कम्मो कहाँ है.....तू क्या कर रही है.....?'' बाबूजी अचानक से सकपका गए और गुस्से में थे. उनका गुस्सा देख के मुन्नी और भी डर गई...और सिर झुका के कमरे से बाहर जाने लगी....

''रुक्क वहीं.....तू यहाँ क्या करने आई थी....?? कम्मो क्यों नही आई ...??'' बाबूजी गुस्से में थे..

''जी वो ..जी ...जी कम्मो आटा गूँथ रही थी सो उसने मुझे कहा.....जी मैं..जी ग़लती हो गई ...मांफ कर दीजिए....'' मुन्नी रोने की कगार पे थी. उसका चेहरा ज़मीन की तरफ था..जिस तरीके से वो खड़ी थी उससे सॉफ पता चल रहा था कि वो बहुत डरी हुई है. उसका चेहरा बाबूजी की नज़र से दूर था और उसका बदन का साइड उनकी तरफ. हाथ और होंठ दोनो काँप रहे थे.

''तूने जो सुना ...वो इस कमरे से बाहर नही जाना चाहिए...समझ गई...'' बाबूजी उसकी तरफ बढ़ते हुए बोले. ''और हां अगर ये बात बाहर गई तो ख़याल रखना की मैं बहुत कुच्छ कर सकता हूँ...''

''जी...आपने क्या कहा मैने कभी सुना ही नही...आपने मुझसे कुच्छ नही कहा...और मैने कुच्छ नही सुना....आप गुस्सा मत हूओ..ऊवंन्न..ऊंन...'' कहते हुए मुन्नी हिचकियाँ लेते हुए रोने लगी. बाबूजी उससे 2 फीट की दूरी पे थे. उसका रोना देख के उनका गुस्सा कम हो गया और उनका मन पसीज गया. बाबूजी को अब मुन्नी के रूप में एक साधारण पर आकर्षक अबला नज़र आ रही थी. कम्मो की ग़लती की सज़ा उसको देना उन्हे ठीक नही लगा. पर अपनी इज़्ज़त का भी सवाल था.

''रोना बंद कर ...और ये ले ...तेरे लिए...अगर चुप रहेगी तो और मिलेगा ..पर अगर बोली तो...खैर नही...'' बाबूजी ने अलमारी में से एक बढ़िया सूट निकाल के उसे दिया. ये वही सूट था जो उन्होने कम्मो के लिए बचा के रखा था. बाबूजी ने सूट वाला हाथ आगे बढ़ाया तो मुन्नी ने सिर को तोड़ा उपर किया. उसकी नज़रे बाबूजी के चेहरे पे गई. बाबूजी अब थोड़े मुस्कुरा रहे थे. उन्हे मुस्कुराता देख मुन्नी की साँसे थोड़ी संभली और उसका सूबकना बंद हुआ. अपने राइट हॅंड से उसने अपने आँसू पोन्छे और फिर दोनो हाथों से थोडा सिर झुका के सूट लिया. अब वो बाबूजी को फेस कर रही थी. सूट को पकड़ते ही वो समझ गई कि वो कितना कीमती था. अचानक उसके मन में क्या सूझा कि वो सूट को पकड़े हुए बाबूजी के पैरों में गिर गई.

''बाबूजी ..आप गुस्सा मत होना...हमसे ग़लती हो गई...आप निसचिंत रहिए हम आपकी इज़्ज़त पे आँच नही आने देंगे...हम कसम खाते है आपके पैर च्छू के कि ये बात हमारे साथ हमारी चिता तक जाएगी. आप बस हम पर कोई गुस्सा ना कीजिएगा नही तो हमारी ज़िंदगी नरक बन जाएगी....बाबूजी...'' मुन्नी उनके पावं में गिरी हुई गिड़गिदा रही थी. उसका सिर बाबूजी के गम्छे में छुपे उनके हथियार से मात्र 6 इंच की दूरी पे था. उसके मन में सिर्फ़ डर था और उसको ये एहसास भी नही था कि उसकी स्तिथि क्या है..पर बाबूजी को अब तक अपने पे पूरा कंट्रोल आ चुका था.

rajaarkey
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Re: खानदानी चुदाई का सिलसिला

Unread post by rajaarkey » 30 Dec 2014 03:07


उनके सामने जो गांद थी वो गथीली नही थी पर उसकी शेप बहुत अच्छी थी. पतली सी कमर और फिर उपर की तरफ पीठ का कुच्छ नंगा हिस्सा. उसके उपर लहराती हुई एक लंबी चोटी. चोटी इतनी लंबी थी क़ी गांद की दरार में घुसी जा रही थी. बाबूजी ने अपना सिर थोड़ा पिछे किया और नीचे देखा तो उनका लंड अब हरकत में आ चुका था. घम्छे में अब एक छ्होटा सा तंबू बन चुका था. पैरों पे काँपते हुए हाथ उनके शरीर में गर्मी पैदा कर रहे थे. सिर को पिछे करने से झुकी हुई मुन्नी के मम्मो की दरार दिखने लगी थी. साँवले से मम्मे सखी की याद दिला रहे थे....मेरी प्यारी बहू सखी...कितने दिन हो गए....हाऐ...सोचते हुए लंड की अंगड़ाई बढ़ने लगी. बाबूजी को कुच्छ सूझा.

''ह्म्‍म्म इधेर उपर देख...मेरी तरफ....जा तुझे मांफ किया....पर जो तूने वादा किया है उसे भूलना नही...और मैं वादा तोड़ने वालों को नही भूलता...'' बाबूजी ने एक उंगली दिखाते हुए आख़िरी बार मुन्नी को चेताया. मुन्नी उनके पैरों को पकड़े हुए उनके चेहरे को देख रही थी. मूह उपर करने से उसकी पतली गर्दन खिंच गई थी और मम्मे थोड़े और क्लियर नज़र आने लगे थे. छाती बाहर को खिंची हुई थी और उसपे उसके आँसुओं की ताज़ा बूँदें गिरी हुई थी.

''बाबूजी कसम खाई है..तोड़ेंगे नही...जान ले लेना चाहे..इससे बाद के और क्या कहें...बाकी जो माँगो दे देंगे...बस कोई गुस्सा ना करना...हमारी ज़िंदगी आपके हाथों में है....''मुन्नी फिर से थोड़ी घबराई और उसके आँसू टपकने लगे.

''चल पगली मैं इतना भी बुरा नही हूँ...फिलहाल तो तू बस एक काम कर ...ये जो चाइ तूने मीठी की है...इसे अपने हाथों से मुझे पिला दे....'' बाबूजी ने उसके कंधे पकड़ के उसे धीरे धीरे उपर उठाया और एक हाथ कंधे पे रखते हुए दूसरे हाथ से उसके आँसू पोन्छे. अब उनके चेहरे पे मुस्कुराहट थी. मुस्कुराहट जीत की...मुस्कुराहट इस एहसास की कि एक और नई कम्मो का जनम हुआ...मुस्कुराहट ये सोच के ...मुन्नी के बदन से आती हुई खुश्बू जो कि जल्दी ही उनके बदन में समा जाने वाली थी...बाबूजी की मुस्कुराहट और उनके आदेश का मुन्नी पे ज़बरदस्त प्रभाव पड़ा. वो शर्मा गई और सिर झुका के कसमसा उठी. बाबूजी ने मौका देख के उसके कंधे पकड़ के उसे धीरे धीरे अपनी ओर खींच लिया.

''पीला दे ना चाइ....वोई तो पिलाने आई थी...देखूं तेरे होंठो की लगी हुई चाइ तेरे हाथों से कितनी मीठी लगती है....'' बाबूजी ने तकरीबन उसे अपने से चिपका लिया था और उसकी ठोडी को पकड़ के उसके मूह को उपर कर दिया था. शरम के मारे मुन्नी की आँखें आधी बंद थी और चेहरे पे मुस्कान. उसका तीखा नैन नक्श बाबूजी को लुभा रहे थे. बाबूजी और उसके बदन की दूरी सिर्फ़ उसके हाथों में पकड़े हुए सूट की वजह से थी ...वो हाथ जो बाबूजी के लंड के बेहद नज़दीक थे. हाथो का पिच्छला हिस्सा गम्छे को छ्छू रहा था.

''धाातत्ट ..बाबूजी ...आप कैसी बात करते हैं...आप हमारी झूठी चाई पिएँगे...नही नही....ऐसा नही हो सकता ...हम दूसरी लाते है....'' मुन्नी की नज़र और सिर फिर से झुक गए थे. उसने बाबूजी से अलग होते हुए बाहर जाने की कोशिश की ...उसके अलग होते ही सूट पे लगे हुए शीशे में बाबूजी के गम्छे की किनारी अटक गई ...और मुन्नी के हाथ से सूट छितक गया. सूट के वज़न से बाबूजी का गमछा खुल गया और उनका आधा खड़ा हथियार नग्न हो गया. बाबूजी को उसकी चिंता नही थी...सब कुच्छ इतना अचानक और स्पीड से हो रहा था...उन्होने हाथ बढ़ा के मुन्नी की कलाई पकड़ ली और उसे अपनी तरफ खींचा...मुन्नी के कदम दरवाज़े की ओर बढ़ रहे थे और वो लड़खड़ा गई. बाबूजी का दूसरा हाथ उसकी बगल में पहुँचा और उससे सपोर्ट दी. हाथ के दबाव से मम्मे भी नही बचे....नंगे बाबूजी के बदन से अब मुन्नी का सूट रगड़ खा रहा था और उसकी आँखों में थोरे अश्चर्य और थोड़ी मस्ती के भाव थे.

बाबूजी ने आँखें पढ़ ली ...लोहा गरम था...बस चोट करनी बाकी थी...

''क्यों री...अभी तो इन्ही होंठो से चुस्की लेके तू चाइ यहाँ छोड़ के जा रही थी...अब पिलाने में दिक्कत है....पिला दे ना...क्यों तडपा रही है...वैसे भी तेरे हाथ खाली अच्छे नही लग रहे ...'' बाबूजी ने कसमसाती हुई मादक मुन्नी का हाथ अपने लंड पे रगड़ दिया. हथेली में गरम लंड का एहसास पाते ही मुन्नी पिघल गई...होंठ काँप उठे और गला सूख गया. हाथ को झटकने की कोशिश की पर बाबूजी की पकड़ मज़बूत थी. हथेली लगतार लंड को रगड़ रही थी. मुन्नी ने एक बार हाथ हटाते हुए मुट्ठी भिचने की कोशिश की पर हाथ तो हटा नही ...उसकी जगह भींची हुई मुट्ठी में लंड ज़रूर आ गया...

''हाऐी दैयाअ.....बाबूजी....जाने दो नाअ.....क्या कर रहे हो......मत करो बाबूजी......ग़लत हो जाएगा.....जाने दो ..कम्मो और शारदा क्या सोचेंगी....?? बाबूजी मिन्नत करते हैं...जाअनए....??'' मुन्नी हटने की कोशिश में अपने हाथ को कभी खोल रही थी तो कभी बंद कर रही थी. लंड फूँकार मार रहा था. रोड की तपिश उसके बदन को झुलसा रही थी. होंठ और भी काँपने लगे थे. नंगे बदन रगड़ खाने से सूट में धकि चूचियाँ सख़्त हो गई थी और दूसरे हाथ का दबाव अब दबाव नही रहा था. मम्मो को साइड से नोचा जा रहा था.

''उम्म अच्छा चल चाइ नही पिलाएगी तो ना सह ...कम से कम इन होंठो की मिठास तो चखवा दे....'' बाबूजी ने कलाई को झटका दिया और लंड छुड़ाते हुए बाजू को मुन्नी की पीठ की तरफ मोड दिया. दूसरा हाथ अब मम्मे को छोड़ गर्दन के पिछे चला गया था और सिर को अपनी तरफ खींच लिया. बाबूजी ने अपनी मूच्छों से सजे होंठ मुन्नी के काँपते हुए होंठो पे रख दिए और चूसने लगे. बाबूजी का एक्सपीरियेन्स ज़बरदस्त था और मुन्नी के होंठ उस एक्षपेरेंसे को महसूस कर रहे थे. 5 सेकेंड में ही उसके होंठो पे थूक की लार लगी हुई थी और उसकी सस्ती सी लिपस्टिक बाबूजी के होंठो के आस पास फैली हुई थी. होंठ बंद नही रह पाए और कसमासाते हुए अपने हाथ को छुड़ाने की कोशिश में उसका मूह खुलता चला गया. जीभ से जीभ की बात शुरू हो गई. चूचियाँ अब खुले आम बाबूजी की छाती में धँस रही थी..7 इंच का मूसल चूत के मुहाने पे दस्तक दे रहा था.

''ब्बाआब्ब्ब्बुऊुज्जिि.........उउंम्म.......माअत्त्त्त्त्त कार्रूऊ....उउम्म्म्मह...उम्म्म्ममह......करूऊओ.......मेरे बाबूजी.......और कर .उउउम्म्म्मममह उउम्म्म्मह.....स्लुउउररुउउप्प्प....उउम्म्म्ममह.....ऊहह....'' बाबूजी के हाथ से अपनी कलाई छ्छूटते ही मुन्नी अब उनकी गर्दन पे अपनी बाजुओं का हार डाले उनका पूरा साथ दे रही थी. बाबूजी के दोनो हाथ अब उसके चूचों को पकड़े हुए थे....उसकी चूत का उभार रह रह के उनसे रगड़ खा रहा था...थूक की लार दोनो के होंठो से बह रही थी....

'''ऊऊऊऊओह बबुऊुजिइीइ.....उउम्म्म्म...उम्म्म्ममह...उम्म्म्मम.....चूवस लो मेरे को.......उउम्म्म्ममम......चाइ पिलो.....मेरे होंठो से ....और तरो ताज़ा....हो जाओ.....फिर तगड़े तरीके से .......उउउम्म्म्मह मेरी....उउउम्म्मह ऊओह हाआंन्‍णणन्....'' बाबूजी के होंठो को चूस्ते हुए मम्मे दब्वाते हुए अब मुन्नी पूरी पागल हो गई थी. उसके बदन का कोई भी हिस्सा अब बिना रगडे नही रहा था. बाबूजी ने सूट के उपर से उसकी गांद दबोची हुई थी और उसे अपने लंड की तरफ दबाए हुए थे.

''क्या मेरी मुन्नी क्या कर दूओ....तेरी क्या...तरो ताज़ा होके ...क्या करूँ तेरा....'मूह से बोल ....सुना मुझे....क्या ....'' बाबूजी उसकी गर्दन और कानो को बेतहाशा चूमे जा रहे थे.

''बबुउउउ.....ऊऊहह ये दे दे......दे दे ....चाइ हो चुकी...अब रुक्क मत......दे ना इसससे......यहीं ...अभी के अभी.......डाालल्ल्ल्ल्ल्ल....मरी जा र्है हूओन........ऊओह...उउउम्म्मह ...उउउर्र्घह....यहाँ दे ईसीए...''' मुन्नी ने लंड पकड़ के 4 - 5 बार उसे निचोड़ा....लंड का सूपड़ा और भी फूल गया....और फूले हुए सुपादे को चूत पे घिस दिया.
क्रमशः................................


rajaarkey
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Re: खानदानी चुदाई का सिलसिला

Unread post by rajaarkey » 30 Dec 2014 03:07







Sarla ke dimaag men sirf Sujit ka kaala lund ghoom raha tha. 9 inch ka solid kaala mota moosal aur usme se nikalti veerya ki pichkaarian jo ki Sarla ke muh men utar rahi thi...aur Sarla ki jeebh uske tope ko chaat rahi thi...uske tope ki aankh se latki hui aakhiri boonden uski jeebh kured kured ke apne hontho pe laa rahi thi....uuufffff...Suuu...jjjiiiittt......dedd....ddoooo kaaale....lunnndddd....ka rass...anyas hi Sarla ke muh se jharte hue nikal gaya......awaaz bahut dabi hui thi par itni bhi nahi ki Sanjay ko sunaai na de. Gaadi ke AC ke halke shor men Sujit ka naam aur kaale shabd ko Sanjay ne bhali bhaanti samjh lia aur uska dhyaan Sarla ke kaamte hue chootar pe chala gaya. Kampan zabardast thi par Sarla usse bahut control karne ki koshish kar rahi thi. Ek aakhiri dabaav men choot ki pichkaari hi chhoot gai aur Sarla ek last baar halke se karah ke sust pad gai. Kareeb 10 min tak wo waise hi sust padi rahi aur phir use thode hosh aaya. Ghar ab 10 - 15 min ki doori pe tha. Use apne aap ko sambhalna tha. Halke halke angraai lete hue usne neend se jaagne ka naatak kia. Nipple ab bhi kuchh kuchh kade the aur angraai lete hue usne baajuon ke sir ke pichhe kheencha to unka ubhaar achhe se nazar aane laga.

3 - 4 minute ki neend ki khumaari ke baad usne Sanjay ki taraf gaur se dekha. Kisi bhai haav bhaav se Sanjay ne yeh nahi show hone dia ki usko aaj apni saas ki chudaas ka pata chal gaya. Agar Sarla dhyaan se dekhti to use Sanjay ki gode men pada hand towel aur uske niche ka ubhaar nazar aata. par shayad wo apne ko sambhaalne men jiada vyast thi. Sanjay ka dimaag ab shaant ho chuka tha. Sujit ka naam aur uske kaale lund ka zikar ... uspe yaad aai baaten ..Kiran ka uske darwaaze pe khade hoke Sarla ka naam pukarna ..ye sab Sanjay ko yaad aa gaya tha. Uski chudaas saas ne raat ko achha khel rachaya tha aur phir us khel ko jam ke dekha bhi tha.. ab iski chudaas nikalne ke lie Sanjay ke man men ek khel ki rachna shuru ho gai thi.

Ghar aa chuka tha aur Babuji aur Kammo ne bahut garam joshi ke sath sabka swaagat kia. Kammo kaafi khush thi aur uske badan pe ek keemati suit kisi se bhi chhupa nahi. Babuji ki moonchh aaj kuchh ziada kadak lagg rahi thi ..jaise ki uspe unhone koi hair fixer lagaya ho......ghar men kuchh alag tha par kyaa ye nahi pata tha....

Bachhe chale gae aur uske baad Babuji achanak se akelapan mehsoos karne lage. Kammo ne Ramesh ki shaadi ke lie chhutti li thi. Babuji ka man nahi lag raha tha. Socha kisi se mil aae par phir socha ki ghar baithe kuchh business ka kaam dekh len. Kaam karte karte dopahar se kab shaam hui pata hi nahi chala. Wahin sofa pe baithe baithe so gae. Achanak se darwaaze pe kisi ne dastak di. Aadhi neend men Babuji ne darwaza khola to dekha ki Kammo 2 auraton ke sath wahan khari hai. Dikhne men dono uske jaisi niche ghar ki thi. Kammo ne aaj Babuji ka dia suit pehna hua tha. Un dono ke kapde Kammo ke saamne fike lag rahe the.

''Arri Kammo tu to shaadi pe thi na...yahan kaise phir ...aur ye dono kaun hain...'' Babuji thode achambhit the. Unhone apni dhoti ko theek se adjust nahi kia tha aur banian bhi pet ke aas paas ikatthi hui padi thi. Babuji waapis mud gae aur dhoti ko adjust karte hue apne business ke kagaz ikatthe karne lage.

''Babuji ye dono meri sahelian hain...jinke yahan shaadi hai unki rishtedaar par ek tarah se meri muh boli behne hain...iska naam Sharda hai aur ye hai Munni. Shaadi men hum log baaten kar rahe the to mujhe dhyaan aaya ki kal sab aa jaenge aur main khaane ki koi taiyaari nahi ki hai. Shaadi men raat der hogi so main subah bhi late aaungi. Islie abhi chali aai aur ye dono bhi ...kehti hain dekhe ki kaun ghar men kaam karti hoon main jahan se mujhe itna badiya suit mila hai....jalti hain mujhse dono .....'' Kammo ne Babuji ke nazdeek khare khare ithhlaate hue kaha. Uske chehre pe ek kutil si muskaan thi jo uski sahelian to dekh rahi thi par Babuji ne gaun nahi kia.

''Achha theek hai ja jaake kaam kar de aur mere lie chai bana de... main nahane ja raha hoon...chai kamre men de dena....15 min men ...aur haan chai men cheeni mat daalna.....'' Achanak Kammo ko wahan dekh ke Babuji ka mood sexy ho gaya. Kammo pe suit bahut khil raha tha aur uski chhattion ki daraar aur uske chootar bahut achhe se ubhar ke aa rahe the. Waise dikhne men Sharda aur Munni bhi buri nahi thi. Dono ne suit hi pehne the par saste aur bharkeele..dono hi maang men sindoor lagae hue thi ... Sharda kad men chhoti thi aur gatheeli...uske mamme kaafi bade the. Uske hath aur bajuon ko dekh ke lagta tha ki jaise bahut mehnat waale kaam karti hai. Munni kad men theek thi aur patli bhi .....dikhne men saanwli thi par nain naksh achhe teekhe the... uska shareer dubla tha aur choochian bhi chhoti thi...

Babuji ne apne kaagaz samete aur nahane chale gae. Kamre ka darwaze ki kundi nahi lagi thi. Nahane ke baad Babuji ne apna gamcha apne shareer pe bandha aur kamre men aa gae. Achanak unhe kuchh yaad aaya wur wo phir se business ke kagaz leke khidki ke paas khade hoke dekhne lage. Itne men darwaaze pe knock hui. Babuji ko yaad aaya ki chai mangwaai thi ...so unhone andar aane ka aadesh dia aur phir se paper dekhne lage. Chai ka cup plate side table pe rakhne ki awaaz hui.

''Arri chai men shakkar daalne se mana kia tha ....daali to nahi na...chal ab ek kaam kar ...apne hontho se ek ghoont le le ..apne aap meethi ho jaegi... '' Babuji ne Kammo ko aadesh dia. Dimag 2 taraf chal raha tha..kaagaz saamne tha aur Kammo ke maadak badan aur roop ki picture...

Kuchh second tak sab shaant raha. Koi harkat nahi hui. 2 aankhen Babuji ke aadhe nange badan ko ghoor rahi thi. Dhalte hue suraj ki roshni khidki se andar unke badan pe thi aur unka kasa hua badan gamche men bahut sexy lag raha tha. Unki tight gaand ki shape ko wo dono aankhen gaur se ghoor rahi thi.

''Arri Kammo pila de jaldi se apne ras se bhari chai ...subah se akela hoon ....aaja tere hontho se pee loon ....raat ka guzara ho jaega....'' Babuji ab bhi kagaz ko dekhte hue bole. Achanak se unhe chai ki chuski lene ki awaaz sunai padi aur wo khil uthe. Mand mand muskuraate hue pichhe mude to muskaan ki jagah muh khula ka khula reh gaya. Saamne Munni khadi thi..........uski nazren unke chehre pe thi aur hathon men cup jise wo side table pe rakhne ja rahi thi. Munni ka chehra bhi ek dam se badal gaya. Pehle ashcharya aur phir darr ke bhav uske chehre pe aa gae. Kammo ne use kamre men bhej ke galti kar di thi. Uspe badi galti ye hui ki kamre men ghuste hue usne kuchh kaha nahi....Babuji ka aadha nanga badan dekh ke wo sharma gai thi ...uspe Babuji ne jo aadesh use de dia usko poora karna ek aur badi galti hui......par wo bhi kya karti ...pehli galti ki wajah se usne Babuji ki baat maan ke chup chap kamre se jaana theek samjha.