नेहा और उसका परिवार की सेक्स स्टोरी हिंदी मै पार्ट 1

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नेहा और उसका परिवार की सेक्स स्टोरी हिंदी मै पार्ट 1

Unread post by fuck » 23 Mar 2017 13:46



नेहा का परिवार

लेखिका:सीमा

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कहानी के सारे पात्र कहानी विवरण के समय अट्ठारह साल के या उसके ऊपर हैं।

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नेहा और उसका परिवार की सेक्स स्टोरी हिंदी मै पार्ट 1

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दोस्तों, मैं तो बस बड़े मामाजी,दुसरे परिवार के सदस्यों और नेहा के प्यार का विस्तृत वर्णन ही कर रहीं हूं। उन्हें किस किस तरह तरह की रति-क्रिया से सुख मिलता है उस पर मेरा कोई नियंत्रण नहीं है। आशा है कि पाठकगण भी उनकी निजी काम-इच्छाओं का आदर करेंगे और बुरा नहीं मानेगें।

सीमा

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नेहा और उसका परिवार की सेक्स स्टोरी हिंदी मै पार्ट 1

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हमारा छोटा सा परिवार नानाजी के शिलमा वाले घर जाने के लिए तैयार हो रहा था. मेरे परिवार में मेरे पिताजी, माँ और मैं, नेहा, इकलौती बेटी थे.

मेरे मामाजी के छोटे बेटे मनू (मनू प्रताप सिंह) की शादी के बाद नानाजी की इच्छा के अनुसार सारा परिवार एक निजी पार्टी के लिए इकठ्ठा हो रहा था. मनु भैया सिर्फ बीस साल के थे पर वो इस साल उच्च पढ़ाई के लिय़े अमरीका जा रहे थे. उनका अपनी प्रेमिका नीलम से प्यार इतना प्रबल था की वो नीलम के बिना अमरीका नहीं जाना चाहते थे. नीलम का परिवार काफी दकियानुसी था. नीलम के पिता बिना शादी हुए अपनी बेटी को किसी प्रेमी के साथ देश से बाहर भेजने के लिए तैयार नहीं थे. मामाजी और मेरे पापा ने काफी सोचने के बाद मनू और नीलम को शादी करने की सलाह दी. दोनों बहुत खुशी से तैयार हो गए. दोनों ही नीलम के पिताजी की इज्ज़त की फ़िक्र से वाकिफ थे.

दोनों की शादी बड़ी धूमधाम से हुई. हमारा परिवार बहुत अमीर था. नीलम का घर भी खानदानी पैसे से समृद्ध था. नानाजी के योजना के अनुसार अगले ७ दिनों तक सिर्फ नज़दीक का परिवार मिलजुल कर उत्सव मनायेगा. नानाजी की उम्र भी अब ७० साल के नज़दीक पहुचने वाली थी. उनकी शायद सारे परिवार को एक छत के नीचे देखने इच्छा ज़्यादा प्रबल होने लगी थी.

मुझे नानाजी के घर जाना हमेशा बहुत अच्छा लगता था. नानजी मुझे हमेशा से बहुत प्यार करते थे.हमारी रेंज-रोवर तैयार थी. मैं जल्दी से बाथरूम में मूत्रत्याग कर के बाहर आ रही थी कि पापा मुझे खोजते हुए मेरे कमरे में आ गए . मुझे तैयार हुआ देख कर वो मुस्कराए, "नेहू, मेरी बेटी शायद अकेली तरुणा [टीनएजर] होगी इस शहर में जो इतनी जल्दी तैयार हो जाती है."

मेरे पिताजी, अक्षय प्रताप सिंह, ६'४" फुट ऊंचे थे. पापा का शरीर बहुत चौड़ा,विशाल और मस्कुलर था.

मैं अपने पापा की खुली बाज़ुओ में समा गयी,"पापा क्या आप यह तो नहीं कह रहे कि आपकी बेटी और लड़कियों जैसी सुंदर नहीं है?"

उसी वक़्त मेरी मम्मी भी मेरे कमरे की तरफ आ रहीं थीं, "देखा अक्शु, आपकी बेटी आपकी तरह ही होशियार हो गयी है."

मेरी मम्मी ने मुझे प्यार से चूमा. मेरी मम्मी, सुनीता सिंह, मेरे हिसाब से दुनिया के सबसे ख़ूबसूरत औरत थीं. मम्मी अगले साल ३७ साल की हो जायेंगी.पापा उनसे एक साल बड़े थे. मेरी मुम्मू ५'५" फुट लम्बी थीं. मेरी मम्मी का मांसल बदन किसी भी कपड़े में बहुत आकर्षक लगता था. पर हलके नीले और हलके पीले रंग की साड़ी में उनका रूप और भी उभर पड़ता था. मेरी मम्मी का सीना उनकी सुंदरता की तरह सबका ध्यान अपनी तरफ खींच लेता था. मेरी मम्मी के वक्षस्थल का उभार किसी हिमालय की ऊंची चोटी की तरह था. मम्मी की कमर गोल और भरी-पूरी थी. उनके भरी हुई कमर के नीचे उनके कूल्हों का आकार उनकी साड़ी को बिलकुल भर देता था. उनके लम्बे घुंघराले बाल उनके भरे कूल्हों के नीचे तक पहुँचते थे. मैं अपनी मम्मी की आधी सुंदरता से भी अपने को बहुत सुंदर समझती.

पापा ज़ोर से हँसे,"सुनी, मै तो दो बेहत सुंदर और बुद्धिमान महिलाओं के साथ रहने की खुशनसीबी के लिए बहुत शुक्रगुज़ार हूँ." पापा ने मेरे बालों के ऊपर मुझे चूमा, "मेरी चतुर और अत्यंत सुंदर पत्नी के सद्रश इस संसार में सिर्फ एक और नवयुवती है और वो मेरी बेटी है."

मैं और मेरी मम्मी दोनों बहुत ज़ोरों से हंस दिए. पापा हमेशा हम दोनों को अपने चतुर जवाबों और मज़ाकों से हंसाते रहते थे. मैं अपने पापा के सामने किसी और को उनके बराबर का नहीं समझती थी.

मम्मी और पापा एक साथ कॉलेज में थे. हमारे परिवार पहले से ही मिल चुके थे. पापा की बड़ी बहन की शादी छोटे मामाजी, विक्रम प्रताप सिंह,के साथ हो चुकी थी. दोनों का प्यार बहुत जल्दी परवान चढ़ गया. मम्मी का इरादा हमेशा से अपने घर और परिवार की देखबाल करने था. उनकी राय में दोनों, संव्यावसायिक (प्रोफेशनल) होना और घर में माँ पत्नी होना,काफी मुश्किल था. पापा मेरी मम्मी की, इस बात के लिए, और भी ज़्यादा इज्ज़त करते थे. मेरे नानाजी का बहुत बड़ा 'बिज़नस एम्पायर' था. मम्मी ने पापा की तरह बिज़नस डिग्री की थी. पापा उसके बाद हार्वर्ड गए. उन्होंने पापा के साथ शादी करने के इरादे के बाद कोई इंतज़ार करने की ज़रुरत नहीं समझी. मम्मी मेरे पापा की पढ़ाई के दौरान उनकी देखबाल करना चाहतीं थीं. मम्मी के बीसवें जन्मदिन के एक महीने के बाद उनकी शादी पापा से हो गयी. पापा दो साल के लिए हार्वर्ड गए. दो साल के बाद मेरा जन्म हुआ.

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हम दोपहर तक शिमला पहुँच गए. बाहर एक बहुत बड़ा शामियाना लगा हुआ था. नानाजी ने शहर के गरीब और मजलूमों के लिए खुला पूरे दिन खाने का इन्तिज़ाम किया था. उन लोगों का खाना खत्म हो जाने के बाद सारी सफाई हो चुकी थी.

मेरे बड़े मामाजी बाहर ही थे. मैंने चिल्ला पड़ी, "बड़े मामा," मामाजी ने मुझे अपनी बाँहों में भर लिया और प्यार से कई बार दोनों गालों पर चुम्बन दिए. मुझे मुक्त कर के मम्मी को ज़ोर से आलिंगन में भर लिया. मम्मी दोनों भाइयों से छोटीं थी और दोनों भाई उनपर अपनी जान छिड़कते थे.

मामाजी और पापा गले मिले. मामाजी पापा जितने ही लम्बे थे पर उनका गए सालों में थोड़ा वज़न बड़ गया था. बड़े मामा ने सफ़ेद कुरता-पजामा पहना हुआ था जिसमे उनकी छोटी सी तोंद का उभार दिख रहा था, बड़े मामा बहुत हैण्डसम लग रहे थे. उनकी घनी मूंछें उन्हें और भी आकर्षित बनाती थी. मेरे बड़े मामा विधुर थे. मेरी बड़ी मामीजी का देहांत अचानक स्तन के कैंसर से बारह साल पहले हो गया था. तभी से बड़े मामा ने अपने दोनों लड़कों की देखभाग में अपनी ज़िन्दगी लगा दी.

मम्मी बोलीं,"रवि भैया, कोई काम तो नहीं बचा करने को?"

पापा ने भी सर हिलाया.

"नहीं सुनी, डैडी ने सब पहले से ही इंतज़ाम कर रखा था.तुम्हे तो पता है उनकी आयोजन करने की आदत का." बड़े मामा ने मेरे कन्धों के उपर अपना बाज़ू डालकर हमसब को अंदर ले गए.

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शिमला का घर विशाल था. वो करीब १०० एकड़ ज़मीन पर बना था. इस विशाल घर में शायद १५ कमरे थे. उसके अलावा १० बंगले भी इर्द गिर्द बने हुए थे. उन में से एक बंगला मनु और नीलम की सुहागरात के लिए सजाया गया था. जायदाद की परिधि के नज़दीक २५ घर में काम करने वालों के लिए थे.

नानाजी ने इस घर को सारे परिवार के लिए बनाया था. उनकी इच्छा थी की जब वो इस संसार से चले जाएँ तो सब परिवार के सदस्य इस घर में, कम से कम साल में एक बार इकट्ठे हों.

घर में घुसते ही नरेश भैया ने मुझे आलिंगन में भर लिया. नरेश भैया करीब ६'३" लम्बे और पापा की तरह बड़ी बड़ी मांस पेशियों से विपुल भारी भरकम शरीर के मालिक थे. नरेश भैया ने मुझे हमेशा के जैसे बच्ची की तरह प्यार दर्शाया. मम्मी और डैड ने नरेश को बेटे की तरह गले से लगाया.

नरेश की पत्नी अंजनी, जिसको सब अंजू कह कर पुकारते थे, दौड़ी दौड़ी आयी और हम सबसे गले मिली. अंजू बेहद सुंदर स्त्री थी. उसका गदराया हुआ शरीर किसी देवता को भी आकर्षित कर सकता था.

अंजू और नरेश भैया ने हम को हमारे कमरे दिखा दिए. ड्राईवर ने हम सबका सामान कमरों में रख दिया.

पापा और मम्मी नानाजी को ढूँढने चले गए. मैं अंजू भाभी के साथ मनू भैया और नीलम से मिलने के लिए साथ हो ली.

नीलम सीधी सादी मैक्सी में अत्यंत सुंदर लग रही थी. उसके बड़े बड़े स्तन ढीली ढाली मैक्सी में भी छुप नहीं पा रहे थे. अंजू ने नीलम से मज़ाक करना शुरू कर दिया, "नीलू आज मनू आपकी हालत खराब करने के लिए बेताब है."

नीलम शर्मा गयी और उसका चेहरा लाला हो गया. अंजू के मज़ाक और भी गंदे और स्त्री-पुरुष के सम्भोग के इर्दगिर्द ही स्थिर हो गए.

मैं भी अंजू के मज़ाकों से कुछ बेचैन हो गयी. मुझे स्त्री-पुरुष के सम्भोग के बारे में सिवाए किताबी बातों के कुछ और नहीं पता था. मैंने अंजू और नीलम से विदा लेकर मनु भैया को ढूँढने के लिए चल दी.

मनू भैया और छोटे मामा, विक्रम प्रताप सिंह, दोंनो एक बंगले के सामने कुर्सियों पर बैठे हुए स्कॉच के गिलास थामें हुए थे.

छोड़े मामा मनू भैया की तरह ६'४" लम्बे थे. मनू भैया काफी छरहरे बदन पर मज़बूत जिस्मानी ताक़त के मालिक थे. छोड़े मामा बड़े मामा की तरह थोड़े मोटापे की तरफ धीरे-धीरे बड़ रहे थे. दोनों ने मुझे बारी बारे से गले लगाया और प्यार से चूमा. मैंने काफी देर दोनों से बात की.

मनु भैया ने मुझे याद दिलाया की नानाजी मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे, "नेहा, दादाजी अपनी प्यारी इकलौती धेवती को देखने के लिए बेसब्र हो रहे होंगे."

मैं नानाजी को ढूँढने के लिए सब तरफ गयी. रसोई घर में छोटी मामी सुशीला [शीलू] पूरे नियंत्रण में थीं. शीलू मामी मेरे पापा की बड़ी बहन थीं, अतः मेरी बुआ भी लगती थीं. शुरू से ही मुझे उनको बुआ कहने की आदत पड़ गयी थी. सो मैंने उनको हमेशा बुआ कह कर ही पुकारा.

आखिर में मुझे नानाजी सबसे दूर वाले दीवान खाने में मिले. वहां दादा और दादी जी भी उनके पास बैठें थें.

नाना, रूद्र प्रताप सिंह, ७० साल के होने वाले थे. वो हमारे और पुरुषों की तरह ६'२" लम्बे और बड़े भरी भरकम शरीर के मालिक थे. दादा जी, अंकित राज सिंह, नाना जी से चार साल छोटे थे, वो ६६ साल के थे. दादाजे करीब ६ फुट लम्बे थे पर उनका महाकाय दानवाकार शरीर किसी पहलवान की तरह का था. दोनों नाना और दादा जी विशाल शरीर और सारे परिवार की तरह बहुत सुंदर नाक-नुक्श के मालिक थे. दादी जी, निर्मला सिंह, ६६ साल के उम्र में भी निहायत सुंदर थीं. उनका शरीर उम्र के साथ थोडा ढीला और मांसल और गुदगुदा हो चला था. उनका सुंदर चेहरा अभी भी किसी भी मर्द की निगाह खींचने के काबिल था.तीनो ने मुझे बहुत प्यार से गले लगाया और मेरे मूंह हज़ारों चुम्बनों से गीला कर दिया.

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नेहा और उसका परिवार की सेक्स स्टोरी हिंदी मै पार्ट 2

Unread post by fuck » 23 Mar 2017 13:47

नेहा और उसका परिवार की सेक्स स्टोरी हिंदी मै पार्ट 2

दोस्तों, मैं तो बस बड़े मामाजी,दुसरे परिवार के सदस्यों और नेहा के प्यार का विस्तृत वर्णन ही कर रहीं हूं। उन्हें किस किस तरह तरह की रति-क्रिया से सुख मिलता है उस पर मेरा कोई नियंत्रण नहीं है। आशा है कि पाठकगण भी उनकी निजी काम-इच्छाओं का आदर करेंगे और बुरा नहीं मानेगें।

सीमा

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————२————

नाना, दादा और दादी जी को सारे परिवार को एक जगह इकट्ठा देख कर बहुत सुख मिला. तीनो बहुत खुश और संतुष्ट लग रहे थे. सारी शाम बहुत हसीं-मजाक चलता रहा.

बेचारी नीलम भाभी की तो हालत खराब हो गयी. अंजू भाभी के मज़ाक से दादा, नाना और दादी जी भी हसीं रोक नहीं पाए.

अंजू भाभी, मैं और नीलम भाभी खाने के बाद नीलम भाभी के बंगले में चले गए. अंजू भाभी ने बंगला बहुत ही अच्छे से सजा रखा था. सब तरफ फूलों की मालाएं और गुलदस्ते बिखरे हुए थे. अंजू भाभी का काम में नीलम को सुहाग रात के लिए तैयार करना भी था. अंजू भाभी ने नीलम के कपड़े उतारने शुरू कर दिए. अंजू भाभी के अश्लील मज़ाक मुझे भी कसमसा रहे थे. नीलम भाभी का सुंदर मूंह शर्म से लाल हो गया था.

नीलम भाभी अब बिलकुल नग्न थीं. मेरे सांस मुश्किल से काबू में थी. नीलम भाभी का सुंदर गुदाज़ शरीर मुझे भी प्रभावित कर रहा था. उनके बड़े-बड़े भारी स्तन अपने वज़न से थोड़े ढलक रहे थे. उनकी सुंदरता की एक अच्छे मूर्तिकार की किसी देवी की मूर्ती से ही तुलना की जा सकती थी. नीलम भाभी की सुडौल भरी कमर के नीचे मुलायम काले घुंघराले बालों से ढकी हुई योनी ने मुझे भी प्रभावित कर दिया. नीलम भाभी की मांसल टाँगे उनके भारी गोल नितिम्बों के उठान को और भी खूबसूरत बना रहीं थीं.

अंजू भाभी ने बिना किसी शर्म के नीलम भाभी के दोनों उरोजों को दोनों हाथों से मसल दिया, "नीलू, कल सुबह, इन दोनों सुंदर चूचियों नीले दागों से भरी होंगी. मनू भैया इन सुंदर चूचियों को खा जायेंगें."

नीलम भाभी शर्मा कर हंस दी. अंजू भाभी ने नीलू भाभी को एक झीने सिल्क का साया पहना दिया. अंजू भाभी ने नीलम भाभी को खूब सता कर बिस्तर में लिटा कर विदा ली.

वापसी में मुझसे रहा नहीं गया, "अंजू भाभी सुहागरात में मनू भैया क्या-क्या करेंगे नीलम भाभी के साथ."

अंजू भाभी पहले थोड़ा हंसी, "नेहा, मनू नीलम की आज रात पहली बार चूत मारेगा. नीलम को पता नहीं है की मनू का लंड कितना बड़ा है."

मेरी जांघों के बीच में गीलापन भर गया, "भाभी आपको कैसे पता की मनू भैया का ल ..ल ..लंड कितना बड़ा है?"

थो "नेहा, मैंने मनू को पेशाब करते हुए देखा है. वास्तव में मैंने मनू को बावर्ची की बेटी को चोदते हुए देखा है. मनू की चूदाई कोई लड़की नहीं भूल सकती."

"अंजू भाभी क्या नरेश भैया का लंड भी उतना बड़ा है?"

बातें करते हुए हम मेरे कमरे तक पहुँच गए थे, "नेहा, इस घर के सारे मर्दों के लंड दानवीय माप पर बने हैं. तुम्हारे नरेश भैया का लंड भी महाकाय है. जब उन्होंने पहली दफा मेरी चूत मारी तो मैं सारी चुदाई में रोती ही रही दर्द के मारे. पर अब मुझे उनके लंड से अपनी चूत मरवाए बिना चैन नहीं पड़ता. जब तुम्हारे भैया ने पहली बार मेरी गांड मारी तो मैं तीन दिन तक पाखाने नहीं जा पाई."

अंजू भाभी ने मेरे होठों पर प्यार से चुम्बन दिया फिर फुसफुसा के मेरे कानो में कहा, " नेहा, यदी रात में मेरी बातों से चूत गीली और खुजली से परेशान कर रही हो तो हमारे कमरे में आ जाना. तुम्हारे नरेश भैया को मैं तुम्हारी चूत के मालिश करने को मना लूंगी."

मैं बहुत शर्मा गयी. मेरा मूंह बिलकुल गुलाब की तरह लाल हो गया. नीलम भाभी का मेरे भाई से मेरी चूत मरवाने के ख्याल से ही मेरी हालत बुरी हो गयी.

अंजू भाभी मेरी स्तिथी को भांप गयी थी, "नेहा, अच्छे से सोना. प्यार सबसे बड़ा आशीर्वाद होता है. समाज के प्रतिबन्ध तो कम अक्ल के लोगों के लिए होतें हैं." अंजू भाभी की गम्भीर और गहरी बात की महत्वता अगले कुछ दिनों में सत्य हो जायेगी.

*****३*********

मैंने अपने कपड़े बदल लिए. बाथरूम में पेशाब करते हुए मुझे अपनी चूत में से सुगन्धित पानी निकलता मिला. मैंने हमेशा की तरह ढीली-ढाली टीशर्ट पहन ली. मै रात में कोई ब्रा और जाँघिया नहीं पहनती थी. मेरे दीमाग में मनू भैया का लंड नीलम भाभी की चूत के अंदर घुसने की छवि समा गयी थी. मैं बिलकुल सो नहीं पाई. आखिर में मैंने हार मान ली. मेरे वासना से गरम मस्तिष्क ने हर किस्म का ख़तरा उठाने का इरादा कर लिया.

मैंने गरम पश्मीना शौल ओड़ कर कमरे से निकल पड़ी. जिस बंगले में मनू भैया और नीलम भाभी की सुहागरात का इंतज़ाम किया गया था उसके बाहर एक खिड़की थी जो एक संकरे गलियारे की वजह से दूर से नहीं दिखती थी.

मैंने धीरे से गलियारे में पहुँच कर धीरे से खुली हुई खिड़की को धक्का दिया. फूलों की माला से खिड़की बंद ही नहीं हुई थी. बाहर अन्धेरा था. अंदर मंद बिजली थी.

मैंने अपनी शॉल कस कर अपने शरीर पर लपेट ली,वायू में थोड़ी सी ठण्ड का अहसास होने लगा था. यदी कोई भी मुझे भैया-भाभी के कमरे में झांगते हुए देख लेता तो मेरी सारी ज़िन्दगी शर्मिन्दिगी से भर जाती. पर मेरी कामवासना और उत्सुकता ने मेरे डर को काबू कर लिया.

कमरे में नीलम भाभी बिलकुल वस्त्रहीन थीं. उनके बड़े मुलायम उरोज़ मनू भैया के हाथों में थे. मेरा जिस्म बिलकुल गरम हो गया. मनू भैया ने अपने मूंह में नीलम भाभी का बायां निप्पल ले लिया. मनू भैया, लगता था कि वो ज़ोर से भाभी का चूचुक चूस रहे थे. नीलम भाभी के मूंह से सिसकारी निकल पडी. नीलम भाभी का चेहरा बिलकुल साफ़ साफ़ तो नहीं दिख रहा था पर फिर भी उनकी आधी बंद सुंदर आँखें और आधा खुला ख़ूबसूरत मूंह उनकी काम-वासना और आनंद को दर्शा रहे था. मैंने हिम्मत करके खिड़की थोड़ी और खोल दी.

मनू भैया ने नीलम भाभी का सारा शरीर चुम्बनों से भर दिया. दोनों ने फिर से अपने खुले मूंह ज़ोर से एक दुसरे के मूंह से चिपका दिए. भैया के दोनों हाथ भाभी के दोनों चूचियों से खेल रहे थे. भाभी का हाथ भैया के पजामे के ऊपर पहुँच गया और भैया के लंड को सहलाने लगा.

मेरी छाती हिमालय की चोटी के सामान शॉल में से उभर रही थी. मेरी सांस तेज़-तेज़ चलने लगी. मुझे अपनी जांघों के बीच में गीलापन का अहसास होने लगा. मेरा दायाँ हाथ अपने आप मेरी बाये उरोंज़ को सहलाने लगा. मेरा निप्प्ल बहुत जल्दी लंबा और सख्त हो गया. मेरा चूचुक [निप्पल] बहुत संवेदनशील था और मेरा हाथ के रगड़ से मेरे बदन में बिजली की लहर दौड़ गयी. मैंने बड़ी मुश्किल से अपने मूंह से उबलती सिसकारी को दबा पाई.

अंदर कमरे में भाभी ने भैया का पजामा खोल कर नीचे कर दिया था. भाभी अपने घुटनों पर बैठीं थी और उनका मूंह भैया की जाँघों के सामने था. भैया के शक्तिशाली मज़बूत नितम्ब आगे पीछे होने लगे . मेरा दिल अपने भैया का नंगा बदन खाली पीछे से देख कर ही धक्-धक् करने लगा. नीलम भाभी के मूंह से उबकाई जैसी आवाज़ सुन कर मुझे लगा िक भाभी भैया का लंड चूस रही थी. काश मैं भाभी का मूंह भैया का लंड चूसते हुए देख पाती.

नीलम भाभी ने मनू भैया का लंड काफी देर तक चूसा. भैया कभी-कभी ज़ोर से अपने ताकतवर नितम्बों से अपना लंड भाभी के मूंह में ज़ोर से धकेल देते थे. भाभी के मूंह से ज़ोर की उबकाई जैसी आवाज़ निकल पड़ती थी पर भाभी ने एक बार भी अपना मूंह भैया के लंड से नहीं हटाया.

मेरा हाथ अब मेरे उरोज़ को ज़ोर से मसल रहा था. मैंने अपना निचला होंठ, अपनी सिस्कारियों को दबाने के लिए अपने दातों में भींच लिया.

मनू भैया ने नीलम भाभी को अपने मान्स्ली मज़बूत बाज़ूओं में उठा लिया और प्यार से उनको बिस्तर पर लिटा दिया.

नीलम भाभी ने अपने दोनों टाँगे खोल कर अपने बाहें फैला दीं, "मनू अब मेरी चूत में अपना घोड़े जैसा लंड दाल दो. मेरे पिताजी ने कितने महीनो मुझे इस दिन का इंतज़ार करवाया है. अब तुम अपने लंड से मेरी चूत को खोल दो."

नीलम भाभी की वासना भरी आवाज़ ने मेरे मस्तिष्क को कामंगना से भर दिया. मेरा पूरा शरीर में एक अजीब किस्म की एंठन होने लगी. मेरी सांस मानो रुक गयी. में भैया के लंड को भाभी की चूत के अंदर जाते हुए देखने के लिए कुछ भी कर सकती थी.

मेरा सारा ध्यान अंदर के दृश्य पर था. मुझे पता भी नहीं चला कि एक बहुत लम्बा चौड़ा पुरुष मेरे पीछे काफी देर से खड़ा था. अचानक उसने मुझे अपनी मज़बूत बाज़ू में जकड़ लिया और दुसरे हाथ से मेरा मूंह बंद कर दिया. मेरा सर उसके सीने तक भी मुश्किल से पहुच रहा था.

"श..श..श...चुप रहो," उसकी धीमे भरी आवाज़ मुझे बिलकुल भी पहचान नहीं आई.

मैं काफी डर गयी. पर नानाजी के घर के किसी भी नौकर की घर की स्त्रियों के साथ इस तरह व्यवहार करने की हिम्मत नहीं थी. उसने मुझे या तो कोई नौकरानी अन्यथा किसी नौकर की बेटी या बहिन समझा होगा.

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उस अजनबी पुरुष का एक हाथ मेरे दोनों उरोज़ों पर था. उसके हाथ के दवाब ने मेरे चूचियों को और भी संवेदनशील बना दिया. मेरा बदन अब बुरी तरह से कामान्गनी में जल रहा था. मेरी उत्तेजना और भी बड़ गयी और मेरी वासना ने मेरे डर और दिमाग पर काबू पा लिया. मेरा सिर अपने आप उस वृहत्काय आदमी की मज़बूत सीने से लग गया. मेरे शरीर की प्रतिक्रिया ने उस आदमी की, यदि कोई भी झिझक बची हुई थी तो वो भी दूर कर दी.

उसने मेरे मूंह से अपना हाथ हटा लिया. उसने दोनों हाथों से मेरे दोनों उरोज़ों कमीज़ के ऊपर से ही सहलाना शुरू कर दिया. मेरी सांसों में तूफ़ान आ गया. मेरी गले में सिसकारियां भर गयीं जो मैंने बड़ी मुश्किल से दबा दीं. उसके हाथों ने मेरे निप्पल को बहुत संवेदनशील और सख्त बना दिया. मैं और पीछे होकर अपने शरीर को उसके विशाल काया से चिपका दिया. हम दोनों की निगाहें अंदर कमरे में भैया-भाभी के बीच हो रहे सहवास पर एकटक लगी हुईं थीं.

मेरे भैया ने अपनी मज़बूत बाँहों में नीलम भाभी को ऊठा कर बड़े प्यार से बिस्तर पर लिटा दिया था. नीलम भाभी ने अपने दोनों गुदाज़ मांसल जांघें मोड़ कर पूरी चौड़ा दीं. उनकी रेशमी घने घुंगराले काले बालों से ढकी गीली चूत मेरे भैया को मानों अमिन्त्रित कर रही थी,"मनू, अब मुझसे और नहीं बर्दाश्त होता. मेरे पिताजी के िज़द की वजह से मेरा कौमार्य तुम्हरे लंड से इतने अरसे से दूर रहा.अब तुम अपने घोड़े जैसे लंड से मारी चूत का कुंवारापन मिटा दो."

भैया जल्दी से मेरी भाभी की खुली टांगों के बीच में बैठ गए. भाभी के गले से एक हल्की चीख निकल गयी. भैया ने अपना लंड भाभी के चूत में डालना शुरू कर दिया था. भैया ने अपना विशाल महाकाय शरीर से भाभी की मांसल कोमल काया को ढक दिया. भैया के बलवान हृष्ट-पुष्ट नितम्ब ने मेरी किशोरी वासना को और भी उत्तेजित कर दिया.

भैया के नितम्बो की मांसपेशिया थोड़ी संकुचित होई और भैया ने बड़े ज़ोर से अपने कूल्हों को नीचे धक्का दिया. कमरे की दीवारें नीलम भाभी की दर्द भरी चीख से गूँज ऊंथी. मेरी सांस रुक गयी. मेरी चूत अपने आप संकुचित हो गयी. भाभी की चीख ने मुझे उनकी चूत पर भैया के लंड के प्रभाव का अन्दाज़ा दे दिया था.

अजनबी आदमी ने मेरा एक बड़ा कोमल स्तन अपने बड़े हाथ में जितना भर सकता था भर कर दुसरे हाथ की उँगलियों से मेरी भगशिश्निका [क्लाइटॉरिस] को सहलाने लगा. यदि मेरे सामने भैया-भाभी की चुदाई नहीं होती तो मेरे आँखें उन्मत्तता की मदहोशी से बंद हो गयीं होतीं.

भैया ने, मुझे लगा, बड़ी बेदर्दी से नीलम भाभी के चीखों को नज़रअंदाज़ कर के अपने ताकतवर नितम्बों की मदद से अपना लंड भाभी की चूत में घुसाते रहे. अब भाभी के रोने की आवाज़ भी उनकी चीखों के साथ मिल गयी,"आँ.. आँ ..आह..मनू..ऊ...ऊ...मेरी चूत फट गयी. अपना लंड बहर निकाल लो प्लीज़," नीलम भाभी सिस्कारियां मेरे दिल में सुइओं की तरह चुभ रहीं थीं. मेरा मन अंदर जा कर नीलम भाभी को सान्तवना देने के लए उत्सुक हो रहा था. उसी वक़्त मेरे भग-शिश्न पर उस आदमी की उँगलियों ने मेरी मादकता को और परवान चड़ा दिया.

मनू भैया ने या तो भाभी का रोना और चीखें नहीं सुनी अथवा उनकी बिलकुल उपेक्षा कर दी.

भैया के गले से एक गुरगुराहट के आवाज़ निकली और उनकी कमर की मांसपेशियां और भी स्पष्ट हो गयी कि वो अपनी विशाल शरीर की ताकत से भाभी की चूत में अपना लंड डालने का प्रयास कर रहे थे.

भैया ने अपना लंड थोडा बहर निकला और कुछ देर रुक कर, बिलखती हुई नीलम भाभी की चूत में निर्दर्दी के साथ अपना लंड पूरा जड़ तक धकेल दिया. नीलम भाभी की चीख से लगा जैसे भैया के लंड ने उनकी चूत फाड़ दी हो.

"आं...आँ...आँ...मई मर गयी....ई..ई...ई. मेरी चूत फट गयी मनू..ऊ..ऊ.बहुत दर्द कर रहे हो.मेरी चूत तुम्हारा लंड नहीं ले सकती. प्लीज़ निकल लो बाहर. हाय माँ मुझे बचा लो." नीलम भाभी की दिल से निकली दर्दभरी पुकार सुन कर भी मेरी काम-वासना में कोई कमी नहीं आई. मेरी चूत में अब आग लगी होई थी. उस वक़्त यदी मुझे कोई मौका देता तो मैं एक क्षण में नीलू भाभी से स्थान बदल लेती.

मेरे अजनबी प्रेमी ने मेरे भगांकुर [क्लित] को तेज़ी से रगड़ना शुरू कर दिया. मेरी सांस अब अनियमित हो गयी थी. उसका हाथ मेरी बड़े कोमल उरोंज़ को मसल रहा था और उसकी उंगलियाँ मेरे चूचुक को मरोड़ रही थीं. मुझे अब लगाने लगा कि, किसी दुसरे के स्पर्श से, मेरा पहला रति-निष्पत् होने वाला था.

मैं धीरे से फुफुसाई,"आह..आह..और मैं आने वाली हूँ. प्लीज़ मुझे झाड़ दो."

उस आदमे ने मेरे सिर पर चुम्बन किया और उसकी उँगलियों ने मेरे भंगाकुर को तेज़ी से सहलाना शुरू कर दिया. मेरी चूत और चूची, दोनों में एक अजीब सी जलन हो रही थी. उस जलन को बुझाने की दवा उस आदमी के हाथों में थी. कुछ क्षणों में ही मेरा शरीर अकड़ गया. मेरी सांस मुश्किल से चल रही थी. मेरे चूत के बहुत अंदर एक विचित्र सा दर्द जल्दी ही बहुत तीव्र हो गया. मेरे अजनबी प्रेमी ने मुझे अपने शरीर से भींच लिया. मेरी चूत झड़ने लगी और मेरे बदन में बिजली सी दौड़ गयी. मुझे काफी देर तक कोई होश नहीं रहा. मुझे काफी देर में अपनी अवस्था का अहसास हुआ. मैंने अपना शरीर पूरा ढीला अपने अपरिचित प्रेमी के शरीर पर छोड़ दिया.

fuck
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नेहा और उसका परिवार की सेक्स स्टोरी हिंदी मै पार्ट 3

Unread post by fuck » 23 Mar 2017 13:48

नेहा और उसका परिवार की सेक्स स्टोरी हिंदी मै पार्ट 3

यह कहानी नेहा के किशोरावस्था से परिपक्व होने की सुनहरी दास्तान है।

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दोस्तों, मैं तो बस बड़े मामाजी,दुसरे परिवार के सदस्यों और नेहा के प्यार का विस्तृत वर्णन ही कर रहीं हूं। उन्हें किस किस तरह तरह की रति-क्रिया से सुख मिलता है उस पर मेरा कोई नियंत्रण नहीं है। आशा है कि पाठकगण भी उनकी निजी काम-इच्छाओं का आदर करेंगे और बुरा नहीं मानेगें।

सीमा



अब मेरा ध्यान अंदर कमरे कि कमरे में हो रही भैया-भाभी कि चुदाई पर फिर से लग गया. भाभी का रोना अब बहुत कम हो गया था.

"नीलू,बस अब पूरा लंड अंदर है. मैं धीरे-धीरे तुम्हारी चूत मरना शुरू करूंगा." भैया की आवाज़ में बहुत सा प्यार छुपा हुआ था.

नीलम भाभी सिर्फ सिसकती रहीं पर भैया के मज़बूत चौड़े हृष्ट-पुष्ट नितम्ब ऊपर-नीचे होने लगें. मुझे बीच-बीच में भैया का थोडा सा लंड दिखाई पडा. उनके लंड की मोटाई देख कर मेरे दिल की धड़कन मानो कुछ क्षणों के लिए रुक गयी.

मनू भैया ने अपने अविश्वसनीय मोटे लंड से नीलम भाभी की चूत की चुदाई करनी शुरू कर दी. भैया के मज़बूत चौड़े नितम्ब धीमें-धीमें ऊपर नीचे होने लगे. भैया ने अपने शक्तीशाली कमर और कूल्हों की मसल्स की मदद से अपना महाकाय लंड नीलम भाभी की चूत में अंदर-बाहर करना शुरू कर दिया.

नीलम भाभी अब बिलकुल नहीं रो रहीं थीं पर उनकी सिसकियाँ रुक-रुक कर उनकी कामुकता की हालत बता रहीं थीं.

मेरे अपरिचित प्रेमी ने मेरी भगांकुर को फिर से मीठी यातना देनी शुरू कर दी. उसकी दोनों हाथ मेरे उरोज़ों को और मेरी चूत को बिना रुके उत्तेजित करते रहे.

मनू भैया अब भाभी को और भी ज़ोर से चोद रहे थे. उनका लंड भाभी की चूत में बढ़ती हुई तेज़ी के साथ रेल के पिस्टन की तरह अंदर-बाहर जा रहा था. नीलम भाभी की सिस्कारियां उनकी काम-वासना की तरह ऊंची होती जा रहीं थीं, "आह..ऊई..मनू-अब बहुत अच्छा लग रहा है.मेरी चूत में तुम्हारा मोटा लंड अब बहुत कम दर्द कर रहा है. मुझे चोदो प्लीज़....मेरी चूत मारो...आँ..आँ. ...अम्म..मनू..ऊ.आह."

मनू भैया के चूतड़, इंजन के तरह, अब और भी तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रहे थे.

मेरी चूत की हालत भी बहुत खराब थी. मैं दूसरी बार झरने वाली थी. मेरे शरीर की एंथन आने वाले कामोन्माद से मुझे और भी परेशान करने लगी.

अचानक भाभी की सिसकारी चीख में बदल गयी पर इस चीख में दर्द की कोई भावना नहीं थी.

"मैं झड़ने वाली हूँ, मनू.मेरी चूत को फाड़ दो.मुझे चोदो. आँ..आँ..अ..आ..मैं आ गयी.ई...ई..ई..ई," नीलम की लम्बी चीख उनके कौमार्य-भंग के पहले कामोन्माद [ओर्गाज़म] की घोषणा कर रही थी.

मेरा चरम-आनन्द भी भाभी के साथ मेरे शरीर को यंत्रणा दे रहा था पर बेचारी भाभी की तरह मैं चीखना चाहती थी पर मैंने अपने होंठ दातों से दबा लिए.

अगले एक घंटे कमरे में भैया ने नीलम भाभी की चूत का,अपने वृहत्काय मोटे लंड से, बेदर्दी से लतमर्दन किया. भाभी कम से कम पांच बार झड़ चुकीं थीं.

बाहर मेरे अपरिचित प्रेमी ने मेरी चूत, भागान्कुर और चूचियों को मीठी यातना दे-दे कर मुझे सात बार झाड़ दिया था .

भैया का लंड अब भाभी की चूत, जो अब उनके स्खलित रति-जल से लबालब भर गयी थी, चपक-चपक की आवाज़ के साथ बिजली की तेज़ी से भाभी की चूत का मर्दन कर रहा था. भाभी की चुदाई अब इतनी भयंकर हो चली थी कि एसा लगता था कि भैया एक हिंसक मनुष्य बन गए थे और भाभी की चूत का विनाश ही उनका उद्देश्य था. पर भाभी सिस्कारियों के बीच में उनको और ज़ोर से उनकी चूत 'फाड़ने' का प्रोत्साहन दे रहीं थीं.

जब भाभी अंदर कमरे में भैया के मूसल लंड से चुदवा कर छठवीं बार झड़ीं, मैं बाहर अपने अनजान प्रेमी से अपने चूत मसलवा कर आठवीं बार झड़ रही थी.

भैया ने अपने लंड को भीषण शक्ति से भाभी की चूत में अंदर बाहर डाल कर एक जंगली जानवर कि तरह गुर्रा कर अपने लंड को भाभी की प्यासी चूत में खोल दिया. भैया का लंड भाभी कि चूत में स्खलित हो रहा था और मैं बाहर अनजान पुरुष की उँगलियों पर मचल-मचल कर झड़ रही थी.

भैया भाभी के ऊपर निढाल हो कर परस गए. भाभी ने भैया अपनी दोनों बाँहों में और भी ज़ोर से जक्कड़ लिया. भाभी मातृक-प्रेम के साथ भैया की पीठ और सिर प्यार से सहला रही थीं. कामलिप्सा की संतुष्टी के बाद दोनों एक दुसरे को अनुराग भरे चुम्बन दे रहें थे.

मैं अब बिलकुल थकान से निढाल हो चली थी.मेरे बहुतबार झड़ने की थकान मेरे अजनबी प्रेमी को भी महसूस हुई. मुझे उसकी पकड़ ढीली महसूस हुई और मैंने अपने आपको उसकी बाँहों से मुक्त कर लिया. मैं जैसे ही दूर जाने के लिए चली उस आदमी ने मुझे पकड़ने की कोशिश की पर उसके हाथ में सिर्फ मेरी शॉल ही आ पाई.

***********६*************

मैंने पीछे बिना देखे भाग कर बाहर खुले लॉन में चली गयी. मैंने वहां रुक कर पीछे मुड़कर देखा. वो विशाल शरीर का आदमी अभी भी अँधेरे में खड़ा था. उसने मेरी शॉल प्यार से दीवार पर तह मार कर डाल दी.

मैं भरी साँसों से भरी अपने कमरे की तरफ दौड़ पड़ी. कमरे में पहुँच आकर मैं बिस्तर में निढाल हो कर लेट गयी. मुझे करीब आधा घंटा लगा अपनी सांस काबू में लाने के लिए.

============ दूसरा अध्याय ==========

मेरी तरुण उम्र में कभी भी मुझे इस तरह स्थिति के होने का कोई पूर्वानुमान या सँभालने का अनुभव नहीं था. मैंने कभी भी कोई ऐसा काम नहीं किया था जिसे मुझे अपने मम्मी-पापा से छुपाना पड़े. ऊपर से मेरे दिल में अब डर बैठ गया था कि क्या पता यह आदमी मुझे ब्लैक्मेल करने की कोशिश करे.

पर मेरी अपेक्षा के खिलाफ उससे भी बड़े डर ने मेरे मस्तिष्क पर नियंत्रण कर लिया, जिससे मेरा दिल बिलकुल बेचैन हो गया, कि वो मुझे कभी भी दुबारा न मिले. मैंने उसकी शक्ल भी नहीं देखी.

मैंने हिम्मत कर के फिर से बंगले की तरफ चल पड़ी. मेरा दिल हथोड़े की तरह मेरे छाती में धड़क रहा था. मैं धीरे-धीरे फिर से संकरे गलियारे में प्रविष्ट हो गयी. मेरी शॉल अभ्हे भी दीवार पर लटक रही थी. वो आदमी मुझे नहीं नज़र आया. मेरी सांस ज़ोर-ज़ोर से चल रही थी. मैंने खिड़की से कमरे के अंदर देखा. मनू भैया नीलम भाभी कि पीछे से चुदाई कर रहे थे. मुझे मालूम था इसे 'डॉगी' या 'घोड़ी' की रीति में चुदाई करना कहते हैं.

मेरा मन भैया-भाभी की चुदाई देखने के लिए तड़प रहा था पर मेरा डर मेरी मनोकामना से ज्यादा बलवान निकला.

मैं अपनी शॉल लेकर चुपचाप धीरे से बाहर आ गयी.

जैसे ही मैं गलियारे से बाहर आकर लॉन में जाने के लिए मुड़ी, मैं अँधेरे में खड़े लम्बे-चौड़े आदमी को देख कर डर के मारे स्तंभित हो कर बिलकुल स्थिर घड़ी हो गयी.

मेरी सांस रुक कर गले में अटक गयी. मेरे दीमाग ने काम करना बंद कर दिया. अब मुझे पता चला के शिकार का जानवर कैसे महसूस करता है जब शिकारी उसके बचने सब रस्ते बंद कर देता है.

मैं डरी हुई पर शांती से खड़ी रही. वो विशालकाय मर्द धीरे-धीरे मेरी तरफ आया. जब उसका चेहरा थोड़ी सी रोशनी में आया तो मेरी जान ही निकल गयी. उस आदमी की शक्ल देख कर मेरा दीमाग चकरा गया. मुझे ज़ोर से चक्कर आने लगे. मैं घास पर गिरने ही वाले थी कि उस आदमी ने मुझे अपनी बाँहों में संभाल लिया.

मुझे थोड़ी देर बाद होश आया,और मेरी चीख निकलने वाले थी पर उस महाकाय विशाल शरीर के मालिक व्यक्ती ने अपने होंठ मेरे होंठों पर रख दिए. मैं थोड़ी देर कुनमुनायी पर मेरा मूंह स्वाभिक रूप में अपने आप ही से खुल गया और उस मेरे बड़े मामा की जीभ मेरे मूंह में प्रविष्ट हो गयी. मैंने अपनी दोनों बाहें बड़े मामा के गले के इर्द-गिर्द डाल दीं. उन्होंने ने अपने जीभ से अंदर से मेरा सारा मूंह का अन्वेषण कर लिया. मेरी सांस फिरसे तेज़ हो गयी.

*********७***********

बड़े मामा ने मुझे घास पर खड़ा कर दिया. मैं गुस्से से बोली, "बड़े मामा, आप को पता था कि वो लड़की मैं थी."

बड़े मामा ने मुस्करा कर सिर हिलाया, "नेहा बेटी, तुम्हारी सुंदरता और प्यार ने मुझे बिलकुल निस्सहाय कर दिया. मनू की खिड़की के पास तुम्हे देख कर मुझसे और बर्दाश्त नहीं हुआ."

मेरा दीमाग गुस्से से और इस नयी स्थिती से ठीक से सोच नहीं पा रहा था. मैं बड़े मामा की तरफ कमर कर खड़ी हो गयी. इस से पहले मैं कुछ बोल पाऊँ,बड़े मामा ने मुझे फिर से अपनी बाँहों में जकड़. उनके दोनों हाथों ने मेरे दोनों बड़े-बड़े उरोजों को ढक लिया. बड़े मामा ने धीरे-धीरे मेरे उरोजों को सहलाना शुरू कर दिया.

मेरी चूत में पानी भर गया. मेरा दिमाग ने बड़े मामा के हाथों के जादू के प्रभाव में नियंत्रण खो दिया. मेरी सोच-समझने की क्षमता पूरी तरह से समाप्त हो गयी. रही सही कसर बड़े मामा ने मेरे दोनों उरोज़ों को अपने बड़े-बड़े हाथों में दबा कर मुझे अपनी विशाल शरीर से भींच कर पूरी कर दी. मेरी साँसों में तूफान आ गया. बड़े मामा अपनी भरी पर प्यार भरी आवाज़ में बोले, "नेहा बेटा, यदि तुम्हें मनू की खिड़की के सामने पता होता कि वो आदमी मैं था तो फिर सब ठीक था? फिर तुम्हे यह सब स्वीकार होता?"

बड़े मामा के तर्क ने मुझे लाजवाब कर दिया और मैं अवाक रह गयी. बड़े मामा ने मुझे बचपन से अब की तरुणावस्था तक हमेशा अपनी बच्ची की तरह से प्यार किया था.

मैंने बड़ी मुश्किल से अपने गुस्से को अभिव्यक्त कर पाई, "बड़े मामा, मैं तो आपकी बेटी की तरह... आपकी अकेली बहन की बेटी,....भांजी हूँ."

बड़े मामा ने मेरे बालों पर प्यार से चुम्बन दिया, उनके हाथ मेरे चूचियों पर और भी कस गए,"नेहा बेटा, मैं तुम्हारे अप्सरा जैसे स्वरुप से मुग्ध सम्पूर्ण रूप से विमोह में हूँ. यदि तुम चाहो तो इसे बुद्धिलोप कह सकती हो. अब मैं तुम्हरी चूत का ख्याल अपने दिमाग से नहीं निकाल सकता. मुझे तुम्हे चोदे बिना चैन नहीं पडेगा."

मेरी सांस रुक-रुक आ रही थी. मेरे मस्तिष्क में विपरीत विचार मुझे दोनो तरफ खींच रहे थे.

"बड़े मामा, प्लीज़, मुझे थोडा समय दीजिये.मैं अभी बहुत उलझन में हूँ." मेरी आवाज़ से स्पष्ट था कि मैं रोने वाली थी.

बड़े मामा का, जो हमेशा से मेरे पिता तुल्य थे,पितृवत् प्यार उनकी मेरे ऊपर कामलिप्सा से बहुत बलवान था. उन्होंने मुझे अपने बाँहों में उठा कर अपने गले से लगा लिया.मैं उनके गले को अपनी बाँहों से ज़क्कड़ किया और जोर से रोने लगी. मैं सुबक-सुबक कर रो रही थी. बड़े मामा ने मुझे अपने से िचपका कर मेरे कमरे की तरफ चल पड़े.

कमरे में उन्होंने मुझे धीरे और प्यार से बिस्तर पर लिटा दिया. मैं अभी भी ज़ोर-ज़ोर से रो रही थी. बड़े मामा भी बिस्तर में मेरे साथ लेट गए. मैंने उनकी तरफ पलट कर उन्हें अपनी बाँहों में भर उनसे लिपट गयी.

मैं बहुत देर तक रोती रही. बड़े मामा प्यार से मेरे बालों को सहलाते रहे. आखिर कर मैंने रोना बंद किया.

बड़े मामा ने मुझे सीधा लिटा कर अपना सिर अपने हाथ पर टिका कर प्यार से एकटक मेरे आंसू से मलिन चेहरे को देख रहे थे.

उनकी प्यार भरी आँखों में अपनी आँखे डालने के बाद मेरे चेहरे पर मुस्कराहट अपने आप आ गयी. मुझे अब पता चला कि मेरे बेतहाँ रोने से मेरी नाक भी बह रही थी.

बड़े मामा ने मेरी सूजी हुई आँखों को प्यार से चूमा. फिर उन्होंने मेरे पूरे मलिन चेहरे को अपने होठों और जीभ से बड़े प्यार से साफ़ कर दिया.

बड़े मामा ने अपनी जीभ से मेरी सुंदर नाक चूम और चाट कर साफ़ की. फिर उन्होंने अपनी झीभ की नोंक मेरी दोनों नथुनों के अंदर बारी-बारी से डाल कर मेरे नथुनों को साफ़ कर दिया. मैं अब खिलखिला कर हंस रही थी.

बड़े मामा ने मुझे अपनी बाँहों में भर कर धीरे-धीरे मेरे बालों को सहला कर सुला दिया. मुझे तो बहुत बाद में पता चला. बड़े मामा, जब मैं सो गयी, तो काफी देर तक मुझे सोते हुए देखते रहे. उनको मेरी गहरी नींद में मेरी ज़ोर की साँसें और मृदु खर्राटें सुन कर आत्मिक प्रसन्नता मिली.

****************** ८***************

=========तीसरा अध्याय ===

मैं सुबह देर से ऊठी. मेरा मन बिस्तर से निकलने का नहीं हुआ. मैं जगी हुई बिस्तर में लेटी रही. करीब नौ बजे होंगे जब अंजू भाभी मेरे कमरे में मुस्कुराती हुईं दाखिल हुईं. वो अभी भी रात के गाउन में थीं. उन्हें देख कर मेरा चेहरा खिल ऊठा.

"नेहा, अभी तक बिस्तर में हो? क्या मुझे निमंत्रण दे रही हो? यदी चाहो तो मैं तुम्हारे जैसे प्यारी सुंदर नन्द को बहुत प्यार कर सकती हूँ. पर मेरा विचार है कि तुम्हे एक औरत की चूत नहीं एक बड़े मर्द का विशाल लंड चाहियें," अंजू भाभी ने हमेशा कि तरह अश्लील भाषा में मज़ाक करने शुरू कर दिए.

अंजू भाभी जल्दी से मेरे साथ बिस्तर में घुस गयीं. उन्होंने गाऊन के नीचे कोई ब्रा और जांघिया नहीं पहन रखा था.

अंजू भाभी ने मुझे अपने बाँहों में भर लिया. उन्होंने फिर बहुत प्यार से मेरे मूंह का चुम्बन लिया. अंजू भाभी भी अभी-अभी बिस्तर से निकली थीं और उन्होंने सुबह-सवेरे की कोई सफाई नहीं की थी. उनके मूंह में, मेरे मूंह के जैसे, रात के सोने बाद का मीठी सुगंध और मीठा स्वाद था.

"नेहा, क्या तुमने मनू को नीलम कि चुदाई करते हुई देखा?" अंजू भाभी सर्वज्ञ मालूम होतीं थीं.

मैंने शर्म से भरे लाल चेहरे से मनू भैया और नीलम भाभी के पहली चुदाई का विस्तृत रूप से वर्णन दिया. मैंने बड़े मामा से मिलने का कोई संकेत नहीं दिया. अंजू भाभी ने मुझे न जाने कितनी बार मुझे होठों पर चुम्बन दिया.

"नेहा, क्या तुम्हारा दिल नहीं करता, एक मूसल जैसे बड़े लंड से चुदवाने का?" अंजू भाभी हमेशा से मेरे साथ अश्लील, सम्भोग की बातें करती थीं.

मेरे चेहरे पर रात की बात याद आते ही शायद थोड़ी सी उदासी छा गयी थी. मैंने धीरे से सिर हिला कर हांमी भर दी.

"नेहा, जब तुम चाहो मुझे बता देना. मैं तुम्हारे नरेश भैया से तुम्हारी चुदाई का इंतज़ाम करवा दूंगीं."

नेहा के आखें बहर निकल पड़ीं, "भाभी, क्या कह रही हो? भैया और मैं एक दुसरे को चोदेंगें?"

अंजू भाभी ने प्यार से मेरी नाक के ऊपर चुम्बन दिया,"बहन-भाई, यह सब बकवास है. यह पिछड़े हुए दकियानूसी रुकावटें है प्यार के रास्ते मैं. यदि मैं अपने सिर्फ अपने भाई से ही शादी करना चाहती तो यह समाज मुझे रोक सकता था? नहीं. मैं और मेरे भैया दूर कहीं जा कर अपनी गृहस्थी बसा लेते. जैसे मैंने पहले बोला, नेहा, समाज के प्रतिबन्ध केवल बेवकूफ लोगों के लिये होतें हैं."

अंजू भाभी ने मेरी पूरे नाक अपने मूंह में लेकर बड़े प्यार से उसे चूसा. फिर अपनी जीभ मेरे दोनों नथुनों में डाल कर अपने थूक से मेरी नाक भर दी. मैं खिलखिला कर हंस रही थी.

"नेहा, सच में. जब तुम तैयार हो मुझे बता देना. तुम्हारे नरेश भैया अपने को खुशकिस्मत समझेंगें यदि तुम उनसे अपनी चूत मरवाने का निर्णय करोगी." अंजू भाभी ने मुझे प्यार से चूमा और नाश्ते के लिए तैयार होने के लिये कह कर खुद तैयार होने के लिए अपने बंगले की तरफ चल दीं.

*********

मैं नहा-धो कर तैयार हो गयी. मैंने एक हलके नीले रंग का कुरता और सफ़ेद सलवार पहनी. मैंने कुरते के नीचे ब्रा नहीं पहनी क्योंकी मेरी चूचियां बड़े मामा से कल रात मसलवाने के बाद अभी भी दर्द कर रहीं थीं. मैंने चुन्नी लेने की की ज़रुरत भी नहीं समझी. नाश्ते के लिए जाते वक़्त जब मैं लम्बे गलियारे में थी तो किसीने मुझे पीछे से पकड़ कर नज़दीक के कमरे में खींच लिया. अब मुझे समझने मे कुछ ही क्षण लगे की ऐसा तो सिर्फ एक व्यक्ती ही कर सकते थे. और वास्तव में मेरे बड़े मामा ही ने मुझे खींच कर खाली कमरे मे अंदर ले गये. मेरी साँसे तेज़-तेज़ चलने लगी. मामाजी ने मेरी दोनों उरोज़ों को अपने बड़े-बड़े हाथों से ढक लिया. मैंने अपने शरीर को उनके बदन पर ढीला छोड़ दिया. मेरे पितातुल्य बड़े मामा ने मेरे दोनों उरोज़ों को पहले धीरे-धीरे सहला कर फिर काफी जोर से मसलना शुरू कर दिया. हम दोनों ने अब तक एक भी शब्द नहीं बोला था. मेरी तरुण अवयस्क शरीर मे वासना की आग फिर से भड़क उठी. मेरी आँखें कामंगना के उद्वेग से अपने आप बंद हो गयीं. मेरी सांस अब बहुत ज़ोर से चल रही थी. बड़े मामा ने कुरते के ऊपर से ही मेरे दोनों उरोज़ों की घुन्दीयाँ अपने अंगूठे और पहली उंगली के बीच मे दबा कर उनको उमेठने लगे. मेरे मूंह से अविराम सिस्कारियां निकालने लगीं.

बड़े मामा का एक हाथ मेरी चूची को अविराम मसलता रहा. उनका दूसरा हाथ मेरे कुरते को ऊपर खींचने लगा. उन्होंने मेरे कुरते को पेट तक उठा कर मेरे मुलायम गुदाज़ उभरे हुए पेट की कोमल खाल पर अपने हाथ फिराने लगे. उनका हाथ धीरे-धीरे मेरी सलवार के नाड़े तक पहुच गया. मेरा हृदय अब रेल के इंजन की तरह धक-धक रहा था. मैं वासना के ज्वार मे भी डर रही थी की कोई हम दोनो को इस अवस्था मे पकड़ ना ले. मेरे मुंह से बड़े मामा को रोकने के लिए शब्द निकल कर ही नहीं दिये.

बड़े मामा ने मेरी सलवार का नाड़ा खोल दिया और मेरी सलवार एक लहर मे मेरी टखनों के इर्द-गिर्द इकट्ठी हो गयी. मामाजी ने मेरे सफ़ेद झान्घिये के अंदर अपना हाथ डाल दिया. मैं शरीर मे एक बिजले सी कौंध गयी. मामाजी की उँगलियों ने मेरे घुंघराले झांटों से खेलने लगीं. मेरी दिल की धड़कन अब मेरे छाती को फाड़ने लगी. मेरी सांस अब रुक-रुक कर आ रही थी. मामाजी ने अपनी उँगलियों से मेरी चूत के भगोष्ठ को भाग कर मेरी चूत के मूंह पर अपनी उंगली रख दी. उनकी उंगली ने धीरे से मेरे बिलकुल गीली चूत के अंदर जाने का प्रयास किया.मैं दर्द और घबराहट से छटपटा उट्ठी.मामाजी ने अपनी उंगली को हटा कर मेरे भागान्कुर को सहलाने लगे. मेरा शरीर फिर से ढीला होकर मामाजी के शरीर पर ढलक गया. मामाजी ने कल रात की तरह मेरे चूत की घुंडी को अपनी उंगली से सहलाना शुरू कर दिया. मेरी चूत मे से लबालब रतिरस बहने लगा. मामाजी ने एक हाथ से मेरी चूची को मसला और दुसरे हाथ से मेरी भग-शिश्न को कस कर मसलना शुरू कर दिया. मेरे तरुणावस्था की नासमझ उम्र मे मेरी वासना की कोई सीमा नहीं थी. मैं अपने चरम-आनन्द की प्रतीक्षा और कामना से और भी उत्तेजित हो गयी. बड़े मामा के अनुभवी हाथों और उँगलियों ने मुझे कुछ ही देर मे पूर्ण यौन-आनन्द के द्वार पर पहुंचा दिया. मेरी चूत का पानी मेरी झंगों पर दौड़ रहा था. मेरी कामुकता अब चरम सीमा तक पहुँच चुकी थी. मेरे कुल्हे अब अबने-आप आगे-पीछे होने लगे. मेरी हलक से एक छोटी सी चीख निकल पडी. मेरे बड़े मामा ने मेरी चूत को अपने हाथों के जादू से मेरे आनन्द की पराकाष्ठा को मेरे शरीर मे एक तूफ़ान की तरह समाविष्ट कर दिया. मेरी चूत मे से एक तीखा दर्द उट्ठा और मेरी दोनों उरोज़ों मे समा गया. मुझे लगा जैसे मेरी पेट मे कोई तेज़ ऐंठन है जो बाहर निकलना चाह रही है.

अचानक मेरा शरीर बिलकुल ढीला पड़ गया. मेरे घुटने मेरा वज़न उठाने के लिए अयोग्य हो गये. मेरे कामोन्माद के स्खलन ने मुझे बहुत क्षीण सा बना दिया. मामजी ने मुझे अपनी बाँहों मे लपेटे रखा. जब मुझे थोडा सा होश आया तो उन्होंने बिना कुछ बोले मुझे अपनी बाँहों से मुक्त कर कमरे से बाहर चले गये.

मैं बहुत देर तक अपनी उलझन भरी अवस्था मे अर्धनग्न खाली कमरे मे खड़ी रही. फिर मैंने धीरे-धीरे थके ढंग से अपनी सलवार ऊपर खींच कर नाड़ा बांधा. मैं थोड़ी देर चुपचाप अकेले खड़ी रही. फि